अब बेटियां भागती नहीं
अब बेटियां भागती नहीं
और न ही भगाई जाती हैं
बेटियां अब खुशी - खुशी
चली जाती हैं गांव से कस्बों में
कस्बों से शहर फिर महानगरों में
इतना कमाने के लिए इज़्ज़त से
कि रहने का खर्च निकल जाए
खाने और आने-जाने का किराया भी
मोबाइल रिचार्ज और वाई फाई के दाम
ये सब पेमेंट के आधे में निपटे
और इतनी ही राशि बैंक में बच जाए
बेटियां बड़े लगन से निपटाती हैं काम
कि खुश रहें कलीग और संस्थान
आजीविका की जंग लड़ते-लड़ते
वे टालती जाती हैं शादी के प्रश्न
वैसे वे जानती हैं मां पिता भाई के सवाल
कितने बेमानी हैं कि उनके पास
नहीं है कोई विकल्प सिवाय इसके
कि हर माह वह भेजती रहे पैसे
चलता रहे घर द्वार, कि छोटी बहन भी तो
हो गई विवाह योग्य, वह कहती तो
आँखें नम हो जातीं माँ पिता की
बस इतना कहते - "तू ठीक कहती है बेटी "
अब बेटियां भागती नहीं
बल्कि परिवार को संभाल कर
जिम्मेदार हो जाती हैं।।।
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