गुरुवार, 15 जनवरी 2026

हम उन्हें जानते हैं




हम जिन्हें जानते हैं
क्या वाक़ई हम उन्हें जान पाते हैं
बस, इतना ही काफ़ी नहीं होता

हम उनसे मिलें हों या न मिले हों
भावनाओं की नदी क्या सही में नदी नहीं होती
दिल की गहराइयों से किया प्यार क्या
ज़माने को ज़ाहिर होना चाहिए या उस प्यार को
क्षितिज के काल्पनिक स्थल पर
कील से किसी तस्वीर की तरह टांग देना चाहिए

हम हर चाहने वाले के प्रति
दिल से आभारी होते हैं
शुक्रगुज़ार रहते हैं और कुछ न कुछ
चाहते हैं देते रहना बेज़रूरत भी
यह कोई कर्ज़ नहीं है जिसे चुकता करना होता है
इसे हम हैसियत से बढ़कर करना चाहते हैं अदा

क्या यह कोई ज़रूरी शर्त है इस रिश्ते की
या इस बेनाम से रिश्ते को
कोई नाम देना हमारी मजबूरी है

तुम नाहक चिंता करते हो
हम बिना कुछ जताए
बिना कुछ पाए
बहुत कुछ गंवाकर भी
इस रिश्ते को बचाकर रखेंगे
इस तरह कि कोई जान भी न पाए
रिश्ते को बुरी नज़र न लग पाए।।।।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास

 डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास 

अनवर सुहैल



 

 

विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है. यह 2007 से मनाया जा रहा है. इसका अर्थ ये हुआ कि दुनिया में इस व्याधि के बारे में बहुत बाद में जागरूकता आई. इसके पूर्व इस डाउन सिंड्रोम को लोग छुपा लिया करते थे. 

अब दुनिया भर में जो प्रयास किये जा रहे हैं उसके कारण डाउन सिंड्रोम से ग्रसित लोगों को अब बीमार या सामाजिक रूप से त्याज्य नहीं माना जाता है. डाउन सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जिससे ग्रसित व्यक्ति को सारे समाज से स्वीकार्यता मिलनी ही चाहिए. डाउन सिंड्रोम जिसे ट्राइसोमी 21 के नाम से भी जाना जाता है, डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति के पास एक अतिरिक्त गुणसूत्र (क्रोमोसोम) या गुणसूत्र का एक अतिरिक्त टुकड़ा होता है। यह विभिन्न शारीरिक और संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) समस्याओं को जन्म देता है, जिसमें विकास में देरी, बौद्धिक अक्षमताएं, चेहरे की विशिष्ट विशेषताएं जैसे कि तिरछी आंखें और एक सपाट नाक एवं हृदय दोष और थायराइड की समस्या आदि शामिल हैं।  डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, कई लोग उचित समर्थन और संसाधनों के साथ पूर्ण जीवन जीते हैं। प्रारंभिक हस्तक्षेप कार्यक्रम और समावेशी (इन्क्लूसिव) शिक्षा उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है और उन्हें समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।

हिंदी साहित्य में इस विषय पर लिखा ही नहीं गया है. मुक्तिबोध ने कहा था कि हमारे समय में विषयों की कमी नहीं है फिर भी हमारा उपलब्ध हिंदी साहित्य नए और चैलेंजिंग विषयों पर क्यों नहीं लिखता है? उस पर तुर्रा ये कि साहित्य के तथाकथित मठाधीश हिंदी में नोबल पुरुस्कार पाने की लालसा भी पाले रहते हैं. कोई साहित्य तभी बहुआयामी होता है जब वह समाज के हर कोने की पड़ताल करता है और खासकर उस समाज के हाशिये पर पड़े लोगों की समस्याओं को भी मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें करता है.

डाउन सिंड्रोम विषय पर छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी संजय अलंग ने एक उपन्यास  "चलो साथ चलें" की रचना की है. इसके पूर्व संजय अलंग ने इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक किताबें लिखी हैं. उनके तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित और चर्चित हैं. कथा या उपन्यास लेखन क्षेत्र में यह उनका पहला कदम है और विश्वास नहीं होता है कि इतना सुगठित और सहज उपन्यास पहली बार का प्रयास है. 

अपने व्यस्ततम सेवा काल में संजय अलंग को भारत के माननीय राष्ट्रपति जी द्वारा दिव्यान्गजनों और वृद्धजनों के लिए किये गए विशेष कार्यों के लिए पृथक पृथक वर्षों में सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.  

संजय अलंग की चिंताओं को समझने के लिए हमें उनकी कविताओं को भी उतना ही समझना होगा. उनके चयनित विषयों में कवि के भीतर,  पंक्ति  अंतिम व्यक्ति तक पहुँच पाने की ललक है, बेचैनी है.   संजय अलंग के पास संवेदना की अपनी अर्जित भाषा है, जिसके सहारे वह अभिव्यक्ति की चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और ऐसे वितान रचते हैं कि साधारण से साधारण जन तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं. 

"चलो साथ चलें' उपन्यास यदि कोई दूसरा हिंदी लेखक लिखता तो इसे दर्द और कराह का एक मूर्त रूप बना देता किन्तु संजय अलंग, दिलो-दिमाग में छाई बेचैनियों को प्रताड़ना के लसलसे प्रवाह में नष्ट नहीं होने देते हैं बल्कि वह एक राह तलाशते जाते  हैं जिससे समस्या को समझा जा सके और उसके निदान का सहज सकारात्मक प्रयास किया जा सके. यह एक चिकित्सक के परामर्श की तरह है न कि किसी कथावाचक  के करुण रूदन की गूँज है. 

मर्सी और नलिन के प्रथम  शिशु सन्नी के जन्म की कहानी है "चलो साथ चलें".  जब उनके परिवार को ज्ञात होता है कि उनकी बिटिया सन्नी सामान्य बच्ची नहीं है बल्कि उसे डाउन सिंड्रोम है तब मर्सी और नलिन के जीवन में जैसे कोई अप्रत्याशित हमला सा होता है. मर्सी और नलिन के परिजन भी इस वज्रपात को झेलने की कोशिशें करते हैं.  यहीं से बेचैनियों को दूर करने की राह तलाशने में लग जाते हैं. मर्सी का जन्म एक सामान्य डिलीवरी से हुआ था. हाँ, गले में नाल फंसने से डॉक्टर को फोरसेप्स की सहायता लेनी पड़ी थी. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इससे कोई घातक रोग नहीं होता है किन्तु शुरू में मर्सी और नलिन को यही लगा कि नवजात बिटिया सन्नी के जीवन में जो असामान्यता है उसके पीछे गले में नाल फंसने के कारण तो नहीं हुई है?

नवजात शिशु को प्रथम बार मर्सी ने देखा तो "उसे यह रूप रंग थोडा अलग हट कर लगा. उसने गौर किया तो फीचर भी अलहदा से लगे. गोल सी नाक, फूला और गोल चौड़ा चेहरा, मचमचाती हुई सी छोटी आँखें. मर्सी को कुछ अजीब तो लगा पर अभी वह ममत्व में डूबी अच्छा महसूस कर रही थी और मातृत्व का आनंद ले रही थी." (पृष्ठ 21)

मर्सी के पति नलिन के पैर में एक छोटे एक्सीडेंट के कारण प्लास्टर चढ़ा था, मर्सी और शिशु से मिलने के लिए वह भी बेचैन थे और डॉक्टर से परामर्श लेकर जबलपुर से नागपुर आने के लिए गाडी बुक कर ली गई थी. मर्सी की सास ने जब सन्नी को देखा तो काफी प्रसन्न हुईं --" बहुत गोरी और प्यारी है." 

लेकिन कुछ देर बाद नलिन की माँ ने कहा--"बच्ची की आँखें ज्यादा हेज़ी हैं. धुंधली सी, ब्राईट नहीं हैं. डल हैं. अलग तरह का इफेक्ट दे रही हैं. फीचर भी बहुत अलग से हैं. भारीपन तो हैं ही, आकार भी फैला सा है. नलिन तुम भी ज़रा ध्यान से देखना."

यहीं से शुरू होती है एक नवजात शिशु के कारण उत्पन्न हुई नई समस्या की. यह समस्या इस परिवार भर की नहीं थी बल्कि यह एक ऐसी बात थी कि जिसे समाज बड़े अविश्वास से कहता रहता है -"ऐसा मेरे साथ क्यों ?" या "हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?" यह ऐसा सवाल है जो बड़े-बड़ों के आत्मविश्वास को हिला के रख देता है. परिवार में सब्र करने का जज़्बा न हो तो फिर समस्या बड़ी विकराल हो जाती है. मर्सी और नलिन की सन्नी पहली संतान है. मर्सी और नलिन के माता-पिता ने इस पूरे समय में बड़ी शालीनता के साथ प्रसूति को सर-आँखों पर बिठाया. हर तरह कि चिकित्सकीय परामर्श का अक्षरशः पालन किया. फिर ऐसा क्यों हुआ वे इस घटना को जस्टिफाई नहीं कर पा रहे थे और एक अनोखे दुःख की गिरफ्त में फंसते चले जा रहे थे. 

इस विषय पर उपन्यास की रचना करना एक चैलेंजिंग कार्य है. इसमें समस्या के प्रतिरूप शिशु की दयनीयता, शिशु के रिश्तेदारों का अरण्य-रूदन, समाज की नकारात्मकता  से प्रसंगों का वितान नहीं बुना गया हैं बल्कि संजय अलंग की लेखनी से डाउन सिंड्रोम से प्रभावित शिशु और उसके परिजनों के दुखों को तो शिद्दत से लिपिबद्ध किया है. इस जटिल स्थिति में शिशु के माता-पिता, अन्य रिश्तेदार और समाज की वास्तविकता से एक साथ कथाकार संजय अलंग भी जूझते हैं और "चलो साथ चलें" की गुहार के साथ एक नई राह खोजते जाते हैं. 

सर्वप्रथम इस परिस्थिति में नवजात शिशु के सभी परिजन एक साथ खड़े होते हैं. बच्ची की स्थिति के लिए हिन्दुस्तान में उपलब्ध चिकित्सा और चिकित्सा पद्धति को आपसी परामर्श से तलाश करते हैं. जबलपुर, नागपुर और मुंबई तक शिशु के लिए बेहतर उपचार की जो व्यवस्था है उसे अंगीकार करते हैं. नागपुर के डॉक्टर ने कह दिया था कि शिशु सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है. मर्सी और नलिन ने जबलपुर के डॉ कुंडू को भी बिटिया को दिखलाया. डॉ कुंडू ने कहा---"देखिये नागपुर में भी डॉक्टर का मत सही था. सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही हैं."

फिर वे लोग मेडिकल कालेज में डॉक्टर लवली मेहरा को भी दिखलाया. डॉ मेहरा ने सामान्य चेकअप के बाद महत्वपूर्ण बात कही---"डाउन सिंड्रोम ही है. अब आप सन्नी को इसी तरह देखना प्रारंभ करें. उसके लिए आगे क्या और कैसे करना है, यह देखें. इसके साथ अनुकूल हों. शॉक और गिल्ट से आप लोगों को बाहर आना होगा. समाज में मूव्ड करें तो सहजता बढ़ेगी."

हिम्मत और धैर्य से काम लेने की सीख मिली. यह सच है कि समाज इसके लिए तैयार नहीं है, इसलिए मित्रों, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों कि बातों पर ध्यान नहीं देना ही उचित होगा. 

दंपत्ति को जब यह खबर मिली कि मुंबई में कोई एक विदेशी डॉक्टर हैं जो इस तरह के मामलों में बेहतर दखल रखते हैं, तब नलिन और मर्सी ने सन्नी को लेकर मुंबई पहुंचे. डॉ कोसिमो ने भी बतलाया कि सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है और वे सन्नी के इलाज के लिए योजना बना रहे हैं. काफी महँगी विदेशी दवाएं मंगवा कर सन्नी का इलाज किया गया और साथ ही फ़िजिओथेरेपी के ज़रिये मरीज़ के दिमाग और शारीर की सामान्य क्रियाओं को कुछ बेहतर एक्टिव रखने और विकसित करने के लिए विभिन्न तरह की थेरेपी की भी ज़रूरत पूरी करने के लिए डॉक्टर के परामर्श से अणिमा मुले का पता भी मिल गया. 

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथानक के अलावा डाउन सिंड्रोम से लड़ने के लिए एक पथ प्रदर्शक गाइड की तरह है. घटनाक्रम से गुज़रते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उपन्यास में वर्णित "की वर्ड्स" को गूगल में सर्च किया जा सकता है इतना वास्तविक वर्णन है कि संजय अलंग ने वाकई इस उपन्यास की संरचना के लिए छोटी से छोटी डिटेल को भी मिस नहीं किया है. 

डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे को सामाजिक मान्यता दिलाने और ऐसे अभिभावकों को भी घरों से निकालना जो अपने घरों में ऐसे बच्चों को छुपा कर रखते हैं. लोकलाज और मर्यादा जैसी रुढियों के चलते ऐसे अभिभावक बड़े शातिर तरीके से अपने डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों को मुख्यधारा से अलग रखते थे. नलिन और मर्सी के सद्प्रयासों ने ऐसे गुम किये गए बच्चों को डाउन सिंड्रोम प्रबंधन जैसी संस्थाओं की देख-रेख करने के लिए बाहर निकाला. उपन्यास का सूत्र वाक्य है --"सार्थक जीवन की आदत पड़ जाने पर सकारात्मक प्रयास भी सहज ढंग से सूझते हैं,"

इस बीच मर्सी पुनः गर्भवती होती है. सन्नी की असामान्य दशा के कारण मर्सी चिंतित थी और वे लोग यह चाहते थे कि गर्भ में पल रहा भ्रूण कहीं डाउन सिंड्रोम का शिकार तो नहीं है? ऐसा परिक्षण मुंबई में होता है. मुंबई से रिपोर्ट आई कि स्थिति सामान्य है लेकिन गर्भावस्था के अंतिम चरण में मर्सी को गर्भपात की स्थिति से गुज़रना पड़ा जिससे वह परिवार बुरी तरह से टूट गया था. 

जबलपुर के डॉक्टर राधा होतवानी से जब वे मिले तो उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में उनका सुझाव है कि मर्सी पुनः शीघ्र ही कंसीव करने का प्रयास करें वर्ना आगे जाकर काम्पिल्केशन बढ़ने के चांस हैं. नलिन और मर्सी ने सन्नी का प्रवेश नागपुर के सर्व-उदय विद्यालय में करा दिया. यहाँ मर्सी बच्ची के साथ विद्यालय जाने लगी और डाउन सिंड्रोम बच्चों को सिखाये जाने वाली गतिविधियां दोहराती और इससे सन्नू कि प्रगति भी अच्छी होने लगी थी. नागपुर में मर्सी एक बार पुनः गर्भवती हो गई. इस बार उन लोगों ने गर्भस्थ शिशु का डाउन सिंड्रोम टेस्ट नहीं करवाया. 

मर्सी ने एक स्वस्थ कन्या शिशु को जन्म दिया. उनके अन्दर एक नया उत्साह भी पैदा हुआ और दंपत्ति ने नए शिशु  के साथ डाउन सिंड्रोम ग्रसित सन्नी की उत्कृष्ट देखभाल शुरू कर दी. मर्सी ने सन्नी के नाम से मिलती जुलती एक संस्था बना ली जिसे नाम दिया गया--"राइजिंग सन डेवलपमेंट सेंटर". 

डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों के सर्वांगीण विकास की राह आसान होने लगी. हिन्दुस्तान में इस तरह की गतिविधियाँ एकदम नवीन थीं और मर्सी की ज़िद ने उनकी तमाम कोशिशों को समाज के लिए सहज स्वीकार्य बना दिया था. जो अभिभावक अब तक अपने बच्चों को समाज की निगाह से छुपा कर रखने के लिए अभिशप्त थे उनके लिए मर्सी और नलिन की उर्जावान पहल ने नई राह बनाई. 

आगे जाकर मर्सी ने सन्नी के साथ सिंगापूर में विशेष प्रशिक्षण के लिए चयन हो गया. इसमें मर्सी को सन्नी के साथ सिंगापूर आने का प्रस्ताव भी दिया.

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथा नहीं है बल्कि डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चों के उच्च स्तरीय प्रबंधन की एक पथ प्रदर्शक भी है. 

संजय अलंग के इस उपन्यास का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी साहित्य में लीक से हटकर लिखी गई कथा है ये जिसे समावेशी सोच के साथ एक नई राह तलाशने का प्रयास किया गया है.





कृति : चलो साथ चलें   लेखक : संजय अलंग 

पृष्ठ : 144  मूल्य : 250

प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, C-515, बुद्धनगर, नई दिल्ली 110012

मो 8750688053




मंगलवार, 6 जनवरी 2026

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

  समीक्षा

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी : अनवर सुहैल









शुक्ला चौधुरी एक सम्वेदनशील कवि हैं और इन्होनें कहानियां भी लिखी हैं। उपन्यास विधा में उनकी यह पहली प्रस्तुति है किन्तु किसी भी तरह पहली कृति नहीं लगती। इसे उपन्यासिका भी कहा जा सकता है। रमेश बक्षी, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम के छोटे कलेवर के उपन्यासों जैसा सशक्त कथानक और पद्यमय-गद्य की अद्भुत बानगी है ‘इश्क़’। उपन्यास के शीर्षक से यह आभाष होता कि इस उपन्यास में प्रेम-प्रसंगों की बात होगी लेकिन चट्टानों में फूल खिलने की घटनाएं होती हैं तो सभी अचंभित होते हैं। कथानक में नवीनता न भी हो तो लेखक की शैली पाठकों को एक नया आस्वाद कराती है। इश्क़ पढ़ते हुए यही आभाष होता है। उपन्यास का पाठ शुरू करते ही पाठक कथारस का आनंद उठाने लगता है। बहुत सी बातें इस तरह से बयान की गई हैं कि पाठक अचम्भित हो जाता है। 

कस्बाई या ग्रामीण परिवेश में अब भी पुरूष-वर्चस्व और सामंती शोषण के अवशेष नज़र आते हैं। खै़र शहर भी कहां इन जंजालों से आज़ाद हैं। ऑनर-कीलिंग की घटनाएं सर्वत्र देखने को मिल ही जाती हैं। लेकिन इश्क़ के कथानक के जादू का केन्द्र-बिन्दु सामंत की स्त्री सुमित्रा का चरित्र है। सामंती मूल्यों की जंजीर में कैद सुमित्रा मुक्ति की छटपटाहट में किस तरह शनैः-शनैः अपने अंदर की शक्ति को पहचानकर जगाती है और मुक्ति की राह निकालती है। 

छोटे-छोटे वाक्यों से सजी उपन्यास की शैली पाठकों को कथा-प्रवाह को रोमांचित करती है। यथा आप पाठ के प्रवेश में ही जो वाक्यांश पाते हैं वह कितना सहज और सरस है--‘‘आकाश का चांद खिला पूरा, पीतर की थाली बराबर। चांदनी में नहा उठा जंगल। चांद से चूंई-चूंई कर झरने लगा अमृत। फागुनी, बल्ली के कंधे से झूल गई।’’ शहरी प्रदूषण से दूर एक आदिवासी गांव का चित्रण कितना मनोहारी है। ऐसे ही किसी माला में मोती की तरह गुंथे हुए शब्दों का अद्भुत चमत्कार है उपन्यास ‘इश्क़’। 

बल्ली गांव का एक दलित बूढ़ा है। वह सूरदास भी है। फागुनी उसकी बेटी है। सामंत ठाकुर मेवालाल का नौकर है कोंदा। गांव में तुतलाकर बोलने वाले को कांदा कहा जाता है। कोंदा एक अनाथ आदिवासी किशोर है। सामंतों के टुकड़ों पर पलता है। सामंतों की देह-मालिश से लेकर उनके अन्य क्रियाकलापों में सेवकई करता है। गांव में दलितों का जीवन कष्टप्रद है। सामंतों को इन दलितों की ज़रूरत पड़ती है गंदगी, मल-मूत्र या पाखाना की नाली साफ करने के लिए। सामंतों द्वारा दलितों की स्त्रियों का भोग करना सामान्य घटनाएं हैं। सामंतों की स्त्रियां या तो अपने पति का साथ देती हैं या फिर मूक दर्शक बनी रहती हैं। गांव के सामंत की पत्नी सुमित्रा देवी किन्तु ऐसी नहीं है। उनके मन में मानव जाति की मर्यादा का सम्मान है। 

यह सच है कि कोंदा मन ही मन फागुनी पर आसक्त है। अपनी प्रीत का इज़हार वह ठकुराईन के दिए अन्न यथा गुड़-चना आदि की भेंट फागुनी को देकर करता है। फागुनी अवयस्क लड़की है। कोंदा बल्ली चमार को बुलाने आया है कि ठकुराईन ने बुलावा भेजा है। ठाकुर का पाखाना जाम हो गया है। कोंदा बल्ली को पटाने के लिए बोलता है--‘‘पांच दिन का राशन-पानी घर पहुंचा दिही, कहत रहीन ठकुराईन।’’ गांव में श्रम का मूल्य इसी तरह अन्न से किया जाता है। 

अंधा बल्ली जानता है कि फागुनी पर डोरे डालता है कोंदा इसलिए वह कांदा को फटकारकर भगा देता है--‘‘खबरदार जो पांव भीतर रखा।’’  

‘‘अंधे काका की कितनी आंखें, कोंदा जाते-जाते सोचने लगा।’’ 

जब बल्ली रात में सामंत के घर जाने से मना कर देता है तब सुमित्रा देवी स्वयं दलितों की बस्ती जाती है क्यांकि उनके घर में एक कार्यक्रम होना है जिसमें बहुत से मेहमान आने वाले हैं। यदि पाखाना जाम रह गया तो कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और जो बदनामी होगी सो अलग। ठाकुुर मेवालाल से जब सुमित्रादेवी ने बल्ल्ी के इंकार के बारे में बताया तो सुमित्रादेवी का बेटा सुखविंदर बोल पड़ा--‘‘साला बड़ा भाव खाने लगा आजकल...जाकर टेंटुआ दबा दूं क्या अम्मा या बाबू कहें तो झोपड़ी में आग लगा दूं, एक मिनट लगेगा।’’ 

इस सम्वाद के पीछे दलितों के प्रति सवर्णों को मन को सरलता से पढ़ा जा सकता है। सदियों से दलितों के प्रति यही भाव रहा है सामंतों के मन में। आज़ादी के इतने बरसों बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है। बेटे के गर्म खून को पिता यह कहकर शांत करता है--‘‘यह वक्त नाराज़गी का नहीं है बेटा, धीरज रखना जरूरी है। समय हमारे हाथ में नहीं रहा बेटा, नही ंतो बल्ली की यह मज़ाल!’’

शुरूआती तीन पृष्ठों में उपन्यास की पृष्ठभूमि समझी जा सकती है जिसे बिना किसी खींचतान के सहज सम्वाद के माध्यम से शुक्ला चौधुरी ने प्रस्तुत किया है। दृ

चमार टोले का वर्णन भी हमारे समय का कटु यथार्थ है। इसके लिए शुक्ला चौधुरी की काव्यमयी भाषा का चमत्कार देखें--‘‘पत्थरों के बदन को जख्मी कर बसाए गए डोम और चमारों के कुछ घर।’’

हर तरह की नागरिक आवश्यकताओं से उपेक्षित परछाईंनुमा लोगों की बस्ती का अद्भुत चित्रण है यहां। सामंतों की चाकरी करना और वनोपज इकट्ठा करना इन गरीबों का काम है। अधिकतर अधपेटे सोना इनका नसीब है। जंगल जाकर महुआ के फूल चुनने का शगल कई दिनों तक चलता है। इस महुआ के बदौलत औरतें सिंगार सामग्री यथा झुमका, बिंदी, चूड़ी आदि खरीदती थीं। 

मुंह अंधेरे ठकुराईन बल्ली चमार के घर आ पहुंचती है। उसके साथ नौकर कोंदा भी है जो झोला भर सामान उठाए है। ठकुराईन सुमित्रादेवी छिपकर बल्ली के घर आई है कि बल्ली जाम पाखाना आकर खोल दे और अन्य सफाई का काम कर दे। 

सुमित्रादेवी भूल चुकी है अपना अतीत। स्त्री-विमर्श पर जाने कितनी बातें की जाती हैं किन्तु शुक्ला चौधुरी ने पुरूष सत्तात्मक समाज में स्त्री की उपस्थिति के औचित्य और उसकी अपनी स्वतंत्रता पर चंद शब्दों में ही काफी बातें कह दी हैं। ठकुराईन बल्ली के घर से जैसे ही अपने घर पहुंची उसने देखा कि --‘‘ठाकुर मेवालाल दरवाज़ा छेंक कर खड़ा है। ठकुराईन धक्का नहीं संभाल पाई और चौखट पर सर के बल गिर गई। कपार की बांई ओर से एक धार बह निकला जो बांई आंख के कोर को भिंगोता हुआ गले से होकर सफेद चादर पर गिरने लगा टप-टप-टप।’’ यही है स्त्रियों के जीवन की विडम्बना, उनकी अस्मिता और बेचारगी से भरा अस्तित्व। 

दलितों के घर फागुनी जैसी रूपवती कन्या का होना आश्चर्य है। बल्ली की घरवाली जमनी अचानक एक दिन गायब हो गई। जमनी दीनदयाल मेहतर की बेटी थी जो घर से भागकर आई थी और जिसे बल्ली ने ब्याहता बनाकर रख लिया था। उसी जमनी पर सामंत मेवालाल की कुदृष्टि थी। सुमित्रा देवी को शक था कि जमनी का अपहरण ठाकुर ने किया है। उसने एक रोज ठाकुर से पूछ ही लिया--‘‘कहां थे जी रात भर इस दुरजोग में।’’ 

तब ठाकुर ने ऐंठ कर जवाब दिया था--‘‘मैं शिकार पर गया था सुन ले, आज भी जाउंगा और कल भी।’’ 

जमनी तीन रातों के बाद चौथे दिन की सुबह भागती हांफती लड़खड़ाती हुई घर पहुंची। बल्ली दरवाजे पर बैठा था। जमनी औंधे मुंह गिर पड़ी। 

एक दिन सुमित्रा देवी ने ठाकुर पति के मुंह से गुंडे भैरव गोंड को लताड़ते सुना--‘‘वह भागी कैसे रे भंड़वा, एक लड़की को संभाल नहीं पाया हरामी।’’ तब सुमित्रा देवी की आंखों के सामने सब कुछ साफ होने लगा। यह लोग जिन्हें अछूत कहते हैं जिनसे घृणा करते हैं उन्हीं की बहन-बेटी के शरीर से खिलवाड़ करते नहीं थकते। 

सुमित्रा देवी ठाकुर की बंदिशों के बाद भी जमनी को सांत्वना देने के इरादे से चमार टोला में बल्ली के घर जा पहुंची। पूरा चमार टोला सकते में आ गया। तभी ठाकुर राइफल लेकर आ गया और सुमित्रा देवी को घर ले जाकर नजरबंद कर दिया। गर्भवती जमनी का अस्पताल में निधन हो गया और फागुनी इस तरह संसार में आई। फूल सी खूबसूरत बच्ची फागुनी। सुमित्रा देवी फागुनी की सुंदरता देख मुग्ध हो जाती है। बल्ली के साथ फागुनी जब सुमित्रा देवी के घर नाली साफ करने आती तो सुमित्रा देवी उसे अपलक देखती रहती। ठकुराईन के तीन पुत्र हैं। उसे एक पुत्री की साध थी लेकिन लड़की न हुई। पता नहीं क्यों फागुनी को देख कर ‘‘ सुमित्रा की छाती दूध से भरने लगती है।’’ 

ठाकुर अपने नौकर कोंदा से कहता है--‘‘रे कोंदवा...तोर ठकुराइन बुढ़ापे में बावरी हुई जा रही है, संभालकर रखिओ। नही ंतो तोर टेंटुआ दबाये में टाइम न लगी। न जाने चमार टोला में का रखा है, ससुरी वहीं जाने के लिए पगलाए रहती है।’’ 

फागुनी बड़ी हो रही है। कोंदा भी जवान हो रहा है। कोंदा मन ही मन फागुनी को प्यार करता है। ठाकुर और उसके पुत्रों को फागुनी रूपी शिकार का मन होने लगा। ठाकुर कांदा से कहता है कि बाप-बिटिया को ले आ, घर की सफाई करानी है। कोंदा जानता है इसके पीछे का कारण। कांदा को अकेले आते देख ठाकुरों का मन खराब हो गया और कांदा की दम-भर पिटाई हुई। सुमित्रा देवी जानते हुए भी उन वनमानुषों से पूछ नहीं सकती थी कि कोंदा को इस बेरहमी से क्यों पीटा जा रहा है। 

न जाने कितने बरसों का गम और गुस्सा ठकुराईन के मन में भरा था। वह जानती थी कि अवयस्क फागुनी ठाकुर का खून है और फागुनी उसकी अपनी ही बेटी है। बेटी को बरबादी से बचाने के लिए ठकुराईन ने कोंदा को तैयार किया। ठाकुरों के प्रति कांदा के मन में नफ़रत भरी और कोंदा को अपने पक्ष में किया। आदिवासी कांदा एक गठीले बदन का युवक था। जब ठाकुर और उसके पुत्र फागुनी का अपहरण करने चमार टोला आए तो कोंदा ने उन्हें मार-मार कर अधमरा कर दिया। उपन्यास यहीं पर आकर समाप्त होता है लेकिन सुमित्रा देवी के मन में हमेशा-हमेशा जीवित रहने वाला इश्क़ ही अंततः विजयी हुआ। 

उपन्यास में छोटे-छोटे वाक्य हैं और चित्रमयी भाषा है जो पाठकों को बांधे रखती है। शुक्ला चौधुरी का यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में बहुत बड़े कथानक को समेटे है। पुस्तक की छपाई और गेटअप शानदार है। 



समीक्ष्य पुस्तक : इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

पृष्ठ : 64  मूल्य : 150 

प्रकाशक : डायमंड बुक्स, एक्स-3, ओखला इंडस्टियल एरिया, फेज-2

         नई दिल्ली 110020 फोन : 011 40712200


रविवार, 28 दिसंबर 2025

संभावनाशील कथाकार की कहानियां: शकील




अनवर सुहैल विदा ले रही सदी के अंतिम दशक में उभरे अल्पसंख्यक समुदाय के उन गिने-चुने सम्भावनाशील रचनाकारों में से एक है जो मूल रूप से हिन्दी में लिख रहे हैं। रचनाकारों को लिंग, समुदाय और क्षेत्र के आधार पर चिन्हित करने से असहमति जताई जाती रही है पर भारतीय समाज में ये कारक रचनाकार की अनुभूतियों को विशिष्टता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं इसलिए इसकी उपेक्षा सम्भव नहीं। अनवर सुहैल का एक कविता संग्रह 1995 में आ चुका है। अब उनका कहानी संग्रह ‘कुंजड़ कसाई’ प्रकाशित हुआ है। कुंजड़ कसाई’ की कुल नौ कहानियांे के अध्ययन के बाद यह एहसास होता है अनवर सुहैल ऐसे कथाकारों में से हैं जो बहुुत ख़ामोशी से रचनाकर्म करते रहते हैं और अचानक हम पाते हैं कि प्रायोजित चर्चाओं की धुंध फाड़कर ऐसे रचनाकार पहचान बनाने में सफल हो जाते हैं।

समीक्ष्य संग्रह कुंजड़ कसाई’ में शीर्षक कहानी तथा ‘फत्ते भाई’ दो कहानियां मुस्लिम समाज से सम्बंधित हैं और मेरी दृष्टि में संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी ‘बिलौटी’ है जिसमें दो निम्नवर्गीय चरित्र पगलिया और उसकी बेटी बिलौटी के जीवन संघर्ष को लेखक ने कलात्मक कौशल से कथाशिल्प में ढाला है। मेरे मत की पुष्टि वरिष्ठ कथाकार कृष्ण बलदेव वैद की ब्लर्ब में बिलौटी कहानी की प्रशंसा से भी होती है। ‘बिलौटी’ की अर्द्ध विक्षिप्तता, उसके वात्सल्य और अभिभाकत्व की चेतना को लील नहीं पाती। बलात्कार से जन्मी बेटी बिलौटी के लालन-पालन में वह खासी सजग दिखती है। बिलौटी भी अपनी जीवन परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए तेजी से सांसारिक ऊंच-नीच को समझती है और अपना रास्ता बनाते हुए एक आत्म निर्भर स्त्री बन जाती है। लेखक ने ‘बिलौटी’ के चरित्र का चित्रण काफी कलात्मक दक्षता के साथ किया है। ‘बिलौटी’ हमारे औद्योगिक क्षेत्रों विशेषकर कोयला उद्योग से जुड़े क्षेत्र की संस्कृति के यथार्थवादी अंकन की दृष्टि से उल्लेखनीय कहानी बन पड़ी है। संग्रह की दूसरी प्रभावशाली कहानी है  ‘काश मैं तुम्हारे साथ रहती’। इसे प्रेम कहानी की संज्ञा दी जा सकती है पर इसमें निश्चिंत एवं दायित्वहीन युगल का प्रेम नहीं है। राजीव और उर्मि के शहर में बैंक में सहकर्मी हैं। दोनों की पृष्ठभूमि में काफी समानता है। राजीव के पिता एक ईमानदार और सिद्धांतवादी शिक्षक थे। उनकी अकाल मृत्यु के उपरांत उनके भाई ने पिता की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया। राजीव की मां भी पति के सदमेे से जाती रहीं। संघर्ष करते हुए राजीव ने बैंक में क्लर्की पाई। उर्मि की मां भी बे्रस्ट कैंसर से असमय चली गईं। पिता ने बेटी उर्मि और बेटे बीनू के लिए दूसरा विवाह न किया। पिता एक मिल में यूनियन नेता थे विरोधियों ने उनकी हत्या करवा दी। संरक्षणहीन उर्मि ने संघर्ष कर नौकरी पाई। राजीव और उर्मि में सहकर्मियों जैसी मित्रता शुरू हुई और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं। यह उन्हें तब पता चलता है जब राजीव के चाचा अपने स्वार्थ के लिए राजीव पर अपने क्षेत्र के विधायक के भाई की बेटी से विवाह के लिए दबाव बनाने लगे। इन सारी परिस्थितियों का लेखक ने स्वाभाविक घटनाक्रमों में प्रवाहपूर्ण भाषा में अंकन किया है। ?

शीर्षक कहानी ‘कुंजड़-कसाई’ भारतीय समाज के अन्तर्विरोधों पर आधारित है। भारतीय मुस्लिम समाज के इस अंतर्विरोध का स्वरूप जटिल है। भारतीय उपमहाद्वीप के मुस्लिम समाज में जिसका नब्बे प्रतिशत से अधिक भाग हिन्दुओं से धर्मांतरित है, हिन्दू संस्कार अंतव्र्याप्त है। इसलिए इस्लाम में सैद्धांतिक रूप से जातिगत भेदभाव नहीं होने के बसवजूद भारतीय मुस्लिम शादी ब्याह में हिन्दुओं की भांति ‘जात-पात’ का विचार करते हैं। चूंकि मुसलमानों के यहां सैद्धांतिक वर्जना नहीं है इसलिए अंतर्जातीय विवाह भी प्रायः सामान्य रूप में प्रायः होते रहते हैं विशेषकर कथित रूप से ऊंची जाति की लड़की की तथाकथित निम्न जाति के लड़के से। ‘कुंजड़-कसाई’ में ऐसे ही अंतर्जातीय विवाह सूत्र में बंध्े एक युगल को मुख्यपात्रों के रूप में लिया गया है। लतीफ़ कुरैशी जो निम्न माने जाने वाली जाति से हैं की पत्नी जुलेख़ा सैयद जाति की है। जुलेखा के विवाह के समय निमन जाति के लतीफ से जुलेखा के वालिद ने समझौता कर लिया पर इकलौते बेटे के विवाह के समय, लड़की वाले अपनी जाति ढंूढने लगे। लतीफ के चाचा की एक लड़की के विेवाह का प्रस्ताव जुलेखा के वालिद ने ठुकरा दिया। लतीफ को उचित ही यह नागवार गुज़रा और जैसा कि होता है पुरूष अपने मन का गुबार औरतों पर निकालता है। लतीफ भी जुलेखा को उसकी जाति के हवाले से व्यंग्य बाण से छलनी करता रहता है--‘‘ जुलेखा रो पड़ी और किचन की ओर चली गई। मुहम्मद लतीफ कुरैशी साहब बेंत की आराम कुर्सी पर निढाल पसर गए। उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे जंग जीत गए हों। सैयद वंशीय पत्नी को दुख पहुंचा कर वे इसी तरह रिलैक्स अनुभव किया करते थे।’’ 

अनवर सुहैल ने भारतीय मुस्लिम समाज के इस अंतर्विरोध पर एक गंभीर कथात्मक व्यंग्य किया है। ‘फत्ते भाई’ मुस्लिम समाज में व्याप्त कठमुल्लावाद पर आधारित कहानी है। एक सीधे-सादे अनपढ़ फत्ते भाई द्वारा पक्षाघात के इलाज के लिए एक हिन्दू मित्र के कहने पर बजरंग बली का प्रसाद ग्रहण कर लेने के कारण कठमुल्लाओं की जमात उन्हें धर्म से बहिष्कृत घोषित कर देती है और मीटिंग बुलाकर फिर से कलमा पढ़ कर मुसलमान बनने का फैसला सुनाती है। कहानी में चरित्रों और घटनाक्रमों का विकास स्वाभाविक है। फ्लैप पर दर्ज लेखक के परिचय में कहा गया हं --‘‘भारतीय मुस्लिम समाज में व्याप्त मध्यवर्गीय वैचारिक प्रदूषण, आस्था संकट और धर्म के व्यवासायीकरण के विरूद्ध जेहाद इनकी रचनाओं की विशेषता है। ‘कपड़े के पीछे’ बाहर से जिम्मेदार और अच्छे पद पर कार्य करने वाले व्यक्ति की हरकतों की कहानी है जो अंदर से विकृतियों का शिकार है। ‘अनुकम्पा नियुक्ति’ कहानी में एक स्वाभिमानी युवा की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है जो अनुकम्पा नियुक्ति स्वीकार तो लेता है परन्तु इसे अपनी योग्यता पर प्रश्नचिन्ह के समान झेलता है। ‘शोक पर्व’ कहानी एक शिक्षित युवा के सरकारी नौकरी पकड़ पाने की उम्र समाप्त होने के दुखों की व्यथा है। ‘सन आफ बुधन’ दलित वर्ग के एक पदाधिकारी की कहानी है जिसमें उच्चवर्गीय संस्कार से उग आए हैं और अ बवह अपने पिता के नाम को प्रमाण-पत्र पर देखकर परेशान होतां है। अभावग्रस्तता मनुष्य को कैसी मजबूरियो ंऔर हास्यास्पद परिस्थितियों में उलझा देती है इसकी सुंदर अभिव्यंजना कथाशिल्प में ‘स्वेटरनामा’ में हुई है। 

अनवर सुहैल से उम्मीद करनी चाहिए कि अपनी प्रतिबद्धताओं को अपनी कहानियों के माध्यम से लगातार शिल्पबद्ध करते रहेंगे। 


(युद्धरत आम आदमी, अंक 47 में प्रकाशित शकील की समीक्षा)


बुधवार, 24 दिसंबर 2025


एक 

 बेहतर कल की उम्मीद


हम सोचते हैं कि कल शायद

सब ठीक हो जाए

उम्मीद बांधे रखते हैं

कि कल आज से बेहतर ही होगा

इस बेहतर कल की

उम्मीद का दामन थामे

खप गई जाने कितनी पीढ़ियां

यह तो अच्छा है कि इंसान

थोपे हुए हमलों को

ठेंगा दिखाकर भी

देख लेता है सपने

एक बेहतर कल के सपने

मज़बूत किलों के बंद कमरों में

ज़मीनी-खुदा इस निष्कर्ष पर

पहुंच ही जाते हैं कि बहुत जब्बर है

इंसान की जिजीविषा

बहुत चिम्मड़ है इंसान की खाल

और किले की हिफ़ाज़त के लिए

ख़ामोश और मुस्तैद इंसानों की

ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी।





दो 

कोई नहीं खड़ा है साथ 



कौन खड़ा है साथ 

क्या किसी ने बढ़ाया हाथ 

या, इस  बार भी बे-यारो-मददगार 

मायूस छोड़ दिया जाऊँगा 

नुकीले दांतों, तीखे नाखूनों वाले 

सर्द धमकियों वाले भेड़ियों के बीच 


कोई नहीं खडा है साथ 

लोग अब भूल से भी देखते नहीं 

कि कहीं सुहानुभूति के कीटाणु जाग न जाए 

इंसानियत की सुप्त चेतना झकझोर न दे 

यह ऐसा वक़्त है जब 

सिर्फ उतना ही देखने की इजाज़त है 

जिससे अपना कोई नुकसान न हो 


कोई नहीं खडा है साथ 

यह तो होना था एक दिन 

कोई क्यों देगा साथ 

जब हम भी तो किसी के लिए 

खड़े होने से करते थे परहेज़ 

बहुत सरल तर्क था कि 

जिसकी फटी है वही सिलेगा....


सोमवार, 22 दिसंबर 2025

‘हस्सा-हुस्सैन….हस्सा-हुस्सैन’


 

पहचान: मुहर्रम प्रसंग

कल्लू नाम था उसका। वह बीना की खुली कोयला खदान में काम करता था।
यूनुस तब वहां कोयला-डिपो में पेलोडर चलाया करता था। वह प्राइवेट कम्पनी में बारह घण्टे की ड्यूटी करता था। तनख्वाह नहीं के बराबर थी। शुरू में यूनुस डरता था, इसलिए ईमानदारी से तनख्वाह पर दिन गुजारता था।
तब यदि खाला-खालू का आसरा न होता तो वह भूखों मर गया होता।
फिर धीरे-धीरे साथियों से उसने मालिक-मैनेजर-मुंशी की निगाह से बच कर पैसे कमाने की कला सीखी। वह पेलोडर या पोकलेन से डीजल चुरा कर बेचने लगा। अन्य साथियों की तुलना मंे यूनुस कम डीजल चोरी करता, क्योंकि वह दारू नहीं पीता था।
कल्लू उससे डीजल खरीदता था।
खदान की सीमा पर बसे गांव में कल्लू की एक आटा-चक्की थी। वहां बिजली न थी। चोरी के डीजल से वह चक्की चलाया करता।
धीरे-धीरे उनमें दोस्ती हो गई।
अक्सर कल्लू उससे प्रति लीटर कम दाम लेने का आग्रह करता कि किसके लिए कमाना भाई। जोरू न जाता फिर क्यूं इत्ता कमाता। उनमें खूब बनती।
फुर्सत के समय यूनुस टहलते-टहलते कल्लू के गांव चला जाता।
कालोनी के दक्खिनी तरफ, हाईवे के दूसरी ओर टीले पर जो गांव दिखता है, वह कल्लू का गांव परसटोला था।
परसटोला यानी गांव के किनारे यहां पलाश के पेड़ों का एक झुण्ड हुआ करता था। इसी तरह के कई गांव इलाके में हैं जो कि अपनी हद में कुछ ख़ास पेड़ों के कारण नामकरण पाते हैं, जैसे कि महुआर टोला, आमाडांड़, इमलिया, बरटोला आदि। परसटोला गांव में फागुन के स्वागत में पलाश का पेड़ लाल-लाल फूलों का श्रृंगार करता तो परसटोला दूर से पहचान में आ जाता।
परसटोला के पश्चिमी ओर रिहन्द बांध की पानी हिलोरें मारता। सावन-भादों में तो ऐसा लगता कि बांध का पानी गांव को लील लेगा। कुवार-कार्तिक में जब पानी गांव की मिट्टी को अच्छी तरह भिगोकर वापस लौटता तो परसटोला के निवासी उस ज़मीन पर खेती करते। धान की अच्छी फ़सल हुआ करती। फिर जब धान कट जाता तो उस नम जगह पर किसान अरहर छींट दिया करते।
रिहन्द बांध को गोविन्द वल्लभ पंत सागर के नाम से भी जाना जाता है। रिहन्द बांध तक आकर रेंड़ नदी का पानी रूका और फिर विस्तार में चारों तरफ फैलने लगा। शुरू में लोगों को यकीन नहीं था कि पानी इस तरह से फैलेगा कि जल-थल बराबर हो जाएगा।
इस इलाके में वैसे भी सांमती व्यवस्था के कारण लोकतांत्रिक नेतृत्व का अभाव था। जन-संचार माध्यमों की ऐसी कमी थी कि लोग आज़ादी मिलने के बाद भी कई बरस नहीं जान पाए थे कि अंग्रेज़ी राज कब ख़त्म हुआ। गहरवार राजाओं के वैभव के कि़स्से उन ग्रामवासियों की जुगाली का सामान थे।
फिर स्वतंत्र भारत का एक बड़ा पुरस्कार उन लोगांे को ये मिला कि उन्हें अपनी जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ा। वे ताम-झाम लेकर दर-दर के भिखारी हो गए। ऐसी जगह भाग जाना चाहते थे कि जहां महा-प्रलय आने तक डूब का ख़तरा न हो। ऐसे में मोरवा, बैढ़न, रेणूकूट, म्योरपुर, बभनी, चपकी आदि पहाड़ी स्थानों की तरफ वे अपना साजो-सामान लेकर भागे। अभी वे कुछ राहत की सांस लेना ही चाहते थे कि कोयला निकालने के लिए कोयला कम्पनियांे ने उनसे उस जगह को खाली कराना चाहा। ताप-विद्युत कारखाना वालों ने उनसे ज़मीनें मांगी। वे बार-बार उजड़ते-बसते रहे।
कल्लू के बूढ़े दादा डूब के आतंक से आज भी भयभीत हो उठते थे। उनके दिमाग से बाढ़ और डूब के दृश्य हटाए नहीं हटते थे। हटते भी कैसे? उनके गांव को, उनकी जन्म-भूमि को, उनके पुरखों की क़ब्रगाहों-समाधियों को इस नामुराद बांध ने लील लिया था।
ये विस्थापन ऐसा था जैसे किसी बड़े जड़ जमाए पेड़ को एक जगह से उखाड़कर दूसरी जगह रोपा जाए…
क्या अब वे लोग कहीं भी जम पाएंगे?
कल्लू के दादा की आंखें पनिया जातीं जब वह अपने विस्थापन की व्यथा का जि़क्र करते थे। जाने कितनी बार उसी एक कथा को अलग-अलग प्रसंगों पर उनके मुख से यूनुस को सुन चुका था।
दादा एक सामान्य से देहाती थे। खाली न बैठते। कभी क्यारी खोदते, कभी घास-पात उखाड़ते या फिर झाड़ू उठाकर आंगन बुहारने लगते।
दुबली-पतली काया, झुकी कमर, चेहरे पर झुर्रियों का इंद्रजाल, आंखों पर मोटे शीशे का चश्मा, बदन पर एक बंडी, लट्ठे की परधनी, कंधे पर या फिर सिर पर पड़ा एक गमछा और चलते-फिरते समय हाथों में एक लाठी।
वह बताते कि उस साल बरस बरसात इतनी अधिक हुई कि लगा इंद्र देव कुपित हो गए हों। आसमान में काले-पनीले बादलों का आतंक कहर बरसाता रहा। बादल गरजते तो पूरा इलाका थर्रा जाता।
यूनुस भी जब सिंगरौली इलाके में आया था तब पहली बार उसने बादलों की इतनी तेज़ गड़गड़ाहट सुनी थी। शहडोल जि़ले में पानी बरसता है लेकिन बादल इतनी तेज़ नहीं गड़गड़ाया करते। शहडोल जिले में बारिश अनायास नहीं होती। मानसून की अवधि में निश्चित अंतराल पर पानी बरसता है। जबकि सिंगरौली क्षेत्र में इस तरह से बारिश नहीं होती। वहां अक्सर ऐसा लगता है कि शायद इस बरस भी बारिश नहीं होगी। एक-एक कर सारे नक्षत्र निकलते जाते हैं और अचानक कोई नक्षत्र ऐसा बरसता है कि सारी सम्भावनाएं ध्वस्त हो जाती हैं। लगता है कि बादल फट पड़ेंगे। अचानक आसमान काला-अंधेरा हो जाता है। फिर बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की चमक के साथ ऐसी भीषण बरसात होती कि लगे जल-थल बराबर हो जाएगा।
वैसे इधर-उधर से आते जाते लोगों से सूचना मिलती रहती कि पानी धीरे-धीरे फैल रहा है। लेकिन किसे पता था कि अनपरा, बीजपुर, म्योरपुर, बैढ़न, कोटा, बभनी, चपकी, बीजपुर तक पानी के विस्तार की सम्भावना होगी।
तब देश में कहां थी संचार-क्रांति? कहां था सूचना का महाविस्फोट? तब कहां था मानवाधिकार आयोग? तब कहां थीं पर्यावरण-संरक्षण की अवधारणा? तब कहां थे सर्वेक्षण करते-कराते परजीवी एन जी ओ? तब कहां थे विस्थापितों को हक़ और न्याय दिलाते कानून?
नेहरू के करिश्माई व्यक्तित्व का दौर था। देश में कांग्रेस का एकछत्र राज्य। नए-नए लोकतंत्र में बिना शिक्षित-दीक्षित हुए, ग़रीबी और भूख, बेकारी, बीमारी और अंधविश्वास से जूझते देश के अस्सी प्रतिशत ग्रामवासियों को मतदान का झुनझुना पकड़ा दिया गया। उनके उत्थान के लिए राजधानियों में एक से बढ़कर एक योजनाएं बन रही थीं। आत्म-प्रशंसा के शिलालेख लिखे जो रहे थे।
अंग्रजी राज से आतंकित भारतीय जनता ने नेहरू सरकार को पूरा अवसर दिया था कि वह स्वतंत्र भारत को स्वावलंबी और संप्रभुता सम्पन्न बनाने में मनचाहा निर्णय लें।
देश में लोकतंत्र तो था लेकिन बिना किसी सशक्त विपक्ष के।
इसीलिए एक ओर जहां बड़े-बड़े सार्वजनिक प्रतिष्ठान आकार ले रहे थे वहीं दूसरी तरफ बड़े पूंजीपतियों को पूंजी-निवेश का जुगाड़ मिल रहा था।
यानी नेहरू का समाजवादी और पूंजीवादी विकास के घालमेल का माॅडल।
आगे चलकर ऐसे कई सार्वजनिक प्रतिष्ठानांे को बाद की सरकारों ने कतिपय कारणों से अपने चहेते पूंजीपतियों को कौड़ी के भाव बेचने का षडयंत्र किया।
पुराने लोग बताते हैं कि जहां आज बांध है वहां एक उन्नत नगर था। गहरवार राजा की रियासत थी। केवट लोग बताते हैं कि अभी भी उनके महल का गुम्बद दिखलाई पड़ता है।
गहरवार राजा भी होशियार नहीं थे। कहते हैं कि उनके पुरखों का गड़ा धन डूब गया है।
असल सिंगरौली तो बांध में समा चुकी है।
आज जिसे लोग सिंगरौली नाम से पुकारते हैं वह वास्तव में मोरवा है।
तभी तो जहां सिंगरौली का बस-स्टेंड है उसे स्थानीय लोग पंजरेह बाजार नाम से पुकारते हैं।
कल्लू के दादा से खूब गप्पें लड़ाया करता था यूनुस।
वे बताया करते कि जलमग्न-सिंगरौली रियासत में सभी धर्म-जाति के लोग बसते थे।
सिंगरौली रियासत धन-धान्य से परिपूर्ण थी।
तीज-त्योहार, हाट-बाज़ार और मेला-ठेला हुआ करता था। तब इस क्षेत्र में बड़ी खुशहाली थी। लोगों की आवश्यकताएं सीमित थीं। फिर कल्लू के दादा राजकपूर का एक गीत गुनगुनाते-‘‘जादा की लालच हमको नहीं, थोड़ा से गुजारा होता है।’’
मिजऱ्ापुर, बनारस, रीवा, सीधी और अम्बिकापुर से यहां के लोगों का सम्पर्क बना हुआ था।
यूनुस मुस्लिम था इसलिए एक बात वह विशेष तौर बताते कि सिंगरौली में मुहर्रम बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था।
सभी लोग मिल-जुल कर ताजिया सजाते थे।
खूब ढोल-ताशे बजाए जाते।
तैंयक तक्कड़ धम्मक तक्कड़
सैंयक सक्कर सैंयक सक्कर
दूध मलीदा दूध मलिद्दा…
खिचड़ा बंटता, दूध-चीनी का शर्बत पिलाया जाता।
सिंगरौली के गहरवार राजा का भी मनौती ताजिया निकलता था। मुसलमानों के साथ हिन्दू भाई भी शहीदाने-कर्बला की याद में अपनी नंगी-छाती पर हथेली का प्रहार कर लयबद्ध मातम करते।
‘हस्सा-हुस्सैन….हस्सा-हुस्सैन’
कल्लू के दादा बताते कि उस मातम के कारण स्वयं उनकी छाती लहू-लुहान हो जाया करती थी। वह लाठी भांजने की कला के माहिर थे। ताजिया-मिलन और कर्बला ले जाने से पहले अच्छा अखाड़ा जमता था। सैकड़ों लोग आ जुटते थे। थके नहीं कि सबील-शर्बत पी लेते, खिचड़ा खा लेते। रेवडि़यांें और इलाइची दाने का प्रसाद खाते-खाते अघा जाते थे।
यूनुस ने भी बचपन में एक बार दम-भर कर मातम किया था, जब वह अम्मा के साथ उमरिया का ताजिया देखने गया था। सलीम भाई तो ताजिया को मानता न था। उसके अनुसार ये जहालत की निशानी है। एक तरह का शिर्क (अल्लाह के अलावा किसी दूसरी ज़ात को पूजनीय बनाना) है। ख़ैर, ताजिया की प्रतीकात्मक पूजा ही तो करते हैं मुजाविर वगैरा…
यूनुस ने सोचा कि अगर लोग उस ताजिया को सिर झुका कर नमन करते हैं तो कहां मना करते हैं मुजाविर! उनका तो धन्धा चलना चाहिए। उनका ईमान तो चढ़ौती में मिलने वाली रक़म, फ़ातिहा के लिए आई सामग्री और लोगों की भावनाओं का व्यवसायिक उपयोग करना ही तो होता है। साल भर इस परब का वे बेसब्री से इंतज़ार करते हैं। हिन्दू-मुसलमान सभी मुहर्रम के ताजिए के लिए चंदा देते हैं।
उमरिया में तो एक से बढ़कर एक खूबसूरत ताजिया बनाए जाते हैं। लाखों की भीड़ जमा होती है। औरतों और मर्दों का हुजूम। खूब खेल-तमाशे हुआ करते हैं। जैसे-जैसे रात घिरती जाती है, मातम और मर्सिया का परब अपना रंग जमाता जाता है। कई हिन्दू भाईयों पर सवारी आती है। लोग अंगुलियों के बीच ब्लेड के टुकड़े दबा कर नंगी छातियों पर प्रहार करते हैं, जिससे जिस्म लहू-लुहान हो जाता है।
ईरानी लोग जो चाकू-छूरी, चश्मा आदि की फेरी लगाकर बेचा करते हैं, उनका मातम देख तो दिल दहल जाता है। वे लोग लोहे की ज़जी़रों पर कांटे लगा कर अपने जिस्म पर प्रहार कर मातम करते हैं।
कुछ लोग शेर बनते हैं।
शेर का नाच यूनुस को बहुत पसंद आया था।
रंग-बिरंगी पन्नियों और काग़ज़ों की कतरनों से सुसज्जित ताजिया के नीचे से लोग पार होते। हिन्दू और मुस्लिम औरतें, बच्चे और आदमी सभी बड़ी अक़ीदत के साथ ताजिया के नीचे से निकलते।
यूनुस ने देखा था कि एक जगह एक महिला ताजिया के सामने अपने बाल छितराए झूम रही है। कभी-कभी वह चीख़-चीख़ कर रोने भी लगती है। उसकी साड़ी मैली-कुचैली हो चुकी है। जब वह अपनी छाती पर हाथ मार-मार कर रोती तो लगता कि जैसे उसके घर में किसी की मौत हो गई हो।
नन्हा यूनुस उस औरत के रोने से भयभीत हो गया था।
डूब में बसे कस्बे में मुहर्रम के मनाए जाने का कुछ ऐसा ही दृश्य कल्लू के दादा बताया करते थे।
लोगों का जीवन खुशहाल था।
रबी और खरीफ़ की अच्छी खेती हुआ करती थी।
उस इलाके की खुशहाली पर अचानक ग्रहण लग गया।
लोगों ने सुना कि अब ये इलाका जलमग्न हो जाएगा।
किसी ने उस बात पर विश्वास नहीं किया।
सरकारी मुनादी हुई तो बड़े-बुज़ुर्गों ने बात को हंस कर भुला दिया। अभी तो देश आज़ाद हुआ है। अंग्रेज भी ऐसा काम न करते, जैसा आजाद भारत के कर्णधार करने वाले थे।
इस बात पर कौन यकीन कर सकता था कि गांव के गांव, घर-बार, कार्य-व्यापार, देव-स्थल, मस्जिदें, क़ब्रगाहें सब जलमग्न हो जाएंगी। और तो और गहरवार राजा का महल भी डूब जाएगा।

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

एक अल्प-परिचित संसार का अनावरण : अजय नावरिया

 भारत में कई संस्कृतियाँ, हमेशा से दृश्य पर उपस्थित रहीं और कालांतर में उनका विलय भी समाज में होता रहा; अनेक विदेशी संस्कृतियाँ आईं और घुल-मिल कर एक-से हो गईं- एक मुहावरे में ही सही; उनका एक रूप बन गया. हालांकि, आज भी उनके अपने तीज-त्यौहार, रीति, रस्मो-रिवाज़, मान्यताएं, बंदिशें हैं परन्तु इस सांस्कृतिक बहुलता के बावजूद, उन सभी संस्कृतियों में ‘हिन्दूपन’ पैठ गया है.

       जाति की सत्ता, हिन्दूपन की पहचान है.

अनवर सुहैल, लम्बे समय से साहित्य क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनका उपन्यास ‘पहचान’ छप चुका है. देश की सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में उनकी कहानियां छपती रही हैं. हंस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में चार कहानियों का छपना, उनकी कथा-योग्यता का प्रमाण ही कहा जा सकता है.

       ऐसा नही है कि अनवर सुहैल, पहली बार मुस्लिम परिवेश की कहानियां लिख रहे हैं, हिंदी कथा-साहित्य में शानी, राही मासूम राजा, बदिउज्जमा, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, हसन जमाल, हबीब कैफ़ी तक अलग-अलग कद के रचनाकार रह चुके हैं और आज भी लिख रहे हैं. इनमे असगर वजाहत ने कथा-शिल्प में अनूठे प्रयोग तो किये ही हैं, इस परिवेश से बाहर भी खूब लिखा है.

अनवर सुहैल, हालांकि वैसे मकबूल न हुए, जैसे अन्य रचनाकार हैं, लेकिन उनकी कहानियों में उन सबसे अलग; कहना चाहिए कि अनूठापन यह है कि इन्होने अपनी इन छोटी-छोटी कहानियों में मुस्लिम समाज में जाति की पैठ को पकड़ा है.

       अल्पसंख्यक होने की पीड़ा, दंश और अपमान का अनुभव, हिंदी कथा-साहित्य में पहले भी आता रहा है. गरीब मुसलमान चाहे वे अशराफ़ हों या पसमांदा; का चित्रण भी, उनके रीति-रिवाजों, जीवनचर्या और असुरक्षा बोध के साथ होता रहा है. ऐसा नही है कि अनवर सुहैल ने ऐसी कहानियां नही लिखी हैं…लिखी हैं और खूब लिखी हैं.

       इस संग्रह में भी ‘ग्यारह सितम्बर के बाद’ ‘गहरी जड़ें’ आदि सभी कहानियां इस प्रवृत्ति को चित्रित करती हैं परन्तु जब हम उनकी कहानियां -‘कुंजड-कसाई’ ‘फत्ते-भाई’ ‘पीरु हजाम उर्फ़ हज़रत जी’ पढ़ते हैं, तब एक मुस्लिम परिवेश की इस अल्प-परिचित दुनिया का दरवाज़ा खुलता है. यहाँ पता चलता है कि हिन्दुओं की जाति-व्यवस्था, जैसे ज्यों-की-त्यों उठकर पहुँच गई है.

       ‘कुंजड-कसाई’ कहानी के मुहम्मद लतीफ़ कुरैशी, जो एक बैंक मैनेजर हैं, उसी तरह ‘निचले पायदान’ पर हैं, जिस तरह कोई हिन्दू समाज का तथाकथित निचली जाति का व्यक्ति माना जाता है. जिस ‘कुरैशी’ उपनाम पर उन्हें अपने बचपन में फख्र होता था, वही परेशानी का सबब बन जाता है. कथाकार ने इस मनोभाव को बखूबी पकड़ा है—‘एम. लतीफ़ साहब को अच्छी तरह पता था कि मुहम्मद लतीफ़ कुरैशी के बदन को दफनाया तो जा सकता है परन्तु उनके नाम के साथ लगे ‘कुरैशी’ को वह कतई नही दफना सकते हैं…’

       इसमें सैयद, शेख, पठानों की अकड़ और भेद-भाव को भी उभरा गया है. विडम्बना देखिये कि जो मुस्लिम समाज हिन्दुओं की बुतपरस्ती को सख्त नापसंद करता है, वही उनकी जाति-व्यवस्था को अपने दिल में जगह दिए बैठा है. दोहरे मापदंडों को भी छिलती हैं अनवर सुहैल की कहानियां…

       एक और कहानी है—‘फत्ते भाई’ फत्ते भाई, साइकिल मिस्त्री, धार्मिक कामों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने वाले, ताजिया निकालने के अगुआ परन्तु लोग उन्हें उनकी जात याद दिला ही देते हैं. वे जात के साईं थे..यानी फकीर. हिन्दू समाज में इससे मिलती-जुलती जाति जोगी है. उनकी पत्नी हमीदा ‘नाइ’ जाति की है, जिसका उपहास करते हुए उसे ‘छत्तीसा’ कहा जाता है. इनता व्यंग्य, उपहास, विद्रूप.

       मुहम्मद लतीफ़ कुरैशी की जबानी कहें तो—‘वे तो बस इतना जानते थे कि ‘एक ही सफ में खड़े महमूदो-अयाज़’ वाला दुनिया का एकमात्र मज़हब है इस्लाम. एक नई सामाजिक व्यवस्था है इस्लाम. जहां उंच-नीच, गोरा-काला, स्त्री-पुरुष, जात-पात का कोई झमेला नही है…”

       परन्तु सच यह है कि भारतीय परिवेश का कोई धर्म इससे बचा नही है.

       अनवर सुहैल, धर्म के भीतरी सच्चाइयों को गहराई से जानते हैं. उन्हें इंसानियत और इंसान-दोस्ती की फ़िक्र है. उन्हें इस देश की खुशहाली और अमन की चिंता है. ‘गहरी जड़ें’ कहानी के असगर और ज़फर तथा उनके पिटा के माध्यम से वे इसे रेखांकित करते हैं.

       अनवर सुहैल जानते हैं और न केवल जानते हैं बल्कि उनका विल्श्वास है कि इंसान जब तक भीड़ की शक्ल में न हों, तब तक अच्छा और अम्न-पसंद होता है; परन्तु –“भीड़ के हाथ में जब हुकूमत आ जाति है, तब क़ानून गूंगा-बहरा हो जाता है.” वह ये भी जानते हैं.

       मिडिया की भूमिका और बुद्धिजीवियों की गाल-बजाई पर भी वे तंज़ करने से नही चूकते.

       साथ ही, यह भी, कहना चाहिए कि उनकी नज़र पर्याप्त पैनी है. धर्म और बाज़ार का रिश्ता, वे परत-दर-परत खोलते चलते हैं. कहानी ‘नीला हाथी’ बेहद संवेदनशील कहानी है. कल्लू एक ऐसा बच्चा है जिसे मूर्तिकला का गुण नैसर्गिक रूप से मिला है. परन्तु वह मुसलमान है और हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाने के कारण वह अपने पिता से मार खाता है. समाज उनके परिवार का सामाजिक बहिस्कार कर देता है. वह एक हिन्दू बंगाली लड़की से खुदा को हाज़िर-नाजिर मानकर विवाह कर लेता है क्योंकि कोई उसके साथ नही आता. वही कल्लू बड़ा होकर एक ‘फ़कीर’ के रूप में अपने को प्रस्तुत करता है और धार्मिक लोगों की भावनाओं को ‘कैश’ करता है. कहानी का नैरेटर, उस मज़ार के बाहर की दुकानदारी और एक चाय की गुमटी की व्यवसायिकता का बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से चित्रण करता है. “मैंने देखा कि वहां ‘व्यस्को के लिए’ शीर्षक लिए कई रंग-बिरंगी पत्रिकाएं प्रदर्शित थीं. एक तरफ बाबा रामदेव की किताबें और हनुमान-चालीसा, गीता आरी अन्य धार्मिक किताबें थीं.”

       यही हमारे समाज की सच्चाई है. यहाँ पाखण्ड का बोलबाला है. पारदर्शी और ईमानदार जेवण जीने की अघोषित पाबंदी है. पूरी ज़िन्दगी गुज़र जानी है, दूसरों की नज़रों में ‘अच्छे-भले और इज्ज़तदार’ बने रहने में, और हासिल होता है एक रिक्तता-बोध, बहुत कुछ चूक जाने का अफ़सोस.

       अनवर सुहैल कहानी में बहुत बनावट और आडम्बर में नही पड़ते. वे किसी कुशल किस्सागो की तरह अपने मजमून को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करते हैं. यह रोचकता, पाठक को बांधे रहती है. साथ ही, भाषा में प्रादेशिक लहजे और शब्दों की छौंक एक लोक-गंध उत्पन्न करती है.

       हाँ, नीला हाथी कहानी का अप्रत्याशित अंत कुछ अखरता है.

       मेरे गुजारिश है कि वे इसी अल्प-परिचितदुनिया के दरवाज़े पूरे खोलें ताकि वहां ही बदली हुई फिजा की हवा पहुंचे, वहां भी सुगबुगाहटें हों, तब्दीलियाँ हों और लोकतंत्र का सुंदर सपना, भीड़ में बदलने से बच सके.

       शायद उनका लिखना भी तभी सार्थक होगा…

                                                                                   (ajay navaria : 12 jan 2014) http://dl.flipkart.com/dl/gahari-zaden/p/itm87b781527df10?pid=9788194977964&marketplace=FLIPKART&cmpid=product.share.pp&lid=LSTBOK97881949779645ONCW

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

हमारे ज़माने मे माँ






मैं तुम्हें कैसे बताऊं, मेरी बेटी?

हमारे ज़माने में माँ कैसी होती थी?


तब पापा एक डिक्टेटर की पोजीशन में बैठते थे।

तब बच्चे पापा के नाम से कांपते थे।

और माँ हमें बार-बार पापा की मार और डांट से बचाती थी।

वो हमारी छोटी-बड़ी गलतियाँ पापा से छिपाती थी।

माँ हमारे बचपन की सबसे सेफ दोस्त हुआ करती थी।

वो हमारी रूलर हुआ करती थी।

वो इधर-उधर से पैसे बचाती थी।

और चुपचाप सिनेमा, सर्कस के लिए पैसे दे देती थी।

हम पापा से कोई डायरेक्ट रिक्वेस्ट नहीं कर सकते थे।

माँ हमारी मीडिएटर हुआ करती थी।

जो हमारी ज़रूरतों के लिए अर्ज़ी देती थी।

अपनी प्लेट में बची हुई सब्ज़ी और रोटी के साथ।

जब वो खाने बैठती थी, तो हम, भरे हुए बच्चे,

एक निवाले के लिए बेचैन रहते थे। उस एक बाइट ने हमें सिखाया

हर सब्ज़ी के स्वाद का मज़ा...


आप लोगों की तरह, हम कभी नहीं कह सकते

कि हमें भिंडी पसंद नहीं है। जैसे

कि बैंगन एक खाने की चीज़ है


हमारे ज़माने की माँएँ

सबके सोने के बाद सोती थीं

सबके उठने से पहले उठती थीं

और सबकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखती थीं

कि तब परिवार बहुत बड़े होते थे

कि तब माँएँ मशीन की तरह काम में बिज़ी रहती थीं

कि माँएँ सिर्फ़ बच्चों की माँएँ होती थीं..........


कैसे बताऊँ

हमारे ज़माने में माँएँ कैसी होती थीं ......

ग़ज़ल : जैसे बेढब प्रश्न तुम्हारे

ग़ज़ल 



जैसे बेढब प्रश्न तुम्हारे
वैसे उल्टे उत्तर सारे

चुटकी में कैसे हल होंगे
दुनिया भर के मसले प्यारे

बहलाओ पर कुछ तो सोचो
मूर्ख नहीं हैं दर्शक सारे

दो दो टके में मिल जायेंगे
शेख-बरहमन औ' हत्यारे

हाथ हमारे कितने छोटे
फिर भी तोड़ लाएंगे तारे 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2025

पहचान एक ज़रूरी उपन्यास : ज़रीन हलीम

ज़रीन हलीम जी की कलम से मेरे लेखन पर टिपण्णी :






 इस वर्ष जब मैं पुस्तक मेले में अपनी पुस्तक के विमोचन में अपने स्टाल पर पहुंची जहां से मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई थी यानी कि नींव वर्ल्ड पब्लिकेशन पर तोअन्य पुस्तकों का मुआयना कर‌ते समय कुछ पुस्तकें मुझे बहुत ही भाईं और मैंने उन्हें ख़रीद लिया।घर आकर जब पढ़ना आरम्भ किया तो लगा‌ वास्तव मे मैने सही चयन किया। क्या पता था कि पुस्तक के लेखक से फेसबुक पर मुलाकात हो जाएगी। लेखक सुहेल अनवर की दो किताबें एक तो कथा संग्रह थी जिसका नाम "बिलौटी" था और दूसरी एक उपन्यास "मेरे दुख की दवा करे कोई" इनके साथ अन्य पुस्तकें भी‌ ख़रीदी‌थीं जैसे मनीष आज़ाद की "अब्बू की नज़र में जेल" और श्री कौशल किशोर जी की "समय समाज और साहित्य" थीं।

अनवर सुहैल साहब को जैसे ही पता चला कि मुझे उनकी दोनों किताबें बहुत ई अच्छी लगीं तो उन्होंने मुझे अपना नया उपन्यास "पहचान "भेजा परंतु रमज़ान की वजह से चाहकर भी मैं उसे पढ़ नहीं पाई।
आज ही मैंने उनका लिखा यह उपन्यास "पहचान" समाप्त किया तो मैं पढ़ कर इतना प्रभावित हुई कि आज ही समीक्षा देने का मन हुआ और मैं जब लिखने बैठी तो शब्दों की कमी पड़ने लगी कि कहां से और किस प्रकार आरंभ करें।
उनके उपन्यास को पढ़कर ऐसा‌लगा ही नहीं कि यह उपन्यास है ऐसा लगा कि यह मेरे आस पास घटित हो रहा है। उनके लेखन में अधिकतर निम्न वर्ग और कारखानों विशेष रूप से कोयला खदानों से संबंधित समस्याओं का उल्लेख है शायद लेखक का वहां से संबंध है इसीलिए वहां की एक एक बारीकी बखूबी विस्तार से बताई गई है जो उपन्यास के किरदारों से संबंधित हैं।
मेरे दुख की दवा करे कोई एक बहुत ही मार्मिक एवं निम्न वर्ग की औरतों के चरित्र तथा मजबूरी और उनके सपनों के बिखरने का मार्मिक चित्रण है मैं तो रो पड़ी अंत में लगा इसके किरदारों से हम बखूबी परिचित हैं मगर यह परिचय केवल सुहैल अनवर ने करवाया वरना उनके जीवन की वास्तविकता तक पहुंचना असंभव था।लेखक की भाषा शैली बहुत ही सरल व सहज है। कुछ भी बनावटी नहीं लगता बस ऐसा‌ लगता है कि हमें अपने समाज की औरतों और निम्न वर्ग के नौजवानों को और अधिक जानने तथा समझने की आवश्यकता है।
उनकी पुस्तक" पहचान " हमें मध्य प्रदेश के कोयला खदानों के आसपास रह रहे उस निम्न वर्ग से परिचित कराती है जहां के नौजवान धर्म के नाम पर बहुत ही कंफ्यूज हैं क्योंकि उनके मार्गदर्शन के लिए उनके परिजनों के पास ना तो समय है ना ही प्राथमिकता वह भी जो कुछ बचपन से देखते आ रहे हैं वह उनके मन मस्तिष्क में अंकित होकर मार्ग अवरूद्ध कर देता है। सुहैल साहब की हर पुस्तक में औरतों की बेबाकी और निडरता तथा हालात से निपटने की क्षमता का सजीव चित्रण है जिसका कारण उनका बचपन से ही बड़ा बन जाना और पारिवारिक जिम्मेदारियों का बोझ कुछ इस, प्रकार बयान किया है लगता है हमने इस पहलू को क्यों नहीं जाना।
पहचान में निम्न वर्ग का नौजवान जो कट्टर धार्मिकता से परे अपने उज्जवल भविष्य को लेकर चिंतित है अनेकों समस्याओं से जूझ कर सामाजिक विषमताओं से निकल कर जीना सीख जाता है और अपनी पहचान को ज़िंदा रखने के लिए घर से भागकर कहीं दूर जहां वह अपने सपने को साकार करके अपनी पहचान अपनी कर्मठता से बना सके। इसके लिए उसे अपनी सबसे प्रिय सनोबर जो उसका प्यार थी और प्रेरणा भी ,को भी छोड़ना पड़ जाता है परन्तु वह अपनी पहचान बना कर ही अपने आत्मसम्मान के साथ यह सबकुछ वापस पाने के लिए स्वयं से वचनबद्ध है।
सुहैल अनवर साहब को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं जो उन्होंने हम लोगों को इतनी उच्च कोटि की पुस्तकें प्रदान कीं जिसे पढ़कर हम एक अलग ही समाज में विचरण कर वहां की समस्याओं में इतना खो जाते हैं कि लगता है अपने देश के इस हिस्से को जानना और समझना भी हमारा कर्तव्य है जिसे हम इन पुस्तकों के माध्यम से जी लेते हैं और सोचने पर मजबूर हो जाते हैं उन सभी पात्रों के विषय में जो एक पहचान के लिए भी इतनी जद्दोजहद कर रहे हैं।
यह सभी पुस्तकें आपको अमेज़न पर उपलब्ध हो जाएंगी अवश्य पढ़ें और कुछ नया सीखें जो हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है।एक अलग समाज जो हमारे देश का ही हिस्सा है आज भी कितनी विकट समस्याओं से जूझ रहा है।

सोमवार, 3 नवंबर 2025

सार्थक संघर्ष और विवेक की पक्षधरता का निबाह करती कहानियाँ "गहरी जड़ें" - मनोज पाण्डेय


मनोज पांडेय: समीक्षक 



अनवर सुहैल समकालीन हिंदी कथा जगत में एक जाने पहचाने कहानीकार हैं. ‘गहरी जड़ें’ उनका कहानी संग्रह है जिसमें भारतीय मुस्लिम परिवेश पर आधारित कहानियां संग्रहित है. इस बात को आधिकारिक बनाने के लिए इस संग्रह के मुखपृष्ठ पर स्पष्ट रूप से इत्तला भी दिया गया है.हिंदी पाठकों के लिए इस कहानी संग्रह का परिचय देते हुए भूमिका में ‘अपरिचित संसार का अनावरण’ का शीर्षक भी दिया गया है जिसे हिंदी कथा जगत के चर्चित कथाकार अजय नावरिया ने लिखा है. यह मान कर चला गया है कि ‘मुस्लिम परिवेश’ एक अपरिचित दुनिया ही साबित होता रहा है.जबकि ऐसा नही है कि अनवर सुहैल पहली बार मुस्लिम परिवेश की कहानियां लिख रहे है. हिंदी कथा-साहित्य में शानी, राही मासूम रजा, बदी उज्जमाँ, असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, हसन जमाल, हबीब कैफ़ी अलग-अलग कद के रचनाकार रह चुके हैं और आज भी लिख रहे है. इतने लोगों के लिखने और उनको पढ़े जाने के बाद भी परिवेश का अपरिचित बने रहना हिंदी कहानियों के संवेदनशील पाठक के लिए किसी धक्के से कम नही हो सकता. इन ‘मुस्लिम’ कहानीकारों से पहले प्रेमचंद की कहानियों में वह भारतीय जीवन उभरता है जिसमे ‘मुस्लिम परिवेश’ के रंग भी साफ़ पहचाने जा सकते है. प्रेमचंद के कथा-साहित्य में यह परिवेश किसी विशेष हिस्से के रूप में आने की जगह भारतीय जीवन के पहलू के तौर पर ही सामने आता है.       

  बिम्ब प्रतिबिंब प्रकाशन 
   प्रेमचंद ने जिस समय में अपनी कहानियां लिखी उस समय तक न धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा हुआ था और न ही उस समय तक ‘पाकिस्तान’ का विचार ही अपनी जड़े जमा पाया था. 1947 के बाद बंटवारे के बाद से भारत में ही रह गये भारतीय मुस्लिमों के साथ एक खास किस्म की मानसिकता ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी. मुसलमानों को किसी एक दूसरे देश के साथ जोड़ कर पहचाने जाने की पीड़ा से नही गुजरना पड़ता था. उस समय तक उसके खाने-गाने पर दो देशों के नाम नही चिपके हुए थे.जितनी मात्रा में हिन्दू अंग्रेजपरस्त थे उतनी ही मात्रा में मुस्लिमों के मामले में भी संभावना थी. शहर-गाँव की बसावट में धर्म की  रेखाएं दीवार में नही बदली थी. शायद यही कारण रहा होगा कि अलगू और जुम्मन एक दूसरे की पंचायत करते थे और उन के निर्णय भी दोनों सहजता से स्वीकार भी करते थे. संग्रह के शीर्षक ‘गहरी जड़ें’ नामक कहानी का मुस्लिम पिता का मनोसंसार ‘बाबरी’,‘गोधरा’ और ‘ग्यारह सितम्बर’ होने से पहले ही पुख्ता तौर पर निर्मित हो चुका था. अपने मनोसंसार में ‘पंच-परमेश्वर’ वाले खाद-पानी के कारण ही उनके भीतर अपने पुराने मुहल्ले में ‘बसे’ रहने की जिद ने गहरी जड़ें जमा ली हैं. उनकी यह जिद अपने समय के अधेरों के खिलाफ रौशनी की जिद बन पाठक को भारतीय समाज के प्रति आश्वस्त करती है. अपनी इस आश्वासन की बिना पर यह कहानी इस संग्रह की विशिष्ट कहानी का दर्जा पाती है.

      एक अच्छी कहानी अपनी पूरी बुनावट में अपने लिखे जाने के कारण की ओर साफ़ इशारा करती है. अनवर की अधिकांश कहानियों में ये इशारे इतने साफ़ तौर पर आते है कि उन इशारों को हम ब्यौरे की तरह देखने लगते है.’नीला हाथी’,’ग्यारह सितंबर के बाद’ और ‘दहशतगर्द’ नामक कहानियों में हमे इसकी तफ्शील मिलती है. दहशतगर्द कहानी के मूसा के आतंकवादी में तब्दील होने की प्रक्रिया को इन्ही ब्योरों के साथ देखा-समझा जा सकता है.”पहले-पहल इस नगर में एक ही मन्दिर था, देवी माँ का मन्दिर,फिर जब यहाँ मारवाड़ी आकर बसे तब नगर के मध्य में भव्य ‘राम-मन्दिर’ बना,जिसके प्रांगण में सुबह-शाम शाखाएं लगने लगीं. पहले यहाँ एक छोटे कमरे में मस्जिद बनी, फिर देखते-देखते इस नगर में तीन मस्जिदें, दो ईदगाह, एक कब्रस्तान, एक मजार बन गई.  ...आर्थिक उन्नति के साथ  धर्म, आस्था, विचार, आदर्श, संवेदना और शिक्षा का व्यवसायीकरण किस तेजी से होता है, इसकी प्रत्यक्ष मिसाल यहाँ देखी जा सकती है.” इन ब्योरों की बानगी हमे हर शहर और कस्बों के साथ इतनी ही शिद्दत के साथ घटती दिखाई देती है.यह कहानी हर शहर-कस्बें की कहानी बन जाती है. मूसा के आतंकवादी बन जाने या बना दिए जाने  के बाद भी गनीमत है कि  हमारे आसपास ईसा मियां और पहले वाले मूसा कम नही हुए हैं. यह कहानी मूसा को बदलने में भागीदार लोगों की साजिशों को बेपर्दा करने वाली कहानी है.यह बेपर्दा करने वाली कहानियां हमे किसी अगले मूसा को आतंकवादी बनने और बनाने की प्रक्रिया से जूझने की ताकत से भरने का काम भी करती जाती हैं. जबकि ‘ग्यारह सितंबर के बाद’ का अहमद इससे पहले ‘छह दिसंबर’ भी झेल चुकने की निरन्तरता को सह नही पाता और ‘घनघोर-नमाजी’ बन जाता है. उसके इस बदलाव के पीछे इन दोनों घटनाओं के असर से कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका इन दोनों घटनाओं के बीच उसके साथ रोजमर्रा के जीवन में होने वाली घटनाएँ और व्यवहारों ने निभाई हैं. अयोध्या और अमेरिका दोनों अहमद से दूर है पर उसके आसपास के लोग हमेशा उसके आसपास हैं. “मुझे एक मुसलमान क्यों समझा जाता है,जबकि मैंने कभी भी तुमको हिन्दू वगैरा नही माना. मुझे एक सामान्य भारतीय शहरी कब समझा जायेगा?” अहमद का यही ‘दर्द’ उसको भीतर तक डरा देता है. एक ‘मुसलमान’ में बदलते अहमद के रूप में भारतीय समाज-संस्कृति का ‘डरा-सहमा और कमजोर’ होता चेहरा हमारे सामने आ खड़ा होता है.
         अनवर परिवार और उसके संबंधों की भी कहानियां लिखते हैं और अच्छी लिखते हैं.’नसीबन’,’चहल्लुम’ शीर्षक कहानी तो पूरी तरह परिवार के भीतर की कहानी हैं.’पुरानी रस्सी’ को भी इस दायरे में शामिल माना जा सकता है. इन कहानियों के माध्यम से पारिवारिक रिश्तों के तनावों से रूबरू होता है. इन कहानियों के पात्रों का नाम आप जिस परिवेश की छाह देने वाले रखगें यह कहानियां भी उसी परिवेश की हो जाएँगी. इस तरह की कहानियां हमारे पारिवारिक ढांचे को ढकने वाले धार्मिक आवरण को उघाड़ कर पूरे भारतीय सामाजिक ताने बाने की विसंगतियों को सामने लाती है. ‘हमारे यहाँ ऐसा नही होता या होता है’ के दावों की भुरभुरी नीवं को खोद कर नेस्तनाबूद कर देती हैं. रिश्तों के भीतर मार्मिक स्थितियों को पहचानने और उन्हें प्रभावी कलेवर में प्रस्तुत करने में भी अनवर सुहैल सफल रहे है. इस लिहाज से ’नसीबन’ एक बेहद सफल कहानी है.नसीबन एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो स्त्री-जीवन की विपरीत और त्रासद स्थितियों के खिलाफ मजबूती से खड़ी होती है, लडती है, अपने दायरे में जीतती भी है. वह पाती है कि  एक उस जैसी एक दूसरी स्त्री उन्ही विपरीत और त्रासद स्थितियों के चंगुल में फंसी हुयी है और उस दूसरी स्त्री के व्यवहार में उसका एहसास दूर–दूर तक दिखाई नही देता. इस सच से नसीबन को गहरा धक्का लगता है. कहानी का अंतिम अंश है “नसीबन की आँखें बंद थीं./एक बम सा फटा उसके कानों के पास! ‘जुम्मन’/काश! उसने अपने कान भी बंद कर लिए होते.” इस तरह नसीबन दूसरी स्त्री के जीवन-स्थितियों के त्रासद सच से अपने आप को एकाकार महसूस करती है. नसीबन के साथ कहानी का पाठक भी भीतर तक हिल जाता है.
        ‘नीला हाथी’ और ‘पीरू हज्जाम उर्फ़ हजरतजी’ कहानी धर्म के आडम्बर औरविसंगतियों का कथात्मक रूप प्रस्तुत करती है. अपनी विषयवस्तु में प्रभावी होने के बाद भी इन कहानी का पूरा ढांचा बहुत हद तक तय फार्मूले और टूल के इस्तेमाल से खड़ा किया हुआ लगता है. इन दोनों कहानियों में धर्म का आडम्बर रचने और उसे अपने लिए फायदेमंद बना लेने का काम करने वाले पात्र मुस्लिम समुदाय के अशराफ या पसमांदा तबके से ताल्लुक रखने वाले हैं. कहानीकार इस तथ्य को दोनों कहानियों में दर्ज भी करता है. एक कहानी के शीर्षक से ही इस बात की पुष्टि हो जाती है. अब मामला ये बनता है कि धर्म के पूरे जालताल पर किस तबके का वर्चस्व बना रहता है, उस ओर न तो इशारा करती है और न ही इन पात्रों के व्यक्तित्व को इस तरह से विकसित होने में उस तबके की मानसिकता का असर ही पकड़ा गया है. इसके बावजूद दोनों कहानियों को पढने में  पाठक कहानी का पूरा रस ले सकते है.
        ‘फिरकापरस्त’, ’कुंजड-कसाई’, और ‘फत्ते भाई’ इन तीन कहानियों में मुस्लिम परिवेश के परत दर परत खांचों के दबावों और विषमता-बोध को केंद्र में रखा गया है. इन कहानियों में दर्ज हुआ ‘मुस्लिम परिवेश’ अपने ही धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ साबित होता है फिर भी मजबूती से अपना वजूद कायम रखे है. यह भारतीय परिवेश का कारुणिक प्रभाव है जिससे कोई भी धर्म नही बचा हुआ है. कहानी संग्रह की भूमिका में जिस ‘अपरिचित संसार का अनावरण’ करने की बात की गई है वह इन्ही तीन काहनियों से मुख्यतः जुडती हैं. इन तीनों कहानियों का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि इन तीनों कहानियों के पात्र अपने जीवन पर थोपी त्रासदी और विषमताबोध के खिलाफ सार्थक संघर्ष के रास्ते पर चलते है. एक कहानीकार के तौर पर अनवर सुहैल ने अपनी सभी कहानियों में संवेदनशील और सचेत रूप में सार्थक संघर्ष के प्रति अपनी गहरी आस्था और विवेक की पक्षधरता का निबाह किया है और यही निबाह किसी भी रचनाकार का अंतिम देय साबित होती है.