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Monday, August 31, 2009

paakhi me prakashit pahchan ki samiksha ki pratrikriya

pehchan novel in hindi published by rajkamal prakashan delhi, page 150 price 200/- ---

वो बात सारे फ़साने में जिसका ज़िक्र न था---

                                                 अनवर सुहैल   
            
अपने उपन्यास का ज़िक्र पाखी में देख लगा कि पहचान के जिस संकट से 
मेरा नायक यूनुस जूझ रहा है उसे अभी जाने कब तक यूं ही जूझना होगा। 
देश के लोगों की मानसिक स्थिति अभी वैसी की वैसी है। 
मेरी इस धारणा को बल मिला धर्मव्रत चौधरी की आलोचना पद्धति देख कर। 
उनकी भी वही धारणा है कि उनके भारत देश में मियां लोग चार शादियां करते हैं. ढेर सारे 
बच्चे पैदा करते हैं. लाइल्मी के दौर से गुज़रते हैं.  मलेच्छ की तरह रहते हैं.  मांस खाते हैं सो 
स्वभाव से तामसिक होते हैं, गौवध करते हैं, बडे झगडालू होते हैं, हिन्दुओं को काफ़िर कहते 
हैं, अपनी दुनिया में खोए रहते हैं, जेहादी होते हैं, आतंकवादी होते हैं, रहते भारत में और गाते
पाकिस्तान की हैं। पाकिस्तान ले लेने के बाद भी भारत माता का का खून चूस रहे हैं ये मुसल्ले---
लगता है कि आलोचक धर्मव्रत चौधरी ने उपन्यास पढना ही इसी नीयत से शुरु किया 
है कि अनवर सुहैल एक सांप्रदायिक सोच का लेखक है और उसका नज़रिया संकीर्ण है। अनवर 
सुहैल कांग्रेस की अल्पसंख्यक तुटिकरण नीति का समर्थक है।
पहचान उपन्यास की आलोचना के अंत तक आते आते धर्मवीर चौधरी ने यह समझाईश 
तक दे डाली है कि
‍'' यह समझना और समझाना कठिन है कि वन्दे मातरम के  गाने से अल्लाताला का 
सिंहासन डोल जाएगा। दूसरी तरफ़ संघ यह सिध्द कर सकता है कि देश के सभी हिन्दू वन्दे मातरम
गाते हैं। इस देश में ऎसे करोडों हिन्दू मिल जाएंगे जिन्होनें वन्दे मातरम सुना तक नहीं होगा। इस 
तरह के अतिवादी मानसिकता वाले लोगों यह समझना चाहिए बिना वन्दे मातरम  गाए भी देश भक्त 
हुआ जा सकता है। और मुसलमानों को वन्दे मातरम के शब्दार्थ के बजाए संदर्भ पर ध्यान देना 
चाहिए। और इसे एक बार गाकर देखना चाहिए कि इसे गाने से इस्लाम पर कौन सा पहाड टूट पडता 
है।''
मैं एक कवि हूं, कथाकार हूं। उपन्यास लिखने का जोखिम क्यों उठाता भला। वह भला हो
यूनुस का और सलीम का, साथ ही भाई नरेन्द्र मोदी का जिन्होने मिल जुल कर मुझसे एक नावेल फंदवा
लिया। मैं कथा में ऎसा डूबा कि बातें खुलती गईं और नावेल तैयार हो गया। 
मेरा उपन्यास लिखने का सबसे बडा कारण ये है कि मैं मुस्लिम समाज के लोगों को खास
कर युवकों को ये संदेश देना चाहता हूं कि वे हिन्दुस्तान में रहने वाली नई पीढी में शामिल हैं। वह
ज़माना और था जब बंटवारा हुआ था और इंसानों के बीच ऎसी खाई खोद दी गई थी कि उसे पाटने
में कई दशक गुज़र गए। अब दुनिया वैसी नहीं रह गई है कि शुतुर्मुर्ग की तरह जिया जाए। अब समय 
आ गया है कि प्रत्येक भारतीय को धर्म की व्याख्या स्वयं करना चाहिए और इस उपभोक्तावादी समय
की ज़रुरतों को ध्यान में रखकर कर्मकाण्ड और अंध विश्वास से बचना चाहिए। यह दौर टेक्नालाजी का
है और मुस्लिम युवकों को हुनरमंद होना चाहिए। स्वालंबी होकर देश की मुख्य धारा में आ जाना 
चाहिए। मुख्य धारा यानी विहिप का हिन्दत्व में नहीं बल्कि सेक्यूलर, स्वतंत्र भारत का जागरुक
नागरिक बने।
यही कारण है कि उपन्यास का नायक इधर उधर भटकते भटकते अंत में इतनी सलाहियत पैदा 
कर लेता कि अपनी रोज़ी रोटी स्वयं कमाने के योग्य बन जाता है। यही तो चाहती हैं सरकारें हमारी और 
यही तो हम भी चाहते हैं। हम कहां बोल रहे हैं कि हमारे पात्र सिमी का सदस्य बनें, अल कायदा में शामिल हों, 
या उग्रवादी संगठनों का हिस्सा बनें।
हां, भाई धर्मव्रत जी, मैं दुर्भाग्यवश मुस्लिम परिवेश की पैदाईश हूं। अब आप ही बताएं कि
अपने परिवेश का सफल प्रवक्ता मेरे अलावा और कौन हो सकता है? आप कहते हैं कि मुझे कश्मीरी विस्थापितों 
का दर्द दिखलाई नहीं देता? तो ये डिफ़रेन्सेज आपकी डिक्शनरी में मौजूद हैं, मैंने तो बडी ईमानदारी से अपनी 
बात कहने के लिए उस समाज से पात्र चयन किए हैं जिन्हें मैं अच्छी तरह जानता हूं।
आपके हिसाब से यदि इस मुल्क में मुसलमान किराएदार की हैसियत से रह रहे हैं तो मुझे इससे
इत्तेफ़ाक नहीं है। ये मुल्क जितना आपका है उतना हमारा भी है...

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