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Thursday, June 20, 2013

कविता में प्रेम

हिना फिरदौस की पेंटिंग
















उसने मुझसे कहा
ये क्या लिखते रहते हो
गरीबी के बारे में
अभावों, असुविधाओं,
तन और मन पर लगे घावों के बारे में
रईसों, सुविधा-भोगियों के खिलाफ
उगलते रहते हो ज़हर
निश-दिन, चारों पहर
तुम्हे अपने आस-पास
क्या सिर्फ दिखलाई देता है
अन्याय, अत्याचार
आतंक, भ्रष्टाचार!!
और  कभी विषय बदलते भी हो
तो अपनी भूमिगत कोयला खदान के दर्द का
उड़ेल देते हो
कविताओं में
कहानियों में
क्या तुम मेरे लिए
सिर्फ मेरे लिए
नहीं लिख सकते प्रेम-कवितायें...
मैं तुम्हे कैसे बताऊँ प्रिये
कि  बेशक मैं लिख सकता हूँ
कवितायें सावन के फुहारों की
रिमझिम  बौछारों की
उत्सव-त्योहारों की कवितायें
कोमल, सांगीतिक छंद-बद्ध कवितायें
लेकिन तुम मेरी कविताओं को
गौर से देखो तो सही
उसमे तुम कितनी ख़ूबसूरती से छिपी हुई हो
जिन पंक्तियों में
विपरीत परिस्थितियों में भी
जीने की चाह लिए खडा दीखता हूँ
उसमें  तुम्ही तो मेरी प्रेरणा हो...
तुम्ही तो मेरा संबल हो.....

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