सोमवार, 26 जनवरी 2026

बेटियां

 

अब बेटियां भागती नहीं
 
अब बेटियां भागती नहीं
और न ही भगाई जाती हैं
बेटियां अब खुशी - खुशी
चली जाती हैं गांव से कस्बों में
कस्बों से शहर फिर महानगरों में
इतना कमाने के लिए इज़्ज़त से
कि रहने का खर्च निकल जाए
खाने और आने-जाने का किराया भी
मोबाइल रिचार्ज और वाई फाई के दाम
ये सब पेमेंट के आधे में निपटे
और इतनी ही राशि बैंक में बच जाए
बेटियां बड़े लगन से निपटाती हैं काम
कि खुश रहें कलीग और संस्थान
आजीविका की जंग लड़ते-लड़ते
वे टालती जाती हैं शादी के प्रश्न
वैसे वे जानती हैं मां पिता भाई के सवाल
कितने बेमानी हैं कि उनके पास
नहीं है कोई विकल्प सिवाय इसके
कि हर माह वह भेजती रहे पैसे
चलता रहे घर द्वार, कि छोटी बहन भी तो
हो गई विवाह योग्य, वह कहती तो
आँखें नम हो जातीं माँ पिता की
बस इतना कहते - "तू ठीक कहती है बेटी "
अब बेटियां भागती नहीं
बल्कि परिवार को संभाल कर
जिम्मेदार हो जाती हैं।।।


गुरुवार, 15 जनवरी 2026

हम उन्हें जानते हैं




हम जिन्हें जानते हैं
क्या वाक़ई हम उन्हें जान पाते हैं
बस, इतना ही काफ़ी नहीं होता

हम उनसे मिलें हों या न मिले हों
भावनाओं की नदी क्या सही में नदी नहीं होती
दिल की गहराइयों से किया प्यार क्या
ज़माने को ज़ाहिर होना चाहिए या उस प्यार को
क्षितिज के काल्पनिक स्थल पर
कील से किसी तस्वीर की तरह टांग देना चाहिए

हम हर चाहने वाले के प्रति
दिल से आभारी होते हैं
शुक्रगुज़ार रहते हैं और कुछ न कुछ
चाहते हैं देते रहना बेज़रूरत भी
यह कोई कर्ज़ नहीं है जिसे चुकता करना होता है
इसे हम हैसियत से बढ़कर करना चाहते हैं अदा

क्या यह कोई ज़रूरी शर्त है इस रिश्ते की
या इस बेनाम से रिश्ते को
कोई नाम देना हमारी मजबूरी है

तुम नाहक चिंता करते हो
हम बिना कुछ जताए
बिना कुछ पाए
बहुत कुछ गंवाकर भी
इस रिश्ते को बचाकर रखेंगे
इस तरह कि कोई जान भी न पाए
रिश्ते को बुरी नज़र न लग पाए।।।।

मंगलवार, 13 जनवरी 2026

डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास

 डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास 

अनवर सुहैल



 

 

विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है. यह 2007 से मनाया जा रहा है. इसका अर्थ ये हुआ कि दुनिया में इस व्याधि के बारे में बहुत बाद में जागरूकता आई. इसके पूर्व इस डाउन सिंड्रोम को लोग छुपा लिया करते थे. 

अब दुनिया भर में जो प्रयास किये जा रहे हैं उसके कारण डाउन सिंड्रोम से ग्रसित लोगों को अब बीमार या सामाजिक रूप से त्याज्य नहीं माना जाता है. डाउन सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जिससे ग्रसित व्यक्ति को सारे समाज से स्वीकार्यता मिलनी ही चाहिए. डाउन सिंड्रोम जिसे ट्राइसोमी 21 के नाम से भी जाना जाता है, डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति के पास एक अतिरिक्त गुणसूत्र (क्रोमोसोम) या गुणसूत्र का एक अतिरिक्त टुकड़ा होता है। यह विभिन्न शारीरिक और संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) समस्याओं को जन्म देता है, जिसमें विकास में देरी, बौद्धिक अक्षमताएं, चेहरे की विशिष्ट विशेषताएं जैसे कि तिरछी आंखें और एक सपाट नाक एवं हृदय दोष और थायराइड की समस्या आदि शामिल हैं।  डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, कई लोग उचित समर्थन और संसाधनों के साथ पूर्ण जीवन जीते हैं। प्रारंभिक हस्तक्षेप कार्यक्रम और समावेशी (इन्क्लूसिव) शिक्षा उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है और उन्हें समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।

हिंदी साहित्य में इस विषय पर लिखा ही नहीं गया है. मुक्तिबोध ने कहा था कि हमारे समय में विषयों की कमी नहीं है फिर भी हमारा उपलब्ध हिंदी साहित्य नए और चैलेंजिंग विषयों पर क्यों नहीं लिखता है? उस पर तुर्रा ये कि साहित्य के तथाकथित मठाधीश हिंदी में नोबल पुरुस्कार पाने की लालसा भी पाले रहते हैं. कोई साहित्य तभी बहुआयामी होता है जब वह समाज के हर कोने की पड़ताल करता है और खासकर उस समाज के हाशिये पर पड़े लोगों की समस्याओं को भी मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें करता है.

डाउन सिंड्रोम विषय पर छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी संजय अलंग ने एक उपन्यास  "चलो साथ चलें" की रचना की है. इसके पूर्व संजय अलंग ने इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक किताबें लिखी हैं. उनके तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित और चर्चित हैं. कथा या उपन्यास लेखन क्षेत्र में यह उनका पहला कदम है और विश्वास नहीं होता है कि इतना सुगठित और सहज उपन्यास पहली बार का प्रयास है. 

अपने व्यस्ततम सेवा काल में संजय अलंग को भारत के माननीय राष्ट्रपति जी द्वारा दिव्यान्गजनों और वृद्धजनों के लिए किये गए विशेष कार्यों के लिए पृथक पृथक वर्षों में सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.  

संजय अलंग की चिंताओं को समझने के लिए हमें उनकी कविताओं को भी उतना ही समझना होगा. उनके चयनित विषयों में कवि के भीतर,  पंक्ति  अंतिम व्यक्ति तक पहुँच पाने की ललक है, बेचैनी है.   संजय अलंग के पास संवेदना की अपनी अर्जित भाषा है, जिसके सहारे वह अभिव्यक्ति की चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और ऐसे वितान रचते हैं कि साधारण से साधारण जन तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं. 

"चलो साथ चलें' उपन्यास यदि कोई दूसरा हिंदी लेखक लिखता तो इसे दर्द और कराह का एक मूर्त रूप बना देता किन्तु संजय अलंग, दिलो-दिमाग में छाई बेचैनियों को प्रताड़ना के लसलसे प्रवाह में नष्ट नहीं होने देते हैं बल्कि वह एक राह तलाशते जाते  हैं जिससे समस्या को समझा जा सके और उसके निदान का सहज सकारात्मक प्रयास किया जा सके. यह एक चिकित्सक के परामर्श की तरह है न कि किसी कथावाचक  के करुण रूदन की गूँज है. 

मर्सी और नलिन के प्रथम  शिशु सन्नी के जन्म की कहानी है "चलो साथ चलें".  जब उनके परिवार को ज्ञात होता है कि उनकी बिटिया सन्नी सामान्य बच्ची नहीं है बल्कि उसे डाउन सिंड्रोम है तब मर्सी और नलिन के जीवन में जैसे कोई अप्रत्याशित हमला सा होता है. मर्सी और नलिन के परिजन भी इस वज्रपात को झेलने की कोशिशें करते हैं.  यहीं से बेचैनियों को दूर करने की राह तलाशने में लग जाते हैं. मर्सी का जन्म एक सामान्य डिलीवरी से हुआ था. हाँ, गले में नाल फंसने से डॉक्टर को फोरसेप्स की सहायता लेनी पड़ी थी. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इससे कोई घातक रोग नहीं होता है किन्तु शुरू में मर्सी और नलिन को यही लगा कि नवजात बिटिया सन्नी के जीवन में जो असामान्यता है उसके पीछे गले में नाल फंसने के कारण तो नहीं हुई है?

नवजात शिशु को प्रथम बार मर्सी ने देखा तो "उसे यह रूप रंग थोडा अलग हट कर लगा. उसने गौर किया तो फीचर भी अलहदा से लगे. गोल सी नाक, फूला और गोल चौड़ा चेहरा, मचमचाती हुई सी छोटी आँखें. मर्सी को कुछ अजीब तो लगा पर अभी वह ममत्व में डूबी अच्छा महसूस कर रही थी और मातृत्व का आनंद ले रही थी." (पृष्ठ 21)

मर्सी के पति नलिन के पैर में एक छोटे एक्सीडेंट के कारण प्लास्टर चढ़ा था, मर्सी और शिशु से मिलने के लिए वह भी बेचैन थे और डॉक्टर से परामर्श लेकर जबलपुर से नागपुर आने के लिए गाडी बुक कर ली गई थी. मर्सी की सास ने जब सन्नी को देखा तो काफी प्रसन्न हुईं --" बहुत गोरी और प्यारी है." 

लेकिन कुछ देर बाद नलिन की माँ ने कहा--"बच्ची की आँखें ज्यादा हेज़ी हैं. धुंधली सी, ब्राईट नहीं हैं. डल हैं. अलग तरह का इफेक्ट दे रही हैं. फीचर भी बहुत अलग से हैं. भारीपन तो हैं ही, आकार भी फैला सा है. नलिन तुम भी ज़रा ध्यान से देखना."

यहीं से शुरू होती है एक नवजात शिशु के कारण उत्पन्न हुई नई समस्या की. यह समस्या इस परिवार भर की नहीं थी बल्कि यह एक ऐसी बात थी कि जिसे समाज बड़े अविश्वास से कहता रहता है -"ऐसा मेरे साथ क्यों ?" या "हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?" यह ऐसा सवाल है जो बड़े-बड़ों के आत्मविश्वास को हिला के रख देता है. परिवार में सब्र करने का जज़्बा न हो तो फिर समस्या बड़ी विकराल हो जाती है. मर्सी और नलिन की सन्नी पहली संतान है. मर्सी और नलिन के माता-पिता ने इस पूरे समय में बड़ी शालीनता के साथ प्रसूति को सर-आँखों पर बिठाया. हर तरह कि चिकित्सकीय परामर्श का अक्षरशः पालन किया. फिर ऐसा क्यों हुआ वे इस घटना को जस्टिफाई नहीं कर पा रहे थे और एक अनोखे दुःख की गिरफ्त में फंसते चले जा रहे थे. 

इस विषय पर उपन्यास की रचना करना एक चैलेंजिंग कार्य है. इसमें समस्या के प्रतिरूप शिशु की दयनीयता, शिशु के रिश्तेदारों का अरण्य-रूदन, समाज की नकारात्मकता  से प्रसंगों का वितान नहीं बुना गया हैं बल्कि संजय अलंग की लेखनी से डाउन सिंड्रोम से प्रभावित शिशु और उसके परिजनों के दुखों को तो शिद्दत से लिपिबद्ध किया है. इस जटिल स्थिति में शिशु के माता-पिता, अन्य रिश्तेदार और समाज की वास्तविकता से एक साथ कथाकार संजय अलंग भी जूझते हैं और "चलो साथ चलें" की गुहार के साथ एक नई राह खोजते जाते हैं. 

सर्वप्रथम इस परिस्थिति में नवजात शिशु के सभी परिजन एक साथ खड़े होते हैं. बच्ची की स्थिति के लिए हिन्दुस्तान में उपलब्ध चिकित्सा और चिकित्सा पद्धति को आपसी परामर्श से तलाश करते हैं. जबलपुर, नागपुर और मुंबई तक शिशु के लिए बेहतर उपचार की जो व्यवस्था है उसे अंगीकार करते हैं. नागपुर के डॉक्टर ने कह दिया था कि शिशु सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है. मर्सी और नलिन ने जबलपुर के डॉ कुंडू को भी बिटिया को दिखलाया. डॉ कुंडू ने कहा---"देखिये नागपुर में भी डॉक्टर का मत सही था. सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही हैं."

फिर वे लोग मेडिकल कालेज में डॉक्टर लवली मेहरा को भी दिखलाया. डॉ मेहरा ने सामान्य चेकअप के बाद महत्वपूर्ण बात कही---"डाउन सिंड्रोम ही है. अब आप सन्नी को इसी तरह देखना प्रारंभ करें. उसके लिए आगे क्या और कैसे करना है, यह देखें. इसके साथ अनुकूल हों. शॉक और गिल्ट से आप लोगों को बाहर आना होगा. समाज में मूव्ड करें तो सहजता बढ़ेगी."

हिम्मत और धैर्य से काम लेने की सीख मिली. यह सच है कि समाज इसके लिए तैयार नहीं है, इसलिए मित्रों, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों कि बातों पर ध्यान नहीं देना ही उचित होगा. 

दंपत्ति को जब यह खबर मिली कि मुंबई में कोई एक विदेशी डॉक्टर हैं जो इस तरह के मामलों में बेहतर दखल रखते हैं, तब नलिन और मर्सी ने सन्नी को लेकर मुंबई पहुंचे. डॉ कोसिमो ने भी बतलाया कि सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है और वे सन्नी के इलाज के लिए योजना बना रहे हैं. काफी महँगी विदेशी दवाएं मंगवा कर सन्नी का इलाज किया गया और साथ ही फ़िजिओथेरेपी के ज़रिये मरीज़ के दिमाग और शारीर की सामान्य क्रियाओं को कुछ बेहतर एक्टिव रखने और विकसित करने के लिए विभिन्न तरह की थेरेपी की भी ज़रूरत पूरी करने के लिए डॉक्टर के परामर्श से अणिमा मुले का पता भी मिल गया. 

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथानक के अलावा डाउन सिंड्रोम से लड़ने के लिए एक पथ प्रदर्शक गाइड की तरह है. घटनाक्रम से गुज़रते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उपन्यास में वर्णित "की वर्ड्स" को गूगल में सर्च किया जा सकता है इतना वास्तविक वर्णन है कि संजय अलंग ने वाकई इस उपन्यास की संरचना के लिए छोटी से छोटी डिटेल को भी मिस नहीं किया है. 

डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे को सामाजिक मान्यता दिलाने और ऐसे अभिभावकों को भी घरों से निकालना जो अपने घरों में ऐसे बच्चों को छुपा कर रखते हैं. लोकलाज और मर्यादा जैसी रुढियों के चलते ऐसे अभिभावक बड़े शातिर तरीके से अपने डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों को मुख्यधारा से अलग रखते थे. नलिन और मर्सी के सद्प्रयासों ने ऐसे गुम किये गए बच्चों को डाउन सिंड्रोम प्रबंधन जैसी संस्थाओं की देख-रेख करने के लिए बाहर निकाला. उपन्यास का सूत्र वाक्य है --"सार्थक जीवन की आदत पड़ जाने पर सकारात्मक प्रयास भी सहज ढंग से सूझते हैं,"

इस बीच मर्सी पुनः गर्भवती होती है. सन्नी की असामान्य दशा के कारण मर्सी चिंतित थी और वे लोग यह चाहते थे कि गर्भ में पल रहा भ्रूण कहीं डाउन सिंड्रोम का शिकार तो नहीं है? ऐसा परिक्षण मुंबई में होता है. मुंबई से रिपोर्ट आई कि स्थिति सामान्य है लेकिन गर्भावस्था के अंतिम चरण में मर्सी को गर्भपात की स्थिति से गुज़रना पड़ा जिससे वह परिवार बुरी तरह से टूट गया था. 

जबलपुर के डॉक्टर राधा होतवानी से जब वे मिले तो उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में उनका सुझाव है कि मर्सी पुनः शीघ्र ही कंसीव करने का प्रयास करें वर्ना आगे जाकर काम्पिल्केशन बढ़ने के चांस हैं. नलिन और मर्सी ने सन्नी का प्रवेश नागपुर के सर्व-उदय विद्यालय में करा दिया. यहाँ मर्सी बच्ची के साथ विद्यालय जाने लगी और डाउन सिंड्रोम बच्चों को सिखाये जाने वाली गतिविधियां दोहराती और इससे सन्नू कि प्रगति भी अच्छी होने लगी थी. नागपुर में मर्सी एक बार पुनः गर्भवती हो गई. इस बार उन लोगों ने गर्भस्थ शिशु का डाउन सिंड्रोम टेस्ट नहीं करवाया. 

मर्सी ने एक स्वस्थ कन्या शिशु को जन्म दिया. उनके अन्दर एक नया उत्साह भी पैदा हुआ और दंपत्ति ने नए शिशु  के साथ डाउन सिंड्रोम ग्रसित सन्नी की उत्कृष्ट देखभाल शुरू कर दी. मर्सी ने सन्नी के नाम से मिलती जुलती एक संस्था बना ली जिसे नाम दिया गया--"राइजिंग सन डेवलपमेंट सेंटर". 

डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों के सर्वांगीण विकास की राह आसान होने लगी. हिन्दुस्तान में इस तरह की गतिविधियाँ एकदम नवीन थीं और मर्सी की ज़िद ने उनकी तमाम कोशिशों को समाज के लिए सहज स्वीकार्य बना दिया था. जो अभिभावक अब तक अपने बच्चों को समाज की निगाह से छुपा कर रखने के लिए अभिशप्त थे उनके लिए मर्सी और नलिन की उर्जावान पहल ने नई राह बनाई. 

आगे जाकर मर्सी ने सन्नी के साथ सिंगापूर में विशेष प्रशिक्षण के लिए चयन हो गया. इसमें मर्सी को सन्नी के साथ सिंगापूर आने का प्रस्ताव भी दिया.

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथा नहीं है बल्कि डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चों के उच्च स्तरीय प्रबंधन की एक पथ प्रदर्शक भी है. 

संजय अलंग के इस उपन्यास का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी साहित्य में लीक से हटकर लिखी गई कथा है ये जिसे समावेशी सोच के साथ एक नई राह तलाशने का प्रयास किया गया है.





कृति : चलो साथ चलें   लेखक : संजय अलंग 

पृष्ठ : 144  मूल्य : 250

प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, C-515, बुद्धनगर, नई दिल्ली 110012

मो 8750688053




मंगलवार, 6 जनवरी 2026

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

  समीक्षा

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी : अनवर सुहैल









शुक्ला चौधुरी एक सम्वेदनशील कवि हैं और इन्होनें कहानियां भी लिखी हैं। उपन्यास विधा में उनकी यह पहली प्रस्तुति है किन्तु किसी भी तरह पहली कृति नहीं लगती। इसे उपन्यासिका भी कहा जा सकता है। रमेश बक्षी, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम के छोटे कलेवर के उपन्यासों जैसा सशक्त कथानक और पद्यमय-गद्य की अद्भुत बानगी है ‘इश्क़’। उपन्यास के शीर्षक से यह आभाष होता कि इस उपन्यास में प्रेम-प्रसंगों की बात होगी लेकिन चट्टानों में फूल खिलने की घटनाएं होती हैं तो सभी अचंभित होते हैं। कथानक में नवीनता न भी हो तो लेखक की शैली पाठकों को एक नया आस्वाद कराती है। इश्क़ पढ़ते हुए यही आभाष होता है। उपन्यास का पाठ शुरू करते ही पाठक कथारस का आनंद उठाने लगता है। बहुत सी बातें इस तरह से बयान की गई हैं कि पाठक अचम्भित हो जाता है। 

कस्बाई या ग्रामीण परिवेश में अब भी पुरूष-वर्चस्व और सामंती शोषण के अवशेष नज़र आते हैं। खै़र शहर भी कहां इन जंजालों से आज़ाद हैं। ऑनर-कीलिंग की घटनाएं सर्वत्र देखने को मिल ही जाती हैं। लेकिन इश्क़ के कथानक के जादू का केन्द्र-बिन्दु सामंत की स्त्री सुमित्रा का चरित्र है। सामंती मूल्यों की जंजीर में कैद सुमित्रा मुक्ति की छटपटाहट में किस तरह शनैः-शनैः अपने अंदर की शक्ति को पहचानकर जगाती है और मुक्ति की राह निकालती है। 

छोटे-छोटे वाक्यों से सजी उपन्यास की शैली पाठकों को कथा-प्रवाह को रोमांचित करती है। यथा आप पाठ के प्रवेश में ही जो वाक्यांश पाते हैं वह कितना सहज और सरस है--‘‘आकाश का चांद खिला पूरा, पीतर की थाली बराबर। चांदनी में नहा उठा जंगल। चांद से चूंई-चूंई कर झरने लगा अमृत। फागुनी, बल्ली के कंधे से झूल गई।’’ शहरी प्रदूषण से दूर एक आदिवासी गांव का चित्रण कितना मनोहारी है। ऐसे ही किसी माला में मोती की तरह गुंथे हुए शब्दों का अद्भुत चमत्कार है उपन्यास ‘इश्क़’। 

बल्ली गांव का एक दलित बूढ़ा है। वह सूरदास भी है। फागुनी उसकी बेटी है। सामंत ठाकुर मेवालाल का नौकर है कोंदा। गांव में तुतलाकर बोलने वाले को कांदा कहा जाता है। कोंदा एक अनाथ आदिवासी किशोर है। सामंतों के टुकड़ों पर पलता है। सामंतों की देह-मालिश से लेकर उनके अन्य क्रियाकलापों में सेवकई करता है। गांव में दलितों का जीवन कष्टप्रद है। सामंतों को इन दलितों की ज़रूरत पड़ती है गंदगी, मल-मूत्र या पाखाना की नाली साफ करने के लिए। सामंतों द्वारा दलितों की स्त्रियों का भोग करना सामान्य घटनाएं हैं। सामंतों की स्त्रियां या तो अपने पति का साथ देती हैं या फिर मूक दर्शक बनी रहती हैं। गांव के सामंत की पत्नी सुमित्रा देवी किन्तु ऐसी नहीं है। उनके मन में मानव जाति की मर्यादा का सम्मान है। 

यह सच है कि कोंदा मन ही मन फागुनी पर आसक्त है। अपनी प्रीत का इज़हार वह ठकुराईन के दिए अन्न यथा गुड़-चना आदि की भेंट फागुनी को देकर करता है। फागुनी अवयस्क लड़की है। कोंदा बल्ली चमार को बुलाने आया है कि ठकुराईन ने बुलावा भेजा है। ठाकुर का पाखाना जाम हो गया है। कोंदा बल्ली को पटाने के लिए बोलता है--‘‘पांच दिन का राशन-पानी घर पहुंचा दिही, कहत रहीन ठकुराईन।’’ गांव में श्रम का मूल्य इसी तरह अन्न से किया जाता है। 

अंधा बल्ली जानता है कि फागुनी पर डोरे डालता है कोंदा इसलिए वह कांदा को फटकारकर भगा देता है--‘‘खबरदार जो पांव भीतर रखा।’’  

‘‘अंधे काका की कितनी आंखें, कोंदा जाते-जाते सोचने लगा।’’ 

जब बल्ली रात में सामंत के घर जाने से मना कर देता है तब सुमित्रा देवी स्वयं दलितों की बस्ती जाती है क्यांकि उनके घर में एक कार्यक्रम होना है जिसमें बहुत से मेहमान आने वाले हैं। यदि पाखाना जाम रह गया तो कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और जो बदनामी होगी सो अलग। ठाकुुर मेवालाल से जब सुमित्रादेवी ने बल्ल्ी के इंकार के बारे में बताया तो सुमित्रादेवी का बेटा सुखविंदर बोल पड़ा--‘‘साला बड़ा भाव खाने लगा आजकल...जाकर टेंटुआ दबा दूं क्या अम्मा या बाबू कहें तो झोपड़ी में आग लगा दूं, एक मिनट लगेगा।’’ 

इस सम्वाद के पीछे दलितों के प्रति सवर्णों को मन को सरलता से पढ़ा जा सकता है। सदियों से दलितों के प्रति यही भाव रहा है सामंतों के मन में। आज़ादी के इतने बरसों बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है। बेटे के गर्म खून को पिता यह कहकर शांत करता है--‘‘यह वक्त नाराज़गी का नहीं है बेटा, धीरज रखना जरूरी है। समय हमारे हाथ में नहीं रहा बेटा, नही ंतो बल्ली की यह मज़ाल!’’

शुरूआती तीन पृष्ठों में उपन्यास की पृष्ठभूमि समझी जा सकती है जिसे बिना किसी खींचतान के सहज सम्वाद के माध्यम से शुक्ला चौधुरी ने प्रस्तुत किया है। दृ

चमार टोले का वर्णन भी हमारे समय का कटु यथार्थ है। इसके लिए शुक्ला चौधुरी की काव्यमयी भाषा का चमत्कार देखें--‘‘पत्थरों के बदन को जख्मी कर बसाए गए डोम और चमारों के कुछ घर।’’

हर तरह की नागरिक आवश्यकताओं से उपेक्षित परछाईंनुमा लोगों की बस्ती का अद्भुत चित्रण है यहां। सामंतों की चाकरी करना और वनोपज इकट्ठा करना इन गरीबों का काम है। अधिकतर अधपेटे सोना इनका नसीब है। जंगल जाकर महुआ के फूल चुनने का शगल कई दिनों तक चलता है। इस महुआ के बदौलत औरतें सिंगार सामग्री यथा झुमका, बिंदी, चूड़ी आदि खरीदती थीं। 

मुंह अंधेरे ठकुराईन बल्ली चमार के घर आ पहुंचती है। उसके साथ नौकर कोंदा भी है जो झोला भर सामान उठाए है। ठकुराईन सुमित्रादेवी छिपकर बल्ली के घर आई है कि बल्ली जाम पाखाना आकर खोल दे और अन्य सफाई का काम कर दे। 

सुमित्रादेवी भूल चुकी है अपना अतीत। स्त्री-विमर्श पर जाने कितनी बातें की जाती हैं किन्तु शुक्ला चौधुरी ने पुरूष सत्तात्मक समाज में स्त्री की उपस्थिति के औचित्य और उसकी अपनी स्वतंत्रता पर चंद शब्दों में ही काफी बातें कह दी हैं। ठकुराईन बल्ली के घर से जैसे ही अपने घर पहुंची उसने देखा कि --‘‘ठाकुर मेवालाल दरवाज़ा छेंक कर खड़ा है। ठकुराईन धक्का नहीं संभाल पाई और चौखट पर सर के बल गिर गई। कपार की बांई ओर से एक धार बह निकला जो बांई आंख के कोर को भिंगोता हुआ गले से होकर सफेद चादर पर गिरने लगा टप-टप-टप।’’ यही है स्त्रियों के जीवन की विडम्बना, उनकी अस्मिता और बेचारगी से भरा अस्तित्व। 

दलितों के घर फागुनी जैसी रूपवती कन्या का होना आश्चर्य है। बल्ली की घरवाली जमनी अचानक एक दिन गायब हो गई। जमनी दीनदयाल मेहतर की बेटी थी जो घर से भागकर आई थी और जिसे बल्ली ने ब्याहता बनाकर रख लिया था। उसी जमनी पर सामंत मेवालाल की कुदृष्टि थी। सुमित्रा देवी को शक था कि जमनी का अपहरण ठाकुर ने किया है। उसने एक रोज ठाकुर से पूछ ही लिया--‘‘कहां थे जी रात भर इस दुरजोग में।’’ 

तब ठाकुर ने ऐंठ कर जवाब दिया था--‘‘मैं शिकार पर गया था सुन ले, आज भी जाउंगा और कल भी।’’ 

जमनी तीन रातों के बाद चौथे दिन की सुबह भागती हांफती लड़खड़ाती हुई घर पहुंची। बल्ली दरवाजे पर बैठा था। जमनी औंधे मुंह गिर पड़ी। 

एक दिन सुमित्रा देवी ने ठाकुर पति के मुंह से गुंडे भैरव गोंड को लताड़ते सुना--‘‘वह भागी कैसे रे भंड़वा, एक लड़की को संभाल नहीं पाया हरामी।’’ तब सुमित्रा देवी की आंखों के सामने सब कुछ साफ होने लगा। यह लोग जिन्हें अछूत कहते हैं जिनसे घृणा करते हैं उन्हीं की बहन-बेटी के शरीर से खिलवाड़ करते नहीं थकते। 

सुमित्रा देवी ठाकुर की बंदिशों के बाद भी जमनी को सांत्वना देने के इरादे से चमार टोला में बल्ली के घर जा पहुंची। पूरा चमार टोला सकते में आ गया। तभी ठाकुर राइफल लेकर आ गया और सुमित्रा देवी को घर ले जाकर नजरबंद कर दिया। गर्भवती जमनी का अस्पताल में निधन हो गया और फागुनी इस तरह संसार में आई। फूल सी खूबसूरत बच्ची फागुनी। सुमित्रा देवी फागुनी की सुंदरता देख मुग्ध हो जाती है। बल्ली के साथ फागुनी जब सुमित्रा देवी के घर नाली साफ करने आती तो सुमित्रा देवी उसे अपलक देखती रहती। ठकुराईन के तीन पुत्र हैं। उसे एक पुत्री की साध थी लेकिन लड़की न हुई। पता नहीं क्यों फागुनी को देख कर ‘‘ सुमित्रा की छाती दूध से भरने लगती है।’’ 

ठाकुर अपने नौकर कोंदा से कहता है--‘‘रे कोंदवा...तोर ठकुराइन बुढ़ापे में बावरी हुई जा रही है, संभालकर रखिओ। नही ंतो तोर टेंटुआ दबाये में टाइम न लगी। न जाने चमार टोला में का रखा है, ससुरी वहीं जाने के लिए पगलाए रहती है।’’ 

फागुनी बड़ी हो रही है। कोंदा भी जवान हो रहा है। कोंदा मन ही मन फागुनी को प्यार करता है। ठाकुर और उसके पुत्रों को फागुनी रूपी शिकार का मन होने लगा। ठाकुर कांदा से कहता है कि बाप-बिटिया को ले आ, घर की सफाई करानी है। कोंदा जानता है इसके पीछे का कारण। कांदा को अकेले आते देख ठाकुरों का मन खराब हो गया और कांदा की दम-भर पिटाई हुई। सुमित्रा देवी जानते हुए भी उन वनमानुषों से पूछ नहीं सकती थी कि कोंदा को इस बेरहमी से क्यों पीटा जा रहा है। 

न जाने कितने बरसों का गम और गुस्सा ठकुराईन के मन में भरा था। वह जानती थी कि अवयस्क फागुनी ठाकुर का खून है और फागुनी उसकी अपनी ही बेटी है। बेटी को बरबादी से बचाने के लिए ठकुराईन ने कोंदा को तैयार किया। ठाकुरों के प्रति कांदा के मन में नफ़रत भरी और कोंदा को अपने पक्ष में किया। आदिवासी कांदा एक गठीले बदन का युवक था। जब ठाकुर और उसके पुत्र फागुनी का अपहरण करने चमार टोला आए तो कोंदा ने उन्हें मार-मार कर अधमरा कर दिया। उपन्यास यहीं पर आकर समाप्त होता है लेकिन सुमित्रा देवी के मन में हमेशा-हमेशा जीवित रहने वाला इश्क़ ही अंततः विजयी हुआ। 

उपन्यास में छोटे-छोटे वाक्य हैं और चित्रमयी भाषा है जो पाठकों को बांधे रखती है। शुक्ला चौधुरी का यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में बहुत बड़े कथानक को समेटे है। पुस्तक की छपाई और गेटअप शानदार है। 



समीक्ष्य पुस्तक : इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

पृष्ठ : 64  मूल्य : 150 

प्रकाशक : डायमंड बुक्स, एक्स-3, ओखला इंडस्टियल एरिया, फेज-2

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