सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

मुहम्मद दीपक

 


अचानक तुम आये मुहम्मद दीपक
और जैसे इंसानों के बचे रहने की उम्मीद
फिर से तिनके जोड़ने लगे
बनने लगे घोंसले जिन्हें बार बार तोड़ा गया था
अचानक तुम आये मुहम्मद दीपक
जानते हो कितने सच्चे मित्रों को तुमने
बोलते रहने की जिजीविषा दी
वे सब खड़े हुए देखो इक- दूजे से
सामूहिक नफ़रतों के खिलाफ़
ज़रूरी नहीं हथियारों से ही बनते हों ज़ख्म
नफ़रतों से बने ज़ख्म कभी नहीं भरते
अचानक तुम आये मुहम्मद दीपक
यह जानते हुए कि तुम्हारे इस तरह आने से
इस बेमेल समय में रिस्क बहुत है
फिर भी तुमने जो राह चुनी
उस क्षण को सलाम
उस हौसले को सलाम

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