मंगलवार, 18 मार्च 2025

पिता (दो कवितायेँ )


 


पिता: एक


तुम बुड्ढे हो गए पिता
अब तुम्हें मान लेना चाहिए
आने वाला है ‘द एण्ड’

तुम बुड्ढे हो गए पिता
कि तुम्हारा इस रंगमंच में
बचा बहुत थोड़ा-सा रोल
ज़रूरी नहीं कि फिल्म पूरी होने तक
तुम्हारे हिस्से की रील जोड़ी ही जाए

इसलिए क्यों इतनी तेज़ी दिखाते हो
चलो बैठो एक तरफ
बच्चों को करने दो काम-धाम...

तुम बुड्ढे हो गए पिता
अब कहाँ चलेगी तुम्हारी
खामखाँ हुक्म देते फिरते हो
जबकि तुम्हारे पास कोई
फटकता भी नहीं चाहता

तुम बुड्ढे हो गए पिता
रिटायर हो चुके नौकरी से
अब तुम्हें ले लेना चाहिए रिटायरमेंट
सक्रिय जीवन से भी...
तुम्हें अब करना चाहिए
सत्संग, भजन-पूजन
गली-मुहल्ले के बुड्ढों के संग
निकालते रहना चाहिए बुढ़भस

तुम बुड्ढे हो गए पिता
भूल जाओ वे दिन
जब तुम्हारी मौजूदगी में
कांपते थे बच्चे और अम्मा
डरते थे
जाने किस बात नाराज़ हो जाएं देवता
जाने कब बरस पड़े
तुम्हारी दहशत के बादल...

तुम बुड्ढे हो गए पिता
अब क्यों खोजते हो
साफ धुले कपड़े
कपड़ों पर क्रीज़
कौन करेगा ये सब तुम्हारे लिए
किसके पास है फालतू समय इतना
कि तुमसे गप्प करे
सुने तुम्हारी लनतरानियां
तुम इतना जो सोचो-फ़िक्र करते हो
इसीलिए तो बढ़ा रहता है
तुम्हारा ब्लड-प्रेशर...
अस्थमा का बढ़ता असर
सायटिका का दर्द
सुन्न होते हाथ-पैर
मोतियाबिंद आँखें लेकर
अब तुमसे कुछ नहीं हो सकता पिता
तुम्हें अब आराम करना चाहिए
सिर्फ आरा....म!

पिता: दो

मैं भी हो जाऊँगा
एक दिन बूढ़ा
मैं भी हो जाऊँगा
एक दिन कमज़ोर
मैं भी हो जाऊँगा
अकेला एक दिन
जैसे कि हो गए हैं पिता
बूढ़े, अकेले और कमज़ोर
मैं रहता हूँ व्यस्त कितना
नौकरी में
बच्चों में
साहित्यकारी में
बूढ़ा होकर क्या मैं भी हो जाऊँगा
बातूनी इतना कि लोग
कतराना चाहेंगे मुझसे
बच कर निकलना चाहेंगे मुझसे
मैं सोचता नहीं हूँ
कि मैं कभी बूढ़ा भी होऊँगा
कि मैं कभी अशक्त भी होऊँगा
कि मैं कभी अकेला भी होऊँगा
तब क्या मैं पिता की तरह
रह पाऊंगा खुद्दार इतना
कि बना सकूँ रोटी अपनी खुद से
कि धो सकूँ कपड़े खुद से
कि रह सकूँ किसी भूत की तरह
बड़े से घर में अकेले
जिसे मैंने अपने पिता की तरह
बनवाया था बड़े शौक से
पेट काटकर
बैंक से लोन लेकर
शहर के हृदय-स्थल में!
पता नहीं
कुछ भी सोच नहीं पाता हूं
और नौकरी में
बीवी, बाल-बच्चों में
साहित्यकारी में रखता हूँ खुद को व्यस्त
मेरे सहकर्मी भी
नहीं सोच पाते
कि कभी होएंगे वे बूढ़े, कमज़ोर और अशक्त
अक्सर वे कहते हैं
कि ऐसी स्थिति तक आने से पहले
उठा लें भगवान

तो कितना अच्छा हो...

रविवार, 9 मार्च 2025

बात होनी चाहिए



रंजिशों के दौर में भी कह रहे हैं
मुलाक़ात होनी चाहिए
और बात होनी चाहिए
रंजिशी माहौल में भी
दो किनारों को जोड़ता सा
एक जो पुल बन रहा है
तामीर उसकी चलती रहे
कोशिशें होती रहें
कि गाहे-बगाहे बात होनी चाहिए

एक रिश्ते का तसव्वुर झिलमिलाता,
धुंधला होकर गुम होता सा
और उसी बनते-बिगड़ते
रिश्ते की कसमें खा-खाकर
रंजिशों के नेजे से
दोस्ती से जख्म हमेशा हरे रहेंगे….

ये बता दो पूछते हैं लोग सारे
दोस्ती करनी नहीं जब
फिर वहां पर कौन सी मजबूरियाँ हैं
सच कहूँ तो गौर कर लो
रिश्तों के बीच देखो दूरियां ही दूरियां हैं
दूरियां बढ़ती रहेंगी
और बनने से पहले ही टूटकर
गिर जाएगा पुल….

रंजिशें, कडुवाहटें, सरगोशियाँ सब
दोस्ती की राह में दुश्वारियां पैदा करते हैं
लेकिन जब इनसे उबरकर राह तय हो जाती है
दोस्ती की मंजिल ही आती है…

दास्तान ए श्वेत-श्याम केश









मैं ईष्या से जल कर देखता
काले झब्बे बालों से सजे
अपनी ही उम्र के पुरूषों के सिर
समझता निवासी उन्हें
दूसरे ग्रहों का 
अपने टकले होते सिर
काले कम सफेद ज्यादा बालों की 
दयनीय दशा देख
दिल तड़प उठता
सोचता एकांत में
कहां हुई गलती

यदि करें बात
बालों की देखभाल के लिए 
दैनिक, मासिक या वार्षिक बजट की
तो उसमें भी कहीं नहीं पाएंगे
नगर में उपलब्ध 
अखबारों और पत्रिकाओं के 
तमाम विज्ञापनों को आजमाया
स्वेटर की डिजाइनों के लिए 
खरीदी गई पत्रिकाओं में दर्ज
सौंदर्य विषेषज्ञाओं की सलाह
खोज-खोज कर पढ़ा-आजमाया
नानी-दादी, मां और सास के
तमाम नुस्खों पर भी दिया ध्यान
लेकिन ‘मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’
हालत ये हुई है
कि अब कैमरा और आईने का 
सामना करते लगता है डर
सफेद बालों वाले सिर के कारण
आजकल रहता हूं उदास...

सहधर्मिणी सलाह देती-
काले क्यों नहीं करा लेते बाल
वर्मा साहब की तरह
आप भी लगेंगे जवान
अभी आपकी उम्र ही क्या है
अपने छोटे भाई को देखिए
एक ही साल तो छोटे हैं आपसे
किन्तु दिखते कितने मासूम-जवान
तभी तो उनके चाल-चलन पर 
रखती ख़ास नज़र देवरानी 

बेटियां कहतीं
डरते-झिझकते
पापा, टीवी में आता तो है ‘एड’
बिटिया के संग कहती है माॅडल
‘गेस माई एज’
ग़ज़ब करते पापा आप भी
है कितना आसान आजकल
बालों को काला करना
खोलो, घोलो, मिलाओ और लगाओ
आप हुक्म तो करें पापा!
मिनटों में हम सफेद बालों को
बड़ी सफाई से काला कर देंगी।
फिर हमें कोई नहीं टोकेगा-
‘‘न रे क्या ये तेरे दादा हैं?’’

मैं पत्नी को 
यकीन दिलाना चाहता
बारम्बार कि दिखता हूं, 
जितना उम्रदार उतना हूं नहीं
अभी तो सिर्फ चालीसा लगा है
पत्नी के साथ घूमने निकलने पर
जब भी मिलता कोई सहपाठी या लंगोटिया
भरे-पूरे बालों वाला चिरयुवा सा
तब उसे रोक अभिवादन करता
आत्मीयता से हाल-चाल पूछता 
फिर मिलने का वादा कर
बतलाता पत्नी को-
‘‘ये मेरा क्लास-फेलो है!’’
जैसे दिखा कर सबूत 
दिलाना चाहता विश्वास
यदि मेरे तेजहीन चेहरे पर
गंजे होते सिर पर
श्वेत-श्याम केश पर 
न दिया जाए ध्यान तो
मैं भी इन मित्रों की तरह 
अभी भी हूं जवान
उतना ही ऊर्जावान!


शनिवार, 8 मार्च 2025

रुखसाना



रूखसाना से इस तरह मुलाकात होगी, मुझे मालूम न था।
चाय लेकर जो युवती आई वह रूखसाना थी। जैसे ही हमारी नज़रें मिलीं…हम बुत से बन गए। बिलकुल अवाक् सा मैं उसे देखता रहा। एकबारगी लगा कि खाला क्या सोचेंगी कि उनके घर की स्त्री को मैं इस तरह चित्रलिखित सा क्यों देख रहा हूँ?
खाला सामने बैठी हुई थीं।
खाला ने मुझे इस तरह देखा तो बताने लगीं–‘अच्छा तो तुम इसे जानते हो…ये रुखसाना है, गुलजार की बीवी.  अल्लाह का फ़ज़ल है कि बड़ी खिदमतगार है। दिन-रात सभी की खिदमत करती है। तुम्हारे गाँव की तो है ये। अपने इनायत मास्साब की लड़की।’’
मैंने उन्हें बताया—“इनके अब्बू ने हमें पढ़ाया है खाला…मैं तो इनकी घर ट्यूशन पढने जाया करता था..!”
और इनायत मास्साब का वजूद मेरे ज़ेहन में हाज़िर हो गया.
हमारे प्रायमरी स्कूल के शिक्षक इनायत मास्साब।
नाम से बड़ा रवायती तसव्वुर उभरता है, लेकिन इनायत मास्साब बड़े माडर्न दीखते थे. क्लीन-शेव्ड रहते और अमूमन ग्रे पेंट और सफ़ेद शर्ट पहना करते. ठण्ड के दिनों में वे इस ड्रेस पर एक ग्रे कोट डाल लिया करते. बड़े स्मार्ट-लूकिंग थे मास्साब.
उनकी तीन लड़कियां थीं।
बड़ी का नाम उसे याद नही क्योंकि वो ससुराल जा चुकी थी, दूसरी का नाम शबाना था और सबसे छोटी रुखसाना…
शबाना स्थानीय गर्ल्स कालेज में पढ़ती थी.
रुखसाना और मैं एक ही कक्षा के विद्यार्थी थे लेकिन स्कूल अलग-अलग था हमारा.
मैं गणित में काफी कमज़ोर था, सो अब्बा मुझे गणित पढ़ने के लिए इनायत मास्साब के घर भेजा करते थे।
मुझे गणित विषय अच्छा नही लगता था लेकिन मेरी रूचि गणित के बहाने रुखसाना में ज्यादा थी.
जब मैं उनके घर पहुंचता तब दरवाज़ा रूखसाना ही खोलती और फुर्र से अंदर भाग जाती इस आवाज़ के साथ–‘अब्बू, पढने वाले आ गए!’
उसने कभी ये नहीं कहा कि शरीफ आया है…ट्यूशन पढ़ने। पता नही क्यों वो मेरा नाम न लेती थी…
बहुत खतरनाक टीचर थे इनायत मास्साब, जो भी चेप्टर समझाते इस ताईद के साथ कि न समझ आया हो तो पढाते समय पूछ लो. एक बार नहीं दस बार पूछो…हर बार समझायेंगे वे..लेकिन इसके बाद यदि सवाल नहीं बना तो फिर बेंत की मार खानी होगी. वे बेंत इस तरह चलाते की हथेली लाल हो जाती और चेहरा रुआंसा.
एक और खासियत थी उनकी। सवाल का जवाब नहीं लिखाते थे। बच्चों को जवाब लिखने को प्रेरित करते। वे कहते कि दिखाओ कैसे कोशिश की सवाल का जवाब पाने की.
बड़े ध्यान से बच्चों के जवाब देखते और बताते कि सवाल हल करने का तरीका कितनी दूर तक ठीक था और कहां से रास्ता भटक गया है। यह भी कहा करते कि गणित में सबसे महत्वपूर्ण बात होती है सवाल को समझना। यदि सवाल सही न समझा गया तो कितना बड़ा फन्नेखां हो सवाल हल नहीं कर पाएगा। इसलिए अव्वल बात ये कि सवाल भले से याद हो फिर भी जवाब लिखने से पूर्व सवाल को अच्छी तरह पढ़ा और समझा जाए। हम बच्चे उनकी इस शिक्षा को जीवन के हर स्तर पर खरा उतरता पाते।
मेरे हिसाब से बच्चे उस शिक्षक की ज्यादा कद्र करते हैं और उससे डरते भी हैं जिसके बारे में उनके बाल-मन में यकीन हो जाए कि ये शिक्षक विलक्षण ज्ञानी है। कहीं से भी पूछो और कितना कठिन प्रश्न पूछो चुटकी बजाते हल कर दिया करते थे. मुझे उनमे एक रोल-मॉडल दीखता…मैं भी बड़ा होकर उन्ही की तरह का ज्ञानी-शिक्षक बनने के ख़्वाब देखने लगा था.
ठीक इसके उलट बच्चे उन शिक्षकों का मज़ाक उड़ाते, जिनके बारे में जान जाते कि इस ढोल में बड़ी पोल है।
उनमे हिंदी के अध्यापक का नाम सबसे ऊपर था.
वैसे भी विज्ञान के बच्चे हिंदी के शिक्षकों का मज़ाक उड़ाया करते हैं.
हिंदी के अध्यापक उर्फ़ जेपी सरन उर्फ़ उजड़े-चमन….
मुझे नही मालूम लेकिन ये बात कितनी सही है कि हिंदी का अध्यापक कवि ज़रूर होता है. कवि भी ऐरा-गैरा नही. तुलसीदास से कुछ कम और निराला से कुछ ज्यादा. उनकी बात माने तो कविता वही है जैसी जेपी सरन उर्फ़ उजड़े-चमन लिखते हैं.
बच्चे उनकी इतनी हूटिंग करते लेकिन वाह रे सर की मासूमियत, वे समझते की उन्हें दाद मिल रही है.
इनायत मास्साब को हम सर भी कह सकते थे, लेकिन नगर के उम्र-दराज़ शिक्षक थे इनायत मास्साब. जब शिक्षकों को गुरूजी कहा जाता था उस वक्त भी उन्हें मास्साब का लकब मिला हुआ था. जाने कितने लेखको की गणित की किताबों का अध्ययन उन्होंने किया हुआ था. हम तो सोचा करते कि इनायत मास्साब खुद ही  सवाल  बना लिया करते हैं. काहे कि अपनी देखी-भाली किसी किताब में वैसे सवाल नही मिलते थे.
इनायत मास्साब मुझे पसंद करते थे क्योंकि मैं सवाल हल करने का वास्तव में प्रयास करता था। मेरी कापी के पन्ने इस बात के गवाह हुआ करते।
इनायत मास्साब के ट्यूशन ने गणित को मेरे लिए खेल बना दिया था…
वे कहा करते…मैथेमेटिक्स एक ट्रिक होती है. जिसे महारत मिल जाए उसकी बाधाएं दूर…
जब मास्साब ट्यूशन पढ़ाते उस दरमियान एक बार रूखसाना पानी का गिलास लेकर आती थी।
वैसे भी किशोरावस्था में किसी को कोई भी लड़की अच्छी लग सकती थी। लेकिन रूखसाना इसलिए भी अच्छी लगती थी कि उसे मैं काफी करीब से देख सकता था। वह दरवाज़ा खोलती थी। अपने पिता के लिए पानी का गिलास लाती थी।
ईद के मौके पर मुझे भी सेवईयां मिल जातीं. उनके घर की शबे-बरात के  समय सूजी और चने की कतलियां तो बाकमाल हुआ करतीं थीं, क्यूंकि उन कतलियों में  रूखसाना का स्पर्श भी छुपा होता था।
वह ज़माना ऐसे ही इकतरफा इश्क या इश्क की कोशिशों का हुआ करता था।
तब मोबाईल, फेसबुक या व्हाटसएप नहीं था। मिस-काल या साइलेंस मोड की सवारी कर प्यार परवान नहीं चढ़ा करता था.
चिट्ठियां लिखी जाएं तो पकड़े जाने का डर था।
और यदि लड़की चिट्ठी अपने पिता या भाई को दिखला दे या कि चिट्ठियां ओपन हो जाएं तो फिर शायद कयामत हो जाए…ऐसे दुःस्वप्न की कल्पना से रोम-रोम सिहर उठे।
कुछ बद्तमीज़ लड़के थे जो जाने कैसे पिटने की हद तक जलील होकर इश्क करते थे और राज़ खुलने पर खूब ठुंकते भी थे।
इस तरह मैं यह फ़ख्र से कह सकता हूं कि रूखसाना मेरा पहला इकतरफा प्यार थी।
बड़ा अजीब जमाना था. बात न चीत, सिर्फ देखा-दाखी से ही सपनों में दखल मिल जाता.
इस रुखसाना ने मेरे ख़्वाबों में बरसों डेरा डाला था.
कभी देखता कि पानी बरस रहा है, मैं छतरी लेकर घर लौट रहा हूँ. रुखसाना किसी मकान के शेड पर बारिश रुकने का इंतज़ार कर रही है और फिर मुझे देख  मेरी ओर बढती है. मैं उसे इस तरह छतरी ओढाता हूँ कि वह न भीगे…भले से मैं भीग जाऊं.
कभी ख़्वाब में वह मेरे घर आकर मेरी बहनों के साथ लुका-छिपी खेलती होती और मुझे घर में देख अचानक  अदृश्य हो जाती.
आह, वो ख्वाबों के दिन…किताबों के दिन…सवालों की रातें…जवाबों के दिन…

वही मेरे सपनो वाली रुखसाना इस रूप में मेरे सामने थी और मैं चित्र-लिखित…
कुछ साल बाद मैं बाहर पढ़ने चला गया।
अपने कस्बे में अब कम ही आ पाता था।
मेरे ख्याल से जब मेरा तीसरा सेमेस्टर चल रहा था तभी दोस्तों से पता चला था कि इनायत मास्साब की बेटी रूखसाना की कहीं शादी हो गई है। शादी हो गई तो हो गई। मुझे क्या फर्क पड़ सकता था। मुझे तो शिक्षा पूर्ण कर अच्छे प्लेसमेंट का प्रयास करना था। उसके बाद ही शादी के बारे में सोचता। घर से कोई दबाव नहीं था। अब्बू चाहते हैं कि मैं अभी प्लेसमेंट के बारे में न सोचूं और पीजी करूं। पीएचडी करूं। फिर किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर लग जाऊं।
अब्बू का मानना है कि दुनिया में प्रोफेसर या शिक्षक से बढ़कर कोई नौकरी या काम नहीं है। कितनी इज़्ज़त मिलती है प्रोफेसरों को। जिन बच्चों को पढ़ाओ, एक तरीके से वे मुरीद बन जाते हैं….पीरों-फकीरों वाला पेशा है प्रोफेसरी। मुझे भी यही लगता कि मेहनत इस तरह की जाए कि मां-बाप  के ख़्वाब भी पूरे हों और भविष्य भी सुनिश्चित रहे।
शिक्षक, वकील  या डॉक्टर कभी रिटायर नही होता…ताउम्र उनकी सेवायें ली जा सकती हैं.
बुजुर्गों की दुआओं से वही हुआ और मैंने पीएचडी की, अन्य अर्हताएं प्राप्त कीं और एक मानद विश्वविद्यालय में  सहायक प्राध्यापक बन गया।
बाल-बच्चेदार हो गया…दुनियादार हो गया…समझदार हो गया…लेकिन दिल के कोने में एक बच्चा, एक किशोर, एक युवक हमेशा उत्सुकता से छिपा बैठा रहा. यही मेरी प्रेरणा है और यही मेरी ताकत.
मैं अपनी खाला से मिलने काफी अरसे बाद आया था।
अनूपपुर में बस-स्टेंड से लगा है खाला का घर। अम्मी के इंतेकाल के वक्त खाला मिलने आई थीं। लगभग दस साल बाद उन्हें देखा था। आसमानी रंग का सलवार-सूट पहने थीं वो जिस पर सफेद चादर से बदन ढांप रखा था उन्होंने। हमारे खानदान में बुरके का चलन नहीं है। मेरी अम्मी भी बुरका नहीं पहनती थीं। जिसे बुरा लगे या भला, मुझे बुर्के का काला रंग एकदम पसंद नही. जाने कब और कहाँ बुर्के के इस प्रारूप का चलन शुरू हुआ…आजकल शहरों में लडकियां कितनी खूबसूरती से चेहरा ढाँपती हैं. एक से बढ़कर एक सुन्दर से स्कार्फ मिलते हैं. डिज़ाइनर-स्कार्फ. जिनसे चेहरा छुपता तो बखूबी छुपता है लेकिन लडकियाँ बुर्केवालियों की तरह अजूबा नही दीखतीं…
मेरा उद्देश्य बुर्के की बुराई करना नही है, लेकिन खाला के घर में रुखसाना को देख विचार यूँ ही भटकने लगे थे.
मुझे अच्छी तरह मालुम था कि खाला के बेटे गुलज़ार भाई की शादी तो बहुत पहले खाला की रिश्तेदारी में ही  कहीं हुई थी. फिर गुलज़ार भाई के पहले बच्चे को जन्म देने की बाद लम्बी बीमारी के बाद वह चल बसी थी. गुलज़ार भाई उसके बाद दुकानदारी और तबलीग जमात के काम किया करते थे. एक बार हमारे शहर में गुलज़ार भाई आये थे एक तबलीगी जमात के साथ. शायद चिल्ला (चालीस दिन) का इबादती सफ़र था. मैं जुमा की नमाज़ के लिए वक्त निकाल ही लेता हूँ. जुमा के जुमा मुसलमानी का नवीनीकरण करता रहता हूँ. मोहल्ले की मस्जिद में मासिक चन्दा भी देता हूँ.
मस्जिद के इमाम, सदर-सेक्रेटरी और अन्य नमाज़ी मुझे काफी अदब से देखते हैं. मेरा आदर करते हैं. विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होने के अलग फायदे हैं. समाज के हर तबके से आदर मिलता है.
तो गुलज़ार भाई ने फोन किया था कि तुम्हारे शहर में तबलीग के सिलसिले में आ रहा हूँ. इसमें जमात छोड़ कहीं घूमने-फिरने की आज़ादी नही होती. इसलिए संभव हो तो मस्जिद में आकर मिलो.
जुमा की नमाज़ से फारिग होकर हम मिले.
अजीबो-गरीब दीख रहे थे गुलज़ार भाई.
पहले कितने हैंडसम हुआ करते थे वो…जींस और टी-शर्ट के शौक़ीन…लेकिन उस दिन मैं उन्हें पहचान नही पाया…मेहँदी रची दाढ़ी, माथे पर काला निशान, गोल टोपी, लम्बा सा कुरता और उठंगा पैजामा….
मैं हतप्रभ रह गया. वैसे मुसलमानों की ये परम्परागत पोशाक है. लेकिन अपने गुलज़ार भाई इस मुद्रा में मिलेंगे ऎसी उम्मीद नही थी. मुझे हंसी आई. गुलज़ार भाई गंभीर दिखे और मुझसे हाल-चाल पूछने की जगह दुनियादारी त्याग कर समय रहते दीन के राह में  चलने की दावत देने लगे. तबलीग जमात में लोगों को यात्रा में निकलने की गुजारिश करने को ’दावत देना’ कहते हैं. ये प्रत्येक तबलीगी का काम है कि वो मुसलमानों को दीन और धर्म का पालन करने की दावत दें. उनसे घर छोड़ कर दीन की राह में निकल पड़ने का आग्रह करें और गुमराही में भटकने से बचा लें.
तबलीगी जमात का काम सारी दुनिया में ज़ारी है.
गुलज़ार भाई जैसे धर्मप्रेमी लोग अपने जीवन में रसूल की सुन्नतें लाने के लिए…अपना आखिरत (परलोक) संवारने के लिए   तबलीग में दस या चालीस दिन के लिए घर छोड़ कर विभिन्न कस्बों-शहरों की मस्जिदों में कयाम करते हैं. सादा जीवन, सादा भोजन और इबादतें करते रहते हैं. एक चिल्ला काटने के बाद उनकी दुनियावी आदतों में दीन ऐसा पेवस्त हो जाता है कि एक तरह से उनका कायाकल्प हो जाता है.
न जाने मुझे क्यों इन तबलीगी लोगों से चिढ होती है. घर-बार छोड़ कर इस्लामी जीवन-पद्धति सीखना मुझे पसंद नही. दुनिया की रोज़मर्रा की उलझनों के बीच रहकर दीन पर कायम रहना ज्यादा कठिन है. खैर…पत्नी के निधन के बाद इंसान में ऐसी तब्दीली आती होगी ऐसा मैंने सोचा था.  मैंने गुलज़ार भाई की बातें ध्यान से सुनी थीं और हस्बे-मामूल उन्हें यही जवाब दिया–’इंशा-अल्लाह, पहली फुर्सत  में एक  चिल्ला  मैं भी काटूँगा…अभी नौकरी नई है भाई साहेब…थोड़ी मुहलत दें!’  बात आई-गई हुई.   गुलज़ार भाई से फिर मेरी मुलाकात नही हुई.


आज जब खाला के घर में हूँ. रुखसाना मेरे सामने है तो जाने कितने खयाल आ-जा रहे हैं.
खाला ने मुझे उस दिन जाने न दिया.
मैं रुक गया.
शाम की चाय खाला के साथ पी. फिर खाला पड़ोस में एक जनाना मीलाद में चली गईं.
रुखसाना और मैं अकेले रह गये.
इधर-उधर की बातें हुईं फिर मेरी जिज्ञासा ने जोर मारा और हम मुद्दे पर आ गए.
रुखसाना ने झिझकते हुए जो किस्सा बताया उसे सुन मेरे होश उड़ गए.
ये रुखसाना की दूसरी शादी है.
रुखसाना की पहली  शादी जिस युवक से हुई, वो अपने पडोस की एक हिन्दू लडकी से प्यार करता था. युवक ने घर वालों के दबाव में आकर रुखसाना से निकाह तो पढवा लिया था, लेकिन उस हिन्दू लडकी से अपना संपर्क नही तोड़ा था.
और एक दिन नगर में खबर फ़ैल गई की रुखसाना का शौहर उस हिन्दू लडकी को लेकर कहीं भाग गया है.
नगर में हिन्दू-मुस्लिम फसाद के आसार हो गए.
लडकी का परिवार नगर के संपन्न लोगों का था. बड़े रसूख वाले लोग थे वे लोग.
रुखसाना के शौहर के खिलाफ लड़की भगा ले जाने का अपराध पंजीबद्ध हुआ. नगर के कई संगठन इस घटना से तिलमिलाए हुए थे. शुक्र है तब ’लव-जिहाद’ शब्द उस कस्बे में नही पहुंचा था. हाँ, कुछ सिरफिरे ज़रूर इस केस को हवा देना चाह रहे थे. उनका मानना था कि मुसलमान लडकों में गर्मी ज्यादा होती है, तभी तो वे उंच-नीच नहीं देखते और ऐसी हरकतें कर बैठते हैं कि उन लोगों की ठुकाई का मन करता है.
रुखसाना ने बताया कि ऐसे हालात बन गये थे कि यदि कोई भी पक्ष थोडा सा भी तनता तो फिर उस आग में सब कुछ जल कर भस्म हो जाता.
खुदा का शुक्र था कि दोनों तरफ समझदार लोगों की संख्या अधिक थी.
फिर भी कई दिनों तक दोनों पक्षों में तनातनी बनी रही. दोनों समुदाय के रसूखदार लोगों के बीच नगर में पंचायत हुई.
अब सुनते हैं की वे लोग घर से भागकर सूरत चले गये थे. युवक वहां किसी फैकट्री में काम करने लगा और दोनों सुकून से  दाम्पत्य  जीवन गुज़ार रहे हैं.
और जो भी हुआ हो उसके आगे…लेकिन रुखसाना अपने मायके वापस आ गई.
इनायत मास्साब ने रुखसाना के लिए आनन्-फानन रिश्ते खोजने लगे.
उसी समय गुलज़ार भाई की बीवी का इन्तेकाल हुआ था.
गुलज़ार भाई की पहली बीवी से पैदा संतान अब स्कूल जाने लगी है.
लेकिन उस समय तो खाला को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था.
ऐसे में मेरी अम्मी ने खाला से रुखसाना प्रसंग पर बात की.
रुखसाना को देखने खाला आई थीं और उन्होंने रुखसाना को गुलज़ार भाई के बारे में, अपनी मृतक बहु के बारे  में और गुलज़ार भाई  की नन्ही सी औलाद के बारे में साफ़-साफ़ बता दिया था.
रुखसाना शादी-ब्याह के मसले से उकता चुकी थी.
इस नए रिश्ते के लिए मानसिक रूप से वह तैयार नही हो पा रही थी.
वह घबरा रही थी, लेकिन फिर इनायत मास्साब की बुजुर्गियत, मोहल्ले की बतकहियाँ आदि ने उसे एक नया फैसला लेने दिया.
और घुमा-फिरा कर रुखसाना का निकाह एक सादे समारोह में गुलज़ार भाई से हो गया.
हम बहुत देर तक खामोश बैठे रहे और बेदर्द समय की हकीकत को महसूस करते रहे……

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

नाउम्मीदी बनी स्थाई भाव




 उम्मीद और ख़्वाब जैसे अलफ़ाज से
नहीं दीखती कोई निजात की सूरत
ना-उम्मीदी जैसे बन गई हो स्थाई भाव
और ख़्वाब तो तब आयें जब नींद आये
ये समय किसी तरह से अपना नहीं है
पहले भी समय अपना नहीं था
लेकिन तब उम्मीद और ख़्वाब छोड़ते नहीं थे साथ
जीवन की लौ हिलती-डुलती जलती तो रहती थी
टिमटिमाती रौशनी में भी रास्ते सूझ ही जाते थे
अब घनघोर अन्धकार है
और अचानक बिजली की कौंध से
कैसे तय हो सफ़र कि चकबकियाई आँखें
भक्क से खुलती और झमक जाती हैं
अँधेरा ठोस हो जाता है जैसे कि एक दीवार
धडकनें बादलों की तरह गरजने लगती हैं
साँसों से उठता है अंधड़….


ऐसे दुर्दांत समय में खोजता हूँ ]
कोई हमनफस, कोई हमनवा
कोई रहनुमा, कोई राहबर
भूल जाता हूँ सच
कि उम्मीदों की डोर टूट चुकी है
कि उचटी नींदें ख़्वाब को खदेड़ चुकी हैं
कि जीवन की टिमटिमाती ढिबरी
हल्के से झोंके से बुझ सकती है कभी भी
याद आती है माँ और उनकी खामोशियाँ
हमेशा किसी न आने वाले का
रास्ता तकती सवालों से भरी औचक निगाहें
और मन ही मन करती स्वागत की तैयार
याद आती हैं माँ
खुलते जाते उम्मीदों के दर
समाने लगते ख़्वाब जागती आँखों में…
इसके अलावा कोई राह नहीं
इसके अलावा कोई चाह नहीं….

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

 घरेलू स्त्री की दास्तान: दो




वह कहती
पढ़ो मत किताब
मुझसे करो बात
गो, कि तुम हो बाहर 
चार लोगों मंे बैठते-उठते हो
ऐसा हो नहीं सकता
कहीं किसी से आज 
न की हो कोई बात...
वह कहती 
तुम रहते क्यों हो इतने ख़ामोश
जब घर में रहते हो
माना कि मैं तुम्हारे
मानसिक स्तर के लायक़ नहीं
लेकिन मैं क्या करूं
इसमें भला मेरा क्या दोष?
वह कहती
घर में पसरे भुतहे चुप को
बेरहमी से काटने के लिए
बात की तलवार से
गिनाती गृहस्थी की झंझटें
जो तुम्हें लगती हैं यकीनन
खामखां की बकवास,
जबकि ये उलझनें मेरे लिए 
कम नहीं किसी इम्तिहान से।
वह कहती
जब तुम नहीं होते 
तुम्हारी पसंद-नापसंद
सोचती-गुनती हूं
ताकि काम से थककर तुम
जब भी घर आओ
महानता के उच्च शिखर पर बैठे
तुम्हारे अस्तित्व को सम्भाल सकूं 
अपनी पूरी सामर्थ्य से।
वह कहती 
तुम इतने बेरूखे़ क्यों हो
चाय के वक़्त
या खाने की टेबिल पर
और निगोड़े बिस्तर पर भी
क्या मैं तुम्हारे किसी लायक नहीं?
कभी सोचता हूं
कितना अच्छा होता
अगर वह इठलाकर
हथेलियां ठुड्डी पर टिका
बड़ी-बड़ी आंखे नचाकर कहती--
‘सुनाओ, उस नई कहानी का प्लॉट
जो तुम्हारे दिमाग की फैक्टरी में
ले रही आकार 
कुछ तो सुनाओ सरकार!’
मैं उसे कैसे समझाऊं
वह मेरे लिए है कितनी ज़रूरी
चार सौ फिट गहरी 
कोयला खदान से
नमक कमाने के बाद
थका-हारा
हो जाता हूं भीतर-बाहर
एकदम खाली
उस निर्वात को भरने
दिमाग में कुलबुलाते कीड़े
जो उकसाते, प्रेरित करते
अस्तित्व की सार्थकता के लिए।
मैं क्या करूं मेरी जान
तुम्हें कैसे समझाऊं
समझौता दर समझौता 
अपनी दास्तान....


सोमवार, 24 फ़रवरी 2025

अवसर खोते हुए









बहुत आसान था 
अपनी कृतियों को
जाने-अन्जाने
पहुंचाना ऐसे मोड़ पर
जहां उगता हो आसमान पर
लाल सूरज
या अंत में नायक
तानता हो हवा में मुट्ठियां
या ठहरे पानी पर 
कंकरियां फेंक छोड़े जाते हों
उथल-पुथल के संकेत। 
एक समय था यही फैशन 
तब प्रलेसी, जलेसी, दलेसी
लेते हाथों-हाथ उसे
मिल जाता मान-सम्मान
किन्तु दुख की बात है
उस समय व्यवस्था में
सकारात्मक परिवर्तन का वह था हामी
जिससे मिली उस वक्त गुमनामी।
फिर वह समय आया जब
अभिव्यक्ति पर
लगा दिया गया ताला
मौलिक अधिकारों का किया गया हनन
फिर ऐसी बही बयार
खुले प्रजातांत्रिक द्वार
हुआ अधिनायक का अंत 
और प्रलेसी-जलेसी-दलेसी मित्रों ने
समय की नब्ज़ पर हाथ रख
धड़ाधड़ छपवाए
अपनी काल्पनिक अनुभवों वाली
आपातकालीन डायरी के अंश।
हुए खूब प्रशंसित-उपकृत।
फिर बदला माहौल
दब गया लाल-आसमानी रंग
बही भगवा-बयार
लुटा दिल का करार
सत्तानशीन हुए तुक्काड़
इतिहास की इुई चीर-फाड़
हक़ीक़तों की बखिया उघाड़
प्रलेसी-जलेसी-दलेसी मित्रों ने
फिर बदला पाला
सेठ-सत्ता-संत-समालोचकों में हुए
सहज स्वीकार्य
लोक-परलोक का हुआ पुख़्ता इंतेजाम
अब भी नहीं समझे जजमान!
और मुझ जैसे कई
समय की धड़कनों से अंजान
लोक रीति-नीति से अज्ञान
खोजते रहे सत्य
दूसरे करते रहे गड़बड़झाला
इस तरह 
लगा रहा हमारी किस्मतों पर
अलीगढ़ी-ताला.


शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2025

कई चाँद थे सरे आसमां : अनुरोध शर्मा

कुमार मुकुल की वाल से एक ज़रूरी पोस्ट :
अनुरोध शर्मा





पहले पांच पन्ने पढ़ते हैं तो लगता है क्या ही खूब किताब है... बेहद शानदार। उपन्यास की मुख्य किरदार से आपका त'आरुफ़ होता है लेकिन उसके बाद कहानी कहीं और चली जाती है। साठ-सत्तर पृष्ठ पलट जाते हैं पर वो नायिका वापस नहीं मिलती। हम उसे ढूंढते रह जाते हैं। हमें लगने लगता है कि जितनी तारीफ़ थी इस किताब की, ऐसा तो कहीं नहीं है। उतना मज़ा आ नहीं रहा।
करीब सौ पन्ने पलट जाने के बाद नायिका फिर से दर्शन देती है और इस बार हमें छोड़कर नहीं जाती। इस बार हम भी नहीं चाहते कि वो कहीं जाए। फिर बस उसी की कहानी है और कहानी में क्या रवानी है। अगले सात सौ पन्ने पढ़ते हुए आप हिंदी-उर्दू अदब का वो वक़्त जी लेते हैं जो अब शायद वापस कभी लौट कर ना आये।
हिन्द-इस्लामी तहज़ीब का वो वक्फा जब मुग़ल सल्तनत की साँसे उखड़ने लगी थी, जिस मुगलिया खानदान के अधिकतर चश्म-ओ-चराग़ इसी मिट्टी में पैदा हुए और इसी में दफ़न हुए, उसके आखिरी शहंशाह को अपने आखिरी वक़्त यहाँ की मिट्टी भी नसीब नहीं हुई थी, उसी ने ग़मज़दा होकर कहा था,
"कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए,
दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।"
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अच्छी किताबें क्यूँ पढनी चाहियें?
कभी भी देख लीजियेगा, जिन लोगों के मन में नए-नए विचार पैदा होते हैं वो किस तरह होते हैं। आप एक अच्छी फिल्म देख रहे हैं या कोई किताब पढ़ रहे हैं तो दिमाग अपना खेल खेलना शुरु करता है। हम अब तक इंसानी दिमाग की मशीनरी को पूरी तरह समझ नहीं पाये हैं पर एक शानदार चीज़ पढ़ते वक़्त दिमाग बहुत उपजाऊ हो जाता है और एक के बाद एक नई नई बातें सूझने लगती हैं, जिनका उस पढ़े हुए से वास्ता हो भी सकता है या बिलकुल भी नहीं हो सकता है।
तो जब मैं इस किताब को पढ़ रहा था जिसमें किशनगढ़ की बणी-ठणी भी है और कश्मीर के गायक भी, जिसमें दिल्ली की गलियां भी हैं और ग़ालिब के शेर भी, जौक भी हैं और दाग़ भी, ऊँचे दर्जे की फारसी शायरी है और शातिर ठग भी, नवाबों की ठसक भी है और अंग्रेजों की धूर्तता भी, आखिरी मुग़ल ज़फर भी हैं और उनकी सबसे कमसिन और तेज़-तर्रार बेगम जीनत महल भी... और इन सात सौ पन्नों में इतना कुछ है कि उसे बयान करने की ताक़त मुझमे नहीं... हाँ, लेकिन उस वक्फे को जी ज़रूर चुका हूँ मैं। जो अनुभव किया है, उसे बस अनुभव किया जा सकता है बताया नहीं जा सकता।
आप खुद पढेंगे तो जानेंगे।
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तो इस किताब को पढ़ते हुए कई सारे विचार उपजे, जिनका किताब से कोई ताल्लुक नहीं लेकिन तहज़ीब से है।
औरंगजेब दाहोद में जन्मा था, गांधी पोरबंदर में, सरदार पटेल नाडियाद में, नरेन्द्र मोदी वडनगर में....पैदाईश से ये सब गुजराती हैं। इनमे से हम किसे बाहरी मानते हैं? सिर्फ़ औरंगजेब को... और इसकी वजह उसके पुरखों का काबुल से आने से ज़्यादा उसका धर्म है। वरना बाबर की आखिरी इच्छा के मुताबिक उसे काबुल में दफनाया गया और काबुल तो सम्राट अशोक के साम्राज्य का हिस्सा था। ‘अखंड भारत’ का हिस्सा तो आज भी है। महाभारत के मुताबिक गांधारी भी अफगानिस्तान की थी।
अफगानिस्तान को तो एक वक़्त के हिंदुस्तान का हिस्सा मानना ही चाहिए, ये एक तथ्य है कोई गप तो है नहीं। तो सिवाय फिरकापरस्ती के और कोई वजह नहीं दिखती कि हम औरंगजेब या मुगलों को बाहरी मानें।
किताब में एक मज़ेदार किस्सा है कि कैसे एक अंग्रेज अफसर दिल्ली में अपनी सवारी निकलते हुए बिलकुल वैसे ही बर्ताव करता है जैसे कभी आलमगीर किया करते थे लेकिन अपनी पूरी कोशिश के बावजूद औरंगज़ेब की एक भद्दी नक़ल के ज़्यादा कुछ नहीं लग पाता। अंग्रेजों ने खुद को मुगलों के बराबर दिखाने की बहुत कोशिश की लेकिन इस मुल्क में वो कभी वो इज़्ज़त हासिल नहीं कर पाए और उसकी वजह ये है कि मुग़ल इस मुल्क को लूट नहीं रहे थे, जबकि ज़्यादातर अंग्रेजों का इस मुल्क से कभी कोई जज़्बाती लगाव नहीं रहा।
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स्कूलों के जिस इतिहास को दक्षिणपंथी एकतरफ़ा कहकर ख़ारिज करते हैं और झूठा इतिहास बताते रहते हैं मुझे तो उस इतिहास की तालीम से भी थोड़ी दिक्कतें हैं। उन किताबों की बुनावट में कमी रही या पढ़ाने वालों के नज़रिए में या हमारी आसपास के माहौल में... मुझे नहीं पता लेकिन ये बात देखी गयी कि जैसे ही अकबर या महाराणा प्रताप की लडाई का ज़िक्र आता या शिवाजी और औरंगजेब की प्रतिद्वंदिता का तो दिलो-दिमाग खुद-ब-खुद प्रताप और शिवाजी की तरफ झुक जाते। औरंगजेब और अकबर खलनायक नज़र आते। जबकि ऐसा बिलकुल नहीं होना चाहिए था।
अगर किसी का दिमाग धर्म की वजह से अकबर और औरंगज़ेब की तरफ झुक रहा है तो वो भी ग़लत है।
हमें बचपन में ही इस तरह नहीं समझाया गया कि ये लडाई ना किसी धर्म के बीच थी और ना अंदरूनी और बाहरी ताकतों के बीच। ये सदियों से चलते आ रहे सत्ता संघर्ष के अलावा और कुछ नहीं था जिसमें धर्म को भी हथियार की तरह उपयोग में लिया जाता था और आज भी लिया जाता है। आज भी कुर्सी की लडाई में धर्म एक हथियार से ज़्यादा कुछ नहीं।
जो भी ये समझते हैं कि राजा धर्म ध्वजा रक्षक होता है उन्हें थोडा परिपक्व हो जाना चाहिए। बचपन में ये सब चल जाता है कि प्रताप हमारा है और अकबर उनका लेकिन समझ विकसित हो जाने के बाद ये एहसास होना चाहिए कि ना प्रताप किसी का है और ना अकबर। ये इतिहास के मजबूत किरदार हैं जो आये और चले गए। हमें निरपेक्ष भाव से इन्हें जानना है और आगे बढ़ जाना है। उस वक़्त ना कोई धर्म के लिए लड़ रहा था और ना देश के लिए। राजनीतिक भारत का तब कोई अस्तित्व ही नहीं था। उल्टा हम बहुत पढेंगे तो जानेंगे कि ये दो मजबूत संस्कृतियाँ इस तरह घुली मिली थी कि इन्हें अलग कर पाना अब किसी के बस की बात नहीं।
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भारत हमेशा से एक विचारवान देश रहा है। गहरे फलसफे में डूबा हुआ देश। बाहर से जितनी भी छोटे मोटे आक्रमण हुए या जातियां आई, भारत ने उन सबको अपने में समेट लिया और अपना बना लिया। फिर सदियों बाद अरब के रेगिस्तान में एक बहुत बड़ा बवंडर उठा जो सबको अपने में लपेटता हुआ भारत की तरफ बढ़ा। भारत, जिसकी हैसियत एक विशाल बरगद जैसी थी उससे इस्लाम का ये बवंडर आकर भिड़ा। बरगद को उखाड़ पाना संभव नहीं था, उसकी जड़ें बहुत गहरी थी लेकिन बवंडर में भी जवानी का जोश था, वैसी उमग थी जैसे एक नए नौजवान में होती है। तो जब इन दो विशाल संस्कृतियों का टकराव हुआ तो कुछ ऐसी मिली-जुली तहज़ीब बनी जो सिर्फ़ इसी धरती पर बन सकती थी, आज भी सिर्फ़ यहीं मौजूद है। भारतीय मुसलमान अपने आप में एक अलग करैक्टर है।
मणि कौल बहुत बड़े फिल्मकार हैं, उनका कहना है कि ग़ालिब सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही पैदा हो सकते थे, कहीं और उनका होना संभव नहीं था। कैसे?
“ना था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या होता”
जावेद अख्तर इस शेर को समझाते हुए कहते हैं कि ग़ालिब कह रहे हैं कि मुझे तो इस होने ने मरवा दिया अगर मैं ना होता तो मैं ही खुदा होता।
ये खुद के खुदा होने की बात भारतीय परंपरा में उपनिषदों से आती है। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ यानी कि मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही खुदा हूँ। और किसी मुल्क का शायर ये कहने की गुस्ताखी नहीं करेगा। ग़ालिब ये भारत की धरती पर ही कह सकते थे। ग़ालिब भारत में ही हो सकते थे। भारतीय मुसलमान का चरित्र औरों से जुदा है वो इसलिए कि उसमें इस मिट्टी का चरित्र भी समाया हुआ है। ये दो तहजीबों के मिलन से संभव हुआ है।
अगर हम इस तरह इतिहास को पढ़ा पायें तो क्या ही खूबसूरत बात हो।
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किताब का नाम इस शेर से लिया गया है।
कई चांद थे सरे-आसमां कि चमक-चमक के पलट गए
ना लहू ही मेरे जि़ग़र में था ना तुम्हारी जुल्फ़ स्याह थी
- अहमद मुश्ताक़
जो तहज़ीब और इतिहास में रूचि रखते हैं (कुछ तो रखते ही होंगे) या जो इश्क़ फरमाते हैं (कौन इस शय से दूर होगा) उन सबको ये किताब पढनी चाहिए।


गुरुवार, 20 फ़रवरी 2025

फिर भी अनंत आस्थावान...


 


रहता है वो

बिना वेतन के भी जीवित
भले से भाग जाए ठीकेदार
लेकर छः-सात माह की पगार
उसे नहीं क़ानून बनाने का अधिकार
इसीलिए बलजबरी मांग नहीं सकता पगार
लेकिन फिर-फिर काम पाने के लिए
खोज लेता एक नया ठीकेदार
और बिकट आस्था के साथ जुटे रहता
हर दिन एक नई टूटन के लिए
हर दिन अंतहीन थकान की लिए
हर दिन एक नई उम्मीद के साथ.

रहता है वो
बिना वेतन के जीवित
मुंह अँधेरे बाँध कर बासी भात-चटनी
साइकिल पर आंधर-झांवर पैडल मार
पहुँच आता ठीहे पर
कितना खुश-खुश, कितना उर्जावान
जैस-जैसे बढ़ती धूप और ताप
वैसे-वैसे गर्माता जाता उसका मिजाज़
और सूरज के ढलने के साथ
बढती थकान, गूंजता थकान का गान
एक बार फिर गाँव-घर तब
थके-तन, खाली हाथ लौटने का ईनाम
फिर भी अनंत आस्थावान..

रहता है वो
बिना वेतन की जीवित
वह नहीं जानना चाहता
कि इस हाड़तोड़ मेहनत और पगार में
हैं कितनी विसंगतियां
कि इसी काम के लिए सरकारी सेवक
पाते हैं दस गुना ज्यादा वेतन
बिना नागा, हर माह, निश्चित तिथि में
वह दूसरों के सुख से दुखी नहीं होता
इसीलिए तो रात भरपूर नींद है सोता…

अपने लिए कतई नहीं चाहिए उसे
एक नया सूरज
एक नई धरती, एक नया आकाश
बस थोड़ी सी जगह में सिकुड़कर-सिमटकर
संकोच और अपार सब्र के साथ
सबके लिए बचा देता है पर्याप्त स्पेस
ताकि बची रहे आसपास
ढेर सारी आस्था और विश्वास…..

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

प्रेम के ढाई आखर से नहीं चलते बाज़ार



बाज़ार रहें आबाद

बढ़ता रहे निवेश
इसलिए वे नहीं हो सकते दुश्मन
भले से वे रहे हों
आतताई, साम्राज्यवादी, विशुद्ध विदेशी…
अपने मुल्क की रौनक बढाने के लिए
भले से किया हो शोषण, उत्पीड़न
वे तब भी नहीं थे वैसे दुश्मन
जैसे कि ये सारे हैं
कोढ़ में खाज से
दल रहे छाती पे मूंग
और जाने कब तक सहना है इन्हें
जाते भी नहीं छोड़कर
जबकि आधे से ज्यादा जा चुके
अपने बनाये स्वप्न-देश में
और अब तक बने हुए हैं मुहाज़िर!

ये, जो बाहर से आये, रचे-बसे
ऐसे घुले-मिले कि एक रंग हुए
एक संग भी हुए
संगीत के सुरों में भी ढल से गये ऐसे
कि हम बेसुरे से हो गये…
यहीं जिए फिर इसी देश की माटी में दफ़न हुए
यदि देश भर में फैली
इनकी कब्रगाहों के क्षेत्रफल को
जोड़ा जाए तो बन सकता है एक अलग देश
आखिर किसी देश की मान्यता के लिए
कितनी भूमि की पडती है ज़रूरत
इन कब्रगाहों को एक जगह कर दिया जाए
तो बन सकते हैं कई छोटे-छोटे देश

आह! कितने भोले हैं हम और हमारे पूर्वज
और जाने कब से इनकी शानदार मजारों पर
आज भी उमड़ती है भीड़ हमारे लोगों की
कटाकर टिकट, पंक्तिबद्ध
कैसे मरे जाते हैं धक्का-मुक्की सहते
जैसे याद कर रहे हों अपने पुरखों को

आह! कितने भोले हैं हम
सदियों से…
नहीं सदियों तो छोटी गिनती है
सही शब्द है युगों से
हाँ, युगों से हम ठहरे भोले-भाले
ये आये और ऐसे घुले-मिले
कि हम भूल गये अपनी शुचिता
आस्था की सहस्रों धाराओं में से
समझा एक और नई धारा इन्हें
हम जो नास्तिकता को भी
समझते हैं एक तरह की आस्तिकता

बाज़ार रहें आबाद
कि बनकर व्यापारी ही तो आये थे वे…
बेशक, वे व्यापारी ही थे
जैसे कि हम भी हैं व्यापारी ही
हम अपना माल बेचना चाहते है
और वे अपना माल बेचना चाहते हैं
दोनों के पास ग्राहकों की सूचियाँ हैं
और गौर से देखें तो अब भी
सारी दुनिया है एक बाज़ार
इस बाज़ार में प्रेम के लिए जगह है कम
और नफरत के लिए जैसे खुला हो आकाश
नफरतें न हों तो बिके नहीं एक भी आयुध
एक से बढ़कर एक जासूसी के यंत्र
और भुखमरी, बेकारी, महामारी के लिए नहीं
बल्कि रक्षा बजट में घुसाते हैं
गाढे पसीने की तीन-चौथाई कमाई

जगाना चाह रहा हूँ कबसे
जागो, और खदेड़ो इन्हें यहाँ से
ये जो व्यापारी नहीं
बल्कि एक तरह की महामारी हैं
हमारे घर में घुसी बीमारी हैं….

प्रेम के ढाई आखर से नहीं चलते बाज़ार
बाज़ार के उत्पाद बिकते हैं
नफरत के आधार पर
व्यापार बढाना है तो
बढानी होगी नफरत दिलों में
इस नफरत को बढाने के लिए
साझी संस्कृति के स्कूल
करने होंगे धडाधड बंद
और बदले की आग से
सुलगेगा जब कोना-कोना
बाज़ार में रौनक बढ़ेगी

कुंजड कसाई कहानी यू ट्यूब पर

कहानियाँ न केवल हमारे हृदय को सुकून देती हैं बल्कि साहित्यिक जगत का परिचय भी प्रदान करती हैं। बचपन से ही दादी-नानी से कहानियों को सुनते हुए हम अनेक गुणों से युक्त होते चले जाते हैं। आज भागदौड़ से भरी जिंदगी में जबकि हमारे पास बैठकर पुस्तकों से कहानियाँ पढ़ने का समय नहीं है, कहानी जगत के माध्यम से नित नई कहानियों का सुनना निश्चित ही आप को सुकून प्रदान करेगा । कहानियों के साथ अनवरत श्रृंखला में हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे श्रेष्ठ रचनाकारों की विविधता पूर्ण रचनाएँ ।आशा है आप इनसे अवश्य ही लाभान्वित होंगे । इन्हें अपने स्वरों से सजाया है सुनीता भटनागर ने। जातीय भेदभाव की परतें खोलती... एक भावपूर्ण कहानी.... अन्य कहानियाँ सुनने के लिए क्लिक करें 👇



गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

लोकल से ग्लोबल बनती कवितायेँ

 





ख़ामोशी का अनुवाद

 जब सब बोल रहे थे, चहक रहे थे

मैंने उस दिन खामोश रहके देखा 


वक़्त निकाला खुद से बतियाने के लिए

जाने कितनी बतकहियाँ थीँ

कितने किस्से थे, ख्वाब थे दरमियाँ


खुद में गुम मैं खामोश था 

मेरे इर्द-गिर्द इक शोर था

हर तरह की आवाज़ों से लबरेज़, 

कर्कश इतना कि रूह छिल जाए 


खुदा का शुक्र है मुझमें हुनर है 

इस शोर को नज़रअंदाज़ करने का 

मैं इस हुनर को बेचता नहीं हूँ

जबकि इसके खरीदार बहुत हैं


सब बोल रहे हैं और मैं चुप हूँ

खुद से बातें करने में मगन हूँ

इस उम्मीद में हूँ कि तुम तक 

पहुंच जाए अनुवाद 

मेरी खामोशी का।।।।