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Friday, August 31, 2012

कोयला


बहुत काला है ये कोयला
कालापन इसकी खूबसूरती है
कोयला यदि गोरा हो जाए तो
पाए न एक भी खरीदार
कोयला जब तक काला है
तभी तक है उसकी कीमत
और जलकर देखो कैसा सुर्ख लाल हो जाता है
इतना लाल! कि आँखें फ़ैल जाएँ
इतना लाल! कि आंच से रगों में खून और तेज़ी से दौड़ने लगे
इतना लाल! कि जगमगा जाए सारी सृष्टि
मुझे फख्र है कि मैं धरती के गर्भ से
तमाम खतरे उठा कर, निकालता हूँ कोयला
मुझे फख्र है कि मेरी मेहनत से
भागता है अंधियारा संसार का
मुझे फख्र है कि मेरे पसीने कि बूँदें
परावर्तित करती हैं सहस्रों प्रकाश पुंज
खदान से निकला हूँ
चेहरा देख हंसो मत मुझ-पर
ये कालिख नही पुती है भाई
ये तो हमारा तिलक है...श्रम-तिलक
कोयला खनिकों का श्रम-तिलक!!!

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