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Sunday, December 10, 2017

मैं इसे उम्मीद कहता हूँ..

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कोई चीज़ है ऎसी
जो बार-बार तोड़े जाने की 
ज़बरदस्त कोशिशों के बाद भी
टूटने नहीं दे रही
खंडित होने के लिए विवश वजूद को
दानिश्वर इसे जो कहें
मैं इसे उम्मीद कहता हूँ
बस, इसी उम्मीद के सहारे
कट जायेंगी काँटों भरी राहें
चाँदनी-बिना पथरीली पगडंडियाँ
तुम देखते रहना
चुपचाप...
मन की हारे हार है
मन है कि हारना नहीं चाहता
बेयारो-मददगार बचाए रखना अपना वजूद
मौत के कुंए में चक्कर लगाने वाले
मोटर-साइकिल चालक जैसा अभ्यस्त हो चुके हैं हम
बिना किसी निर्धारित पाठ्यक्रम के
बहुत लम्बे समय से ली जा रही है धैर्य की परीक्षा
और परीक्षा परिणाम घोषणा के पहले
एक नया प्रश्न-पत्र रख दिया जाता है सामने
अकबकाओ या भुनभुनाओ
उन नित नए अनगिनत सवालों के जवाब लिखते-लिखते
कई पीढियां गुज़र गई हैं भाई
न परीक्षा ख़त्म होती है
न सवालों की फेहरिस्त
समझदार लोग जानते हैं
सुहानुभूति भी रखते हैं
कुछ सहृदय दोस्त, परीक्षा-भवन तो छोड़ भी आते हैं
लेकिन इन परीक्षाओं से
इन अनगिनत सवालों से
कोई तो निजात दिलाओ
आओ भाई, आगे आओ
हमें बचाओ.....
कि ना-उम्मीदी अभी भी हमसे
एक बिलांग दूरी बनाये हुए है
बस, एक बिलांग...
🌸