रविवार, 14 जून 2026

मैं वापस आऊंगा

 


इम्तियाज़ अली ने " मैं वापस आऊंगा" बनाकर वह एक काम कर दिखाया जो उन्हें इस उपमहाद्वीप का एक बड़ा फिल्म निदेशक साबित करेगी।  आज के दौर में जब प्रोपगंडा बेस्ड सिनेमा ब्लॉक बस्टर होकर करोड़ों पीट रही हैं और सत्ता एवं  जनता का एक बड़ा समूह इस भावना  को न्यू सिनेमा के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिये बेचैन शिद्दत से मौजूद हो तब इम्तियाज़ अली एक ऐसी मासूम  कहानी चुनते हैं जिसमें विभाजन की विभीषिका से उपजा शाश्वत प्रेम का एक अद्भुत आख्यान है। आज के दौर में यह ज़रूर सोचा जा सकता है कि भारत में अब ऐसी फिल्म की ज़रूरत है या नहीं? देश का एक बड़ा तबका माने बैठा है कि पाकिस्तान बनने के बाद मुसलमान समस्या का निदान हो जाना चाहिए था. क्यों देश ने पाकिस्तान बनने के बावजूद भी मुसलमानों का देश में रहना स्वीकार किया. आरएसएस जैसी संस्थाएं हमेशा से इस देश में मुसलमानों की हकीकी उपस्थिति नामंजूर करती आ रही हैं. हाँ, मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखना उनकी फितरत में है. पंजाब और पंजाबी इस विभाजन की त्रासदी के सबसे बड़े शिकार रहे. पंजाबी चाहे सिख हों या मुस्लिम. उस सांझी सांस्कृतिक धरोहर का बड़ा नुकसान हुआ था. शरणार्थी के रूप में लोगों ने अपार कष्ट झेलकर अपने जीवन को संवारा था. फिल्म में एक संवाद है---"भागो यहाँ से, सिर्फ को खुद को बचा लो"  
लोगों को नहीं मालूम था महादेश में कैसा खेल होने वाला है? मंटो की कहानी  "टोबा टेक सिंह" जैसे हालात से देश का पंजाब जैसा तबका बहुत शिद्दत से परेशान था. हम किधर के कहलायेंगे. इधर के या उधर के. नसीरुद्दीन शाह और उनके परिजन पहले लाहौर के पास एक जगह है "सरगोधा" वहां रहते थे. वहां पढाई के दौरान नसीर को एक मुस्लिम लडकी से इश्क हो जाता है. लड़की जिया भी उन्हें जी-जान से चाहती है. नसीर जिया से कहते हैं कि वह अचानक कहीं नहीं जायेंगे. यदि ऐसी कोई विपरीत स्थिति आई तो सड़क पर सो जायेंगे लेकिन अपनी जिया को छोड़कर कहीं नहीं जायेंगा. विभाजन की बातें मन्ज़रेआम थीं. सुनते थे कि पंजाब के एक हिस्से में मुस्लिम सिख दंगे हुए हैं. ऐसी ख़बरें लोगों को डराती रहती थीं.  युवा नसीर भी जानते थे कि माहौल खराब है लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि सरगोधा की सरज़मीं हिंदुस्तान ही में रहेगी या पाकिस्तान में चली जाएगी. देश में राष्ट्रीय स्तर पर कोई काम नहीं किया गया था. वायसराय ने ब्रिटेन से रेड क्लिफ को बुलाया और उसने मात्र एक हफ्ते में एक काल्पनिक रेखा नक़्शे पर खींच दी जिसे रेडक्लिफ लाइन कहा गया. १४ अगस्त को पाकिस्तान और १५ अगस्त १९४७ को हिन्दुस्तान बन गया. इस महादेश को रेडक्लिफ लाइन 17 अगस्त १९४७ को मिली. तब कोई इन्टरनेट नहीं था. ख़बरों से ज्यादा अफवाहें माहौल में जिन्दा थीं. इसी अफरातफरी में सरगोधा के लोगों ने जाना कि सरगोधा तो पाकिस्तान में है और फिर वहां सिखों के खिलाफ लूटपाट आगज़नी और हत्या-बलात्कार का दौर शुरू हुआ. इम्तियाज़ अली ने उस तनाव भरे समय को फिल्माने में बड़ी ज़िम्मेदारी का प्रदर्शन किया है. सिख परिवार की सीनियर स्त्री ने बलात्कारियों से अपनी बहु-बेटियों को बचाने के लिए स्वयं अपने कटार से लड़कियों कि गर्दन काट कर शहीद किया था. ऐसे ही कई दर्दनाक प्रसंग हैं जिन्हें इम्तियाज़ अली ने दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया है. 
इम्तियाज़ अली ने इस फिल्म में विभाजन की विभीषिका को दर्शाने के लिए दलजीत दोसांझ के चरित्र के माध्यम से नई पीढ़ी को वाकिफ कराने के लिए टेक्निक का इस्तेमाल किया है. दलजीत दोसांझ नसीरुद्दीन शाह का पोता है जो लन्दन में रहकर स्टैंड अप कामेडी करता है. वह खुद को कई मोर्चों में फ़ैल पाता है तभी एक दिन उसके पिता का फोन आता है कि दादा नसीर को अटैक आया है. दलजीत अपनी प्रेमिका को बताकर इंडिया आ जाता है. नसीर अस्पताल में कोमा में हैं और ज़िन्दगी मौत से जूझ रहे हैं. वह अपनों को भी पहचान नहीं पा रहे हैं. दलजीत को भी नहीं पहचानते हैं लेकिन कोई दुस्वप्न ऐसा है जिससे वृद्ध नसीर रह रह कर व्यथित रहते हैं और उनकी बेचैनी का सबब कोई नहीं जानता है. दलजीत दोसांझ विभाजन के वक़्त को वापस पाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया. सरगोधा की सरज़मीं से दादा नसीर के टूटे लिंक को जोड़ने का प्रयास किया. आधी अधूरी कहानी से जुड़ाव न हो पाने के कारण इस बीच नसीर को एक और अटैक आता है. दलजीत के पिता अब नहीं चाहते कि नसीर को अब बचाने के लिए प्रयास किये जाएँ. नसीर की रूह जैसे अपनी प्रेमिका जिया को देखने के लिए बेचैन रहती है. इस बात को समझता है उनका पोता और एक दिन अपने खोजी  दोस्तों के साथ पाकिस्तान चला जाता है. सरगोधा पहुंचकर वह ऑनलाइन नसीर साहब से जुड़ता है और पूछता है कि वह उन्हें उनका अतीत खोजने में मदद करें. दूसरे हार्ट-अटैक के बाद लगभग मृत नसीर की आँखों में मोबाइल स्क्रीन पर अपने वतन सरगोधा के दृश्य देखकर ग़ज़ब की इच्छा-शक्ति जागती है. वह ऑनलाइन पोते दलजीत और उनके दोस्तों को उन रास्तों के बारे में बताते हैं जिन पर साइकिल से चला करते थे. समय के साथ सरगोधा भी पूरा बदल गया है. वे लोग नसीर के दिशा बताने के आधार पर उस जगह पहुँच जाते हैं जहाँ  
नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, ए आर रहमान की तिकड़ी ने फिल्म के कैनवास को एक बड़ा शाहकार बना दिया है। वेदांग एक अच्छे गायक हैं जो नसीरुद्दीन शाह के किशोरावस्था का रूप हैं और उनकी युवा प्रेमिका  अभिनेत्री शरवरी हैं जिनके अभिनय में वो फैक्टर है कि बेटा यह अवसर जीवन में एक बार मिल रहा है और फिल्मी पर्दे पर अपनी उपस्थिति को जीवंत करने का कोई अवसर मत चूकना। 
युवा सिख नसीर  ने सन सैंतालीस के दौर में अपनी मुस्लिम प्रेमिका को हर हालत में पाने का अहद किए हैं लेकिन विभाजन की त्रासदी ने उस प्रेम की भावना को जॉम्बीज की नफरतों का शिकार बना दिया। युवा नसीर ने प्रेमिका को वचन दिया था कि चाहे कुछ भी जाए वह अकारण उसके जीवन से दूर नहीं जायेंगे भले से परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हो जाएं।
लेकिन सन सैंतालीस की अफरातफरी में ऐसा होता है कि नसीर अपना वचन निभा न पाएंगे। 
अपने बचे खुचे परिजनों के साथ नसीर हिंदुस्तान आते हैं लेकिन अपने प्रेम की यादों को भूल नहीं पाते। आजीवन प्रेमिका से मिलने की कसक एक टीस की तरह उनके दिल में घर कर गई। ज़िंदगी को हिंदुस्तान में फिर से एक नए सिरे से शुरू करने का संघर्ष उन्हें बूढ़ा कर गया। एक ऐसा राज़ उनके साथ जी था जिसे वह अपने बेटे, बहु, पोते और अन्य रिश्तेदारों के साथ साझा नहीं कर पाते। किसी प्रेशर कुकर में फंसी भाप की तरह उनका प्रेम ज़माने के सामने कैसे आए। 
इम्तियाज़ अली ने इन सब बातों को एक आख्यान, महाकाव्य की तरह पेश किया है जिसमें दर्शकों के दिलों में कसमसाहट बनी रहती है जो हूक की श्रृंखला बनकर पूरे समय आंखों को नम बनाए रखती है। वाकई वह समय बहुत वीभत्स था और उस पीढ़ी के अब गिने चुने बचे लोग अब भी उन दुःस्वपनों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। एक ऐसा ज़ोर का झटका था वह समय कि अचानक सब कुछ बदल जाए. हम बर्मा में रोहिंग्या मुस्लिमों को जलावतनी का दर्द झेलना पड़ा क्या उसे अपने साथ घटता देखने की अभिलाषा रख सकते हैं? जो घट रहा है फिलिस्तीन में क्या ऐसा कुछ हमारे साथ भी घट सकता है? ऐसे खतरनाक समय में हम अपने साथ यादों के अलावा और क्या ला सकते हैं? पैसे-रुपये, सोना-चांदी सब बेकार हैं उस सुकून के आगे जो हमें अपने वतन में अनायास ही मिलता रहता है. इम्तियाज़ अली ने हमारे समय की सबसे बड़ी अनहोनियों को महसूस किया है और इस फिल्म के माध्यम से हमें आगाह करना चाह रहे हैं. 
मेरे मामू अपनी बहन यानी मेरी अम्मी से मिलने पाकिस्तान से आते थे तब दोनों भाई बहन घंटों बतियाते रहते थे। मामू जब वापस जाते तो अम्मी की आंखों के अश्क स्थाई हो जाते थे। आज वे दोनों इस नश्वर संसार में नहीं हैं लेकिन मैं सोचता हूं कि हमारे साथ ऐसा कुछ घटित न हो.  
एक दिन युवा सिख नसीर अपनी प्रेमिका जिया उर्फ़ मल्लिका दिलफरेब से कहते हैं कि बेशक सिख और मुस्लिम की शादी होने में मुश्किलात हैं तो हम चर्च जाकर इसाई विधि से शादी कर लेंगे लेकिन यह सब अगस्त १९४७ की घटनाएँ हैं जब अचानक रेडक्लिफ लाइन की मारक रेखा उनकी किस्मत का फैसला कर देती है. सरगोधा खूनी दंगों की गिरफ्त में आ जाता है. नसीर हिंदुस्तान आ जाते हैं लेकिन सरगोधा की यादों के प्रेत उनका पीछा नहीं छोड़ते हैं. 
यह किसी लड़की का प्रेम नहीं है बल्कि अपनी मिटटी की खुशबू से प्रेम की दास्तान है. एक दिन वृद्ध नसीर अपने ड्राईवर को एक पता देते हैं कि यहाँ मुझे ले चलो. यह सरगोधा का पता है. ड्राईवर डर जाता है और गाडी लेकर वाघा बार्डर आ जाता है. जहाँ नसीर को सैनिक समझाते हैं कि सरगोधा उस पार पाकिस्तान में है और आप इस समय हिंदुस्तान में हैं. आप पाकिस्तान नहीं जा सकते. नसीर को यकीन नहीं होता कि ये लोग समझ क्यों नहीं रहे हैं कि वह सरगोधा के हैं और उन्हें वहां भेज देने में हर्ज़ ही क्या है? वाघा बार्डर में उनकी तबियत खराब हो जाती है. इलाज के दौरान वह गिर पड़ते हैं और उन्हें दलजीत के पिता यानी नसीर के बेटे अपने शहर ले आते हैं जहाँ उनका इलाज चालू होता है. यह फिल्म की कहानी है जिसे बताने में कुछ भेद नहीं है लेकिन असली बात है वृद्ध नसीर के सीने में दफ़न वे राज़ हैं जो जब तक  बाहर न आ जायेंगे नसीर को मौत भी तो नहीं आ सकती है. 
ए आर रहमान का संगीत इस फिल्म की जान है. वेदांग और दलजीत दोसांझ अच्छे गायक हैं और पंजाब के संगीत की रूहानी ले दर्शकों को बांधे रखती है.
फिल्म 12 जून को रिलीज़ हुई और १३ जून को मैं थिएटर जाता हूँ तो कुल 12 दर्शकों को देख कर बहुत दुखी हो जाता हूँ. यह वही सिनेमा हाल है जहाँ धुरंदर एक या दो के समय हाल हाउस फुल जाते थे. 
दिल से बनी दिलवालों के लिए बनाई गई इम्तियाज़ अली की पिक्चर "मैं वापस आऊंगा" देखने का मन बनाएं....