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Monday, August 6, 2018

देख बुझने न पाए भीतर की आग




चुप रहकर भी बोल दी जाती हैं बातें 
हम जिस दौर में हैं 
हमें आदत डालनी होगी 
चुप की भाषा डिकोड करने की
मुट्ठियाँ अब नहीं लहराती हवा में 
इशारों पर भी लगे हैं पहरे 
हुंकारी भरने वाली अवाम की ब्रीड 
कर ली गई है ईजाद 
सुबहो-शाम, दिन-रात 
गालियों की नई खेप उतरती है
प्रतिरोध का गला घोंटने वालों को 
मिल रहा इनामो-इकराम 
आलोचकों को दी गई है ड्यूटी 
कविता में तलाशें कला-तत्व 
आह-कराह में कहाँ होता है सौन्दर्य 
कहाँ होती है कला?
सुर की तलाश जहाँ खत्म होती है 
परिवर्तन के नव-राग वहाँ फूटेंगे 
बस ज़रूरत है एक बार और 
मिजाज़ से फेंका जाए जाल
जाग, ओ मेरे मीत जाग 
देख बुझने न पाए भीतर की आग 
जाग ओ मेरे मीत 
समय रहते जाग!

Friday, August 3, 2018

कितनी वहशी सोच तुम्हारी



कितना ज़हर भरा है तुममें
बार-बार डसने पर भी
खत्म नहीं होता है विष
दांतों के खोहों में तुमने
कितना ज़हर छुपा रक्खा है?
अब तक तुम करते रहते थे
ढेरों प्यार-मनुहार की बातें
गंगा-जमुनी तहजीब की बातें
सतरंगी दुनिया की बातें
हम सब कितना खुश थे भाई
गलबहियों और बतकहियों के
कितने अच्छे दिन बीते हैं
इधर हुआ क्या बोलो भाई
तुमने ज़हर उगलना सीखा
हमनें डरना-बचना सीखा
देखो-देखो, इस जहान में
नफरत की ज्वाला भड़की है
कत्लो-गारत, आगज़नी से
घर भी जले हैं दिल भी जले
कितनी वहशी सोच तुम्हारी
कितने बर्बर स्वप्न देखते
ऐसा हरगिज कभी न होगा
नफरत के इस मकड़जाल में
जब तक तुम यूं फंसे रहोगे
केवल तुम भर बचे रहोगे
बेशक तुम ही बचे रहोगे।