मंगलवार, 6 जनवरी 2026

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

  समीक्षा

इश्क़ : शुक्ला चौधुरी : अनवर सुहैल









शुक्ला चौधुरी एक सम्वेदनशील कवि हैं और इन्होनें कहानियां भी लिखी हैं। उपन्यास विधा में उनकी यह पहली प्रस्तुति है किन्तु किसी भी तरह पहली कृति नहीं लगती। इसे उपन्यासिका भी कहा जा सकता है। रमेश बक्षी, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, अमृता प्रीतम के छोटे कलेवर के उपन्यासों जैसा सशक्त कथानक और पद्यमय-गद्य की अद्भुत बानगी है ‘इश्क़’। उपन्यास के शीर्षक से यह आभाष होता कि इस उपन्यास में प्रेम-प्रसंगों की बात होगी लेकिन चट्टानों में फूल खिलने की घटनाएं होती हैं तो सभी अचंभित होते हैं। कथानक में नवीनता न भी हो तो लेखक की शैली पाठकों को एक नया आस्वाद कराती है। इश्क़ पढ़ते हुए यही आभाष होता है। उपन्यास का पाठ शुरू करते ही पाठक कथारस का आनंद उठाने लगता है। बहुत सी बातें इस तरह से बयान की गई हैं कि पाठक अचम्भित हो जाता है। 

कस्बाई या ग्रामीण परिवेश में अब भी पुरूष-वर्चस्व और सामंती शोषण के अवशेष नज़र आते हैं। खै़र शहर भी कहां इन जंजालों से आज़ाद हैं। ऑनर-कीलिंग की घटनाएं सर्वत्र देखने को मिल ही जाती हैं। लेकिन इश्क़ के कथानक के जादू का केन्द्र-बिन्दु सामंत की स्त्री सुमित्रा का चरित्र है। सामंती मूल्यों की जंजीर में कैद सुमित्रा मुक्ति की छटपटाहट में किस तरह शनैः-शनैः अपने अंदर की शक्ति को पहचानकर जगाती है और मुक्ति की राह निकालती है। 

छोटे-छोटे वाक्यों से सजी उपन्यास की शैली पाठकों को कथा-प्रवाह को रोमांचित करती है। यथा आप पाठ के प्रवेश में ही जो वाक्यांश पाते हैं वह कितना सहज और सरस है--‘‘आकाश का चांद खिला पूरा, पीतर की थाली बराबर। चांदनी में नहा उठा जंगल। चांद से चूंई-चूंई कर झरने लगा अमृत। फागुनी, बल्ली के कंधे से झूल गई।’’ शहरी प्रदूषण से दूर एक आदिवासी गांव का चित्रण कितना मनोहारी है। ऐसे ही किसी माला में मोती की तरह गुंथे हुए शब्दों का अद्भुत चमत्कार है उपन्यास ‘इश्क़’। 

बल्ली गांव का एक दलित बूढ़ा है। वह सूरदास भी है। फागुनी उसकी बेटी है। सामंत ठाकुर मेवालाल का नौकर है कोंदा। गांव में तुतलाकर बोलने वाले को कांदा कहा जाता है। कोंदा एक अनाथ आदिवासी किशोर है। सामंतों के टुकड़ों पर पलता है। सामंतों की देह-मालिश से लेकर उनके अन्य क्रियाकलापों में सेवकई करता है। गांव में दलितों का जीवन कष्टप्रद है। सामंतों को इन दलितों की ज़रूरत पड़ती है गंदगी, मल-मूत्र या पाखाना की नाली साफ करने के लिए। सामंतों द्वारा दलितों की स्त्रियों का भोग करना सामान्य घटनाएं हैं। सामंतों की स्त्रियां या तो अपने पति का साथ देती हैं या फिर मूक दर्शक बनी रहती हैं। गांव के सामंत की पत्नी सुमित्रा देवी किन्तु ऐसी नहीं है। उनके मन में मानव जाति की मर्यादा का सम्मान है। 

यह सच है कि कोंदा मन ही मन फागुनी पर आसक्त है। अपनी प्रीत का इज़हार वह ठकुराईन के दिए अन्न यथा गुड़-चना आदि की भेंट फागुनी को देकर करता है। फागुनी अवयस्क लड़की है। कोंदा बल्ली चमार को बुलाने आया है कि ठकुराईन ने बुलावा भेजा है। ठाकुर का पाखाना जाम हो गया है। कोंदा बल्ली को पटाने के लिए बोलता है--‘‘पांच दिन का राशन-पानी घर पहुंचा दिही, कहत रहीन ठकुराईन।’’ गांव में श्रम का मूल्य इसी तरह अन्न से किया जाता है। 

अंधा बल्ली जानता है कि फागुनी पर डोरे डालता है कोंदा इसलिए वह कांदा को फटकारकर भगा देता है--‘‘खबरदार जो पांव भीतर रखा।’’  

‘‘अंधे काका की कितनी आंखें, कोंदा जाते-जाते सोचने लगा।’’ 

जब बल्ली रात में सामंत के घर जाने से मना कर देता है तब सुमित्रा देवी स्वयं दलितों की बस्ती जाती है क्यांकि उनके घर में एक कार्यक्रम होना है जिसमें बहुत से मेहमान आने वाले हैं। यदि पाखाना जाम रह गया तो कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा और जो बदनामी होगी सो अलग। ठाकुुर मेवालाल से जब सुमित्रादेवी ने बल्ल्ी के इंकार के बारे में बताया तो सुमित्रादेवी का बेटा सुखविंदर बोल पड़ा--‘‘साला बड़ा भाव खाने लगा आजकल...जाकर टेंटुआ दबा दूं क्या अम्मा या बाबू कहें तो झोपड़ी में आग लगा दूं, एक मिनट लगेगा।’’ 

इस सम्वाद के पीछे दलितों के प्रति सवर्णों को मन को सरलता से पढ़ा जा सकता है। सदियों से दलितों के प्रति यही भाव रहा है सामंतों के मन में। आज़ादी के इतने बरसों बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है। बेटे के गर्म खून को पिता यह कहकर शांत करता है--‘‘यह वक्त नाराज़गी का नहीं है बेटा, धीरज रखना जरूरी है। समय हमारे हाथ में नहीं रहा बेटा, नही ंतो बल्ली की यह मज़ाल!’’

शुरूआती तीन पृष्ठों में उपन्यास की पृष्ठभूमि समझी जा सकती है जिसे बिना किसी खींचतान के सहज सम्वाद के माध्यम से शुक्ला चौधुरी ने प्रस्तुत किया है। दृ

चमार टोले का वर्णन भी हमारे समय का कटु यथार्थ है। इसके लिए शुक्ला चौधुरी की काव्यमयी भाषा का चमत्कार देखें--‘‘पत्थरों के बदन को जख्मी कर बसाए गए डोम और चमारों के कुछ घर।’’

हर तरह की नागरिक आवश्यकताओं से उपेक्षित परछाईंनुमा लोगों की बस्ती का अद्भुत चित्रण है यहां। सामंतों की चाकरी करना और वनोपज इकट्ठा करना इन गरीबों का काम है। अधिकतर अधपेटे सोना इनका नसीब है। जंगल जाकर महुआ के फूल चुनने का शगल कई दिनों तक चलता है। इस महुआ के बदौलत औरतें सिंगार सामग्री यथा झुमका, बिंदी, चूड़ी आदि खरीदती थीं। 

मुंह अंधेरे ठकुराईन बल्ली चमार के घर आ पहुंचती है। उसके साथ नौकर कोंदा भी है जो झोला भर सामान उठाए है। ठकुराईन सुमित्रादेवी छिपकर बल्ली के घर आई है कि बल्ली जाम पाखाना आकर खोल दे और अन्य सफाई का काम कर दे। 

सुमित्रादेवी भूल चुकी है अपना अतीत। स्त्री-विमर्श पर जाने कितनी बातें की जाती हैं किन्तु शुक्ला चौधुरी ने पुरूष सत्तात्मक समाज में स्त्री की उपस्थिति के औचित्य और उसकी अपनी स्वतंत्रता पर चंद शब्दों में ही काफी बातें कह दी हैं। ठकुराईन बल्ली के घर से जैसे ही अपने घर पहुंची उसने देखा कि --‘‘ठाकुर मेवालाल दरवाज़ा छेंक कर खड़ा है। ठकुराईन धक्का नहीं संभाल पाई और चौखट पर सर के बल गिर गई। कपार की बांई ओर से एक धार बह निकला जो बांई आंख के कोर को भिंगोता हुआ गले से होकर सफेद चादर पर गिरने लगा टप-टप-टप।’’ यही है स्त्रियों के जीवन की विडम्बना, उनकी अस्मिता और बेचारगी से भरा अस्तित्व। 

दलितों के घर फागुनी जैसी रूपवती कन्या का होना आश्चर्य है। बल्ली की घरवाली जमनी अचानक एक दिन गायब हो गई। जमनी दीनदयाल मेहतर की बेटी थी जो घर से भागकर आई थी और जिसे बल्ली ने ब्याहता बनाकर रख लिया था। उसी जमनी पर सामंत मेवालाल की कुदृष्टि थी। सुमित्रा देवी को शक था कि जमनी का अपहरण ठाकुर ने किया है। उसने एक रोज ठाकुर से पूछ ही लिया--‘‘कहां थे जी रात भर इस दुरजोग में।’’ 

तब ठाकुर ने ऐंठ कर जवाब दिया था--‘‘मैं शिकार पर गया था सुन ले, आज भी जाउंगा और कल भी।’’ 

जमनी तीन रातों के बाद चौथे दिन की सुबह भागती हांफती लड़खड़ाती हुई घर पहुंची। बल्ली दरवाजे पर बैठा था। जमनी औंधे मुंह गिर पड़ी। 

एक दिन सुमित्रा देवी ने ठाकुर पति के मुंह से गुंडे भैरव गोंड को लताड़ते सुना--‘‘वह भागी कैसे रे भंड़वा, एक लड़की को संभाल नहीं पाया हरामी।’’ तब सुमित्रा देवी की आंखों के सामने सब कुछ साफ होने लगा। यह लोग जिन्हें अछूत कहते हैं जिनसे घृणा करते हैं उन्हीं की बहन-बेटी के शरीर से खिलवाड़ करते नहीं थकते। 

सुमित्रा देवी ठाकुर की बंदिशों के बाद भी जमनी को सांत्वना देने के इरादे से चमार टोला में बल्ली के घर जा पहुंची। पूरा चमार टोला सकते में आ गया। तभी ठाकुर राइफल लेकर आ गया और सुमित्रा देवी को घर ले जाकर नजरबंद कर दिया। गर्भवती जमनी का अस्पताल में निधन हो गया और फागुनी इस तरह संसार में आई। फूल सी खूबसूरत बच्ची फागुनी। सुमित्रा देवी फागुनी की सुंदरता देख मुग्ध हो जाती है। बल्ली के साथ फागुनी जब सुमित्रा देवी के घर नाली साफ करने आती तो सुमित्रा देवी उसे अपलक देखती रहती। ठकुराईन के तीन पुत्र हैं। उसे एक पुत्री की साध थी लेकिन लड़की न हुई। पता नहीं क्यों फागुनी को देख कर ‘‘ सुमित्रा की छाती दूध से भरने लगती है।’’ 

ठाकुर अपने नौकर कोंदा से कहता है--‘‘रे कोंदवा...तोर ठकुराइन बुढ़ापे में बावरी हुई जा रही है, संभालकर रखिओ। नही ंतो तोर टेंटुआ दबाये में टाइम न लगी। न जाने चमार टोला में का रखा है, ससुरी वहीं जाने के लिए पगलाए रहती है।’’ 

फागुनी बड़ी हो रही है। कोंदा भी जवान हो रहा है। कोंदा मन ही मन फागुनी को प्यार करता है। ठाकुर और उसके पुत्रों को फागुनी रूपी शिकार का मन होने लगा। ठाकुर कांदा से कहता है कि बाप-बिटिया को ले आ, घर की सफाई करानी है। कोंदा जानता है इसके पीछे का कारण। कांदा को अकेले आते देख ठाकुरों का मन खराब हो गया और कांदा की दम-भर पिटाई हुई। सुमित्रा देवी जानते हुए भी उन वनमानुषों से पूछ नहीं सकती थी कि कोंदा को इस बेरहमी से क्यों पीटा जा रहा है। 

न जाने कितने बरसों का गम और गुस्सा ठकुराईन के मन में भरा था। वह जानती थी कि अवयस्क फागुनी ठाकुर का खून है और फागुनी उसकी अपनी ही बेटी है। बेटी को बरबादी से बचाने के लिए ठकुराईन ने कोंदा को तैयार किया। ठाकुरों के प्रति कांदा के मन में नफ़रत भरी और कोंदा को अपने पक्ष में किया। आदिवासी कांदा एक गठीले बदन का युवक था। जब ठाकुर और उसके पुत्र फागुनी का अपहरण करने चमार टोला आए तो कोंदा ने उन्हें मार-मार कर अधमरा कर दिया। उपन्यास यहीं पर आकर समाप्त होता है लेकिन सुमित्रा देवी के मन में हमेशा-हमेशा जीवित रहने वाला इश्क़ ही अंततः विजयी हुआ। 

उपन्यास में छोटे-छोटे वाक्य हैं और चित्रमयी भाषा है जो पाठकों को बांधे रखती है। शुक्ला चौधुरी का यह उपन्यास अपने छोटे कलेवर में बहुत बड़े कथानक को समेटे है। पुस्तक की छपाई और गेटअप शानदार है। 



समीक्ष्य पुस्तक : इश्क़ : शुक्ला चौधुरी

पृष्ठ : 64  मूल्य : 150 

प्रकाशक : डायमंड बुक्स, एक्स-3, ओखला इंडस्टियल एरिया, फेज-2

         नई दिल्ली 110020 फोन : 011 40712200