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Thursday, April 13, 2017

‘आओ आओ, जल्द-जल्द पैर बढाओ’ कविता की वर्तमान समय में प्रासंगिकता

                                                                                                                           ------------अनवर सुहैल
Suryakant Tripathi 'Nirala'
सामाजिक न्याय और आर्थिक शोषण की प्रक्रिया से मानवमुक्ति निराला की काव्य-चेतना का मूल आधार है। इसी आधार पर निराला दलितों, वंचितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और निर्धनों को इंगित कर एक प्रयाण गीत रचते हैं। निराला समाज के दलित-दमित समाज की चेतना को जगाते हैं कि ‘जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ’! सिर्फ पैर बढ़ाना भी एक आव्हान हो सकता था लेकिन निराला नहीं चाहते कि सामाजिक न्याय की प्रक्रिया में विलम्ब हो। इसीलिए वे सामाजिक अन्याय से पीड़ित मानव की मुक्ति के लिए चिंतित हैं और पुरानी सामंती व्यवस्था को ध्वस्त कर एक समतावादी समाज के निर्माण के लिए कृत-संकल्पित हैं।
देश में सामाजिक विसंगतियांे की स्थिति अब भी कमोबेश वही हैं जैसी निराला के समय थीं। परम्परागत सामंती अवशेष जीवित हैं और एक नवधनाढ्य वर्ग पनपा है जो कि सामंतवादी शोषण को बरकरार रखे हुए है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार आदि सवालों से सरकारें बचना चाह रही हैं और वर्तमान परिवेश में साहित्य की चिन्ताओं में आमजन उस तरह नहीं है जैसा कि निराला ने आमजन के दुख-दर्द को महसूस किया था और अभिव्यक्त किया था। जब सारा देश नेहरू के जादुई व्यक्तित्व से चमत्कृत था तब निराला ही थे जिन्होंने ‘अबे सुन बे गुलाब’ लिखने का साहस किया था।
भारत देश में दलितों, वंचितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के लिए आज भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं कि उन्हें शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। देश में कई तरह के प्रयोग हुए लेकिन कम उम्र में ही आर्थिक तंगी के कारण बड़ी मात्रा में बच्चे शिक्षा जारी नहीं रख पाते। निराला जानते हैं कि शिक्षा ही वह अस्त्र है जो शोषण के विरूद्ध प्रतिरोध की आवाज़ तैयार करेगी। वंचितों को अपने अधिकार-प्राप्ति के लिए जागरूक बनाने लिए संघर्ष की रूपरेखा बनाती ‘आओ आओ, जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ’ का आव्हान करती कविता अपने स्वरूप में कालजयी है। जब-जब अन्याय और शोषण के विरूद्ध लोगों को इकट्ठा किया जाएगा निराला की यह कविता अवश्य याद की जाएगी।
स्वतंत्र भारत में इतने साल बाद भी स्थितियां कमोबेश वैसी ही हैं। सामंतवाद और बंधुआकरण के नित-नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं। शारीरिक और मानसिक गुलामी के औजारों से वृहत वंचित समाज प्रताड़ित किया जा रहा है। शिक्षा एक ऐसा जादुई चिराग है जिससे अज्ञानता का ताला खोला जा सकता है। ज्ञान का प्रकाश आने पर वंचित-दलित-आदिवासी, स्त्रियां और अल्पसंख्यक देश-दुनिया से जुड़ सकते हैं और स्व-विवेक से दासता की जंजीरों को तोड़ सकते हैं। यह बहुसंख्यक शोषित समाज अपनी ताकत को जानता नहीं है और मुट्ठी भर आतताईयों से प्रताड़ित, अपमानित होता रहता है। निराला के युग में भी दलालों का एक बड़ा वर्ग सक्रिय हो चुका था जो श्रमवीरों को शिक्षा से दूर करने के कुचक्र को हवा दे रहा था। निराला इन तत्वों का पहचानते हैं और श्रमवीरों को आगाह करते हैं कि बिचैलिया या दलाल एक ऐसी सत्ता है जो मालिक और मजदूर दोनों को ठगता है और बिना श्रम या पूंजी गंवाए ऐश करता है।
हवेली यानी सामंती वैभव के स्मृति-चिन्हों को पाठशालाओं में बदलने का आव्हान एक तरह की क्रांति का उद्घोष है। ये क्रांति उन लोगों को करनी है जो कि भारतीय समाज में नीची जातियों के शिल्पकार लोग हैं। इनमें किसान हैं, धोबी, पासी, चमार, तेली आदि जातियों से आव्हान किया गया है। ये जातियां सदियों से सामंती व्यवस्था के परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमज़ोर होती हैं और इनका जीवन-स्तर घटिया होता है। भूख, बेकारी, बीमारी इनकी नियति है। आधुनिक भारत में शिक्षा ही वह माध्यम है जो इन्हें सामाजिक रूप से सबल और आर्थिक रूप सम्पन्न बना सकता है। सामंतवादी ग्रामीण व्यवस्था में शोषण के दलाल-बिचैलियों से आगाह करते हुए निराला इन वंचितों को व्यापक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना चाहते हैं। भविष्यदृष्टा निराला जानते हैं कि बैंकिंग प्रणाली के अभिनव प्रयोगों का लाभ शिक्षित दलित-वंचित समाज उठाने लगेगा तो जल्द ही उनका संर्वांगीण विकास होगा।
कवि निराला इन वंचितों-दलितों को जागरूक करना चाहते हैं कि देश में जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उनपर समस्त देशवासियों का हक़ है न कि सिर्फ मुट्ठीभर सम्पन्न लोगों का। इसलिए वह चाहते हैं कि शिक्षित होकर ये तमाम शोषित समाज देश में एक ऐसे वैचारिक विमर्श का माहौल बनाएं कि सुविधाओं की गंगा इनकी गलियों से होकर बहने लगे। सभी लोग एक ही जाति के हो जाएं से तात्पर्य हैं कि जनता के बीच जातिवाद काविभाजन खत्म हो जाए। समस्त शोषित-पीड़ित जनों की एक ही जाति हो जो मिलजुलकर अन्याय का प्रतिकार करें।
निराला की यह कविता अच्छे समय की प्रतीक्षा करने को नहीं कहती बल्कि उस शोषित-पीड़ित समाज से कहती है कि जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ, आओ आओ। ये जल्द-जल्द ही कविता की ताकत है जो सर्वहारा वर्ग को एकजुट होकर कहती है कि एक साथ आओ और परिवर्तनकारी क्रांति का सूत्रपात करो। किसी से आशा न रखो कि कोई आकर तुम्हें निर्धनता और अपमानजनक जीवन से मुक्ति दिलाएगा। इसके लिए स्वयं सर्वहारा वर्ग को सामंती के ताकतों को धरासाई करना होगा।
सामाजिक दमन और आर्थिक शोषण की प्रक्रिया से मानवमुक्ति निराला की काव्य-चेतना का मूलाधार है। इस कविता में जिस तरह से जाति सूचक शब्दावली का प्रयोग हुआ है यथा धोबी, पासी, चमार, तेली तो हम निराला की इस कविता को दलित कविता भी कह सकते हैं। आज भी देश में राजनीतिक रोटियां इसी जातिवाद के तवे पर सेंकी जाती हैं।
यह एक प्रयाणगीत है, जिसमें समाज में व्याप्त शोषण, गरीबी, असमानता कि विरूद्ध आवाज़ उठाई गई है। वास्तव में इस गीत में कवि ने साम्यवादी समाज की स्ािापना करने के लिए पंूजीवाद के खिलाफ़ क्रांति का आहवान किया है। कवि को इस बात का अहसास है कि देश का दलित वर्गों में अज्ञानता का अंधकार फैला हुआ है। जब तक यह वर्ग स्वयं नहीं जाग्रत होगा और अन्याय-अत्याचार का विरोध नहीं करेगा तब तक उनकी स्थिति नहीं सुधर सकती है। इसके लिए इनका शिक्षित होना आवश्यक है। कवि का मानना है कि जल्द जल्द पैर बढ़ाने से समाज में जल्द बदलाव आएगा।
इस तरह निराला का यह गीत वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है।