बुधवार, 1 अप्रैल 2026

कुछ अपनी बात : चार




साहिर लुधियानवी ने लिखा भी है

दुनिया ने तज़ुर्बतो-हवादिस की शक्ल में

 जो कुछ मुझे दिया उसे लौटा रहा हूँ मैं.

तो हम नया कुछ नहीं करते बल्कि जो हो रहा है और जो होने वाला है उसका ब्लू-प्रिंट ही तो तैयार करते हैं ताकि सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आये. इस लिखने-पढने के बीच हम अपनी समस्याएं, विडम्बनाएँ, आशा-निराशा, चाहतें और संघर्ष के लिए प्रेरित करते विचार ही तो अपने समकालीन पाठकों से शेयर करते हैं. हम अपनी लेखनी के ज़रिये पाठकों से संवाद करते हैं और एक कारवाँ बनता चला जाता है...यही उम्मीद ही तो लेखक का सरमाया होती है...

बकौल फैज़---‘अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जीये जाते हैं...’

तो ये जीवन-राग है ये हमारी ताकत है जो मनुष्यों, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, आकाश-चाँद-तारों के प्रति हमारी जवाबदेही सुनिश्चित करती है....

 

  

 

6. परिवेश

 मेरा सिद्धांत है कि लेखकीय विरासत के बिना भी लेखन करता रहूँ और अपने आसपास के लोगों पर ज़ाहिर होने दूं कि मैं लेखक हूँ...लेखक कोई कैमरामैन नहीं है कि फोटो खींचकर लोगों को चमत्कृत कर दे. लेखक के दिमाग और दिल के बीच कहीं पर एक स्कैनर रहता है जो नामालूम चीजों को भी किसी कोने में सुरक्षित रख देता है. लेखन के समय वो डिटेल अनायास लेखक की कलम पर आकर बैठ जाती है...

मेरा जो परिवेश है वो कतई साहित्यिक नहीं है लेकिन मेरा परिवेश मेरी सोच को आकार देता है...इस परिवेश की बदौलत मैं लिखता हूँ...इसमें वे तमाम लोग हैं, चरिंद-परिन्द हैं..धुप-छाँह हैं...जो मेरे वजूद में वाबस्ता हैं...इस परिवेश का मैं शुक्रगुज़ार हूँ कि इसने मुझे उपन्यास दिए, कहानियाँ दीं, कविताएँ दीं और नित-नए पात्र बरबस मेरे पास आकर अपनी कहानी सुना कर चले जाते हैं...ये ही मेरे परिवेश का मुझपर असर है...

मेरा हायर सेकंडरी तक का वक्त मनेन्द्रगढ़ में बीता. मप्र और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसा नगर मनेन्द्रगढ़...गढ़ का उपसर्ग लगने से ये समझा जाए कि यहाँ कोई राजा-रजवाड़ा होंगे, महल-दुमहले होंगे..सरगुजा जिले के इस आदिवासी क्षेत्र को इतना शास्त्रीय नाम कैसे मिला...शायद कोरिया स्टेट के परिवार के किसी सदस्य का नाम मनेन्द्र सिंह होगा...वैसे पूरे सुरगुजा जिले में इतना शुद्ध नाम रामानुजगंज का है और मनेन्द्रगढ़ का.

औद्योगिक क्रान्ति के बाद ब्रिटिश राज की ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए कोयले की विपुल आवश्यकता थी. अँगरेजों ने इस क्षेत्र का सर्वे किया. यहाँ कोयले का बड़ा विशाल भण्डार मिला. चिरीमिरी, विश्रामपुर, बैकुंठपुर, कोतमा, शहडोल होते हुए कोरबा और फिर सिंगरौली का क्षेत्र...कोयला ही कोयला है यहाँ. अंग्रेजों ने इस कोयले के उत्खनन के लिए ठेकेदार लाये और भाड़े के गोरखपुरिया मजदूर...इस कोयले की ढुलाई के लिए रेल पांत बिछाई गई. कहते हैं कि कलकत्ता की कम्पनी जो रेल बिछाती थी उसमें प्रख्यात उपन्यासकार विमल मित्र भी काम करते थे. इस क्षेत्र के अनुपपुर स्टेशन से जुडी उनकी कुछ कहानियां भी हैं..

कोयला खदानों से घिरे मनेन्द्रगढ़ को गेटवे ऑफ़ सरगुजा भी कहा जाता है. बाहरी मजदूरों की दैनिक ज़रूरतों के मद्देनज़र मनेन्द्रगढ़ में एक नया उपभोक्ता बाज़ार बना..और यही बाज़ार इस नगर में तमाम धर्मावलम्बियों की आश्रय-स्थली भी बना. इस नगर मे रोज़गार के लिए देश के हर प्रदेश के व्यवसायी, उद्यमी और सरकारी/ गैर-सरकारी कर्मचारी...देखते-देखते नगर एक मिनी हिंदुस्तान बन गया...

इस नगर में जो लोग आये फिर यहीं के होकर रह गये...एक मिली-जुली सांस्कृतिक समझ के साथ नगर में साहित्यिक आयोजन भी होने लगे...खासकर कवि-सम्मलेन आदि

कतिपय उत्साही युवकों ने बैकुंठपुर में एक साहित्यिक संस्था संबोधन के नीव डाली लेकिन जल्द ही बैकुंठपुर से उठकर मनेन्द्रगढ़ में संबोधन स्थाई रूप से गया. सम्बोधन साहित्य और कला परिषद् के माध्यम से नगर में कई गतिविधियाँ होने लगीं और मेरे जैसे किशोर उससे लाभान्वित होते रहे.

आज जाने क्या हो गया है कि हमारे परिवेश से युवा समाज नहीं जुड़ पा रहा है..इतनी संमृद्ध परंपरा वाले नगर में अब साहित्यिक गतिविधियाँ के बराबर हो गई हैं और युवा-वर्ग के अभिव्यक्ति के लिए ऐसी छटपटाहट भी नहीं दीखती जैसी हम महसूस करते थे.

घर का अनुशासित परिवेश और बाह्य-जगत में अपने अस्तित्व की सार्थकता के लिए बेचैनी ही शायद मुझे निरंतर लिखने के लिए प्रेरित करती रही.

लिखता नहीं तो शायद कुछ भी नहीं कर पाता मैं...!

 

 

 

 

 

6. अगर शुरुआत पत्रिका से किया तो कौन सी पत्रिका से किया?

स्कूल की पत्रिका में कविता छपी..ये कविता हिंदी-उर्दू का एक अजीबोगरीब मिश्रण था..मुझे उस नज्म सरीखी रचना का अंश याद रहा है---

जब तू शहीद होगाचिड़ियों से सोग होगा...’ ऐसी ही भावुकता से डूबी पंक्तियाँ थीं.

फिर श्री गिरीश पंकज के सान्निध्य में आने के बाद वयंग्य लेखन किया..जिसमें मैंने ठलुआ पाक्षिक में अपने नगर के छबिगृह, रेलवे स्टेशन, साप्ताहिक बाज़ार आदि पर तात्कालिक हास्य व्यंग्य लिखा..गिरीश भईया की अनुशंसा से वे लेख छपते रहे और जैसे ही लेखकीय प्रति आती ऐसा लगता कि मैं स्थापित लेखक बन गया हूँ.

कालांतर में स्व. सुनील कौशिश जो कथानक पत्रिका कानपुर से निकालते थे उन्होंनेसन ऑफ़ बुधनछापी और फिर तो कहानियाँ छपने लगीं. कविताएँ  भी प्रकाशित होने लगीं.

जयपुर सेलोकशासननामक एक साप्ताहिक पत्र निकलता था, जिसके संपादक थे बी पी सारस्वत, जो बड़ी प्रमुखता से मेरी कवितायेँ छापते थे.

सर्वनाम में विष्णुचंद्र शर्मा जी ने मेरी कविताएँ और कहानियां छापीं, शेष के सम्पादक हसन जमाल साहब ने कहानियां, लघु-कथाएं और कविताएँ छापीं. कृति ओरके विजेंद्र जी और फिर डॉ रमाकांत शर्मा ने भी कविताएँ छापीं. स्व. कामरेड कुंवरपाल सिंह ने कृति ओरमें मेरी दस कविताएँ चयनित की थीं और उनपर अपनी टिप्पणी भी दी थी. संबोधन, अन्यथा, वर्तमान साहित्य, कथादेश, अक्षरपर्व, साम्य, अभिनव कदम ने भी बड़ी प्रमुखता से छापा. स्व.राजेन्द्र यादव ने मेरी चार कहानियों को हंस में स्थान दिया था. वांग्मय ने मुस्लिम कथाकार अंक में मेरी कहानीदहशतगर्दछापी. कल के लिए, प्रेरणा, पाखी, समकालीन भारतीय साहित्य, कथाबिम्ब पत्रिका में रचनाओं को स्थान मिलता रहा और नित नया लिखने की प्रेरणा भी मिलती रही.

 

 

7.इतने व्यस्त जीवन के मध्य साहित्य के लिए कैसे समय निकाल लेते हैं ?

मैं भूमिगत कोयला खदान में काम करता हूँ...यह एक श्रम-साध्य स्थान है...सिर्फ कार्य-स्थल के दैनिक निरिक्षण के लिए ही पांच घंटे अंडर ग्राउंड में लग जाते हैं. सुबह सात बजे घर छोड़ता हूँ

और पहली बार शाम चार बजे वापस आता हूँ. इसके बाद प्लानिंग, मीटिंग के बाद अमूमन रात आठ बजे से अपना वक्त शुरू होता है. सन १९९८ से पेन-फ्री हूँ...की-बोर्ड पर ही लिखता हूँ. जितना लिखा जाए उतने को सेव कर लेता हूँ. इस तरह से आज के विचार कल पर कम ही टालता हूँ.

मैं ऐसा लेखक बनना चाहता हूँ जिसे कभी भी लिखने का कारण लिखने की नौबत आये. मुक्तिबोध ने कहा था कि अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे और पाश ने कहा था कि बीच का कोई रास्ता नहीं होता..ये दोनों लेखकों की जिजीविषा ही मुझे प्रेरित करती रहती है कि हमारे समय की जो विडम्बनाएँ हैं, प्रतिकूलताएं हैं और जो असुविधाएं हैं उन्हें लिपिबद्ध करने का एक नैसर्गिक दायित्व लेखकों को मिला होता है. उन्हें हर हाल अपने समय के सच को बयान करना चाहिए ही चाहिए...इसलिए नौकरी की व्यस्तताएं हों या बाल-बच्चों की जिम्मेदारियां..इन सबके बीच लेखन का संकल्प नहीं टूटना चाहिए...यही मेरी ऊर्जा है और यही मेरे होने का सबब भी...

उस सूत्र वाक्य का पालन करता हूँ किजो रचेगा, वही बचेगा.’ तो लेखक को विधागत पारंगत होना चाहिए और अपनी बात कहने के लिए उस बात के बरअक्स विधा का चुनाव करना चाहिए..क्योंकि लेखन यदि पढ़ा गया तो फिर उसका औचित्य क्या?

काम की अधिकता, अप्राकृतिक वातावरण में काम करने के बाद भी इतनी हिम्मत बचा रखना सिर्फ तभी संभव है जब आप किसी मिशनरी भाव के तहत अपनी अभिरुचि के काम भी कर पायें...और मुझ गर्व है कि मैं अपने सोने के घंटे चोरी कर अभिव्यक्ति के क्षण पा ही लेता हूँ.

 

8. आपकी रुचियां और अभीरुचियां कौन सी हैं ?

लेखन के अलावा जेनुइन किताबें, पत्रिकाएं, ऑनलाइन सामग्री जितना उपलब्ध हो सके उन्हें निरंतर बांचना. इस प्रक्रिया में लेखन के लिए नई चुनौतियाँ और संभावनाएं मिलती हैं जिसके

  फलस्वरूप समयानुकूल शिल्पगत सुधार की गुंजाईश भी बनती रहती है.

लेखन और पठन के अलावा नेट-सर्फिंग, रेखांकन, पत्रिका सम्पादन, पुरानी गाने और गजलें गाना और लांग-ड्राइव पर जाना मुझे बहुत पसंद है.

सोशल साइट्स पर अपने विचार शेयर करना और दूसरों की भावनाओं से रूबरू होने में भी मेरी रूचि है.

 

 

 

 

9. वर्त्तमान के संदर्भ में अल्पसंख्यक के सामने कौन सी चुनौतियां हैं?

अल्पसंख्यक एक अपूर्ण या भ्रमित करने वाला शब्द है..समग्र में कुछ की संख्या को अल्पसंख्यक मानना मेरे हिसाब से गलत है...

जिस प्रदेश में या जिस नगर में आप बहुतायत में हों और समग्रता के आधार पर की गई गणना के अनुसार खुद को अल्पसंख्यक मानें तो ये गलत प्रतीत होता है. जैसे कश्मीर के मुसलमान खुद को अल्पसंख्यक कहें, या फिर पुराने हैदराबाद के मुसलमान या पुरानी दिल्ली के मुसलमान खुद को अल्पसंख्यक कहें तो मुझे ये स्वीकार नहीं है...ये मुसलमान तो अपनी परिवेशगत आबादी के पचास प्रतिशत से ज्यादा के लोग हैं फिर इन्हें कैसे अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है.

शिक्षा, स्वास्थ्य, आय के साधन ये सारी चीजें केंद्र या राज्य सरकार के अधीन आती हैं जो अपनी योजनाओं को समाज के हर तबके के लिए बराबर बांटी जाती हैं...अब ये हर समाज की सयाने लोगों की ज़िम्मेदारी है कि इन योजनाओं का अपने हक में उपयोग करें. होता ये है के अल्पसंख्यक समाज के ये सयानेमज़हब खतरे में हैके नारे लगाते हैं, अल्पसंख्यकों के साथ अन्याय, भेदभाव हो रहा है जैसे जुमले उछालते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार सम्बंधित योजनाओं को धता बताकर रूढ़िवादिता, अंध-विश्वास और धर्मान्धता के पाठ प्रमुखता से पढाते हैं...अल्पसंख्यक समुदाय शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के मुद्दे पर कितना लामबंद होता है..लेकिन यही बाबरी-मस्जिद का प्रकरण जाए, शाह बानो का प्रसंग जाए, दंगा में अल्पसंख्यक पर अत्याचार के मुद्दे जाएँ, पैगम्बर मुहम्मद या कुरआन की बेईज्जती के प्रसंग जाएँ तो अचानक लामबंद हो जाते हैं...धरना, प्रदर्शन करने लगते हैं और कठमुल्लाओं को अपनी राजनितिक आकांक्षा पूरी करने का, देश में राजनितिक ध्रुवीकरण होने का खुला अवसर देते हैं...

भारत देश में अल्पसंख्यक समाज के सामने यही चुनौती है कि सबके लिए शिक्षा की जो व्यवस्था है उससे जुड़ें...विद्यालयीन शिक्षा प्राप्त करें...स्त्रियों की शिक्षा के लिए सजग बनें...धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ टेक्नीकल या हुनर से सम्बन्धित शिक्षा प्राप्त करें और तदनुसार काम की तलाश करें...कठमुल्ला लीडरशिप से खुद को बचाएं और भाड़े के रहनुमाओं की चालबाजियों को बेनकाब करें. हमदर्दी की उन्हें कोई ज़रूरत नहीं है...बल्कि भारत देश के बृहत्तर समाज से खुद को जोड़ें...आखिर बहुसंख्यक हों या अल्पसंख्यक...सभी समाजों में दकियानूसी परम्पराएं, अंधविश्वास और रूढ़िवादिता एक सी है...इस बुराई से लड़ें...

मुख्यधारा में आयें...लोगों में मिलें-बैठें-बतियाएं और पूरी तैयारी के साथ उपलब्ध संसाधन का आनुपातिक उपभोग करें...

 

 

10. आपके लेखन में पहचान का संकट व्यापकता से उभरा है इस पहचान को किस रूप में देखते हैं?

पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई है लेकिन मुझे लगता है कि हमारा मुस्लिम समाज खुद को एक अलग समूह के रूप प्रस्तुत करना चाहता है. इसे इस तरह समझा जा सकता है कि औरतों के

लिए बुर्के की अनिवार्यता. बच्चियों के लिए जो परिधान हों उनमें स्कार्फ और दुपट्टे की अनिवार्यता, पुरुषों के लिए विशेष कट की दाढ़ी-मूंछें, अलग-अलग तरह की टोपियाँ, कुरता-पजामा की अलग तरह की बनावट...रंगों में सिर्फ हरे रंग को प्राथमिकता देना...

अब ये अलगियाने वाले सारे तत्व मुस्लिम समाज को एक बंद समाज के रूप में प्रस्तुत करते हैं...जबकि ऐसी कोई ज़बरदस्त धार्मिक आग्रह कई मुस्लिम देशों में भी नहीं है...सब जगह किसी इंसान को पहले इंसान होना चाहिए उसके बाद हिन्दू या मुस्लमान होना चाहिए...पहचान के संकट से हमारा मुस्लिम समाज इस तरह जूझ रहा है कि प्रतिक्रिया सवरूप वह खुद को लोक-मानस के बीच एक एलियन की तरह पेश करने का प्रयास करने लगता है..

हमारी तहज़ीब, हमारे कर्मकांड, हमारे रीति-रिवाज़, हमारा रहन-सहन, हमारा खान-पान को पुनर्जीवित करता चला जाता है. क्या इन पहचान के अलगियाते तत्वों को अपनाने के बाद घर में बेटी होने पर वह किसी हिन्दू की तरह दुखी नहीं होता है? क्या अपनी अलग पहचान स्थापित करने के बाद वह अपने बेटे की शादी में लडकी वालों से दहेज़ की मांग नहीं करता है? क्या खुद को दाढ़ी-टोपी-परिधान से सजा कर औरतों को कुरआन या हदीस ने जो अधिकार दिए हैं उनकी पाई-पाई अदा कर देता है?

जब मानवीय संवेदनाओं के मसले पर मुस्लिम अपने हिन्दू भाई से किसी तरह अलग नहीं है फिर वो इन खुद से ओढ़ी हुई धार्मिक पहचान से विरत क्यों नहीं होता है? मैंने पहचान उपन्यास में नायक यूनुस के माध्यम से इन्ही सवालों को उठाया है...यूनुस का भाई सलीम अपनी धार्मिक पहचान के कारण गुजरात-दंगे का शिकार हुआ और यूनुस चूँकि एक सामान्य भारतीय युवक है इसलिए हुनर और तकनीकि योग्यता के बल पर रोज़गार पाता है...

तो पहचान का संकट ये नहीं है कि आप बहुसंख्यकों के बीच अजूबे की तरह चिन्हित किये जाएँ बल्कि जिस तरह से नदी में कई धाराएँ मिलकर एक समग्र धारा या नदी का रूप लेती है उसी

तरह से देश का हर नागरिक अपने विवेक का उपयोग करते हुए मुख्यधारा से जुड़े...

 

      

11. शिक्षित अल्पसंख्यक वर्ग को आप क्या सन्देश देना चाहते हैं?

हिंदुस्तान में अमूमन ऐसी मिसालें ही मिलती हैं जिनमें मुसलमान सिर्फ धार्मिक महत्त्व के मसले पर ही लामबंद होते हैं...इसके लिए जाने कहाँ-कहाँ से उन्हें नेतृत्व भी मिल जाता है. इसे हम खिलाफत आन्दोलन के रूप में देख चुके हैं, शाहबानो प्रकरण में देख चुके हैं, सलमान रश्दी की किताब पर प्रतिबंध का मामला हो या फिर बाबरी-मस्जिद प्रसंग में भी इस तथ्य को देखा जा सकता है और अभी किसी व्यक्ति ने पैगम्बर मुहम्मद साहब के बारे में उल्टा-सीधा क्या

कहा कि फिर मुसलमान एकजुट हो गये और मालदा जैसा हादसा हुआ...ये सब क्या है? क्या ये इस्लाम की शिक्षा है?

पैगम्बर मुहम्मद साहब को भी अपने वक्त में जिल्लतों का सामना करना पड़ा था लेकिन उसके लिए उन्होंने बदले की भावना से या फिर आक्रोश, प्रतिशोध का रास्ता इख्तियार नहीं किया

बल्कि सब्र किया...मुआफ किया और अपने मिशन पर डटे रहे....

भारतीय मुस्लिमों को इस बात पर भारतीय संविधान का शुक्र-गुज़ार होना चाहिए जिसमें इंसान को धर्म, लिंग, जाति, रंग से ऊपर रखा गया है...समस्त नागरिकों के लिए एक सी बातें हैं और स्वतन्त्र भारत में यदि मुस्लिम पर्सनल ला की व्यस्था बरकरार रखी गई है तो ये एक बहुत बड़ी                                                                                                                                                                                                          बात है. वक्फ-बोर्ड को शासकीय मान्यताएं हैं...और शायद यही कारण है कि दुनिया भर में धार्मिक शिक्षा की बड़ी मानद संस्थायें हिंदुस्तान की सरजमीं पर हैं और दुनिया भर से धर्म की बारीकियां सीखने के लिए तुलबा (विद्यार्थी) यहाँ आते हैं. हमारे बच्चे स्कूली शिक्षा प्राप्त करते हुए स्थानीय मदरसों से धार्मिक शिक्षा भी पाते हैं...फिर क्यों मुस्लिम समाज में असंतोष पनपता रहता है.

यही नकारात्मक ऊर्जा वाला नेतृत्व शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी से वंचित मुस्लिम समाज को क्यों नहीं लामबंद करता है? क्यों नहीं मुस्लिम समाज अपने अन्दर पैठी फिरकापरस्ती, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, कठमुल्लई और औरतों के प्रति निरादर आदि के खिलाफ लड़ाई करता है? हमेशा एक ही रट लगाए रहना कि देश में मुसलमानों की हक़-तलफी की जा रही है, उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है और लाभ की जगह से वंचित रखने का षड्यंत्र किया जाता है...तो इसमें थोडा-बहुत सच हो सकता  है लेकिन पूरा नहीं. इसका कारण ये है कि समयानुकूल शिक्षा प्राप्ति के लिए मुस्लिम समाज कभी भी उत्सुक नहीं रहता. प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए तो माता-पिता और ही मुल्ला-मौलवी बच्चों को प्रेरितकरते हैं. मदरसा के माध्यम से सिर्फ धार्मिक शिक्षा मिल पाती है और धर्म का ओवरडोज़ बचपन से ही बच्चों को विद्रोही बनाता है और बच्चा धार्मिक व्यवस्थाओं से ऊबकर धर्म-विरोधी या समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने लगता है....नशा करना, चोरी करना, व्यभिचार करना और पैसे कमाने के लिए कुछ भी करना उसकी नियति बन जाती है.

समयानुकूल शिक्षा प्राप्त  करके जाने कितने बच्चे देश के ज़िम्मेदार नागरिक बनते हैं और रोज़गार पाते हैं...कम्पटीशन में बैठते हैं, दिमाग और हुनर में मुस्लिम बच्चे अन्य समुदायों के बच्चों से तेज़ ही होते हैं लेकिन अपने कूढ़मगज परिवेश के प्रभाव में आकर जल्द ही डिस्ट्रक्तिव

हो जाते हैं. इन बच्चों का मन हुनरमंद रोज़गार में लगता है...यांत्रिकीय दक्षता प्राप्त कर गैरेज, टेलरिंग, कशीदाकारी, टर्नरी, कारपेंटरी, प्लाम्बरी वेल्डरी जैसे काम में अच्छा नाम और धन    कमा लेते हैं.

देश में इसाई मिशनरी के स्कूल हैं, मंदिर ट्रस्टों के स्कूल हैं, जैन-सिख-बनिया लोगों के स्कूल हैं, राजनितिक पार्टियों के स्कूल हैं लेकिन मुसलमानों के शिक्षा-संस्थान नहीं के बराबर हैं. ऐसे शिक्षा संस्थान जहां मुस्लिम बच्चों के साथ अन्य समुदायों के बच्चे मिलकर मुख्यधारा की शिक्षा प्राप्त

कर सकें...क्या मुसलमानों में उद्योगपति, धनपति, मजार-ट्रस्ट और वक्फ बोर्ड नहीं हैं..?

क्या ये लोग इस देश में अपनी सेकुलर सोच और उपयुक्त पाठ्यक्रम के साथ राष्ट्रीय स्तर के विद्यालय नहीं खोल सकते थे? हर काम के लिए सरकारों का मुंह ताकना और उनका आसान वोट-बैंक बनना ही क्या भारत में मुसलमानों की नियति है?

शिक्षित मुस्लिम मुस्लिम समाज को चाहिए कि शिक्षा प्राप्ति के लिए अपनी आबादी को प्रोत्साहित और जागरूक करें. मुख्यधारा से तभी हम जुड़ सकते हैं वरना कूंए के मेंढक बन कर

अपनी आबादियों को सदियों सीलन भरे अँधेरे में रहने के लिए मजबूर किये रहें....

शिक्षित मुस्लिम लोग अपने समाज की स्त्रियों को शिक्षित कराएं और उन्हें तकनीकी शिक्षा के लिए भी प्रेरित करें...शिक्षिका, नर्स, बूटीक, ब्यूटी पार्लर जैसे पेशे के लिए उन्हें तैयार करें और समाज की एक उत्पादक इकाई बनने के लिए प्रोत्साहित करें.

कम उम्र में विवाह और बच्चों की जिम्मेदारियां इन स्त्रियों को खिलने से पहले मुरझाने के षड्यंत्र का शिकार बनाती हैं. वैज्ञानिक सोच और आधुनिक समाज में रहन-सहन के लिए मुस्लिम समाज के रीति-रिवाज़ और संस्कार आड़े नहीं आते हैं...कुरीतियों से ज़रूर हमारा समाज ग्रसित है तो उसका सामना शिक्षा ही है जो कालांतर में हमें कुरीतियों से दूर कर देती है. 

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