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Monday, April 13, 2015

जीवन पर थोपी त्रासदी और विषमताबोध के खिलाफ कहानियां

अनवर सुहैल समकालीन हिंदी कथा जगत में एक जाने पहचाने कहानीकार हैं.
मनोज पाण्डेय 
गहरी जड़ेंउनका कहानी संग्रह है जिसमें भारतीय मुस्लिम परिवेश पर आधारित कहानियां संग्रहित है.इस बात को आधिकारिक बनाने के लिए इस संग्रह के मुखपृष्ठ पर स्पष्ट रूप से इत्तला भी दिया गया है.हिंदी पाठकों के लिए इस कहानी संग्रह का परिचय देते हुए अपरिचित संसार का अनावरणका शीर्षक भी दिया गया है.यह मान कर चला गया है कि मुस्लिम परिवेशएक अपरिचित दुनिया ही साबित होता रहा है.जबकि ऐसा नही है कि अनवर सुहैल पहली बार मुस्लिम परिवेश की कहानियां लिख रहे है.हिंदी कथा-साहित्य में शानी, राही मासूम रजा,बदी उज्जमाँ,असगर वजाहत,अब्दुल बिस्मिल्लाह,हसन जमाल,हबीब कैफ़ी अलग-अलग कद के रचनाकार रह चुके हैं और आज भी लिख रहे है.इतने लोगों के लिखने और उनको पढ़े जाने के बाद भी परिवेश का अपरिचित बने रहना हिंदी कहानियों के संवेदनशील पाठक के लिए किसी धक्के से कम नही हो सकता.इन मुस्लिमकहानीकारों से पहले प्रेमचंद की कहानियों में वह भारतीय जीवन उभरता है जिसमे मुस्लिम परिवेशके रंग भी साफ़ पहचाने जा सकते है.प्रेमचंद के कथा-साहित्य में यह परिवेश किसी विशेष हिस्से के रूप में आने की जगह भारतीय जीवन के पहलू के तौर पर ही सामने आता है.
     प्रेमचंद ने जिस समय में अपनी कहानियां लिखी उस समय तक न धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा हुआ था और न ही उस समय तक पाकिस्तानका विचार ही अपनी जड़े जमा पाया था. 1947 के बाद बंटवारे के बाद से भारत में ही रह गये भारतीय मुस्लिमों के साथ एक खास किस्म की मानसिकता ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी.  मुसलमानों को किसी एक दुसरे देश के साथ जोड़ कर पहचाने जाने की पीड़ा से नही गुजरना पड़ता था. उस समय तक उसके खाने-गाने पर दो देशों के नाम नही चिपके हुए थे.जितनी मात्रा में हिन्दू अंग्रेजपरस्त थे उतनी ही मात्रा में मुस्लिमों के मामले में भी संभावना थी.शहर-गाँव की बसावट में धर्म की  रेखाएं दीवार में नही बदली थी. शायद यही कारण रहा होगा कि अलगू और जुम्मन एक दूसरे की पंचायत करते थे और उन के निर्णय भी दोनों सहजता से स्वीकार भी करते थे. संग्रह के शीर्षक गहरी जड़ेंनामक कहानी का मुस्लिम पिता का मनोसंसार बाबरी’,‘गोधराऔर ग्यारह सितम्बरहोने से पहले ही पुख्ता तौर पर निर्मित हो चुका था.अपने मनोसंसार में पंच-परमेश्वरवाले खाद-पानी के कारण ही उनके भीतर अपने पुराने मुहल्ले में बसेरहने जिद ने गहरी जड़ें जमा ली हैं.उनकी यह जिद अपने समय के अधेरों के खिलाफ रौशनी की जिद बन पाठक को भारतीय समाज के प्रति आश्वस्त करती है.अपनी इस आश्वासन की बिना पर यह कहानी इस संग्रह की विशिष्ट कहानी का दर्जा पाती है.
  एक अच्छी कहानी अपनी पूरी बुनावट में अपने लिखे जाने के कारण की ओर साफ़ इशारा करती है.अनवर की अधिकांश कहानियों में ये इशारे इतने साफ़ तौर पर आते है कि उन इशारों को हम ब्यौरे की तरह देखने लगते है.नीला हाथी’,’ग्यारह सितंबर के बादऔर दहशतगर्दनामक कहानियों में हमे इसकी तफ्शील मिलती है.दहशतगर्द कहानी के मूसा के आतंकवादी में तब्दील होने की प्रक्रिया को इन्ही ब्योरों के साथ देखा-समझा जा सकता है.पहले-पहल इस नगर में एक ही मन्दिर था,देवी माँ का मन्दिर,फिर जब यहाँ मारवाड़ी आकर बसे तब नगर के मध्य में भव्य राम-मन्दिरबना,जिसके प्रांगण में सुबह-शाम शाखाएं लगने लगीं.
  पहले यहाँ एक छोटे कमरे में मस्जिद बनी, फिर देखते-देखते इस नगर में तीन मस्जिदें, दो ईदगाह,एक कब्रस्तान, एक मजार बन गई.
  ...........................................आर्थिक उन्नति के साथ धर्म,आस्था,विचार,आदर्श,संवेदना और शिक्षा का व्यवसायीकरण किस तेजी से होता है,इसकी प्रत्यक्ष मिसाल यहाँ देखी जा सकती है.इन ब्योरों की बानगी हमे हर शहर और कस्बों के साथ इतनी ही शिद्दत के साथ घटती दिखाई देती है.यह कहानी हर शहर-कस्बें की कहानी बन जाती है.मूसा के आतंकवादी बन जाने या बना दिए जाने  के बाद भी गनीमत है कि  हमारे आसपास ईसा मियां  और पहले वाले मूसा कम नही हुए हैं.यह कहानी मूसा को बदलने में भागीदार लोगों की साजिशों को बेपर्दा करने वाली कहानी है.यह बेपर्दा करने वाली कहानियां  हमे किसी अगले मूसा को आतंकवादी बनने और बनाने की प्रक्रिया से जूझने की ताकत से भरने का काम भी करती जाता है.जबकि ग्यारह सितंबर के बादका अहमद इससे पहले छह दिसंबरभी झेल चुकने की निरन्तरता को सह नही पाता और घनघोर-नमाजीबन जाता है.उसके इस बदलाव के पीछे इन दोनों घटनाओं के असर से कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका इन दोनों घटनाओं के बीच उसके साथ रोजमर्रा के जीवन में होने वाली घटनाएँ और व्यवहारों ने निभाई हैं.अयोध्या और अमेरिका दोनों अहमद से दूर है पर उसके आसपास के लोग हमेशा उसके आसपास हैं. मुझे एक मुसलमान क्यों समझा जाता है,जबकि मैंने कभी भी तुमको हिन्दू वगैरा नही माना. मुझे एक सामान्य भारतीय शहरी कब समझा जायेगा?” अहमद का यही दर्दउसको भीतर तक डरा देता है.एक मुसलमानमें बदलते अहमद के रूप में भारतीय समाज-संस्कृति का डरा-सहमा और कमजोरहोता चेहरा हमारे सामने आ खड़ा होता है.    
   अनवर परिवार और उसके संबंधों की भी कहानियां लिखते है और अच्छी लिखते हैं.नसीबन’,’चहल्लुमशीर्षक कहानी तो पूरी तरह परिवार के भीतर की कहानी हैं.पुरानी रस्सीको भी इस दायरे में शामिल माना जा सकता है.इन कहानियों के माध्यम से पारिवारिक रिश्तों के तनावों से रूबरू होता है. इन कहानियों के पात्रों का नाम आप जिस परिवेश की छाह देने वाले रखगें  यह कहानियां भी उसी परिवेश की हो जाएँगी.इस तरह की कहानियां हमारे पारिवारिक ढांचे को ढकने वाले धार्मिक आवरण को उघाड़ कर पूरे भारतीय  सामाजिक तानेबाने की विसंगतियों को सामने लाती है. हमारे यहाँ ऐसा नही होता या होता हैके दावों की भुरभुरी नीवं को खोद कर नेस्तनाबूद कर देती हैं.रिश्तों के भीतर मार्मिक स्थितियों को पहचानने और उन्हें प्रभावी कलेवर में प्रस्तुत करने में भी अनवर सुहैल  सफल रहे है.इस लिहाज से नसीबनएक बेहद सफल कहानी है.नसीबन एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो स्त्री-जीवन की विपरीत और त्रासद स्थितियों के खिलाफ मजबूती से खड़ी होती है,लडती है,अपने दायरे में जीतती भी है. वह पाती है कि  एक उस जैसी एक दूसरी स्त्री उन्ही विपरीत और त्रासद स्थितियों के चंगुल में फंसी हुयी है और उस दूसरी स्त्री के व्यवहार में उसका एहसास दूर दूर तक दिखाई नही देता. इस सच से नसीबन को गहरा धक्का लगता है.कहानी का अंतिम अंश है नसीबन की आँखें बंद थीं./एक बम सा फटा उसके कानों के पास! जुम्मन’/काश!उसने अपने कान भी बंद कर लिए होते.इस तरह नसीबन दूसरी स्त्री के जीवन-स्थितियों के त्रासद सच से अपने आप को एकाकार महसूस करती है.नसीबन के साथ कहानी का पाठक भी भीतर तक हिल जाता है.
    ‘नीला हाथीऔर पीरू हज्जाम उर्फ़ हजरतजीकहानी धर्म के आडम्बर और विसंगतियों का कथात्मक रूप प्रस्तुत करती है.अपनी विषयवस्तु में प्रभावी होने के बाद भी इन कहानी का पूरा ढांचा बहुत हद तक तय फार्मूले और टूल के  इस्तेमाल से खड़ा किया हुआ लगता है.इन दोनों कहानियों में धर्म का आडम्बर रचने और उसे अपने लिए फायदेमंद बना लेने का काम करने वाले पात्र मुस्लिम समुदाय के अशराफ या पसमांदा तबके से ताल्लुक रखने वाले हैं.कहानीकार ने इस तथ्य को दोनों कहानियों में दर्ज भी करता है.एक कहानी के शीर्षक से ही इस बात की पुष्टि हो जाती है. अब मामला ये बनता है कि धर्म के पूरे जालताल पर किस तबके का वर्चस्व बना रहता है,उस ओर न तो इशारा करती है और न ही इन पात्रों के व्यक्तित्व को इस तरह से विकसित होने में उस तबके की मानसिकता का असर ही पकड़ा गया है.इसके बावजूद दोनों कहानियों को पढने में  पाठक कहानी का पूरा रस ले सकते है.
    ‘फिरकापरस्त’,’कुंजड-कसाई’,’और फत्ते भाईइन तीन कहानियों में मुस्लिम परिवेश के परत दर परत खांचों के दबावों और विषमता-बोध को केंद्र में रखा गया है.इन कहानियों में दर्ज हुआ मुस्लिम परिवेशअपने ही धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ साबित होता है फिर भी मजबूती से अपना वजूद कायम रखे है. यह भारतीय परिवेश का कारुणिक प्रभाव है जिससे कोई भी धर्म नही बचा हुआ है.कहानी संग्रह की भूमिका में जिस अपरिचित संसार का अनावरणकरने की बात की गई है वह इन्ही तीन काहनियों से मुख्यतः जुडती हैं.इन तीनों कहानियों का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि इन तीनों कहानियों के पात्र अपने जीवन पर धोपी त्रासदी और विषमताबोध के खिलाफ सार्थक संघर्ष के रास्ते पर चलते है.एक कहानीकार के तौर पर अनवर सुहैल अपनी सभी कहानियों में संवेदनशील और सचेत रूप में सार्थक संघर्ष के प्रति अपनी गहरी आस्था और विवेक की पक्षधरता का निबाह किया है और यही निबाह किसी भी रचनाकार अंतिम देय साबित होती है. 

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