शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

कुछ अपनी बात : दो

 

माता-पिता

 

अब्बा स्व.अब्दुल गफ्फार

अब्बा को नगर में गफ्फार-गुरूजी के नाम से जाना जाता है. जबसे हमने होश संभाला उन्हें सफ़ेद लम्बी कमीज़, सफ़ेद पजामा और सिर पर सफ़ेद गांधी टोपी. अब्बा की लम्बाई छः फुट है, अपनी गांधी टोपी के कारण वे भीड़-भाड़ में भी आसानी से दिखलाई दे जाते थे, तब मैं रास्ता बदल लिया करता और चुपचाप घर में घुस जाता. अब्बा चाहते हैं कि बच्चे फालतू घूमे-फिरें नहीं और घर में रहकर पढ़ें-लिखें.

अब्बा जब पांच बरस के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था. तब हमारी स्वर्गीय दादी ने उनका पालन-पोषण मजदूरी करते हुए किया. अब्बा पढने में कुशाग्र थे और स्थानीय मस्जिद में अक्सर नमाज़ पढने जाते थे. तब मस्जिद से भी उन्हें पढाई-लिखाई के लिए मदद मिल जाती थी. अब्बा ने बैकुंठपुर छग से उस जमाने में बुनियादी शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया और नगर के जनपद विद्यालय में शिक्षक हो गये. इस बीच उन्होंनें स्नातक की पढाई शुरू की जो स्वास्थ्य आदि कारणों से पूरी हो सकी. वे सागर विश्व-विद्यालय से बीए कर रहे थे. इस साध को उन्होंने बाद में पूरा किया...वे गुरु घासीदास विवि से पचास वर्ष की उम्र में बीए कर पाए.

इस बीच उनका चयन रेलवे प्राथमिक विद्यालय मनेंद्रगढ़ में हो गया. मनेन्द्रगढ़ का रेलवे स्कूल अब्बा के कारण ही चर्चित रहा. उनके पढाई कई पीढियां आज भी नगर में उन्हें बड़े सम्मान से अभिवादन करती हैं. अब्बा अब भी स्वाध्यायी हैं और लगभग अस्सी बरस की उम्र में भी बड़े सात्विक, परहेजगार और खुद्दार हैं. अब भी नगर की सामाजिक संस्थाओं में आर्थिक मदद करते रहते हैं.

 

अम्मी- स्वर्गीय श्रीमती जाहिदा इस्माइल.

अम्मी का निधन २००४ में हुआ. वे बिहार के औरंगाबाद की थीं. उनकी खाला जो बाल-विधवा थीं, काफी पढ़ी-लिखी थीं और औरंगाबाद के स्कूल में अध्यापिका थीं. अम्मी का बचपन अपनी खाला के साथ गुज़रा. इसलिए वे उर्दू, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी भाषा की अच्छी जानकार थीं. अम्मी जैसे एक चलता-फिरता शब्दकोष थीं. वे बड़ी फुर्तीली थीं और उन्होंने शादी के बाद अब्बा की गृहस्ती को दिल लगाकर आत्मसात किया. वे अपनी सास यानी हमारी दादी की भी बड़ी खिदमत किया करती थीं. अब्बा नौकरी में बड़े नियमित हैं और नौकरी से साथ पांच वक्त के नमाज़ी भी..अम्मी उनके टाइम-टेबल के अनुरूप ही खुद को और पूरे परिवार को ढाले रखतीं. सुबह फजिर की नमाज़ के बाद वे रसोई के काम में जुट जातीं और सात बजे अब्बा के लिए नाश्ता हाज़िर, उनके बाद हम बच्चों के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार. हम सब स्कूल चले जाते तो अम्मी दादी को नाश्ता देतीं और फिर खुद नाश्ता करके बर्तन मांजने और कपड़े धोने के काम में लग जातीं. दुपहर डेढ़ बजे अब्बा को खाना चाहिए होता उसके बाद वे जुहर की नमाज़ पढने मस्जिद चले जाते. जुहर के बाद अब्बा घर लौटते तो दो घंटा कमर सीधी करने के नाम पर हुजरे में चले जाते तब हम बच्चे बेआवाज़ खेल खेला करते..जैसे लूडो वगैरा. इस समय अम्मी या तो स्वेटर बुनतीं, या क्रोशिये की कढ़ाई का काम किया करतीं या थालपोश, तकिया गिलाफ आदि में बेलबूटे की कशीदाकारी किया करतीं.

अम्मी आचार, पापड, बड़ी आदि बनाने में भी पारंगत थीं, साथ ही उन्हें उर्दू की किताबें पढने का शौक था. वे अक्सर उर्दू मासिक पत्रिकाबीसवीं सदी’, बानो पढ़ा करतीं. हिंदी में वे सरिता और मनोरमा पत्रिका पढ़ती थीं. उन्हें इब्ने सफी बीए की जासूसी दुनिया पढने का भी शौक था. उनके इस शौक के कारण मैंने उर्दू लिखना-पढना सीखा. मैं जब उर्दू पढने लगा था तब इब्ने सफी बीए की जासूसी दुनिया की पचासों किताबें बांच डाला था..मुझे इब्ने सफी के किरदार कर्नल फरीद, कैप्टन हमीद, इमरान, कासिम जैसे पात्र अपने वजूद में ढलते नजर आते थे. उनकी लेखनी में बड़ी अजब किस्सागोई थी. फिर बाद में मैंने स्थानीय भारत पुस्तक भण्डार से दस पैसे प्रति दिन के किराए पर लाकर इब्ने सफी बी की तमाम किताबें हिंदी में भी पढ़ डालीं. यहीं से मुझे पढने का रूचि जागी. तो अम्मी की भूमिका है मेरे अन्दर कथाकार को आकार देने में...गर्मियों की रात आँगन में चारपाई डाल कर हम बच्चे अम्मी के ऊपर, इधर-उधर लदे रहते और अम्मी हमें नबियों, पैगम्बरों के किस्से, लोक-कथाएं सुनाया करतीं. इलाहाबाद तरफ से चूड़ी वालियां आतीं तो एक-दो रात वे हमारे घर में ही रुक जातीं. अम्मी के अन्दर पेड़-पौधों से भी दोस्ती कर लेने की क्षमता थी. वे औरतें जब रुकती तो रात में हम बच्चों को भूत-प्रेत, राजा-रानी के अनगिनत किस्से सुनाया करती थीं. हम साल भर उनके आने की प्रतीक्षा किया करते थे.

इसी तरह अम्मी अक्सर मीर, ग़ालिब, जौक, दाग़, हफीज़ आदि के शे सुनाया करतीं. उनकी आवाज़ बड़ी मधुर थी. वह लता, सुरैया के नगमे गुनगुनाया करतीं और उन्हें मुकेश का वो गीत बड़ा पसंद था---

मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ दो

जिसकी आवाज़ भुला दे मुझे वो साज़ दो!

तो ऐसी नफासत पसंद थीं अम्मी, उनके हुनर के कारण मुहल्ले की कुंवारी लडकियाँ उनसे बुनाई, कढाई, सिलाई आदि सीखने आया करतीं. हमारा मुहल्ला एक हिन्दू मुहल्ला है जिसमें सिर्फ हमारा घर मुस्लिम है, लेकिन अम्मी की बहुरंगी प्रतिभा के कारण महिलाएं उनसे छुआ-छूत नहीं किया करती थीं. इसीलिए तीज-त्यौहार में घर में किसिम-किसिम के खाद्य पदार्थ आया करते थे.

अम्मी का कला-संस्कार हम बच्चों को भरपूर मिला...शायद यही कारण है कि मैं लिखने-पढने लगा, गाना गाने लगा और पेंटिंग बनाने लगा.

अब्बा को सिर्फ इस बात से मतलब था कि बच्चे गलत संगत में पड़ें...इसलिए वे हमारी कलाप्रियता को प्रोत्साहित भले करते हों, लेकिन रोड़े नहीं अटकाते थे. हम स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया करते थे. नाटक में रोल किया करते ये सब अम्मी की निगरानी में होता था.

  

 

 

3.  शिक्षा-दीक्षा   

मनेन्द्रगढ़, तब मध्य-प्रदेश के सरगुजा जिले का एक तहसील था. बाद में जब छत्तीसगढ़ बना तब मनेन्द्रगढ़ कोरिया जिले में गया. उसी मनेन्द्रगढ़ के रेलवे स्कूल में मैंने प्राथमिक शिक्षा पाई. उसके बाद नगर के शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मैंने छठवी से लेकर ग्यारहवीं तक की पढाई की.

उसके बाद शहडोल के शासकीय पोलिटेक्निक से मैंने खनन अभियांत्रिकी में डिप्लोमा लिया.

कोल इंडिया लिमिटेड में नौकरी करते हुए प्रबंधन की परीक्षा पास की और वर्तमान में कोल इंडिया में वरिष्ठ प्रबंधक पद पर कार्यरत हूँ.