शुक्रवार, 6 मार्च 2026

कुछ अपनी बात : तीन

 

साहित्य लेखन की प्रेरणा

मैं बचपन से ही अंतर्मुखी हूँ...लगता कि मुझे भी कुछ कहना है और मैं उसके लिए कोई टूल्स नहीं खोज पाता था. अम्मी और किताबों की संगत ने मेरे अन्दर अभिव्यक्ति के बीज बोये. भारत पुस्तक भण्डार से जब इब्ने सफी की किताबें पढता था उसी दरमियान हिन्द पाकेट बुक्स की साहित्यिक किताबें भी किराये पर लाकर पढने लगा. बच्चों की किताबें जैसे चंदामामा, गुडिया, नंदन, पराग आदि भी डूब कर पढ़ा करता. मेरा एक मित्र था जिसके घर नंदन प्रतिमाह डाक से आती थी, मैं उसके होमवर्क कर दिया करता जिसके एवज़ में वह मुझे नंदन पढने के लिए देता था. इन तमाम पत्रिकाओं के बीच पराग मुझे पसंद आती, क्योंकि पराग की कहानियों में काल्पनिकता कम होती थी और बाल-मनोविज्ञान पर आधारित देश-विदेश की श्रेष्ठ रचनाएँ उसमें पढने को मिल जाती थीं, जबकि नन्दन आदि पत्रिकाओं में बच्चों को परी, राजा-रानी, पौराणिक  आदि कहानियों को दुहराया जाता था. उन कहानियों के उलट पराग की कहानियों में तत्कालीन समाज के बच्चों की समस्यायों, स्वप्नों और उम्मीदों को आकार दिया जाता था.

इसी तरह कहानियां पढ़ते-पढ़ते एक बार मैंने अपनी छोटी बहन शमा को एक कहानी सुनाई...वह शमा को बहुत पसंद आई...कहानी मैंने मन से गढ़ी थी...विचार आया और कापी के पन्ने पर उस कहानी को लिखने लगा...कहानी पूरी हुई और उसका शीर्षक लिखा---‘नन्हा शेर’. मैंने उस कहानी को अब्बा के रजिस्टर के पन्ने फाड़कर एक बार फिर साफ़-साफ़ लिखा..तब फाउन्टेन पेन का जमाना था. कहानी लिख कर लिफाफे में डाली और पराग के सम्पादकीय कार्यालय के पते पर भेज दी. उस समय में मैं ग्यारहवी का विद्यार्थी था. स्कूल के हिंदी शिक्षक कवि श्री अमर लाल सोनीअमरमुझे अक्सरबूढा-बालककहकर बुलाते थे. मैं तुकबन्दियाँ करता था और उन्हें स्कूल के कार्यक्रमों में गाया करता था. मेरी आवाज़ बड़ी मधुर थी, सो उन गीतों को अक्सर सराहा जाता.

एक कापी में मैंने कविताएँ लिखनी शुरू कीं और जब पचास कवितायेँ हो गईं तो उनमें से छंट कर दस कविताएँ मैंने आकाशवाणी के अंबिकापुर केंद्र में भेज दिन. कुछ दिन बाद डाक से मुझे कान्टेक्ट मिला. आकाशवाणी में जाकर मुझे अपनी कविताओं की रिकार्डिंग करानी थी. तब मेरे वरिष्ठ लेखकों को युवा-वाणी के लिए कान्टेक्ट मिला करता था और मुझे हिंदी-वार्ता के लिए कान्टेक्ट मिला था...ये बात लोगों को हज़म नहीं हुई कि इस बालक को कैसे हिंदी-वार्ता में स्थान मिला...तो इसका कारण मेरी कविताओं में यथार्थ का चित्रण ही होना चाहिए...मैं इतना पढता था कि मेरी लेखनी समय से पहले परिपक्व होने लगी थी.

जब रिकार्डिंग के लिए आकाशवाणी पहुंचा तो वहां केंद्र-प्रभारी ने मुझे ऊपर-नीचे घूरा और पूछा—‘आप ही अनवर सुहैल हैं?’

मैंने सकुचाते हुए कहा—‘जी हाँ

तब वे बोले अपनी कविताएँ दिखलाओ...मैं कविताएँ रजिस्टर के पन्ने पर अलग से लिख कर ले गया था कि उसकी एक कापी उन्हें रिकार्ड के लिए जमा करानी होगी. वे बोले इसके अलावा भी और कविताएँ होंगी ...तब मैंने अपनी कविताओं की कापी उनके हवाले कर दी. उनका नाम शायद अमरेन्द्र जी था...या तपन बनर्जी अब याद नहीं है..क्योंकि बाद में श्री अमर लाल सोनी ने मुझे बताया था कि यही लोग साहित्य-वार्ता कवर करते हैं.

खैर इस तरह आकाशवाणी में मेरी कविताएँ आने लगीं और कई साल तक मुझे कान्टेक्ट मिलता रहा था. अब्बा ने बैंक में मेरे नाम से एकाउंट खुलवा दिया था, जहाँ मेरा मेहनताना जमा होता रहता. इन पैसों से मैं किताबें खरीदता.

इधर मैं अक्सर पोस्ट-आफिस जाया करता कि पराग से कहानी की स्वीकृति जाए...और एक दिन एक ग्लेज्ड कार्ड मिला. जिसे हाथ में लेकर पढ़ते हुए मेरा शरीर काँप रहा था---‘आपकी कहानीनन्हा-शेरपराग के लिए स्वीकृत है. यथासमय इस कहानी को प्रकाशित किया जायेगा.’

ये कहानी दो साल बाद सन १९८३ में पराग में छपी और बतौर पारिश्रमिक एक सौ रुपये का चेक मेरे नाम आया.

हमारे मुहल्ले में हिंदी के एक व्यंग्यकार रहा करते थेश्री गिरीश पंकज. लम्बे से पतले दुबले गिरीश भईया. बिलकुल गुनाहों के देवता के पात्र से दीखते. गिरीश भईया अख़बारों के लिए लिखते थे. उनके पास एक साप्ताहिक पत्र आता था—‘ठलुआ’. उसमें गिरीश पंकज के व्यंग्य बहुलता से छपते. भईया के चलते मैंने भीठलुआके लिए हास्य-व्यंग्य लिखना शुरू किया और वह छपने लगा. तो कविता, कहानी और व्यंग्य आदि लिखने के कारण मैंने खुद को स्थापित लेखक मान लिया था.

एक बनारसी बाबू थे जो कम्युनिस्ट कार्यकर्ता थे. उनके घर में सोवियत-नारी पत्रिका आती थी. सोवियत नारी पत्रिका हम इसलिए पसंद करते थे कि वो बड़े चिकने पन्नों में छपती थी और उन पन्नो से हमारी टेक्स्ट बुक्स में हम कवर चढाया करते थे. ऐसे ही एक बार मित्र राजीव के साथ बनारसी बाबू के घर गया तो देखा कि उनके घर में बेशुमार रसियन किताबें हैं...उन किताबों के दाम भी नाम-मात्र का होता था. धीरे-धीरे हमने वहां से गोर्की, तोलस्तोय, दोस्तोवस्की आदि की सजिल्द किताबें खरीदनी शुरू कीं और हमारा परिचय विश्व साहित्य से होने लगा...कोई मदन लालमधुअनुवादक हुआ करते थे उन किताबों के और तीन-चार सौ पृष्ठों की सजिल्द किताबें चार-पांच रुपये में मिल जाती थीं...गोर्की के उपन्यासमाँने मेरे लेखन में परिवेश को शब्दाकार देने में बड़ी मदद की...और यहीं से मालूम हुआ कि देश कोई भी हो, इंसान सब जगह एक से होते हैं और उनकी रोज़मर्रा का जीवन एक तरह का ही होता है...तो गोर्की के पात्र ऐसे दीखते जैसे वे हमारे मोहल्ले के पात्र हों. ठीक इसी तरह गोर्की की आत्मकथामेरा बचपनऔरमेरे विश्व-विद्यालयने जीवन में सकारात्मक सोच भरी..कैसे धारा के विपरीत तैराकी की जाये..गोर्की के तमाम कष्ट सिर्फ पढने और पढने की अभिरुचि के कारण उन्हें सारी दुनिया का नागरिक बना गए...तो मैंने ये भी जाना कि लिखने से पहले पढना निहायत ज़रूरी है. बाद के दिनों में एक और किताब ने मुझे स्थानीयता की तरफ अग्रसारित किया---वो किताब हैमेरा दागिस्तानजिसे विश्व-कवि रसूल हमजातोव ने लिखा और जो दूर की कौड़ी लाने वाले लेखकों के लिए एक ऐसा दस्तावेज़ है जहां लोकल ही ग्लोबल होता है...हमें अपने परिवेश, देश-काल, वातावरण और अपने आसपास से रूप-रंग-ध्वनि-गंध को भीतर तक महसूस करना चाहिए...

नगर में एक साहित्यिक संस्था बनी. संबोधन...उस संस्था के गिरीश भईया फाउंडेशन मेंबर थे. संबोधन एक पत्रिका निकालती थी---‘यत्निकाऔर उसके बादशुरुआत’.

संबोधन ने नगर के राम-मन्दिर प्रांगण में एक पुस्तकालय का सञ्चालन शुरू किया तो डिप्लोमा लेने के बाद बेरोजगारी के दिनों में मैं और मित्र राजीव उस पुस्तकालय को नियमित खोलने लगे. मैं अब दिन भर उस पुस्तकालय में पडा रहता...और वहां उपलब्ध तमाम किताबें चाट डालीं.

किताब पढने की भूख ने ही मुझे एक लेखक बनाया और इसीलिए नए लेखकों को अक्सर यही कहा करता हूँ कि भाई, सिर्फ अपना लिखा ही नहीं पढ़ा करो बल्कि देश-दुनिया में जो पहले लिखा जा चुका है उसे भी पढने का प्रयास करो. हम दोनों मित्र बिना गुरु के शमशेर की कविताएँ पढ़ते और समझने का प्रयास करते...बेशक कठिन कवि हैं शमशेर. हम नागार्जुन को पढ़ते और उनकी शब्दों के ललकार से आल्हादित होते. हम मुक्तिबोध को पढ़ते और गहरे अँधेरे में जुगनुओं की तरह टिमटिमाते असंख्य मशालों को जलता और समीप आता देखते. हम अमृता प्रीतम की कविताओं में रूमानियत से इतने मुग्ध होते और खुद को साहिर की तरह तसव्वुर करने लगते...

तो दीवानगी का आलम होता है लिखना और लिखने के पहले गुनना...फिर एक महीन जाल बुनना...

आकशवाणी अंबिकापुर में जबकाला-आजारके लेखक  तेजिंदर गगन जब केंद्र-निदेशक के रूप में आये तब कहानी-पाठ के लिए मैं आकाशवाणी गया था. रिकार्डिंग से पूर्व जिज्ञासावश तेजिंदर जी से मिला. सरगुजा की इसाई मिशनरियों और आदिवासियों के बीच उनकी उपस्थिति से प्रभावित होकर उस समय तेजिंदर जीकाला-पादरीउपन्यास के लिए डिटेल्स इकट्ठे कर रहे थे...मैंने उनसे तब पूछा था कि आप नौकरी करते हुए कैसे लिखने के लिए वक्त निकालते हैं. तब तेजिंदर जी ने कहा था, उनकी आवाज़ में गजब की स्पष्टता है जो अब तक मेरे कान में बजती रहती है---‘अनवर सुहैल, नौकरी कर रहा हूँ क्या ये कम बड़ा अपराध नहीं है...फिर मैं लिखूं-पढूं नहीं..इसके लिये मैं छुट्टियां लेता हूँ और इकट्ठे डिटेल्स के आधार पर काम करता हूँ...!’

जब मेरी नौकरी लगी तब तेजिंदर जी के ये कथन मेरा पीछा करते और सृजनरत रहने को प्रेरित करते हैं....

 

 

5. आपके लिए लेखन क्या है?

लेखन मेरे लिए उतना ही ज़रूरी है जितना कि खाना-पीना-सोना. मैंने जितना भी पढ़ा तो यही जाना कि खुद के बारे में आपके अलावा दूजा कोई नहीं लिख सकता...ठीक है गोर्की ने अपने देश-काल पर लिखा और प्रेमचंद ने अपने समय को जीया, लेकिन ये जो मेरा कालखंड है और जिस परिवेश में मुझे इस पृथ्वी के रंगमंच पर रोल करने को कहा गया है वहां का मुझसे बढ़कर सफल प्रवक्ता मेरे सिवा दूजा कोई नहीं हो सकता है.

साहिर लुधियानवी ने लिखा भी है

दुनिया ने तज़ुर्बतो-हवादिस की शक्ल में

 जो कुछ मुझे दिया उसे लौटा रहा हूँ मैं.

तो हम नया कुछ नहीं करते बल्कि जो हो रहा है और जो होने वाला है उसका ब्लू-प्रिंट ही तो तैयार करते हैं ताकि सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आये. इस लिखने-पढने के बीच हम अपनी समस्याएं, विडम्बनाएँ, आशा-निराशा, चाहतें और संघर्ष के लिए प्रेरित करते विचार ही तो अपने समकालीन पाठकों से शेयर करते हैं. हम अपनी लेखनी के ज़रिये पाठकों से संवाद करते हैं और एक कारवाँ बनता चला जाता है...यही उम्मीद ही तो लेखक का सरमाया होती है...

बकौल फैज़---‘अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जीये जाते हैं...’

        तो ये जीवन-राग है ये हमारी ताकत है जो मनुष्यों, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, आकाश-चाँद-तारों के प्रति हमारी
       जवाबदेही सुनिश्चित करती है....

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