बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

श्रम के सौंदर्य के कवि हैं अनवर सुहैल

ज़ीनित सबा 

 


अनवर सुहैल समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख कथाकार होने के साथ साथ महत्वपूर्ण कवि भी हैं. उन्हें लोग विशेष रूप से ‘गहरी जड़ें’ कहानी संग्रह और ‘पहचान’ उपन्यास के लिए ही जानते हैं, इस दृष्टि से उनका कवि पक्ष उपेक्षित रहा है.

उनकी काव्यात्मक रचनाशीलता से परिचित होने से पूर्व उनका संक्षिप्त परिचय अपेक्षित है. अनवर सुहैल ‘जो रचेगा वही बचेगा’ सूक्त वाक्य का पालन करने वाले कवि हैं. उन्होंने अपने साक्षात्कार में कहा ‘मेरे लिए लिखना उतना ही आवश्यक है, जितना की सांस लेना.’
नौकरी की व्यस्तताओं और जिम्मेदारियों के बीच भी उनका लेखन का संकल्प नहीं टूटा.

अनवर सुहैल की साहित्यिक जीवन की शुरुआत कविता से होती है.  बाद में उन्होंने कहानी, व्यंग्य आदि लिखना प्रारंभ किया.

अनवर सुहैल अपने साक्षात्कार में बताते हैं कि उनकी पहली कविताएँ स्कूल की पत्रिका में प्रकाशित होती थीं.  ये कविताएँ हिंदी और उर्दू का मिश्रण हुआ करती थीं. बाद में उनकी कविताएँ छोटी-बड़ी पत्रिकाओं में भी छपने लगीं.

उनकी कुछ कविताएँ आकाशवाणी से भी प्रसारित हुआ करती थीं. कविता कहने की कला के कारण उनकी खूब प्रशंसा हुई. यहीं से कवि के रूप में उनकी प्रसिद्धि भी होने लगी  ‘और थोड़ी सी शर्म दे मौला’(2007), ‘संतों काहे की बेचैनी’ (2009), ‘कठिन समय में’, ‘उम्मीद बाकी है अभी’, ‘कुछ भी नहीं बदला’ और ‘डरे हुए शब्द’ (2018) आदि उनकी कविता-संग्रह हैं.

अनवर सुहैल कविताओं में समकालीन समाज की विसंगतियों को प्रस्तुत करते हैं. यह इसलिए भी हुआ है कि कवि अपने समकाल में जीता है.  समकालीन समस्याएँ ही उन्हें लिखने के लिए मजबूर किया करती हैं.

अनवर सुहैल कविताओं में यथार्थ का स्पष्ट चित्रण प्रस्तुत करते हैं. उनकी कविताओं में किसी प्रकार का दुराव या छुपाव नहीं दिखाई देता. वास्तविकता को निर्भीक रूप में प्रस्तुत करना कवि का ध्येय है।

उनकी चिंता के केंद्र में मेहनतकश आम जन हैं. स्वतंत्रता के कई वर्षों बाद भी आम वर्ग किस प्रकार अपनी मौलिक आवश्यकताओं को ही पूर्ण करने में सक्षम नहीं हैं यह उनकी चिंता का विषय है. साथ ही उनकी कविताओं में यह भी स्पष्ट है कि किस प्रकार सत्ताधारियों के चिंतन में अभाव से पीड़ित जनता नहीं है –

“दुर्भाग्य ग़ुरबत की मारी
जनता रोवै बेचारी मांगे रोटी और बिछौना
मिले आश्वासनों का खिलौना. ”

उनकी दृष्टि हाशिये के लोगों पर भी गयी. अनवर सुहैल ने कविताओं के माध्यम से भारतीय मुस्लिम परिवेश में व्याप्त एक अनजाने डर को भी आवाज़ देने का प्रयत्न किया है.

उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने ‘अल्पसंख्यक वर्ग’ की आन्तरिक और बाहरी दोनों समस्याओं पर बात की है . उनकी सेकुलर दृष्टि उन्हें अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक के पक्षधर होने से कोसों दूर रखता है.

अनवर सुहैल की कविताओं में अल्पसंख्यक विमर्श के तत्व बखूबी मौजूद हैं.  उन्होंने ‘अल्पसंख्यक’, ‘वहम’, ‘मुसलमान’, ‘गोधरा के बाद’, ‘बम और अनाज’ आदि कविताओं में अल्पसंख्यक विमर्श के मुद्दे जैसे पहचान का संकट, असुरक्षा का सवाल, राष्ट्रीयता पर संदेह आदि को प्रस्तुत किया है.
उदाहरण स्वरुप ये पंक्तियाँ देखिये –
“उनसे फिर
नहीं पूछता कोई
तुम किस प्रदेश या जिले के निवासी
जब जान जाते बहुसंख्यक
उसका नाम है सुलेमान
वह है एक मुसलमान
इसके अलावा नहीं हो सकती
और कोई पहचान.”

जैसा कि हम जानते हैं, हर रचनाकार अपने परिवेश से प्रभावित होता है. उसी प्रकार अनवर सुहैल भी अपने परिवेश से प्रभावित रहे.  आपने कर्म क्षेत्र को भी अपनी कविताओं का विषय बनाया.

उन्होंने कोयला खदान पर कई कविताएँ लिखीं जैसे–‘खनिकर्मी’, ‘मुहाडा’, ‘बालकरन पिता सोमारू’, ‘कोयला खनिक का आसमान’, ‘कोयला खदान का अँधेरा’ आदि. कोयला खदान पर बात करते हुए कोयला खदान का माहौल, उसमें कार्यरत खनिकर्मियों की जीवन संघर्ष और उनकी जिजीविषा को कवि अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हैं.

अनवर सुहैल की दृष्टि मनुष्य के श्रम सौन्दर्य की ओर गयी है, इसलिए उनके यहाँ सौंदर्यशास्त्र की परिभाषा भी बदली हुई है.

“यकीन करें आप
नहीं खोज पाएंगे
मेरी कविताओं में
कोमलकांत पदावली
रस-छंद-अलंकार युक्त भाषा
क्योंकि मैं एक खनिक हूँ
खदान में खटते-पदते
खो गया सौन्दर्यशास्त्र. ”

अनवर सुहैल उत्तर आधुनिक युग में फैले बाजारवाद और उपभोक्तावाद की भी कलई खोलते हैं.  ‘बाज़ार’ नामक कविता उनकी इसी से संबंधित है. कवि ने अपनी कविताओं में बाज़ारवाद को बढ़ावा देने वाले विज्ञापनों की भी मुखालफ़त की है. इस दौर में मानवीय मूल्य में आई गिरावट को भी वह अपनी कविता का विषय बनाते हैं.

संबंधों कि ऊष्मा निरंतर शिथिल पड़ रही है, इसलिए परिवार विघटन तथा बुजुर्गों की समस्याएँ बढ़ती गयी है.  इससे सम्बंधित कविता –
“बुजुर्गों की देखभाल से बचने के लिए बच्चे
जाते बार-बार बाज़ार के पास
जहाँ से मिलती कर्ज की सहूलियतें
वह भी आसान किस्तों में
ई एम आई का जिन्न के आगे
कहाँ आएं उन्हें बुजुर्ग माँ-बाप ?”

बुजुर्गों की समस्याओं पर उन्होंने ‘बुजुर्गों के लिए’, ‘अनुपयोगी’ आदि कविताएँ लिखीं हैं.
अनवर सुहैल की कविताओं में उनके व्यक्तिगत जीवन की भी झांकी प्रस्तुत होती है जैसे अम्मा, पिता:एक, पिता:दो, ‘हिना बेटी से’, ‘शिकायत’  आदि  के अलावा उन्होंने अन्य कई विषयों पर लिखीं हैं.

अनवर सुहैल की कविताएँ-

1. किताबें

बड़े जतन से संजोई किताबें
हार्ड बाउंड किताबें
पेपरबैक किताबें
डिमाई और क्राउन साइज़ किताबे
मोटी किताबें, पतली किताबें
क्रम से रखी नामी पत्रिकाओं के अंक
घर में उपेक्षित हो रही हैं अब…
इन किताबों को कोई पलटना नही चाहता
खोजता हूँ कसबे में पुस्तकालय की संभावनाएं
समाज के कर्णधारों को बताता हूँ
स्वस्थ समाज के निर्माण में
पुस्तकालय की भूमिका के बारे में…
कि किताबें इंसान को अलग करती हैं हैवान से
कि मेरे पास रखी इन बेशुमार किताबों से
सज जाएगा पुस्तकालय
फिर इन किताबों से फैलेगा ज्ञान का आलोक
कि किताबों से अच्छा दोस्त नही होता कोई
इसे जान जाएगी नई पीढी
वे मुझे आशस्त करते हैं और भूल जाते हैं…

मौजूदा दौर में
कितनी गैर ज़रूरी हो गई किताबें
सस्तई के ज़माने में खरीदी मंहगी किताबें
बदन पर भले से हों फटी कमीज़
पैर को नसीब न हो पाते हों जूते
जुबान के स्वाद को मार कर
खरीदी जाती थीं तब नई किताबें
यहाँ-वहाँ से मारी जाती थीं किताबें
जुगाड़ की जाती थीं किताबें
और एक दिन भर जाता था घर किताबों से
खूब सारी किताबों का होना
सम्मान की बात हुआ करती थी तब…

बड़ी विडम्बना है जनाब
डिजिटल युग में सांस लेती पीढ़ी
किसी तरह से मन मारकर पढ़ती है
सिर्फ कोर्स में लगी किताबें….
मेरे पास रखी इन किताबों को बांचना नही चाहता कोई
दीमक, चूहों से बचाकर रख रहे हैं हम किताबें
खुदा जाने
हमारे बाद इन किताबों का क्या होगा……

 

2. बाज़ार में स्त्री

छोड़ता नही मौका
उसे बेइज्ज़त करने का कोई

पहली डाले गए डोरे
उसे मान कर तितली
फिर फेंका गया जाल
उसे मान कर मछली
छींटा गया दाना
उसे मान कर चिड़िया
सदियों से विद्वानों ने
मनन कर बनाया था सूत्र
“स्त्री चरित्रं…पुरुषस्य भाग्यम…”
इसीलिए उसने खिसिया कर
सार्वजनिक रूप से
उछाला उसके चरित्र पर कीचड…

फिर भी आई न बस में
तो किया गया उससे
बलात्कार का घृणित प्रयास…
वह रहा सक्रिय
उसकी प्रखर मेधा
रही व्यस्त कि कैसे
पाया जाए उसे…
कि हर वस्तु का मोल होता है
कि वस्तु का कोई मन नही होता
कि पसंद-नापसंद के अधिकार
तो खरीददार की बपौती है
कि दुनिया एक बड़ा बाज़ार ही तो है
फिर वस्तु की इच्छा-अनिच्छा कैसी
हाँ..ग्राहक की च्वाइस महत्वपूर्ण होनी चाहिए
कि वह किसी वस्तु को ख़रीदे
या देख कर
अलट-पलट कर
हिकारत से छोड़ दे…
इससे भी उसका
जी न भरा तो
चेहरे पर तेज़ाब डाल दिया…
क़ानून, संसद, मीडिया और
गैर सरकारी संगठन
इस बात कर करते रहे बहस
कि तेज़ाब खुले आम न बेचा जाए
कि तेज़ाब के उत्पादन और वितरण पर
रखी जाये नज़र
कि अपराधी को मिले कड़ी से कड़ी सज़ा
और स्त्री के साथ बड़ी बेरहमी से
जोड़े गए फिर-फिर
मर्यादा, शालीनता, लाज-शर्म के मसले…!

 

3. लोकतंत्र का महापर्व

बताया जा रहा हमें
समझाया जा रहा हमें
कि हम हैं कितने महत्वपूर्ण
लोकतंत्र के इस महा-पर्व में
कितनी महती भूमिका है हमारी
ईवीएम के पटल पर
हमारी एक ऊँगली के
ज़रा से दबाव से
बदल सकती है उनकी किस्मत
कि हमें ही लिखनी है
किस्मत उनकी
इसका मतलब
हम भगवान हो गए…
वे बड़ी उम्मीदें लेकर
आते हमारे दरवाज़े
उनके चेहरे पर
तैरती रहती है एक याचक-सी
क्षुद्र दीनता…
वो झिझकते हैं
सकुचाते हैं
गिड़गिडाते हैं
रिरियाते हैं
एकदम मासूम और मजबूर दिखने का
सफल अभिनय करते हैं
हम उनके फरेब को समझते हैं
और एक दिन उनकी झोली में
डाल आते हैं…
एक अदद वोट…
फिर उसके बाद वे कृतघ्न भक्त
अपने भाग्य-निर्माताओं को
अपने भगवानों को
भूल जाते हैं….

 

4. विडंबना

उनकी न सुनो तो
पिनक जाते हैं वो
उनको न पढो तो
रहता है खतरा
अनपढ़-गंवार कहलाने का
नज़र-अंदाज़ करो
तो चिढ़ जाते हैं वो
बार-बार तोड़ते हैं नाते
बार-बार जोड़ते हैं रिश्ते
और उनकी इस अदा से
झुंझला गए जब लोग
तो एक दिन
वो छितरा कर
पड़ गए अलग-थलग
रहने को अभिशप्त
उनकी अपनी चिडचिड़ी दुनिया में…

 

5. ख़्वाब के मिलावट

उन अधखुली
ख्वाबीदा आँखों ने
बेशुमार सपने बुने
सूखी भुरभरी रेत के
घरौंदे बनाए
चांदनी के रेशों से
परदे टाँगे
सूरज की सेंक से
पकाई रोटियाँ
आँखें खोल उसने
कभी देखना न चाहा
उसकी लोलुपता
उसकी ऐठन
उसकी भूख
शायद
वो चाहती नहीं थी
ख्वाब में मिलावट
उसे तसल्ली है
कि उसने ख्वाब तो पूरी
ईमानदारी से देखा
बेशक
वो ख्वाब में डूबने के दिन थे
उसे ख़ुशी है
कि उन ख़्वाबों के सहारे
काट लेगी वो
ज़िन्दगी के चार दिन…

 

6. दोस्त

वो मुझे याद करता है
वो मेरी सलामती की
दिन-रात दुआएँ करता है
बिना कुछ पाने की लालसा पाले
वो सिर्फ सिर्फ देना ही जानता है
उसे खोने में सुकून मिलता है
और हद ये कि वो कोई फ़रिश्ता नही
बल्कि एक इंसान है
हसरतों, चाहतों, उम्मीदों से भरपूर…
उसे मालूम है मैंने
बसा ली है एक अलग दुनिया
उसके बगैर जीने की मैंने
सीख ली है कला…
वो मुझमें घुला-मिला है इतना
कि उसका उजला रंग और मेरा
धुंधला मटियाला स्वरूप एकरस है
मैं उसे भूलना चाहता हूँ
जबकि उसकी यादें मेरी ताकत हैं
ये एक कडवी हकीकत है
यदि वो न होता तो
मेरी आँखें तरस जातीं
खुशनुमा ख्वाब देखने के लिए
और ख्वाब के बिना कैसा जीवन…
इंसान और मशीन में यही तो फर्क है……

 

7. अभिशप्त

जिनके पास पद-प्रतिष्ठा
धन-दौलत, रुआब-रुतबा
है कलम-कलाम का हुनर
अदब-आदाब उनके चूमे कदम
और उन्हें मिलती ढेरों शोहरत…
लिखना-पढ़ना कबीराई करना
फकीरी के लक्षण हुआ करते थे
शबो-रोज़ की उलझनों से निपटना
बेजुबानों की जुबान बनना
धन्यवाद-हीन जाने कितने ही ऐसे
जाने-अनजाने काम कर जाना
तभी कोई खुद को कहला सकता था
कि जिम्मेदारियों के बोझ से दबा
वह एक लेखक है हिंदी का
कि देश-काल की सीमाओं से परे
वह एक विश्‍व-नागरिक है
लिंग-नस्ल भेद वो मानता नहीं है
जात-पात-धर्म वो जानता नहीं ही
बिना किसी लालच के
नोन-तेल-कपडे का जुगाड़ करते-करते
असुविधाओं को झेलकर हंसते-हंसते
लिख रहा लगातार पन्ने-दर-पन्ने
प्रकाशक के पास अपने स्टार लेखक हैं
सम्पादक के पास पूर्व स्वीकृत रचनायें अटी पड़ी हैं
लिख-लिख के पन्ने सहेजे-सहेजे
वो लिखे जा रहा है…
लिखता चला जा रहां है…

 

8. कार्तिक मास में काले बादल

कार्तिक मास में काले बादल
आकाश में छाये काले बादल
किसान के साथ-साथ
अब मुझे भी डराने लगे हैं…

ये काले बादलों का वक्त नही है
ये तेज़ धुप और गुलाबी हवाओं का समय है
कि खलिहान में आकर बालियों से धान अलग हो जाए
कि धान के दाने घर में पारा-पारी पहुँचने लगें
कि घर में समृद्धि के लक्षण दिखें
कि दीपावली में लक्ष्मी का स्वागत हो

कार्तिक मास में काले बादल
किसान के लिए कितने मनहूस
संतोसवा विगत कई दिनों से
कर रहा है मेहनत
धान के स्वागत के लिये
झाड-झंखार कबाड़ के
उबड़-खाबड़ चिकना के
गोबर-माटी से लीप-पोत के
कर रहा तैयार खलिहान
कि अचानक फिर-फिर
झमा-झम बारिश आकर
बिगाड़ देती खलिहान…

इस धान कटाई, गहाई के चक्कर में
ठेकेदारी काम में
जा नही पाता संतोसवा
माथे पे धरे हाथ
ताकता रहता काले बादलों को

हे सूरज!
का तुम जेठ में ही तपते हो
कहाँ गया तुम्हारा तेजस्वी रूप
हमारी खुशहाली के लिए एक बार
बादलों को उड़ा दो न
कहीं दूर देश में
जहां अभी खेतों में पानी की ज़रूरत हो…

 

9. विभाजन-रेखा

एक विभाजन रेखा
दिखलाई देती साफ़-साफ़
कामगारों में भी
जिन काम में
ख़तरे ज्यादा
जिनमें श्रम ज्यादा
उनमें हैं मज़दूर
आदिवासी, दलित और पिछड़े
जिस काम में रहता आराम
वहां दिखते अगड़ी और
ऊंची जाति के लोग तमाम!

 

10. टिफिन में कैद रूहें

टिफिन में कैद रूहें
हम क्या हैं
सिर्फ पैसा बनाने की मशीन भर न
इसके लिए पांच बजे उठ कर
करने लगते हैं जतन
चाहे लगे न मन
थका बदन
ऐंठ-ऊँठ कर करते तैयार
खाके रोटियाँ चार
निकल पड़ते टिफिन बॉक्स में कैद होकर
पराठों की तरह बासी होने की प्रक्रिया में
सूरज की उठान की ऊर्जा
कर देते न्योछावर नौकरी को
और शाम के तेज-हीन सूर्य से ढले-ढले
लौटते जब काम से
तो पास रहती थकावट, चिडचिडाहट,
उदासी और मायूसी की परछाइयां
बैठ जातीं कागज़ के कोरे पन्नों पर….

और आप ऐसे में
उम्मीद करते हैं कि
मैं लिक्खूं कवितायें
आशाओं भरी
ऊर्जा भरी…?

 

11. खौफ के पल

उड़ रही है धूल चारों ओर
छा रहा धुंधलका मटमैली शाम का
छोटे-छोटे कीड़े घुसना चाहते आँखों में
ओंठ प्यास से पपडिया गए हैं
चेहरे की चमड़ी खिंची जा रही है
छींक अब आई की तब
कलेजा हलक को आ रहा है
दिल है कि बेतरतीब धड़क रहा है
साँसे हफ़नी में बदल गई हैं
बेबस, लाचार, मजबूर, बेदम
और ऐसे हालात में
हांके जा रहे हम
किसी रेवड़ की तरह…

वे वर्दियों में लैस हैं
उनके हाथों में बंदूकें हैं
उनकी आँखों में खून है
उनके चेहरे बेशिकन हैं
उनके खौफनाक इरादों से
वाकिफ हैं सभी…

ये वर्दियां किसी की भी हो सकती हैं
ये भारी बूट किसी के भी हो सकते हैं
ये बंदूकें किसी की भी हो सकती हैं
ये खौफनाक चेहरे किसी के भी हो सकते हैं
हाँ…रेवड़ में हम ही मिलते हैं
आँखों में मौत की परछाईं लिए
दोनों हाथ उठाये
बेदर्दी से हंकाले जा रहे हैं

हमारे भीतर प्रतिरोध की स्वाभाविक प्रवित्ति
जाने कब और कहाँ गुम गई
हम जान नहीं पाए
और अचानक खून के छींटों से
सजा चेहरा लेकर
जब तुम आये तो जैसे
उम्मीद एक कौंध की तरह
आ बसा हमारी आँखों में…

 

(कवि अनवर सुहैल का जन्म 09 अक्टूबर सन 1964 ई. में छतीसगढ़ के जांजगीर में हुआ.
प्रकाशित पुस्तकें : दो उपन्यास, तीन कथा संग्रह, कई कविता संग्रह,
सम्पादन : संकेत नामक लघुपत्रिका के सत्रह अंक.
सम्प्रति: कोल इंडिया में कार्यरत. संपर्क: sanketpatrika@gmail.com

टिप्पणीकार ज़िनित सबा हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं. इन्होंने अनवर सुहैल के उपन्यासों पर एम. फिल. किया है.)

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

मुहम्मद दीपक

 


अचानक तुम आये मुहम्मद दीपक
और जैसे इंसानों के बचे रहने की उम्मीद
फिर से तिनके जोड़ने लगे
बनने लगे घोंसले जिन्हें बार बार तोड़ा गया था
अचानक तुम आये मुहम्मद दीपक
जानते हो कितने सच्चे मित्रों को तुमने
बोलते रहने की जिजीविषा दी
वे सब खड़े हुए देखो इक- दूजे से
सामूहिक नफ़रतों के खिलाफ़
ज़रूरी नहीं हथियारों से ही बनते हों ज़ख्म
नफ़रतों से बने ज़ख्म कभी नहीं भरते
अचानक तुम आये मुहम्मद दीपक
यह जानते हुए कि तुम्हारे इस तरह आने से
इस बेमेल समय में रिस्क बहुत है
फिर भी तुमने जो राह चुनी
उस क्षण को सलाम
उस हौसले को सलाम

सोमवार, 26 जनवरी 2026

बेटियां

 

अब बेटियां भागती नहीं
 
अब बेटियां भागती नहीं
और न ही भगाई जाती हैं
बेटियां अब खुशी - खुशी
चली जाती हैं गांव से कस्बों में
कस्बों से शहर फिर महानगरों में
इतना कमाने के लिए इज़्ज़त से
कि रहने का खर्च निकल जाए
खाने और आने-जाने का किराया भी
मोबाइल रिचार्ज और वाई फाई के दाम
ये सब पेमेंट के आधे में निपटे
और इतनी ही राशि बैंक में बच जाए
बेटियां बड़े लगन से निपटाती हैं काम
कि खुश रहें कलीग और संस्थान
आजीविका की जंग लड़ते-लड़ते
वे टालती जाती हैं शादी के प्रश्न
वैसे वे जानती हैं मां पिता भाई के सवाल
कितने बेमानी हैं कि उनके पास
नहीं है कोई विकल्प सिवाय इसके
कि हर माह वह भेजती रहे पैसे
चलता रहे घर द्वार, कि छोटी बहन भी तो
हो गई विवाह योग्य, वह कहती तो
आँखें नम हो जातीं माँ पिता की
बस इतना कहते - "तू ठीक कहती है बेटी "
अब बेटियां भागती नहीं
बल्कि परिवार को संभाल कर
जिम्मेदार हो जाती हैं।।।


गुरुवार, 15 जनवरी 2026

हम उन्हें जानते हैं




हम जिन्हें जानते हैं
क्या वाक़ई हम उन्हें जान पाते हैं
बस, इतना ही काफ़ी नहीं होता

हम उनसे मिलें हों या न मिले हों
भावनाओं की नदी क्या सही में नदी नहीं होती
दिल की गहराइयों से किया प्यार क्या
ज़माने को ज़ाहिर होना चाहिए या उस प्यार को
क्षितिज के काल्पनिक स्थल पर
कील से किसी तस्वीर की तरह टांग देना चाहिए

हम हर चाहने वाले के प्रति
दिल से आभारी होते हैं
शुक्रगुज़ार रहते हैं और कुछ न कुछ
चाहते हैं देते रहना बेज़रूरत भी
यह कोई कर्ज़ नहीं है जिसे चुकता करना होता है
इसे हम हैसियत से बढ़कर करना चाहते हैं अदा

क्या यह कोई ज़रूरी शर्त है इस रिश्ते की
या इस बेनाम से रिश्ते को
कोई नाम देना हमारी मजबूरी है

तुम नाहक चिंता करते हो
हम बिना कुछ जताए
बिना कुछ पाए
बहुत कुछ गंवाकर भी
इस रिश्ते को बचाकर रखेंगे
इस तरह कि कोई जान भी न पाए
रिश्ते को बुरी नज़र न लग पाए।।।।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास

 डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास 

अनवर सुहैल



 

 

विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है. यह 2007 से मनाया जा रहा है. इसका अर्थ ये हुआ कि दुनिया में इस व्याधि के बारे में बहुत बाद में जागरूकता आई. इसके पूर्व इस डाउन सिंड्रोम को लोग छुपा लिया करते थे. 

अब दुनिया भर में जो प्रयास किये जा रहे हैं उसके कारण डाउन सिंड्रोम से ग्रसित लोगों को अब बीमार या सामाजिक रूप से त्याज्य नहीं माना जाता है. डाउन सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जिससे ग्रसित व्यक्ति को सारे समाज से स्वीकार्यता मिलनी ही चाहिए. डाउन सिंड्रोम जिसे ट्राइसोमी 21 के नाम से भी जाना जाता है, डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति के पास एक अतिरिक्त गुणसूत्र (क्रोमोसोम) या गुणसूत्र का एक अतिरिक्त टुकड़ा होता है। यह विभिन्न शारीरिक और संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) समस्याओं को जन्म देता है, जिसमें विकास में देरी, बौद्धिक अक्षमताएं, चेहरे की विशिष्ट विशेषताएं जैसे कि तिरछी आंखें और एक सपाट नाक एवं हृदय दोष और थायराइड की समस्या आदि शामिल हैं।  डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, कई लोग उचित समर्थन और संसाधनों के साथ पूर्ण जीवन जीते हैं। प्रारंभिक हस्तक्षेप कार्यक्रम और समावेशी (इन्क्लूसिव) शिक्षा उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है और उन्हें समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।

हिंदी साहित्य में इस विषय पर लिखा ही नहीं गया है. मुक्तिबोध ने कहा था कि हमारे समय में विषयों की कमी नहीं है फिर भी हमारा उपलब्ध हिंदी साहित्य नए और चैलेंजिंग विषयों पर क्यों नहीं लिखता है? उस पर तुर्रा ये कि साहित्य के तथाकथित मठाधीश हिंदी में नोबल पुरुस्कार पाने की लालसा भी पाले रहते हैं. कोई साहित्य तभी बहुआयामी होता है जब वह समाज के हर कोने की पड़ताल करता है और खासकर उस समाज के हाशिये पर पड़े लोगों की समस्याओं को भी मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें करता है.

डाउन सिंड्रोम विषय पर छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी संजय अलंग ने एक उपन्यास  "चलो साथ चलें" की रचना की है. इसके पूर्व संजय अलंग ने इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक किताबें लिखी हैं. उनके तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित और चर्चित हैं. कथा या उपन्यास लेखन क्षेत्र में यह उनका पहला कदम है और विश्वास नहीं होता है कि इतना सुगठित और सहज उपन्यास पहली बार का प्रयास है. 

अपने व्यस्ततम सेवा काल में संजय अलंग को भारत के माननीय राष्ट्रपति जी द्वारा दिव्यान्गजनों और वृद्धजनों के लिए किये गए विशेष कार्यों के लिए पृथक पृथक वर्षों में सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.  

संजय अलंग की चिंताओं को समझने के लिए हमें उनकी कविताओं को भी उतना ही समझना होगा. उनके चयनित विषयों में कवि के भीतर,  पंक्ति  अंतिम व्यक्ति तक पहुँच पाने की ललक है, बेचैनी है.   संजय अलंग के पास संवेदना की अपनी अर्जित भाषा है, जिसके सहारे वह अभिव्यक्ति की चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और ऐसे वितान रचते हैं कि साधारण से साधारण जन तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं. 

"चलो साथ चलें' उपन्यास यदि कोई दूसरा हिंदी लेखक लिखता तो इसे दर्द और कराह का एक मूर्त रूप बना देता किन्तु संजय अलंग, दिलो-दिमाग में छाई बेचैनियों को प्रताड़ना के लसलसे प्रवाह में नष्ट नहीं होने देते हैं बल्कि वह एक राह तलाशते जाते  हैं जिससे समस्या को समझा जा सके और उसके निदान का सहज सकारात्मक प्रयास किया जा सके. यह एक चिकित्सक के परामर्श की तरह है न कि किसी कथावाचक  के करुण रूदन की गूँज है. 

मर्सी और नलिन के प्रथम  शिशु सन्नी के जन्म की कहानी है "चलो साथ चलें".  जब उनके परिवार को ज्ञात होता है कि उनकी बिटिया सन्नी सामान्य बच्ची नहीं है बल्कि उसे डाउन सिंड्रोम है तब मर्सी और नलिन के जीवन में जैसे कोई अप्रत्याशित हमला सा होता है. मर्सी और नलिन के परिजन भी इस वज्रपात को झेलने की कोशिशें करते हैं.  यहीं से बेचैनियों को दूर करने की राह तलाशने में लग जाते हैं. मर्सी का जन्म एक सामान्य डिलीवरी से हुआ था. हाँ, गले में नाल फंसने से डॉक्टर को फोरसेप्स की सहायता लेनी पड़ी थी. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इससे कोई घातक रोग नहीं होता है किन्तु शुरू में मर्सी और नलिन को यही लगा कि नवजात बिटिया सन्नी के जीवन में जो असामान्यता है उसके पीछे गले में नाल फंसने के कारण तो नहीं हुई है?

नवजात शिशु को प्रथम बार मर्सी ने देखा तो "उसे यह रूप रंग थोडा अलग हट कर लगा. उसने गौर किया तो फीचर भी अलहदा से लगे. गोल सी नाक, फूला और गोल चौड़ा चेहरा, मचमचाती हुई सी छोटी आँखें. मर्सी को कुछ अजीब तो लगा पर अभी वह ममत्व में डूबी अच्छा महसूस कर रही थी और मातृत्व का आनंद ले रही थी." (पृष्ठ 21)

मर्सी के पति नलिन के पैर में एक छोटे एक्सीडेंट के कारण प्लास्टर चढ़ा था, मर्सी और शिशु से मिलने के लिए वह भी बेचैन थे और डॉक्टर से परामर्श लेकर जबलपुर से नागपुर आने के लिए गाडी बुक कर ली गई थी. मर्सी की सास ने जब सन्नी को देखा तो काफी प्रसन्न हुईं --" बहुत गोरी और प्यारी है." 

लेकिन कुछ देर बाद नलिन की माँ ने कहा--"बच्ची की आँखें ज्यादा हेज़ी हैं. धुंधली सी, ब्राईट नहीं हैं. डल हैं. अलग तरह का इफेक्ट दे रही हैं. फीचर भी बहुत अलग से हैं. भारीपन तो हैं ही, आकार भी फैला सा है. नलिन तुम भी ज़रा ध्यान से देखना."

यहीं से शुरू होती है एक नवजात शिशु के कारण उत्पन्न हुई नई समस्या की. यह समस्या इस परिवार भर की नहीं थी बल्कि यह एक ऐसी बात थी कि जिसे समाज बड़े अविश्वास से कहता रहता है -"ऐसा मेरे साथ क्यों ?" या "हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?" यह ऐसा सवाल है जो बड़े-बड़ों के आत्मविश्वास को हिला के रख देता है. परिवार में सब्र करने का जज़्बा न हो तो फिर समस्या बड़ी विकराल हो जाती है. मर्सी और नलिन की सन्नी पहली संतान है. मर्सी और नलिन के माता-पिता ने इस पूरे समय में बड़ी शालीनता के साथ प्रसूति को सर-आँखों पर बिठाया. हर तरह कि चिकित्सकीय परामर्श का अक्षरशः पालन किया. फिर ऐसा क्यों हुआ वे इस घटना को जस्टिफाई नहीं कर पा रहे थे और एक अनोखे दुःख की गिरफ्त में फंसते चले जा रहे थे. 

इस विषय पर उपन्यास की रचना करना एक चैलेंजिंग कार्य है. इसमें समस्या के प्रतिरूप शिशु की दयनीयता, शिशु के रिश्तेदारों का अरण्य-रूदन, समाज की नकारात्मकता  से प्रसंगों का वितान नहीं बुना गया हैं बल्कि संजय अलंग की लेखनी से डाउन सिंड्रोम से प्रभावित शिशु और उसके परिजनों के दुखों को तो शिद्दत से लिपिबद्ध किया है. इस जटिल स्थिति में शिशु के माता-पिता, अन्य रिश्तेदार और समाज की वास्तविकता से एक साथ कथाकार संजय अलंग भी जूझते हैं और "चलो साथ चलें" की गुहार के साथ एक नई राह खोजते जाते हैं. 

सर्वप्रथम इस परिस्थिति में नवजात शिशु के सभी परिजन एक साथ खड़े होते हैं. बच्ची की स्थिति के लिए हिन्दुस्तान में उपलब्ध चिकित्सा और चिकित्सा पद्धति को आपसी परामर्श से तलाश करते हैं. जबलपुर, नागपुर और मुंबई तक शिशु के लिए बेहतर उपचार की जो व्यवस्था है उसे अंगीकार करते हैं. नागपुर के डॉक्टर ने कह दिया था कि शिशु सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है. मर्सी और नलिन ने जबलपुर के डॉ कुंडू को भी बिटिया को दिखलाया. डॉ कुंडू ने कहा---"देखिये नागपुर में भी डॉक्टर का मत सही था. सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही हैं."

फिर वे लोग मेडिकल कालेज में डॉक्टर लवली मेहरा को भी दिखलाया. डॉ मेहरा ने सामान्य चेकअप के बाद महत्वपूर्ण बात कही---"डाउन सिंड्रोम ही है. अब आप सन्नी को इसी तरह देखना प्रारंभ करें. उसके लिए आगे क्या और कैसे करना है, यह देखें. इसके साथ अनुकूल हों. शॉक और गिल्ट से आप लोगों को बाहर आना होगा. समाज में मूव्ड करें तो सहजता बढ़ेगी."

हिम्मत और धैर्य से काम लेने की सीख मिली. यह सच है कि समाज इसके लिए तैयार नहीं है, इसलिए मित्रों, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों कि बातों पर ध्यान नहीं देना ही उचित होगा. 

दंपत्ति को जब यह खबर मिली कि मुंबई में कोई एक विदेशी डॉक्टर हैं जो इस तरह के मामलों में बेहतर दखल रखते हैं, तब नलिन और मर्सी ने सन्नी को लेकर मुंबई पहुंचे. डॉ कोसिमो ने भी बतलाया कि सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है और वे सन्नी के इलाज के लिए योजना बना रहे हैं. काफी महँगी विदेशी दवाएं मंगवा कर सन्नी का इलाज किया गया और साथ ही फ़िजिओथेरेपी के ज़रिये मरीज़ के दिमाग और शारीर की सामान्य क्रियाओं को कुछ बेहतर एक्टिव रखने और विकसित करने के लिए विभिन्न तरह की थेरेपी की भी ज़रूरत पूरी करने के लिए डॉक्टर के परामर्श से अणिमा मुले का पता भी मिल गया. 

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथानक के अलावा डाउन सिंड्रोम से लड़ने के लिए एक पथ प्रदर्शक गाइड की तरह है. घटनाक्रम से गुज़रते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उपन्यास में वर्णित "की वर्ड्स" को गूगल में सर्च किया जा सकता है इतना वास्तविक वर्णन है कि संजय अलंग ने वाकई इस उपन्यास की संरचना के लिए छोटी से छोटी डिटेल को भी मिस नहीं किया है. 

डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे को सामाजिक मान्यता दिलाने और ऐसे अभिभावकों को भी घरों से निकालना जो अपने घरों में ऐसे बच्चों को छुपा कर रखते हैं. लोकलाज और मर्यादा जैसी रुढियों के चलते ऐसे अभिभावक बड़े शातिर तरीके से अपने डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों को मुख्यधारा से अलग रखते थे. नलिन और मर्सी के सद्प्रयासों ने ऐसे गुम किये गए बच्चों को डाउन सिंड्रोम प्रबंधन जैसी संस्थाओं की देख-रेख करने के लिए बाहर निकाला. उपन्यास का सूत्र वाक्य है --"सार्थक जीवन की आदत पड़ जाने पर सकारात्मक प्रयास भी सहज ढंग से सूझते हैं,"

इस बीच मर्सी पुनः गर्भवती होती है. सन्नी की असामान्य दशा के कारण मर्सी चिंतित थी और वे लोग यह चाहते थे कि गर्भ में पल रहा भ्रूण कहीं डाउन सिंड्रोम का शिकार तो नहीं है? ऐसा परिक्षण मुंबई में होता है. मुंबई से रिपोर्ट आई कि स्थिति सामान्य है लेकिन गर्भावस्था के अंतिम चरण में मर्सी को गर्भपात की स्थिति से गुज़रना पड़ा जिससे वह परिवार बुरी तरह से टूट गया था. 

जबलपुर के डॉक्टर राधा होतवानी से जब वे मिले तो उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में उनका सुझाव है कि मर्सी पुनः शीघ्र ही कंसीव करने का प्रयास करें वर्ना आगे जाकर काम्पिल्केशन बढ़ने के चांस हैं. नलिन और मर्सी ने सन्नी का प्रवेश नागपुर के सर्व-उदय विद्यालय में करा दिया. यहाँ मर्सी बच्ची के साथ विद्यालय जाने लगी और डाउन सिंड्रोम बच्चों को सिखाये जाने वाली गतिविधियां दोहराती और इससे सन्नू कि प्रगति भी अच्छी होने लगी थी. नागपुर में मर्सी एक बार पुनः गर्भवती हो गई. इस बार उन लोगों ने गर्भस्थ शिशु का डाउन सिंड्रोम टेस्ट नहीं करवाया. 

मर्सी ने एक स्वस्थ कन्या शिशु को जन्म दिया. उनके अन्दर एक नया उत्साह भी पैदा हुआ और दंपत्ति ने नए शिशु  के साथ डाउन सिंड्रोम ग्रसित सन्नी की उत्कृष्ट देखभाल शुरू कर दी. मर्सी ने सन्नी के नाम से मिलती जुलती एक संस्था बना ली जिसे नाम दिया गया--"राइजिंग सन डेवलपमेंट सेंटर". 

डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों के सर्वांगीण विकास की राह आसान होने लगी. हिन्दुस्तान में इस तरह की गतिविधियाँ एकदम नवीन थीं और मर्सी की ज़िद ने उनकी तमाम कोशिशों को समाज के लिए सहज स्वीकार्य बना दिया था. जो अभिभावक अब तक अपने बच्चों को समाज की निगाह से छुपा कर रखने के लिए अभिशप्त थे उनके लिए मर्सी और नलिन की उर्जावान पहल ने नई राह बनाई. 

आगे जाकर मर्सी ने सन्नी के साथ सिंगापूर में विशेष प्रशिक्षण के लिए चयन हो गया. इसमें मर्सी को सन्नी के साथ सिंगापूर आने का प्रस्ताव भी दिया.

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथा नहीं है बल्कि डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चों के उच्च स्तरीय प्रबंधन की एक पथ प्रदर्शक भी है. 

संजय अलंग के इस उपन्यास का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी साहित्य में लीक से हटकर लिखी गई कथा है ये जिसे समावेशी सोच के साथ एक नई राह तलाशने का प्रयास किया गया है.





कृति : चलो साथ चलें   लेखक : संजय अलंग 

पृष्ठ : 144  मूल्य : 250

प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, C-515, बुद्धनगर, नई दिल्ली 110012

मो 8750688053




मंगलवार, 6 जनवरी 2026

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

  समीक्षा

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी : अनवर सुहैल









शुक्ला चौधुरी एक सम्वेदनशील कवि हैं और इन्होनें कहानियां भी लिखी हैं। उपन्यास विधा में उनकी यह पहली प्रस्तुति है किन्तु किसी भी तरह पहली कृति नहीं लगती। इसे उपन्यासिका भी कहा जा सकता है। रमेश बक्षी, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम के छोटे कलेवर के उपन्यासों जैसा सशक्त कथानक और पद्यमय-गद्य की अद्भुत बानगी है ‘इश्क़’। उपन्यास के शीर्षक से यह आभाष होता कि इस उपन्यास में प्रेम-प्रसंगों की बात होगी लेकिन चट्टानों में फूल खिलने की घटनाएं होती हैं तो सभी अचंभित होते हैं। कथानक में नवीनता न भी हो तो लेखक की शैली पाठकों को एक नया आस्वाद कराती है। इश्क़ पढ़ते हुए यही आभाष होता है। उपन्यास का पाठ शुरू करते ही पाठक कथारस का आनंद उठाने लगता है। बहुत सी बातें इस तरह से बयान की गई हैं कि पाठक अचम्भित हो जाता है। 

कस्बाई या ग्रामीण परिवेश में अब भी पुरूष-वर्चस्व और सामंती शोषण के अवशेष नज़र आते हैं। खै़र शहर भी कहां इन जंजालों से आज़ाद हैं। ऑनर-कीलिंग की घटनाएं सर्वत्र देखने को मिल ही जाती हैं। लेकिन इश्क़ के कथानक के जादू का केन्द्र-बिन्दु सामंत की स्त्री सुमित्रा का चरित्र है। सामंती मूल्यों की जंजीर में कैद सुमित्रा मुक्ति की छटपटाहट में किस तरह शनैः-शनैः अपने अंदर की शक्ति को पहचानकर जगाती है और मुक्ति की राह निकालती है। 

छोटे-छोटे वाक्यों से सजी उपन्यास की शैली पाठकों को कथा-प्रवाह को रोमांचित करती है। यथा आप पाठ के प्रवेश में ही जो वाक्यांश पाते हैं वह कितना सहज और सरस है--‘‘आकाश का चांद खिला पूरा, पीतर की थाली बराबर। चांदनी में नहा उठा जंगल। चांद से चूंई-चूंई कर झरने लगा अमृत। फागुनी, बल्ली के कंधे से झूल गई।’’ शहरी प्रदूषण से दूर एक आदिवासी गांव का चित्रण कितना मनोहारी है। ऐसे ही किसी माला में मोती की तरह गुंथे हुए शब्दों का अद्भुत चमत्कार है उपन्यास ‘इश्क़’। 

बल्ली गांव का एक दलित बूढ़ा है। वह सूरदास भी है। फागुनी उसकी बेटी है। सामंत ठाकुर मेवालाल का नौकर है कोंदा। गांव में तुतलाकर बोलने वाले को कांदा कहा जाता है। कोंदा एक अनाथ आदिवासी किशोर है। सामंतों के टुकड़ों पर पलता है। सामंतों की देह-मालिश से लेकर उनके अन्य क्रियाकलापों में सेवकई करता है। गांव में दलितों का जीवन कष्टप्रद है। सामंतों को इन दलितों की ज़रूरत पड़ती है गंदगी, मल-मूत्र या पाखाना की नाली साफ करने के लिए। सामंतों द्वारा दलितों की स्त्रियों का भोग करना सामान्य घटनाएं हैं। सामंतों की स्त्रियां या तो अपने पति का साथ देती हैं या फिर मूक दर्शक बनी रहती हैं। गांव के सामंत की पत्नी सुमित्रा देवी किन्तु ऐसी नहीं है। उनके मन में मानव जाति की मर्यादा का सम्मान है। 

यह सच है कि कोंदा मन ही मन फागुनी पर आसक्त है। अपनी प्रीत का इज़हार वह ठकुराईन के दिए अन्न यथा गुड़-चना आदि की भेंट फागुनी को देकर करता है। फागुनी अवयस्क लड़की है। कोंदा बल्ली चमार को बुलाने आया है कि ठकुराईन ने बुलावा भेजा है। ठाकुर का पाखाना जाम हो गया है। कोंदा बल्ली को पटाने के लिए बोलता है--‘‘पांच दिन का राशन-पानी घर पहुंचा दिही, कहत रहीन ठकुराईन।’’ गांव में श्रम का मूल्य इसी तरह अन्न से किया जाता है। 

अंधा बल्ली जानता है कि फागुनी पर डोरे डालता है कोंदा इसलिए वह कांदा को फटकारकर भगा देता है--‘‘खबरदार जो पांव भीतर रखा।’’  

‘‘अंधे काका की कितनी आंखें, कोंदा जाते-जाते सोचने लगा।’’ 

जब बल्ली रात में सामंत के घर जाने से मना कर देता है तब सुमित्रा देवी स्वयं दलितों की बस्ती जाती है क्यांकि उनके घर में एक कार्यक्रम होना है जिसमें बहुत से मेहमान आने वाले हैं। यदि पाखाना जाम रह गया तो कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और जो बदनामी होगी सो अलग। ठाकुुर मेवालाल से जब सुमित्रादेवी ने बल्ल्ी के इंकार के बारे में बताया तो सुमित्रादेवी का बेटा सुखविंदर बोल पड़ा--‘‘साला बड़ा भाव खाने लगा आजकल...जाकर टेंटुआ दबा दूं क्या अम्मा या बाबू कहें तो झोपड़ी में आग लगा दूं, एक मिनट लगेगा।’’ 

इस सम्वाद के पीछे दलितों के प्रति सवर्णों को मन को सरलता से पढ़ा जा सकता है। सदियों से दलितों के प्रति यही भाव रहा है सामंतों के मन में। आज़ादी के इतने बरसों बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है। बेटे के गर्म खून को पिता यह कहकर शांत करता है--‘‘यह वक्त नाराज़गी का नहीं है बेटा, धीरज रखना जरूरी है। समय हमारे हाथ में नहीं रहा बेटा, नही ंतो बल्ली की यह मज़ाल!’’

शुरूआती तीन पृष्ठों में उपन्यास की पृष्ठभूमि समझी जा सकती है जिसे बिना किसी खींचतान के सहज सम्वाद के माध्यम से शुक्ला चौधुरी ने प्रस्तुत किया है। दृ

चमार टोले का वर्णन भी हमारे समय का कटु यथार्थ है। इसके लिए शुक्ला चौधुरी की काव्यमयी भाषा का चमत्कार देखें--‘‘पत्थरों के बदन को जख्मी कर बसाए गए डोम और चमारों के कुछ घर।’’

हर तरह की नागरिक आवश्यकताओं से उपेक्षित परछाईंनुमा लोगों की बस्ती का अद्भुत चित्रण है यहां। सामंतों की चाकरी करना और वनोपज इकट्ठा करना इन गरीबों का काम है। अधिकतर अधपेटे सोना इनका नसीब है। जंगल जाकर महुआ के फूल चुनने का शगल कई दिनों तक चलता है। इस महुआ के बदौलत औरतें सिंगार सामग्री यथा झुमका, बिंदी, चूड़ी आदि खरीदती थीं। 

मुंह अंधेरे ठकुराईन बल्ली चमार के घर आ पहुंचती है। उसके साथ नौकर कोंदा भी है जो झोला भर सामान उठाए है। ठकुराईन सुमित्रादेवी छिपकर बल्ली के घर आई है कि बल्ली जाम पाखाना आकर खोल दे और अन्य सफाई का काम कर दे। 

सुमित्रादेवी भूल चुकी है अपना अतीत। स्त्री-विमर्श पर जाने कितनी बातें की जाती हैं किन्तु शुक्ला चौधुरी ने पुरूष सत्तात्मक समाज में स्त्री की उपस्थिति के औचित्य और उसकी अपनी स्वतंत्रता पर चंद शब्दों में ही काफी बातें कह दी हैं। ठकुराईन बल्ली के घर से जैसे ही अपने घर पहुंची उसने देखा कि --‘‘ठाकुर मेवालाल दरवाज़ा छेंक कर खड़ा है। ठकुराईन धक्का नहीं संभाल पाई और चौखट पर सर के बल गिर गई। कपार की बांई ओर से एक धार बह निकला जो बांई आंख के कोर को भिंगोता हुआ गले से होकर सफेद चादर पर गिरने लगा टप-टप-टप।’’ यही है स्त्रियों के जीवन की विडम्बना, उनकी अस्मिता और बेचारगी से भरा अस्तित्व। 

दलितों के घर फागुनी जैसी रूपवती कन्या का होना आश्चर्य है। बल्ली की घरवाली जमनी अचानक एक दिन गायब हो गई। जमनी दीनदयाल मेहतर की बेटी थी जो घर से भागकर आई थी और जिसे बल्ली ने ब्याहता बनाकर रख लिया था। उसी जमनी पर सामंत मेवालाल की कुदृष्टि थी। सुमित्रा देवी को शक था कि जमनी का अपहरण ठाकुर ने किया है। उसने एक रोज ठाकुर से पूछ ही लिया--‘‘कहां थे जी रात भर इस दुरजोग में।’’ 

तब ठाकुर ने ऐंठ कर जवाब दिया था--‘‘मैं शिकार पर गया था सुन ले, आज भी जाउंगा और कल भी।’’ 

जमनी तीन रातों के बाद चौथे दिन की सुबह भागती हांफती लड़खड़ाती हुई घर पहुंची। बल्ली दरवाजे पर बैठा था। जमनी औंधे मुंह गिर पड़ी। 

एक दिन सुमित्रा देवी ने ठाकुर पति के मुंह से गुंडे भैरव गोंड को लताड़ते सुना--‘‘वह भागी कैसे रे भंड़वा, एक लड़की को संभाल नहीं पाया हरामी।’’ तब सुमित्रा देवी की आंखों के सामने सब कुछ साफ होने लगा। यह लोग जिन्हें अछूत कहते हैं जिनसे घृणा करते हैं उन्हीं की बहन-बेटी के शरीर से खिलवाड़ करते नहीं थकते। 

सुमित्रा देवी ठाकुर की बंदिशों के बाद भी जमनी को सांत्वना देने के इरादे से चमार टोला में बल्ली के घर जा पहुंची। पूरा चमार टोला सकते में आ गया। तभी ठाकुर राइफल लेकर आ गया और सुमित्रा देवी को घर ले जाकर नजरबंद कर दिया। गर्भवती जमनी का अस्पताल में निधन हो गया और फागुनी इस तरह संसार में आई। फूल सी खूबसूरत बच्ची फागुनी। सुमित्रा देवी फागुनी की सुंदरता देख मुग्ध हो जाती है। बल्ली के साथ फागुनी जब सुमित्रा देवी के घर नाली साफ करने आती तो सुमित्रा देवी उसे अपलक देखती रहती। ठकुराईन के तीन पुत्र हैं। उसे एक पुत्री की साध थी लेकिन लड़की न हुई। पता नहीं क्यों फागुनी को देख कर ‘‘ सुमित्रा की छाती दूध से भरने लगती है।’’ 

ठाकुर अपने नौकर कोंदा से कहता है--‘‘रे कोंदवा...तोर ठकुराइन बुढ़ापे में बावरी हुई जा रही है, संभालकर रखिओ। नही ंतो तोर टेंटुआ दबाये में टाइम न लगी। न जाने चमार टोला में का रखा है, ससुरी वहीं जाने के लिए पगलाए रहती है।’’ 

फागुनी बड़ी हो रही है। कोंदा भी जवान हो रहा है। कोंदा मन ही मन फागुनी को प्यार करता है। ठाकुर और उसके पुत्रों को फागुनी रूपी शिकार का मन होने लगा। ठाकुर कांदा से कहता है कि बाप-बिटिया को ले आ, घर की सफाई करानी है। कोंदा जानता है इसके पीछे का कारण। कांदा को अकेले आते देख ठाकुरों का मन खराब हो गया और कांदा की दम-भर पिटाई हुई। सुमित्रा देवी जानते हुए भी उन वनमानुषों से पूछ नहीं सकती थी कि कोंदा को इस बेरहमी से क्यों पीटा जा रहा है। 

न जाने कितने बरसों का गम और गुस्सा ठकुराईन के मन में भरा था। वह जानती थी कि अवयस्क फागुनी ठाकुर का खून है और फागुनी उसकी अपनी ही बेटी है। बेटी को बरबादी से बचाने के लिए ठकुराईन ने कोंदा को तैयार किया। ठाकुरों के प्रति कांदा के मन में नफ़रत भरी और कोंदा को अपने पक्ष में किया। आदिवासी कांदा एक गठीले बदन का युवक था। जब ठाकुर और उसके पुत्र फागुनी का अपहरण करने चमार टोला आए तो कोंदा ने उन्हें मार-मार कर अधमरा कर दिया। उपन्यास यहीं पर आकर समाप्त होता है लेकिन सुमित्रा देवी के मन में हमेशा-हमेशा जीवित रहने वाला इश्क़ ही अंततः विजयी हुआ। 

उपन्यास में छोटे-छोटे वाक्य हैं और चित्रमयी भाषा है जो पाठकों को बांधे रखती है। शुक्ला चौधुरी का यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में बहुत बड़े कथानक को समेटे है। पुस्तक की छपाई और गेटअप शानदार है। 



समीक्ष्य पुस्तक : इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

पृष्ठ : 64  मूल्य : 150 

प्रकाशक : डायमंड बुक्स, एक्स-3, ओखला इंडस्टियल एरिया, फेज-2

         नई दिल्ली 110020 फोन : 011 40712200


रविवार, 28 दिसंबर 2025

संभावनाशील कथाकार की कहानियां: शकील




अनवर सुहैल विदा ले रही सदी के अंतिम दशक में उभरे अल्पसंख्यक समुदाय के उन गिने-चुने सम्भावनाशील रचनाकारों में से एक है जो मूल रूप से हिन्दी में लिख रहे हैं। रचनाकारों को लिंग, समुदाय और क्षेत्र के आधार पर चिन्हित करने से असहमति जताई जाती रही है पर भारतीय समाज में ये कारक रचनाकार की अनुभूतियों को विशिष्टता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इसलिए इसकी उपेक्षा सम्भव नहीं। अनवर सुहैल का एक कविता संग्रह 1995 में आ चुका है। अब उनका कहानी संग्रह ‘कुंजड़ कसाई’ प्रकाशित हुआ है। कुंजड़ कसाई’ की कुल नौ कहानियांे के अध्ययन के बाद यह एहसास होता है अनवर सुहैल ऐसे कथाकारों में से हैं जो बहुुत ख़ामोशी से रचनाकर्म करते रहते हैं और अचानक हम पाते हैं कि प्रायोजित चर्चाओं की धुंध फाड़कर ऐसे रचनाकार पहचान बनाने में सफल हो जाते हैं।

समीक्ष्य संग्रह कुंजड़ कसाई’ में शीर्षक कहानी तथा ‘फत्ते भाई’ दो कहानियां मुस्लिम समाज से सम्बंधित हैं और मेरी दृष्टि में संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी ‘बिलौटी’ है जिसमें दो निम्नवर्गीय चरित्र पगलिया और उसकी बेटी बिलौटी के जीवन संघर्ष को लेखक ने कलात्मक कौशल से कथाशिल्प में ढाला है। मेरे मत की पुष्टि वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बलदेव वैद की ब्लर्ब में बिलौटी कहानी की प्रशंसा से भी होती है। ‘बिलौटी’ की अर्द्ध विक्षिप्तता, उसके वात्सल्य और अभिभाकत्व की चेतना को लील नहीं पाती। बलात्कार से जन्मी बेटी बिलौटी के लालन-पालन में वह खासी सजग दिखती है। बिलौटी भी अपनी जीवन परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए तेजी से सांसारिक ऊंच-नीच को समझती है और अपना रास्ता बनाते हुए एक आत्म निर्भर स्त्री बन जाती है। लेखक ने ‘बिलौटी’ के चरित्र का चित्रण काफी कलात्मक दक्षता के साथ किया है। ‘बिलौटी’ हमारे औद्योगिक क्षेत्रों विशेषकर कोयला उद्योग से जुड़े क्षेत्र की संस्कृति के यथार्थवादी अंकन की दृष्टि से उल्लेखनीय कहानी बन पड़ी है। संग्रह की दूसरी प्रभावशाली कहानी है  ‘काश मैं तुम्हारे साथ रहती’। इसे प्रेम कहानी की संज्ञा दी जा सकती है पर इसमें निश्चिंत एवं दायित्वहीन युगल का प्रेम नहीं है। राजीव और उर्मि के शहर में बैंक में सहकर्मी हैं। दोनों की पृष्ठभूमि में काफी समानता है। राजीव के पिता एक ईमानदार और सिद्धांतवादी शिक्षक थे। उनकी अकाल मृत्यु के उपरांत उनके भाई ने पिता की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया। राजीव की मां भी पति के सदमेे से जाती रहीं। संघर्ष करते हुए राजीव ने बैंक में क्लर्की पाई। उर्मि की मां भी बे्रस्ट कैंसर से असमय चली गईं। पिता ने बेटी उर्मि और बेटे बीनू के लिए दूसरा विवाह न किया। पिता एक मिल में यूनियन नेता थे विरोधियों ने उनकी हत्या करवा दी। संरक्षणहीन उर्मि ने संघर्ष कर नौकरी पाई। राजीव और उर्मि में सहकर्मियों जैसी मित्रता शुरू हुई और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। यह उन्हें तब पता चलता है जब राजीव के चाचा अपने स्वार्थ के लिए राजीव पर अपने क्षेत्र के विधायक के भाई की बेटी से विवाह के लिए दबाव बनाने लगे। इन सारी परिस्थितियों का लेखक ने स्वाभाविक घटनाक्रमों में प्रवाहपूर्ण भाषा में अंकन किया है। ?

शीर्षक कहानी ‘कुंजड़-कसाई’ भारतीय समाज के अन्तर्विरोधों पर आधारित है। भारतीय मुस्लिम समाज के इस अंतर्विरोध का स्वरूप जटिल है। भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समाज में जिसका नब्बे प्रतिशत से अधिक भाग हिन्दुओं से धर्मांतरित है, हिन्दू संस्कार अंतव्र्याप्त है। इसलिए इस्लाम में सैद्धांतिक रूप से जातिगत भेदभाव नहीं होने के बसवजूद भारतीय मुस्लिम शादी ब्याह में हिन्दुओं की भांति ‘जात-पात’ का विचार करते हैं। चूंकि मुसलमानों के यहां सैद्धांतिक वर्जना नहीं है इसलिए अंतर्जातीय विवाह भी प्रायः सामान्य रूप में प्रायः होते रहते हैं विशेषकर कथित रूप से ऊंची जाति की लड़की की तथाकथित निम्न जाति के लड़के से। ‘कुंजड़-कसाई’ में ऐसे ही अंतर्जातीय विवाह सूत्र में बंध्े एक युगल को मुख्यपात्रों के रूप में लिया गया है। लतीफ़ कुरैशी जो निम्न माने जाने वाली जाति से हैं की पत्नी जुलेख़ा सैयद जाति की है। जुलेखा के विवाह के समय निमन जाति के लतीफ से जुलेखा के वालिद ने समझौता कर लिया पर इकलौते बेटे के विवाह के समय, लड़की वाले अपनी जाति ढंूढने लगे। लतीफ के चाचा की एक लड़की के विेवाह का प्रस्ताव जुलेखा के वालिद ने ठुकरा दिया। लतीफ को उचित ही यह नागवार गुज़रा और जैसा कि होता है पुरूष अपने मन का गुबार औरतों पर निकालता है। लतीफ भी जुलेखा को उसकी जाति के हवाले से व्यंग्य बाण से छलनी करता रहता है--‘‘ जुलेखा रो पड़ी और किचन की ओर चली गई। मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब बेंत की आराम कुर्सी पर निढाल पसर गए। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे जंग जीत गए हों। सैयद वंशीय पत्नी को दुख पहुंचा कर वे इसी तरह रिलैक्स अनुभव किया करते थे।’’ 

अनवर सुहैल ने भारतीय मुस्लिम समाज के इस अंतर्विरोध पर एक गंभीर कथात्मक व्यंग्य किया है। ‘फत्ते भाई’ मुस्लिम समाज में व्याप्त कठमुल्लावाद पर आधारित कहानी है। एक सीधे-सादे अनपढ़ फत्ते भाई द्वारा पक्षाघात के इलाज के लिए एक हिन्दू मित्र के कहने पर बजरंग बली का प्रसाद ग्रहण कर लेने के कारण कठमुल्लाओं की जमात उन्हें धर्म से बहिष्कृत घोषित कर देती है और मीटिंग बुलाकर फिर से कलमा पढ़ कर मुसलमान बनने का फैसला सुनाती है। कहानी में चरित्रों और घटनाक्रमों का विकास स्वाभाविक है। फ्लैप पर दर्ज लेखक के परिचय में कहा गया हं --‘‘भारतीय मुस्लिम समाज में व्याप्त मध्यवर्गीय वैचारिक प्रदूषण, आस्था संकट और धर्म के व्यवासायीकरण के विरूद्ध जेहाद इनकी रचनाओं की विशेषता है। ‘कपड़े के पीछे’ बाहर से जिम्मेदार और अच्छे पद पर कार्य करने वाले व्यक्ति की हरकतों की कहानी है जो अंदर से विकृतियों का शिकार है। ‘अनुकम्पा नियुक्ति’ कहानी में एक स्वाभिमानी युवा की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है जो अनुकम्पा नियुक्ति स्वीकार तो लेता है परन्तु इसे अपनी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह के समान झेलता है। ‘शोक पर्व’ कहानी एक शिक्षित युवा के सरकारी नौकरी पकड़ पाने की उम्र समाप्त होने के दुखों की व्यथा है। ‘सन आफ बुधन’ दलित वर्ग के एक पदाधिकारी की कहानी है जिसमें उच्चवर्गीय संस्कार से उग आए हैं और अ बवह अपने पिता के नाम को प्रमाण-पत्र पर देखकर परेशान होतां है। अभावग्रस्तता मनुष्य को कैसी मजबूरियो ंऔर हास्यास्पद परिस्थितियों में उलझा देती है इसकी सुंदर अभिव्यंजना कथाशिल्प में ‘स्वेटरनामा’ में हुई है। 

अनवर सुहैल से उम्मीद करनी चाहिए कि अपनी प्रतिबद्धताओं को अपनी कहानियों के माध्यम से लगातार शिल्पबद्ध करते रहेंगे। 


(युद्धरत आम आदमी, अंक 47 में प्रकाशित शकील की समीक्षा)