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Wednesday, February 10, 2016

तुम लिखो कवि

( कवि नित्यानंद गायेन के लिए)

तुम लिखो कवि
दोस्त में छिपे दुश्मन को लतियाकर लिखो
बेख़ौफ़ होकर लिखो क़ि तुम हम सबकी जुबां हो
हमारी मरी आत्माओं का मर्सिया हैं तुम्हारी कविताएँ
क़ि बार बार बीच का रास्ता तलाशते हैं हम
और तुम करते रहते हो सचेत मित्र
कि बीच का कोई रास्ता नहीं होता
अभी अभी तो वह पूछकर गया है कवि
कि बताओ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?
और हम बगलें झाँक रहे हैं तब से
कि हम हर बार लेते रहे हैं विजेता का पक्ष
कि हारे हुए लोग हमेशा से मिटा दिए जाते हैं इतिहास के पन्नों से
तुम लड़ रहे हो हमारे अचेतन में वाबस्ता उस युद्ध को
जिसका हम बनना चाहते रहे इक सिपाही
लेकिन हमने जीतने वालों में खुद को
शुमार कराने का जब से सीखा हुनर
लड़ाइयां तुम हारते रहे कवि
लोकगाथाओं का इतिहास,
चीख चीख कर तैयार करता रहा अपने समय के कवि को
लोकमानस गाता रहा कवि के गीत
और हमारे उच्छ्वास से, सजती रही राजाओं की महफिलें
बजते रहे घुंघरू छन छना छन
मादक सिसकारियों में खोज रहे थे
हमारे समय के आलोचक
एक नया सौंदर्यशास्त्र
कितनी चालबाजियां करते रहें हम
तुम्हारा आर्तनाद, तुम्हारी प्रेम की तड़प
और इंक़िलाब की चाहत से
पैदा होते रहेंगे सदा प्रेमी और इंकलाबी।
ये बगावत का उद्घोष है कवि
जो हमारी समझौता-परस्त आत्मा को
कुरेदती रहेगी पीढ़ियों तक।
इसलिए कवि तुम वही कहो जो तुम्हें कहना है
क्योंकि तुम हमारे कवि हो
क्योंकि तुम हमारी अनकही अभिव्यक्ति हो.....

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