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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास

 डाउन सिंड्रोम : समाज में जागरूकता का एक प्रयास 

अनवर सुहैल



 

 

विश्व डाउन सिंड्रोम दिवस प्रत्येक वर्ष 21 मार्च को मनाया जाता है. यह 2007 से मनाया जा रहा है. इसका अर्थ ये हुआ कि दुनिया में इस व्याधि के बारे में बहुत बाद में जागरूकता आई. इसके पूर्व इस डाउन सिंड्रोम को लोग छुपा लिया करते थे. 

अब दुनिया भर में जो प्रयास किये जा रहे हैं उसके कारण डाउन सिंड्रोम से ग्रसित लोगों को अब बीमार या सामाजिक रूप से त्याज्य नहीं माना जाता है. डाउन सिंड्रोम एक ऐसी स्थिति है जिससे ग्रसित व्यक्ति को सारे समाज से स्वीकार्यता मिलनी ही चाहिए. डाउन सिंड्रोम जिसे ट्राइसोमी 21 के नाम से भी जाना जाता है, डाउन सिंड्रोम एक आनुवंशिक विकार है जिससे पीड़ित व्यक्ति के पास एक अतिरिक्त गुणसूत्र (क्रोमोसोम) या गुणसूत्र का एक अतिरिक्त टुकड़ा होता है। यह विभिन्न शारीरिक और संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) समस्याओं को जन्म देता है, जिसमें विकास में देरी, बौद्धिक अक्षमताएं, चेहरे की विशिष्ट विशेषताएं जैसे कि तिरछी आंखें और एक सपाट नाक एवं हृदय दोष और थायराइड की समस्या आदि शामिल हैं।  डाउन सिंड्रोम वाले व्यक्तियों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, कई लोग उचित समर्थन और संसाधनों के साथ पूर्ण जीवन जीते हैं। प्रारंभिक हस्तक्षेप कार्यक्रम और समावेशी (इन्क्लूसिव) शिक्षा उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करती है और उन्हें समाज में सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनाती है।

हिंदी साहित्य में इस विषय पर लिखा ही नहीं गया है. मुक्तिबोध ने कहा था कि हमारे समय में विषयों की कमी नहीं है फिर भी हमारा उपलब्ध हिंदी साहित्य नए और चैलेंजिंग विषयों पर क्यों नहीं लिखता है? उस पर तुर्रा ये कि साहित्य के तथाकथित मठाधीश हिंदी में नोबल पुरुस्कार पाने की लालसा भी पाले रहते हैं. कोई साहित्य तभी बहुआयामी होता है जब वह समाज के हर कोने की पड़ताल करता है और खासकर उस समाज के हाशिये पर पड़े लोगों की समस्याओं को भी मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिशें करता है.

डाउन सिंड्रोम विषय पर छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत प्रशासनिक अधिकारी संजय अलंग ने एक उपन्यास  "चलो साथ चलें" की रचना की है. इसके पूर्व संजय अलंग ने इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक किताबें लिखी हैं. उनके तीन कविता संग्रह भी प्रकाशित और चर्चित हैं. कथा या उपन्यास लेखन क्षेत्र में यह उनका पहला कदम है और विश्वास नहीं होता है कि इतना सुगठित और सहज उपन्यास पहली बार का प्रयास है. 

अपने व्यस्ततम सेवा काल में संजय अलंग को भारत के माननीय राष्ट्रपति जी द्वारा दिव्यान्गजनों और वृद्धजनों के लिए किये गए विशेष कार्यों के लिए पृथक पृथक वर्षों में सर्वोच्च राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.  

संजय अलंग की चिंताओं को समझने के लिए हमें उनकी कविताओं को भी उतना ही समझना होगा. उनके चयनित विषयों में कवि के भीतर,  पंक्ति  अंतिम व्यक्ति तक पहुँच पाने की ललक है, बेचैनी है.   संजय अलंग के पास संवेदना की अपनी अर्जित भाषा है, जिसके सहारे वह अभिव्यक्ति की चुनौतियों को स्वीकार करते हैं और ऐसे वितान रचते हैं कि साधारण से साधारण जन तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं. 

"चलो साथ चलें' उपन्यास यदि कोई दूसरा हिंदी लेखक लिखता तो इसे दर्द और कराह का एक मूर्त रूप बना देता किन्तु संजय अलंग, दिलो-दिमाग में छाई बेचैनियों को प्रताड़ना के लसलसे प्रवाह में नष्ट नहीं होने देते हैं बल्कि वह एक राह तलाशते जाते  हैं जिससे समस्या को समझा जा सके और उसके निदान का सहज सकारात्मक प्रयास किया जा सके. यह एक चिकित्सक के परामर्श की तरह है न कि किसी कथावाचक  के करुण रूदन की गूँज है. 

मर्सी और नलिन के प्रथम  शिशु सन्नी के जन्म की कहानी है "चलो साथ चलें".  जब उनके परिवार को ज्ञात होता है कि उनकी बिटिया सन्नी सामान्य बच्ची नहीं है बल्कि उसे डाउन सिंड्रोम है तब मर्सी और नलिन के जीवन में जैसे कोई अप्रत्याशित हमला सा होता है. मर्सी और नलिन के परिजन भी इस वज्रपात को झेलने की कोशिशें करते हैं.  यहीं से बेचैनियों को दूर करने की राह तलाशने में लग जाते हैं. मर्सी का जन्म एक सामान्य डिलीवरी से हुआ था. हाँ, गले में नाल फंसने से डॉक्टर को फोरसेप्स की सहायता लेनी पड़ी थी. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इससे कोई घातक रोग नहीं होता है किन्तु शुरू में मर्सी और नलिन को यही लगा कि नवजात बिटिया सन्नी के जीवन में जो असामान्यता है उसके पीछे गले में नाल फंसने के कारण तो नहीं हुई है?

नवजात शिशु को प्रथम बार मर्सी ने देखा तो "उसे यह रूप रंग थोडा अलग हट कर लगा. उसने गौर किया तो फीचर भी अलहदा से लगे. गोल सी नाक, फूला और गोल चौड़ा चेहरा, मचमचाती हुई सी छोटी आँखें. मर्सी को कुछ अजीब तो लगा पर अभी वह ममत्व में डूबी अच्छा महसूस कर रही थी और मातृत्व का आनंद ले रही थी." (पृष्ठ 21)

मर्सी के पति नलिन के पैर में एक छोटे एक्सीडेंट के कारण प्लास्टर चढ़ा था, मर्सी और शिशु से मिलने के लिए वह भी बेचैन थे और डॉक्टर से परामर्श लेकर जबलपुर से नागपुर आने के लिए गाडी बुक कर ली गई थी. मर्सी की सास ने जब सन्नी को देखा तो काफी प्रसन्न हुईं --" बहुत गोरी और प्यारी है." 

लेकिन कुछ देर बाद नलिन की माँ ने कहा--"बच्ची की आँखें ज्यादा हेज़ी हैं. धुंधली सी, ब्राईट नहीं हैं. डल हैं. अलग तरह का इफेक्ट दे रही हैं. फीचर भी बहुत अलग से हैं. भारीपन तो हैं ही, आकार भी फैला सा है. नलिन तुम भी ज़रा ध्यान से देखना."

यहीं से शुरू होती है एक नवजात शिशु के कारण उत्पन्न हुई नई समस्या की. यह समस्या इस परिवार भर की नहीं थी बल्कि यह एक ऐसी बात थी कि जिसे समाज बड़े अविश्वास से कहता रहता है -"ऐसा मेरे साथ क्यों ?" या "हमारे साथ ऐसा क्यों हुआ?" यह ऐसा सवाल है जो बड़े-बड़ों के आत्मविश्वास को हिला के रख देता है. परिवार में सब्र करने का जज़्बा न हो तो फिर समस्या बड़ी विकराल हो जाती है. मर्सी और नलिन की सन्नी पहली संतान है. मर्सी और नलिन के माता-पिता ने इस पूरे समय में बड़ी शालीनता के साथ प्रसूति को सर-आँखों पर बिठाया. हर तरह कि चिकित्सकीय परामर्श का अक्षरशः पालन किया. फिर ऐसा क्यों हुआ वे इस घटना को जस्टिफाई नहीं कर पा रहे थे और एक अनोखे दुःख की गिरफ्त में फंसते चले जा रहे थे. 

इस विषय पर उपन्यास की रचना करना एक चैलेंजिंग कार्य है. इसमें समस्या के प्रतिरूप शिशु की दयनीयता, शिशु के रिश्तेदारों का अरण्य-रूदन, समाज की नकारात्मकता  से प्रसंगों का वितान नहीं बुना गया हैं बल्कि संजय अलंग की लेखनी से डाउन सिंड्रोम से प्रभावित शिशु और उसके परिजनों के दुखों को तो शिद्दत से लिपिबद्ध किया है. इस जटिल स्थिति में शिशु के माता-पिता, अन्य रिश्तेदार और समाज की वास्तविकता से एक साथ कथाकार संजय अलंग भी जूझते हैं और "चलो साथ चलें" की गुहार के साथ एक नई राह खोजते जाते हैं. 

सर्वप्रथम इस परिस्थिति में नवजात शिशु के सभी परिजन एक साथ खड़े होते हैं. बच्ची की स्थिति के लिए हिन्दुस्तान में उपलब्ध चिकित्सा और चिकित्सा पद्धति को आपसी परामर्श से तलाश करते हैं. जबलपुर, नागपुर और मुंबई तक शिशु के लिए बेहतर उपचार की जो व्यवस्था है उसे अंगीकार करते हैं. नागपुर के डॉक्टर ने कह दिया था कि शिशु सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है. मर्सी और नलिन ने जबलपुर के डॉ कुंडू को भी बिटिया को दिखलाया. डॉ कुंडू ने कहा---"देखिये नागपुर में भी डॉक्टर का मत सही था. सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही हैं."

फिर वे लोग मेडिकल कालेज में डॉक्टर लवली मेहरा को भी दिखलाया. डॉ मेहरा ने सामान्य चेकअप के बाद महत्वपूर्ण बात कही---"डाउन सिंड्रोम ही है. अब आप सन्नी को इसी तरह देखना प्रारंभ करें. उसके लिए आगे क्या और कैसे करना है, यह देखें. इसके साथ अनुकूल हों. शॉक और गिल्ट से आप लोगों को बाहर आना होगा. समाज में मूव्ड करें तो सहजता बढ़ेगी."

हिम्मत और धैर्य से काम लेने की सीख मिली. यह सच है कि समाज इसके लिए तैयार नहीं है, इसलिए मित्रों, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों कि बातों पर ध्यान नहीं देना ही उचित होगा. 

दंपत्ति को जब यह खबर मिली कि मुंबई में कोई एक विदेशी डॉक्टर हैं जो इस तरह के मामलों में बेहतर दखल रखते हैं, तब नलिन और मर्सी ने सन्नी को लेकर मुंबई पहुंचे. डॉ कोसिमो ने भी बतलाया कि सन्नी को डाउन सिंड्रोम ही है और वे सन्नी के इलाज के लिए योजना बना रहे हैं. काफी महँगी विदेशी दवाएं मंगवा कर सन्नी का इलाज किया गया और साथ ही फ़िजिओथेरेपी के ज़रिये मरीज़ के दिमाग और शारीर की सामान्य क्रियाओं को कुछ बेहतर एक्टिव रखने और विकसित करने के लिए विभिन्न तरह की थेरेपी की भी ज़रूरत पूरी करने के लिए डॉक्टर के परामर्श से अणिमा मुले का पता भी मिल गया. 

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथानक के अलावा डाउन सिंड्रोम से लड़ने के लिए एक पथ प्रदर्शक गाइड की तरह है. घटनाक्रम से गुज़रते हुए कई बार ऐसा लगता है कि उपन्यास में वर्णित "की वर्ड्स" को गूगल में सर्च किया जा सकता है इतना वास्तविक वर्णन है कि संजय अलंग ने वाकई इस उपन्यास की संरचना के लिए छोटी से छोटी डिटेल को भी मिस नहीं किया है. 

डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे को सामाजिक मान्यता दिलाने और ऐसे अभिभावकों को भी घरों से निकालना जो अपने घरों में ऐसे बच्चों को छुपा कर रखते हैं. लोकलाज और मर्यादा जैसी रुढियों के चलते ऐसे अभिभावक बड़े शातिर तरीके से अपने डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों को मुख्यधारा से अलग रखते थे. नलिन और मर्सी के सद्प्रयासों ने ऐसे गुम किये गए बच्चों को डाउन सिंड्रोम प्रबंधन जैसी संस्थाओं की देख-रेख करने के लिए बाहर निकाला. उपन्यास का सूत्र वाक्य है --"सार्थक जीवन की आदत पड़ जाने पर सकारात्मक प्रयास भी सहज ढंग से सूझते हैं,"

इस बीच मर्सी पुनः गर्भवती होती है. सन्नी की असामान्य दशा के कारण मर्सी चिंतित थी और वे लोग यह चाहते थे कि गर्भ में पल रहा भ्रूण कहीं डाउन सिंड्रोम का शिकार तो नहीं है? ऐसा परिक्षण मुंबई में होता है. मुंबई से रिपोर्ट आई कि स्थिति सामान्य है लेकिन गर्भावस्था के अंतिम चरण में मर्सी को गर्भपात की स्थिति से गुज़रना पड़ा जिससे वह परिवार बुरी तरह से टूट गया था. 

जबलपुर के डॉक्टर राधा होतवानी से जब वे मिले तो उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में उनका सुझाव है कि मर्सी पुनः शीघ्र ही कंसीव करने का प्रयास करें वर्ना आगे जाकर काम्पिल्केशन बढ़ने के चांस हैं. नलिन और मर्सी ने सन्नी का प्रवेश नागपुर के सर्व-उदय विद्यालय में करा दिया. यहाँ मर्सी बच्ची के साथ विद्यालय जाने लगी और डाउन सिंड्रोम बच्चों को सिखाये जाने वाली गतिविधियां दोहराती और इससे सन्नू कि प्रगति भी अच्छी होने लगी थी. नागपुर में मर्सी एक बार पुनः गर्भवती हो गई. इस बार उन लोगों ने गर्भस्थ शिशु का डाउन सिंड्रोम टेस्ट नहीं करवाया. 

मर्सी ने एक स्वस्थ कन्या शिशु को जन्म दिया. उनके अन्दर एक नया उत्साह भी पैदा हुआ और दंपत्ति ने नए शिशु  के साथ डाउन सिंड्रोम ग्रसित सन्नी की उत्कृष्ट देखभाल शुरू कर दी. मर्सी ने सन्नी के नाम से मिलती जुलती एक संस्था बना ली जिसे नाम दिया गया--"राइजिंग सन डेवलपमेंट सेंटर". 

डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चों के सर्वांगीण विकास की राह आसान होने लगी. हिन्दुस्तान में इस तरह की गतिविधियाँ एकदम नवीन थीं और मर्सी की ज़िद ने उनकी तमाम कोशिशों को समाज के लिए सहज स्वीकार्य बना दिया था. जो अभिभावक अब तक अपने बच्चों को समाज की निगाह से छुपा कर रखने के लिए अभिशप्त थे उनके लिए मर्सी और नलिन की उर्जावान पहल ने नई राह बनाई. 

आगे जाकर मर्सी ने सन्नी के साथ सिंगापूर में विशेष प्रशिक्षण के लिए चयन हो गया. इसमें मर्सी को सन्नी के साथ सिंगापूर आने का प्रस्ताव भी दिया.

"चलो साथ चलें" उपन्यास एक कथा नहीं है बल्कि डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चों के उच्च स्तरीय प्रबंधन की एक पथ प्रदर्शक भी है. 

संजय अलंग के इस उपन्यास का स्वागत इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी साहित्य में लीक से हटकर लिखी गई कथा है ये जिसे समावेशी सोच के साथ एक नई राह तलाशने का प्रयास किया गया है.





कृति : चलो साथ चलें   लेखक : संजय अलंग 

पृष्ठ : 144  मूल्य : 250

प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, C-515, बुद्धनगर, नई दिल्ली 110012

मो 8750688053




सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

पहचान उपन्यास लिखने से पूर्व

वैसे तो मैं कविता कहानियाँ लगातार लिख रहा था. हंस में तीन कहानियां आ चुकी थीं. अब मैं अपने लेखन से संतुष्ट था. क्योंकि कानपुर से निकलने वाली लघुपत्रिका के संपादक स्व. सुनील कोशिश ने जब मेरी पहली कहानी स्वीकृत की थी तब कहा था की हंस में छापना कथा-कार की कसौटी है. आपको हंस पढ़ना और कहानी के नए ट्रेंड को पकड़ना होगा. उनकी सीख ने असर किया था. अब ऐसे संपादक कहाँ जो बनते हुए लेखक को खाद-पानी दें.
तो मैं बता रहा था की कहानियां छापने लगीं. अकार, अन्यथा, कथाबिम्ब, कथादेश में कहानियां आ चुकीं.
मैं खुद को बचपन से एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित होते देखना चाहता था. मेरे पास सिंगरौली की सर-ज़मीन पर उपन्यास का खाका तैयार हो चूका था. ज़रूरत थी सिर्फ एक बार तबीयत से पत्थर उछलने की…. मैंने अपने मन में उपन्यासकार बनने की तड़प को महसूस किया…..
मेरा इरादा लंबे उपन्यास लिखने का नहीं था.
लघु-उपन्यास या उपन्यासिका ही मेरा टारगेट था.
ऐसा काम्पेक्ट कथानक की पाठक एक बार घुसे तो फिर पूरा पढ़ कर ही रीते….
जैसा की दोस्तोयेव्स्की के उपन्यासों में होता है…
जैसा की निर्मल वर्मा के उपन्यासों में होता है…
जैसा की अमृता प्रीतम के उपन्यासों में होता है…
जैसा की कृष्ण सोबती के उपन्यासों में होता है…
ऐसा तो था मेरा स्वप्न…और उसके लिए मुझे बड़ी कड़ाई से अपने लिखे को काटना भी था….
पहचान
पहचान

जब मैं सिंगरौली की कोयला खदानों में काम करता था, तभी ‘पहचान’ का आइडिया मन में आया था. ये बात सन १९९० की है.
तब तक मैं कवी से कथाकार बन चूका था. कथानक, हंस, कथाबिम्ब, अक्षरपर्व में कहानियां पब्लिश हो चुकी थीं. इरादा था की अब उपन्यास में हाथ साफ़ किया जाए.
मैंने एक रजिस्टर लिया और उसके पहले पन्ने पर उपन्यास का खाका खींचा.
मुझे मंटो याद हो आये और मैंने रजिस्टर में कलम चलाने से पहले ‘७८६’ लिखा.
जैसा की मंटो करते थे.
उपन्यास का मैंने शीर्षक सोचा और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा
—–छलांग—-
इसमें युनुस की कहानी शुरू हुई.
फिर काम रुक गया.
विभागीय परीक्षाएं आती रहीं और कविता कहानियां समय खाती रही.
फिर १९९३ में मेरी शादी हो गई.
१९९४ में फिर मैं रजिस्टर के पन्ने उलटने पलटने लगा.
युनुस के साथ अब सलीम का चरित्र खुला.
युनुस के खाला खालू आये और उपन्यास ४० पन्ने का हो गया.
फिर मैं भूमिगत कोयला खदान में प्रशिक्षण के लिए आ गया. डेढ़ साल उसमे लगे.
रजिस्टर के पन्नों में कैद युनुस भी गुप-चुप ढंग से आकार लेता रहा.

शनिवार, 31 मार्च 2012

kavita sangrah : santo kahe ki bechaini

prakashak :
Kashyap Publication
B-48/UG-4, Dilshad Extn-II
DLF, Ghaziabad, 201005
pages : 80 Price : 125
Email : kashyppublication@gmail.com
website : kashyappublication.in
phone : 9313282945, 9868778438

गुरुवार, 29 मार्च 2012

mujhe bigada

जीवन संघर्श

अब्बा रेल्वे स्कूल में षिक्षक थे, जो अब अवकाष प्राप्त कर चुके हैं। वह एक अनुषासन प्रिय, अध्यव्यवसायी, गम्भीर एवं धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। उन्हें किसी से कोर्इ षिकायत नहीं रहती। वह अपने जीवन से इतने संतुश्ट रहते हैं कि उन्हीं से प्रेरणा पाकर मेरे अंदर अनुषासनप्रियता और संतोश का भाव गहराया है। अब्बा कहते हैं कि ‘साहेब से सब होत है, बंदे से कुछ नाहिं’।
अब्बा का एक और ध्येय-सूत्र है कि आराम करने के लिए क़ब्र ही बेहतर जगह है। यह जीवन लगातार कुछ नया रचने के लिए है। मैं भी भूमिगत कोयला खदान में काम करने के बावजूद नया रचने या नया पढ़ने की ललक का मारा रहता हूं। बाबा कबीर की उक्ति अक्सर बच्चों को सुनाया करता हूं-’’सुखिया सब संसार खावै अरू सोवै / दुखिया दास कबीर जागे अरू रोवै।’’
जो चेतनासम्पन्न होगा यानी कि बाबा कबीर के “ाब्दों में जो ‘जागा’ होगा वह सांसारिक दु:ख देख कर चिंतित रहेगा। जो तबका स्वार्थ, लिप्सा और भोगविलास में डूबा रहता है उसे कबीर दास सुखिया कहते हैं। मेरे विचार से तमाम “ाायर, लेखक बिरादरी कबीर दास की दुखिया कैटगरी में आती है।
मेरी अम्मी उर्दू, फ़ारसी और अरबी की जानकार थीं। वह इतने ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ लिखती थीं कि ऐसा लगता जैसे कहीं कोर्इ छपी हुर्इ स्क्रिप्ट हो। हम बच्चों को हिन्दी लिखते-पढ़ते देख उन्होंने भी हिन्दी लिखना-पढ़ना सीख लिया था। उनकी संदूक में चंद किताबें ज़रूर रहा करती थीं। जैसे, हफ़ीज़ जालन्धरी की ‘षाहनामा ए इस्लाम’ चार भाग, अल्लामा इक़बाल की किताब ‘बांगे दरा’, स्मिथ की ‘दि स्पिरिट ऑफ इस्लाम’, कृष्न चंदर की ‘एक गधे की आत्मकथा’। उर्दू माहनामा ‘बीसवीं सदी’ के सैकड़ों अंक उनके कलेक्षन में थे। वह इब्ने सफी बीए की जासूसी दुनिया भी ज़रूर पढ़ा करती थीं। मुझे उर्दू पढ़ने की ललक इब्ने सफी बीए की जासूसी दुनिया पढ़ने से जागी।
अम्मी एक चलता-फिरता “ाब्दकोष हुआ करती थीं। “ोरो-षायरी, से उनकी गहरी वाबस्तगी थी। वह कठिन से कठिन अष्आर कहतीं और फिर उनकी तफ़सील बताया करती थीं। अक्सर वह एक “ोर कहती थीं-’’सामां है सौ बरस का, पल की ख़बर नहीं।’’
मेरे विचार से मेरे अंदर कवि या लेखक बनने का ज़ज़्बा अम्मी के कारण पैदा हुआ क्योंकि अम्मी अक्सर अकेले में मौका पाकर कॉपी के पिछले पन्ने पर कुछ न कुछ लिखती रहती थी। मुझे अफ़सोस है कि उन पन्नों को मैं सम्भाल कर रख न पाया वरना तत्कालीन भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति स्वरूप वे तहरीरें आज मेरे कितने काम आतीं।
मेरे मुहल्ले में गिरीष भइया रहते थे। वह पुराने उपन्यासों के उदात्त नायकों की तरह मुझे नज़र आया करते थे। वह व्यंग्य लिखा करते थे। उस समय उत्तर प्रदेष से एक हास्य व्यंग्य की पाक्षिक पत्रिका ‘ठलुआ’ निकला करती थी। गिरीष भइया उसके नियमित लेखक थे। मैं उनके व्यक्तित्व से इतना प्रभावित था कि उनसे मिलने उनके घर गया। उन्होंने ठलुआ का पुराना अंक देकर मुझे कहा कि इसके लिए मैं भी कुछ लिखूं। तब मैं सातवीं या आठवीं कक्षा में था। मैंने सम्पादक के नाम पत्र लिखा। वह पत्र प्रकाषित हुआ और लेखकीय प्रति के रूप में ठलुआ का अंक जब मेरे नाम से पोस्टमैन घर दे गया तो अचानक मुझे महसूस हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक बन गया हूं।
“ााम के समय राम मंदिर के प्रांगण में गिरीष भइया, आर एस एस की “ााखा में अवष्य उपस्थित हुआ करते। मैं तब बालक ही था। राजनीति की कोर्इ समझ तो थी नहीं। “ााखा में झण्डा-वन्दन, प्रार्थना के बाद सभी लोग खेल खेला करते थे। मुझे वहां अच्छा लगता। इसलिए भी अच्छा लगता कि मेरे समय का एक लेखक गिरीष भइया भी वहां खूब आनन्द लेते थे। ठलुआ में मैंने नगर की सड़कों की दुर्दषा पर, एकमात्र छविगृह पर, पगार की पहली तारीख पर व्यंग्य लिखे। मैं जो भी लिखता थोड़े-बहुत संषोधन के साथ वह ठलुआ में छप जाया करता था। गिरीष भइया अर्थात गिरीष पंकज बाद में एक बड़े लेखक बने। वर्तमान में वह साहित्य अकादमी के सदस्य हैं। गिरीष पंकज ने सद्भावना दर्पण के नाम से एक त्रैमासिक लघुपत्रिका का सम्पादन भी कर रहे हैं।
विद्यालय में पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी के दिन होने वाले काय्रक्रमों में मैं भाग लिया करता था। देषभक्ति से प्रेरित कविताएं तुकबंदी के साथ लिखा करता था। कविता पाठ करने पर बच्चे तालियां बजाते और षिक्षकों उत्साह वर्धन करती निगाहें मुझे अन्य बच्चों से हटके बना दिया करती थीं। हिन्दी के अध्यापक श्री अमर लाल सोनी ‘अमर’ मेरी कवितार्इ देखकर मुझे ‘बूढ़ा बालक’ कहा करते थे। वह हमारे घर के सामने रहा करते थे। अक्सर मुझे अपने पास बुलाते और अपनी ताज़ा कविताएं सुनाया करते। उनकी कविताएं अतुकांत होतीं साथ ही उनमें आदर्ष होता। वह षिक्षक के नज़रिए से संसार को देखा करते थे और हर खराब को अच्छा बनाने की ज़िद पाले बैठे थे। उनकी कविताएं मुझे अच्छी लगतीं लेकिन मेरे मित्र उनका मज़ाक उड़ाया करते थे। वास्तव में उस समय का समाज भी लेखक या कवि को अनुत्पादक काम में लिप्त मानता था। लेकिन मेरे मन में तो जयषंकर प्रसाद, प्रेमचंद या रवीन्द्र नाथ टैगोर बनने की ललक थी। मैं खूब कविताएं लिखा करता था। अम्मी के सम्पर्क में रहने के कारण मेरी कविताओं में उर्दू के “ाब्दों की अधिकता होती थी। अम्मी मेरी कविताओं की सराहना किया करतीं। वह मुझे इस्लाह भी किया करती थीं।
नगर में किराए से किताब मिलने की एक दुकान थी। मैं वहां से दस पैसे रोज पर एक किताब लाया करता था। वहां नंदन, पराग, चंदामामा और धर्मयुग जैसी पत्रिकाएं किराए पर मिलती थीं। मुझे बच्चों की पत्रिका ‘पराग’ अत्यंत प्रिय थी। सर्वेष्वर दयाल सक्सेना उसके सम्पादक हुआ करते थे। खूबसूरत सजी-धजी पत्रिका थी ‘पराग’। उस समय के तमाम मषहूर लेखकों की बाल रचनाएं ‘पराग’ में प्रकाषित हुआ करती थीं। आज हिन्दी में ऐसी बाल-पत्रिका का नितान्त अभाव है। जाने क्यों ‘पराग’ पढ़ते-पढ़ते एक दिन मैंने सोचा कि अपने मन से मैं भी तो कहानी बना कर लिख सकता हूं।
छोटी बहिन “ामॉं को रात के वक्त कहानी सुनने की आदत थी। मैं तब दसवीं का छात्र था। मैंने उस दिन सुनी-सुनार्इ कहानी न सुना कर उसे एक कहानी गढ़ कर सुनार्इ। वह कहानी बहन को बहुत पसंद आर्इ। मैंने रजिस्टर के पन्ने फाड़े और उस पर कहानी को दर्ज किया। नाम दिया ‘नन्हा “ोर’।
कहानी भेज दी ‘पराग’ के पते पर। ‘पराग’ जिसके अंकों का मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता था। ‘पराग’ जिसके नए अंक मेरे सपने में आते तो ज़रूर थे लेकिन इतने अस्पश्ट होते कि मैं मुखपृश्ठ भी देख न पाता और नींद खुल जाती। ‘पराग’ जिसके दिल्ली स्थित सम्पादकीय कार्यालय में मैं न जाने कितनी बार सपने में गया था, जहां चारों तरफ ‘पराग’ के पुराने अंकों के बंडल पड़े दिखते थे लेकिन वह अंक न दिखता था जो अभी छपा न था।
‘पराग’ में कहानी भेजने के एक सप्ताह के बाद प्रतिदिन पोस्टआफिस जाने लगा कि कहानी स्वीकृत हुर्इ या नहीं। एक दिन मेरे आनंद का ठिकाना न रहा, जब डाकिए ने एक प्रिंटेड पोस्टकार्ड मुझे पकड़ाया जिसमें छपा हुआ था कि आपकी कहानी ‘नन्हा “ोर’ स्वीकृत कर ली गर्इ है जिसे यथासमय ‘पराग’ में प्रकाषित किया जाएगा। मैंने वह पत्र माननीय गिरीष भइया को दिखलाया। वह भी खुष हुए। अम्मी ने अल्लाह का “ाुक्रिया अदा करते हुए फातिहा पढ़ी। इस तरह से मैं एक लेखक बन गया।
नगर में एक साहित्यिक संस्था थी ‘संबोधन साहित्य एवम् कला परिशद’ जिसके अध्यक्ष थे श्री वीरेन्द्र श्रीवास्तव ‘विºवल’। वह समय अपने नाम के साथ उपनाम लगाने का था। जैसे अमर लाल सोनी ‘अमर’, कासिम इलाहाबादी, जगदीष पाठक ने तो अपना नाम ही बदल लिया था - भतीजा मनेंद्रगढ़ी। जब मैंने संबोधन की सदस्यता ली तो उनकी तर्ज पर मैंने अपना
मैंने अपना नाम रखा अनवर सुहैल ‘अनवर’। मैंने इस नाम की एक सील भी बनवार्इ। मैं अब संस्था की परम्परानुसार कविता और ग़ज़लें कहनी “ाुरू कर दी। कविताएं और ग़ज़लें ऐसी कि हर लार्इन पर लोग ‘वाह-वाह’ कहें। मैं तब तुकों की खोज में रहा करता था। एक बार मैंने ‘हो गया है’ की तुक को पकड़ कर ग़ज़ल लिखी और उसके लिए मैंने ‘खो गया है’ ‘सो गया है’ ‘बो गया है’ ‘धो गया है’ आदि तुकों पर काम करते हुए ग़ज़ल बनार्इ थी जिसपर संस्था की गोश्ठी में बहुत दाद मिली थी। मेरे लिए तुक तलाषना और गीत-कविता गढना एक आसान काम बन गया। मैंने कर्इ गीत लिखे जिनमें एक गीत मैं गोश्ठियों में सस्वर पढ़ा करता था-’’घूम आर्इ अंखियां नगर घर देस
आया न कहीं से प्यार का संदेस’। मंचीय कविता मंच में तो खूब दाद दिलवा देती थीं लेकिन जिन्हें सम्पादक खेद सहित वापस कर देते थे। सम्बोधन संस्था में एक नर्इ बात ये थी कि वहां पहल, सम्बोधन जैसी लघुपत्रिकाएं आया करती थीं। मैंने पहलेपहल ‘पहल’ वीरेंद्र श्रीवास्तव के घर देखी थी। मुझे उसकी कविता और कहानियां बहुत पसंद आर्इ थीं। अब मेरा मन भी ऐसी ही कविताएं लिखने को करने लगा।
नगर में बैंक है, स्कूल है, कॉलेज है सो इनमें स्थानान्तरित होकर नए लोग भी आते। जो साहित्यिक मिजाज़ के होते उन्हें सम्बोधन संस्था से जोड़ लिया जाता था। इसी तारतम्य में कर्इ ऐसे कवि भी देखने सुनने में आए जिनकी कविताएं सिर के उपर से निकल जाया करतीं लेकिन जिन्हें सुनकर लगता कि इनमें वह बात है जो कि गीत-ग़ज़लों में हो नहीं सकती। जीतेंद्र सिंह सोढ़ी, विजय गुप्त, अनिरूद्ध नीरव, माताचरण मिश्र, एम एल कुरील की कविताएं मन को बेचैन कर दिया करती थीं। संबोधन से एक लघुपत्रिका ‘षुरूआत’ निकला करती थी। वह एक साइक्लोस्टार्इल पत्रिका थी। उसमें मेरी कविता और लघुकथा प्रकाषित हुर्इ। धीरे-धीरे मैं अपने को स्थापित लेखक समझने लगा।
बेरोजगारी के दिनों में मैंने सम्बोधन संस्था द्वारा संचालित वाचनालय और पुस्तकालय का कार्यभार सम्भाला। केयर-टेकर के अभाव में वह पुस्तकालय अक्सर बंद रहता और सम्बोधन की गोश्ठियों, सभाओं के काम आता था। वीरेंद्र श्रीवास्तव ने सहर्श मेरी बात मानकर पुस्तकालय का जिम्मा मुझे सौंप दिया। मैं और मेरा मित्र राजीव सोनी उस पुस्तकालय को नियमित खोलने लगे। “ााम को छ: से नौ बजे तक हम पुस्तकालय खोलकर बैठा करते। वहां की सारी किताबें हमने चाट डालीं। तब धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान निकला करती थीं। हमने पुराने अंक पलट डाले। राजीव सोनी की इस बीच “ाादी हो गर्इ। वह अमृता प्रीतम की लेखनी का मुरीद था। इस चक्कर में हमने अमृता प्रीतम का समग्र साहित्य खोज-खोज कर पढ़ डाला। इमरोज़ और अमृता के सम्बंध हमें एक रूमानी दुनिया की सैर कराया करते। मैं तो इतना ज्यादा उनके जीवन से प्रभावित हुआ कि अपने एक भांजे का नाम ही रख दिया ‘इमरोज़’। मुझसे किसी मित्र ने अपनी बिटिया के लिए नाम पूछा तो तत्काल मेरे मुंह से निकलता ‘अमृता’।
अमृता प्रीतम के अलावा मुझे निर्मल वर्मा, रमेष बक्षी, “ौलेश मटियानी, मण्टो, इस्मत चुग़तार्इ, दास्तोयेव्स्की, गोर्की, फैज़, सामरसेट माम, चेखव, उग्र, मोहन राकेष, अज्ञेय, रेणु और मुक्तिबोध की लेखनी ने अत्यधिक प्रभावित किया। जाने क्यों टॉलस्टाय की अन्ना-केरेनिना के आठ भाग खरीद लेने के बावजूद मैं उसे पढ़ नहीं पाया। बेस्ट-सेलर होने के बावजूद मैंने धर्मवीर भारती की ‘गुनाहों का देवता’ पसंद नहीं की। जबकि राजेंद्र यादव की ‘सारा आकाष’ ने ज़रूर उद्वेलित किया था। ठीक इसी तरह मुंषी प्रेमचंद की गबन और मानसरोवर की कहानियों के अलावा अन्य कोर्इ उपन्यास पूरा पढ़ नहीं पाया। हां, अमृतलाल नागर की लेखकीय प्रतिभा का ज़रूर मैं मुरीद रहा। पात्रानुकूल भाशा का सृजन करने में उन्हें महारत थी।
मुझे यथार्थ की ज़मीन से उपजे पात्र और उनके मनोविज्ञान पर आधारित कथानक प्रभावित करते हैं।

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

शुभकामनाएं


खुश होता हूँ
घिर जाता हूँ
जब अपनों के बीच
पूरा होने लगते हैं
कई अधूरे सपने..
जन्म लेती कई कल्पनाएँ
दिखने लगती संभावनाएं
दोस्तों , आप सभी को
नव वर्ष की शुभकामनाएं ....

सोमवार, 28 नवंबर 2011

purwai blog par anwar suhail








09 अक्टूबर 1964 को छत्तीसगढ़ के जांजगीर में जन्में अनवर सुहैल जी के अब तक दो उपन्यास , तीन कथा संग्रह और एक कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। कोल इण्डिया लिमिटेड की एक भूमिगत खदान में पेशे से वरिष्ठ खान प्रबंधक हैं। संकेत नामक लघुपत्रिका का सम्पादन भी कर रहे हैं।


बकौल महेश - अनवर सुहैल जी से मेरा पहला परिचय ‘असुविधा’ पत्रिका के माध्यम से हुआ । उसके बाद से यत्र-तत्र मैं उनकी कविताएं पढ़ता ही रहा हूँ। उनकी कविताओं की सहज संप्रेषणीयता और नए जीवनानुभव मुझे आकर्षित करते रहे हैं। अब तक उनके तीन कविता संग्रह आ चुके हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में बदलते समय और समाज की हर छोटी-बड़ी दास्तान और जीवन के विविध पहलुओं को दर्ज किया है पर मुझे उनकी कविताओं का सबसे प्रिय स्वर वह लगा जिसमें वे खादान जीवन से अनुस्यूत अपने अनुभवों को अपनी कविताओं की अंतर्वस्तु बनाते हैं।
अनवर जी की इन कविताओं को पढ़ना कोयला खादानों से जुड़े अंचलों और उसके जन-जीवन से दो-चार होना है। कोयला खदानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन ,समाज , प्रकृति ,मानवीय संवेदनाएं और उनके संघर्ष उनकी कविताओं में बहुत गहराई और व्यापकता से व्यक्त हुए हैं। ये कविताएं पाठक को एक नए अनुभव लोक में ले जाती और गहरे तक संवेदित करती हैं। मानसिक रूप से हम अपने-आप को उन अंचलों और वहाँ के निवासियों से जुड़ा महसूस करते हैं। फिर यह जुड़ना किसी स्थान विशेष या लोगों तक सीमित नहीं रह जाता है बल्कि समाज की तलछट में रह रहे श्रमरत मनुष्यों और उनकी पीड़ाओं से जुड़ना हो जाता है। इन कविताओं की स्थानीयता में वैश्विकता की अपील निहित है। खदानों के जीवन परिस्थितियों को लेकर इस तरह की बहुत कम कविताएं हिंदी में पढ़ने को मिलती हैं। छोटी-छोटी और सामान्य सी प्रतीत होने वाली घटनाओं में बड़े आशयों का संधान करना इन कविताओं की विशेषता है। ये कविताएं पाठक से सीधा संवाद करती हैं , इस तरह कविता में अमूर्तीकरण का प्रतिकार करती हैं। कहीं-कहीं वे अपनी बात को कहने के लिए अधिक सपाट होने के खतरे भी उठाते हैं। नाटकीयता उनकी कविताओं की ताकत है।


अनवर सुहैल कविता में संप्रेषणीयता के आग्रही रहे हैं।इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह कविता के नाम पर सपाट और शुष्क गद्य के समर्थक हों। उनका मानना है कि गद्य लेखकों की बिरादरी आज की कविता को ‘कवियों के बीच का कूट-संदेश’ सिद्ध करने पर तुली हुई है। यानी ये ऐसी कविताएं हैं जिन्हें कवि ही लिखते हैं और कवि ही उनके पाठक होते हैं।.....कवि और आलोचकों का एक अन्य तबका ऐसा है जो कविता को गूढ़ ,अबूझ , अपाठ्य ,असहज और अगेय बनाने की वकालत करता है। वह प्रश्न खड़ा करते हैं कि किसी साधारण सी बात को कहने के लिए शब्दों की इस बाजीगरी को ही कविता क्यों कहा जाए? इसलिए अपनी कविताओं में वह इस सबसे बचते हैं।


लोकोन्मुखता उनकी कविता मूल स्वर है। लोकधर्मी कविता की उपेक्षा उनको हमेशा सालती रही है। इसी के चलते उन्होंने ‘संकेत ‘ पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इस पत्रिका के माध्यम से उनका प्रयास है साहित्य केंद्रों से बाहर लिखी जा रही महत्वपूर्ण कविता को सामने लाया जाय जिसकी लगातार घोर उपेक्षा हुई है। कठिन और व्यस्तता भरी कार्य परिस्थितियों के बावजूद अनवर लिख भी रहे हैं ,पढ़ भी रहे हैं और साथ ही संपादन जैसा थका देने वाला कार्य भी कर रहे हैं। यह सब कुछ वही व्यक्ति कर सकता है जिसके भीतर समाज के प्रति गहरे सरोकार समाए हुए हों। बहुत कम लोग हैं जो इतनी गंभीरता से लगे रहते हैं और दूरस्थ जनपदीय क्षेत्रों में रचनारत लोगों के साथ अपने जीवंत संबंध बनाए रखते हैं।


पेशे से माइनिंग इंजीनियर अनवर सुहैल केवल कविता में ही नहीं बल्कि कथा के क्षेत्र में भी समान रूप से सक्रिय रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व राजकमल प्रकाशन से उनका ‘पहचान’ नाम से एक उपन्यास आया है। जो काफी चर्चित रहा है। इस उपन्यास के केंद्र में भी समाज के तलछट में रहने वाले लोगों का जीवन है जो जीवन भर अपनी पहचान पाने के लिए छटपटाते रहते हैं। विशेषकर उन लोगों का जो धार्मिक अल्पसंख्यक होने के चलते अपनी पहचान को छुपाते भी हैं और छुपा भी नहीं पाते हैं। यह कसमकस इस उपन्यास में सिद्दत से व्यक्त हुई है।


अनवर जितने सहज-सरस साहित्यिक हैं उतने ही सहज-सरस इंसान भी। उनसे मिलने या बात करने वाला कोई भी व्यक्ति उनके मृदुल व्यवहार का कायल हुए बिना नहीं रह सकता है।

जितना ज्यादा


जितना ज़्यादा बिक रहे
गैर-ज़रूरी सामान
जितना ज्यादा आदमी
खरीद रहा शेयर और बीमा
जितना ज्यादा लिप्त इंसान
भोग-विलास में
उतना ज्यादा फैला रहा मीडिया
प्रलय, महाविनाश, आतंकी हमले
और ‘ग्लोबल वार्मिक’ के डर!
ख़त्म होने से पहले दुनिया
इंसान चखना चाहता सारे स्वाद!
आदमी बड़ा हो या छोटा
अपने स्तर के अनुसार
कमा रहा अन्धाधुन्ध
पद, पैसा और पाप
कर रहा अपनों पर भी शक
जैसे-जैसे बढ़ती जा रही प्यास
जैसे-जैसे बढ़ती जा रही भूख
वैसे ही बढ़ता जा रहा डर


टीवी पर लगाए टकटकी
देखता किस तरह होते क़त्ल
देखता किस तरह लुटते संस्थान
देखता किस तरह बिकता ईमान


एक साथ उसके दिमाग में घुसते
वास्तुशास्त्र, तंत्र-मंत्र-जाप,
बाबा रामदेव का प्राणायाम
मधुमेह, रक्तचाप और कैंसर के इलाज
कामवर्धक, स्तम्भक, बाजीकारक दवाएं
बॉडी-बिल्डर, लिंगवर्धक यंत्र
मोटापा दूर करने के सामान
बुरी नज़र से बचने के यत्न
गंजेपन से मुक्ति के जतन


इसी कड़ी में बिकते जाते
करोड़ों के सौंदर्य प्रसाधन
अनचाहे बाल से निजात


अनचाहे गर्भधारण का समाधान
सुडौल स्तन
स्लिम बदन के साथ
चिरयुवा बने रहने के सामान
बेच रहा मीडिया...
बड़ी विडम्बना है जनाब
आज का इंसान
होना नहीं चाहता बूढ़ा
होना नहीं चाहता बीमार
और किसी भी क़ीमत में मरना नहीं चाहता...।

बुधवार, 2 नवंबर 2011

गज़ल





गज़ल : अनवर सुहैल

उनके संयम का सम्भाषण याद आया
अपने लोगों का भोलापन याद आया

सरकारी धन का बंटवारा होते देख
चोर लुटेरों का अनुशासन याद आया

उनके इतने चरचे, उनको देखा तो
बिन-बदली-बरखा का सावन याद आया

चारों ओर पडा है सूखा, लेकिन आज
स्वीमिंग पुल का है उद्घाटन याद आया

इस दफ़तर में जाने कितने बाबू थे
लेकिन अब है इक कम्प्यूटर याद आया

फ़ाकाकश सब मिलकर, इक दिन ज़ोर किए
कैसे डोला था सिंहासन, याद आया

दूजों की थाली पर घात लगाने वाले
भरपेटों का मरभुक्खापन याद आया

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

दुःख दूजा

                                                  दुःख दूजा  
घर से निकला 
तो दुखी था इतना 
कि ऐसा क्यों होता है 
सिर्फ  मेरे  साथ ही 
क्यों  हमेशा ली जाती है परीक्षा 
मेरे धैर्य की , मेरी योग्यता की

वहाँ पहुंचा तो 
                                                      तो लोगों की कतार देख 
                                                      मेरा दुःख हुआ हल्का 
                                                      चलो अच्छा है 
                                                      कि वहां    मैं अकेला नहीं था 
                                                      मेरे  सिवा वहां 
                                                      और भी थे दुर्भागी....