शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

गौ-हत्या

कहानी : अनवर सुहैल                                                                         
गौ-हत्या                                                                                               

उन चार यारों के बारे में जान लें जिनके एडवेंचर ने नगर की तथाकथित शान्ति को भंग की थी.
वैसे तो वे तीन ही थे, लेकिन गाहे-बगाहे एक चौथा भी उनसे आ मिलता.
वे अक्सर बेनी नाले के रपटे पर आ मिलते.             
नगर जहां खत्म होता वहां पहाड़ी के दामन पर पतला सा बरसाती नाला है, बिना पानी का नाला….
बारिश और उसके बाद ये नाला वन-विभाग के लिए दिक्कतें पैदा करता है, इसलिए उस नाले पर एक रपटा बना दिया गया. इसे पुलिया भी कहते हैं देहाती...वैसे है ये रपटा, जब बारिश का पानी ऊपर से बहता है तब रपटा डूब जाता है..
दो-तीन बारिश झेलने के बाद रपटा जर्जर हो गया जैसे कभी उसका कोई अस्तित्व ही न हो. सो इस रपटे के आसपास जुआ खेलने या दारु-गांजा सेवन करने वालों के लिए अनुकूल वातावरण बन गया.
बड़ा ही मनोहारी प्राकृतिक दृश्य बनता शाम के समय, एक तरफ सिद्ध-बाबा की पहाड़ी के पीछे डूबता सूरज और वन-विभाग के संरक्षित सघन वृक्षों के पत्तों से छन-छन आती सुनहरी-लाल किरणों का मायाजाल..
इसी समय ये दोस्त इकट्ठे होते.
शाम के जादू का असर होता हो या नशे की किक...वे गुमसुम खोये से रहते जब तक कि अँधेरा पैर पसारने नहीं लगता था. पहले वे खुद ही गाते-गुनगुनाते थे लेकिन जब से उनके पास एक सेकण्ड-हैण्ड मोबाइल आ गया है, वे मोबाइल पर गाना सुनते हैं-----“हमका पीनी है पीनी है हमका पीनी है...”
डिस्पोजेबल कप-गिलास, पानी बोतल और चखना हो तो दारु इसी तरह की प्राकृतिक जगह में निर्विध्न पी जा सकती है. वे दोस्त थे, रसिक थे, गपोड़ी थे, नशेडी थे लेकिन समलैंगिक नहीं थे.
उन तीनों में से एक शादी-शुदा था लेकिन आवारागर्दी के कारण उसकी बीवी भाग गई. बाकी के दो कुंवारे थे और ये भी दावा करते कि शादी नहीं हुई तो क्या हुआ बारातें बहुत देखी हैं उन दोनों ने!
सूचना क्रान्ति के महा-विस्फोट के बाद अब कुछ भी छिपा नहीं है...और जो दिखता है सो बिकता है.
बेच रही हैं दुनिया भर की ताकतें अश्लीलता, असामाजिकता और अपसंस्कार..एक छोटी सी चिप में...इंसान के नाख़ून के बराबर पतली सी चिप और जाने कितने जीबी के डाटा को अपने अन्दर समोए हुए. ये चमत्कार ही तो है. इस डाटा स्टोर करने के नये साधन ने खा लिए ऑडियो-वीडियो टेप, ऑडियो-वीडियो सीडी, डीवीडी जैसी ताज़ी तकनिकी भी कितनी जल्दी बासी हो गई और अब जब ऑनलाइन डाटा स्टोर हो रहा है तब जाने क्या-क्या होगा कोई नहीं जानता...
असुविधाओं, अभावों के बीच भी उन तीनों ने खुश रहने के कई कारण खोज लिए थे लेकिन इस नई तकनीकी ने उन तीनों की नींदें उड़ा दी थीं.  भरी दुनिया में उन्हें अब बस यही एक चीज़ चाहिए थी. सिर्फ और सिर्फ ऐसा मोबाइल सेट, जिसकी बड़ी सी स्क्रीन हो और जिसे टच करते ही हाई स्पीड डाटा खींच स्वप्न दृश्य स्क्रीन पर चलायमान हो जाएँ.
ऐसे मोबाइल उन लोगों ने कई लोगों के पास देखे थे. कुछ लोगों के पास तो नौ-दस इंच स्क्रीन के मोबाइल देखे, जिनमें जाने कितने पिक्चर सेव रहते हैं, जिन्हें जब चाहें ऊँगली के इशारे पर स्क्रीन पर जिंदा किया जा सकता था और पिक्चर का भरपूर मज़ा लिया जा सकता था. अब धनपति लौंडे पक्का है ऐसे मोबाइल पर धार्मिक या सामाजिक सिनेमा देखते न होंगे. हालीवुड की एक्शन पिक्चर या फिर एडल्ट पिक्चर ही तो देखते हैं लोग...भीड़-भाड़ में छुप कर या फिर अकेले में मस्ती के साथ. ऐसा ही एक सेट उनके पास हो जाता तो फिर कितना आनन्द उठाते वे लोग. कहाँ से आयेंगे इतने सारे पैसे. कैसे होगा दस-पंद्रह हजार रुपये का जुगाड़..इसी जुगत में बेनी नाले के रपटा में बैठ वे योजनायें बनाते.

उन तीनों में जो मुखिया था, उसका नाम था सलमान कुरैशी उर्फ़ सल्लू...यानी बड़े चिकवा का पांचवें नम्बर का बेटा...नगर में तीन कसाई हैं...बड़े चिकवा, मंझले चिकवा और छोटे चिकवा. इन तीनों का नगर के मांस व्यापार में नब्बे प्रतिशत हिस्सा है...इनके कम्पटीशन में रहीस भाई आये लेकिन पनप न सके, गुलज़ार कसाई का धंधा ज़रूर कुछ जमने लगा है. वो भी इसलिए कि वो उधार का व्यापार करता, जबकि खाने-पीने वाले कहाँ याद रखते हैं उधारी-वुधारी...खाए पिए खिसके, पठान भाई किसके...
सल्लू बचपन से ही सुबह-सवेरे अपने अब्बू बड़े चिकवा की गालियाँ सुनकर उठता और आँख मलते हुए रेलवे लाइन किनारे मटन की दूकान पर आ जाता. उसकी ड्यूटी थी दुकान की सफाई करना और फिर सरकारी नल से बाल्टियाँ भर-भरके पानी लाना और दुकान के बाजू में रखे आधे ड्रम को पानी से फुल कर देना. इसी बीच रेल लाईन किनारे वह मैदान आदि से भी निपट लेता है.
फिर जब उसका छटे नम्बर का भाई दुकान आने लगा तब उसकी ज़िम्मेदारी बदल गई. अब वह दूकान की साफ-सफाई होने के बाद घर से माल लाकर दूकान में बांधता और फिर जब बड़े चिकवा माल जिबह करते तो माल की खालपोशी करता.
खालपोशी के बाद अंतड़ियों की सफाई करके नाले में बहाना और अंतड़ियों को सहेज कर दूकान में बिक्री के लिए रखना. कोई गाहक सर या पैर खरीदने आये तो उसे टेकल करना.
खालपोशी करना कोई अच्छा काम नहीं है..साधारण शब्दों में कहा जाए तो खालपोशी करना माने बकरे की चमड़ी बिना कटी-फटे उतारना...मवेशी का चमड़ा बिकता है...इसीलिए उसमे खरोंच नहीं लगनी चाहिए. खरोंच लगी खाल के दाम नहीं मिल पाते. धीरे-धीरे सल्लू इस हुनर में भी उस्ताद हो गया.
उसके बाद उसने बाकायदा दुकान में बैठ कर चापड़ से बोटियाँ काटकर गोश्त बेचने की कला भी सीख ली. बड़ा ही चतुर सयाना था सल्लू जो पलक झपकते ही गाहक की नजर के सामने ही इधर का माल उधर कर देता और अच्छा-बुरा मिलाकर गोश्त बेचना भी एक कला है...इस हुनर के कारण उसके अब्बू बड़े चिकवा उसे अब दूकान में बैठाने लगे थे. अपनी किशोरवय के कारण वह एक कुशल सेल्समैन बन गया था और यदा-कदा अपनी सूझ-बूझ से सौ-पचास की हेराफेरी भी कर लेता था. आखिर रोज़-रोज़ के नित नए खर्चे के लिए दूकान में निष्ठा दिखाने का ईनाम भी तो चाहिए ही था, वर्ना अब्बू के हाथ से फूटी कौड़ी भी न मिले...आठ-दस जनों का संयुक्त परिवार इसी गोश्त की दूकान से ही तो आजीविका पाता था.

सल्लू के दोनों दोस्त अक्सर सल्लू के कहे अनुसार काम करते. सल्लू उनका बॉस है. प्यार से उसे वे बॉस और कभी भाईजान कहते.
उनमे से एक विश्वकर्मा था...अशोक विश्वकर्मा उर्फ़ पप्पू...पप्पू के पिता पहले प्रिंटिंग प्रेस में कम्पोजीटर का काम करते थे. बड़ा ही आँख फोडू काम था वो. बीडी पीते और पेज कम्पोज़ करते. चिमटी के सहायता से एक-एक शब्द चुन कर फ्रेम में फिट करना. काम अधिक होता तो रात घर लौटने से पहले ठेके पर जाकर देसी मार लिया करते.
पैत्रिक संपत्ति के बंटवारे से कुछ राशि मिली तो उन्होंने जोड़-तोड़ कर एक सेकण्ड हैण्ड ट्रेडिल मशीन लगा ली. शुरू में अच्छा काम मिलता था लेकिन जब से स्क्रीन और फिर आफसेट प्रिंटिंग प्रेस नगर में  खुले, तब ट्रेडिल के लिए काम मिलना कम हो गया. उनके पास इतने पैसे तो थे नहीं कि अपना ऑफसेट प्रेस डाल लें सो पप्पू के पिता ने ट्रेडिल मशीन औने-पौने बेचकर साइकिल रिपेयर की दूकान लगा ली. साइकिल किराए पर भी लगाते और महीने में चार-पांच नई साईकिल बेच भी लेते. बगल के कसबे के सिन्धी सेठ से वे नई साइकिलें ले आते और कमीशन पर उन्हें बेचते.
ये अलग बात है कि उनका हाथ हमेशा तंग रहता है. पढने-लिखने में फिसड्डी रहने वाला उनका खुराफाती पूत पप्पू साइकिल की दुकान में बैठने लगा तो उन्हें दुपहर में आराम मिलने लगा. 
पप्पू शाम होते ही पिता को दूकान और गल्ला सौंप सीधे बेनी नाले की रपटे की तरफ इस तरह भागता जैसे कोई नमाज़ी अज़ान की आवाज़ सुन मस्जिद की तरफ भागता है.....इस रपटे में ही उसे दुनिया-जहान का ज्ञान की प्राप्त होता है.
उनका तीसरा साथी है अंसार जो जुगनू टेलर मास्टर का बेटा है..एक जमाने में जुगनू टेलर मास्टर बड़े फेमस थे...फिर जब से न्यू स्टाइल-टेलर की शॉप खुली और लौंडे-लफाड़ी अपने कपड़े न्यू स्टाइल-टेलर में सिलवाने लगे तब जुगनू टेलर मास्टर की दुकान में मंदी छाने लगी...अंसार के अब्बू अपने जमाने के बेस्ट टेलर थे...कोट-पेंट विशेषज्ञ लेकिन अब कोट-पेंट भी रेडीमेड मिलने लगे हैं...बस गिने-चुने पुराने गाहक हैं जिनके आर्डर मिलते रहने से जुगनू टेलर की दूकान में धूल नहीं जमने पाती है.
शाम के वक्त उस रपटे पर इक्का-दुक्का लोग ही आते...
एकदम एकांत वासा..झगडा न झांसा..यही तो नारा था उनका.
दिन भर इधर-उधर और शाम बेनी नाले पर बने रपटे पर बीतती.  
अपने पथरीले से मोबाइल सेट पर गाना सुनते और फूटी किस्मत को कोसा करते
सल्लू कहता—“साला इस मोबाइल को किसी के सामने निकालने पर बेइज्जती खराब हो जाती है..”
पप्पू कभी बिगड़ता तो बोलता मोबाइल फेंक के मारूंगा...मोबाइल न हुआ जैसे कोई पत्थर...
अंसार भी अपने बेढंगे मोबाइल से दुखी रहता.
पप्पू ने गहरी सांस भरकर कहा—“जिसे देखो मोबाइल की स्क्रीन पर ऊँगली से चिड़िया उड़ाता रहता है फुर्र..फुर्र...”
अंसार कहाँ चुप रहता---“अबे वे गेम खेलते हैं...जानता है मैंने भी अपने एक कस्टमर का मोबाइल चलाया है उसमें ऐसा गेम था कि उसे खेलते हुए सांस रोकनी पडती है....चुके नहीं कि धडाम से गड्ढे में गिरे और गेम-ओवर...”
सल्लू अपने लच्छे बालों को संवारते हुए नाक सुड़कते हुए बोला—“जानते हो मेरे बिलासपुर वाले जीजा के पास क्या मस्त टेब है..इतनी बड़ी स्क्रीन है कि जैसे सिनेमा हाल में पिक्चर देख रहे हों...मैंने उनका टेब झटक लिया और दो घंटे कैसे बीते पता भी नहीं चला...उसमें नेट-पेक भी था...खूब मजा आया...उसमें जानते हो दो वीडियो देखे...” सल्लू का चेहरा तमतमा रहा था, आँख दबा कर उसने बताया---“वोई वाले वीडियो...क्या पिक्चर क्वालिटी है उसकी...देख तो रहा था और मेरी “----“ भी फटी जा रही थी कि कहीं कोई आ न जाए...फिर जब उनकी एक काल आई तो मैंने हिस्ट्री डिलीट करके उनका सेट उन्हें वापस कर दिया...पच्चीस हजार का टेब है उनका...!”
सल्लू के अनुभव सुनके पप्पू और अंसार अवाक रह गये...
अब उनके पास एक ही ख़्वाब था...कैसे एक मोबाइल सेट या टेब उनके हाथ लगे...
कम से कम आठ-दस हज़ार रुपये तो लगेंगे ही कायदे का मोबाइल लेने में.
लेकिन इतना पैसा कहाँ से आयेगा?
और ये नामुराद पैसे का जुगाड़ उन्हें अपराध के रास्ते ले गया.
बुढ़िया बकरी का माँस ‘अल्ला-कसम एकदम खस्सी का गोश्त है...सॉलिड..!’ कहके नए लजीले गाहकों को लपेट दिया करता. लजीले गाहक माने ऐसे ग्राहक जो डरते-सहमते गोश्त खरीदने पहुँचते हैं कि उन्हें दूकान में ज्यादा समय खड़ा न रहना पड़े और जिससे लोग ये न जान जाएँ कि वे मांसाहारी हैं. ऐसे भी ग्राहक होते हैं जिन्हें गोश्त से मतलब होता है...जो एकदम नहीं जानते कि अगले पैरों को दस्त और पिछली टांगों को रान कहा जाता है. कि मोटा सीना क्या होता या चांप का गोश्त किसे कहते हैं. सल्लू ऐसे गाहकों को बखूबी पहचानता है और उन्हें छिछड़ा वगैरा भी तौल कर दे देता है.
इस मुए मोबाइल ने उनके रात की नींद और दिन का चैन छीन लिया था.
एक अदद स्मार्ट फोन उनके हाथ आ जाता तो कान के साथ उनकी चक्षुओं के लिए भी मनोरंजन का साधन मिल जाता. वे औरों की तरह अपने स्मार्ट फोन के सपने देखा करते.
एक शाम जब सूरज डूब चूका था और धुंधलका फ़ैल रहा था...अचानक सल्लू को एक बकरा चरता दिखा.
शायद झुण्ड से बिछुड़ा बकरा था.
सल्लू के दिमाग में एक विचार आया.
उसने पप्पू और अंसार की तरफ देखा.
सल्लू भाईजान गुरु ठहरे....युक्ति उसे सूझ चुकी थी....
सल्लू का युक्ति सुनकर पप्पू और अंसार के होश उड़ गये.
---“अगर भेद खुला या पकडे गये तो...?”
---“कुछ नहीं होगा बे...कालूराम है न उसको भी साथ रख लेंगे...उनके बिरादरी में मरे जानवर का मांस खाया जाता है...वो एकदम एक्सपर्ट है इस काम में...!”
तो ये था उनके गैंग का चौथा सदस्य कालूराम.
कालूराम, जिसके बारे में सिर्फ सल्लू ही जानता था कि वो वास्तव में करता क्या है? चूँकि नगर के आखिरी सिरे में नदी के उपेक्षित किनारे पर उन लोगों की बस्ती है जहां कई घरों में सूअर के बाड़े हैं. गन्दगी, गरीबी, अभाव की शिकार बस्ती. उस बस्ती में संभ्रांत दिन में जाने से कतराते हैं. जबकि रात में सड़क के आस-पास की वे झोपड़ियां रगड़े-झगड़े, देसी दारु, जिन्दा और मुर्दा मांस के लिए मशहूर हैं. कहते हैं कि बस्ती की औरतें रात में खुले आम जिस्मफरोशी करती हैं. बस्ती की बदबू से परेशान लोगों को रात-बिरात उस बस्ती की औरतों में जाने कहाँ से सौदर्य और मादकता नज़र आ जाती है.  अमूमन पुलिस वालों की रेड वहां पड़ती ही रहती है. कहीं चोरी छिनैती हो तो पुलिस का पहला छापा इनकी बस्तियों में पड़ता है. जाने कितने हिस्ट्री-शीटर इस बस्ती के पुलिस के खाते में दर्ज हैं.
इस बस्ती के लोगों से चार पैसे छींट कर कोई भी काम करवाया जा सकता है. इसीलिए स्थानीय दारु के ठेके वाले हों या फिर सिनेमा हाल वाले...इस बस्ती के लौंडों को भरती करके रखती हैं...ताकि उनके प्रतिष्ठानों में शांति-व्यवस्था कायम रह सके.
नगर में कहीं भी कोई जानवर मरा हो और बदबू फ़ैल रही हो तो इस बस्ती में भागे-भागे आओ और समस्या का समाधान पाओ. अरे, अब न इतने नर्सिंग होम बन गये हैं वरना एक जमाने में तो यहाँ की चमाईन-दाईयाँ सेठ-महाजनों के घर प्रसव कराती और नेग पाती थीं.
कालूराम का नाम सुनकर पप्पू और अंसार आश्वस्त हुए कि उसके रहने से काम आसान हो जाएगा.
सल्लू के आत्मविश्वास भरे चेहरे को किसी सिद्ध-पुरुष की तरह दोनों ताक रहे थे. इसलिए उन्हें सल्लू भाईजान पर भरोसा है...
सल्लू ने आँख मार कर कहा--“मोबाइल चाहिए कि नहीं बेटा...कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ सकता है जानेमन...ऐसे आँख फाड़-फाड़ कर मुझे न देखो, और मौके की तलाश में रहो...लोहा गरम हो तभी हथोड़ा मारना चाहिए...!” 

वे चारों आखिर पकड़े गये.
जनता के जोरदार संघर्ष और धरना-प्रदर्शन का परिणाम था कि सालों से ठंडाई पुलिस-प्रशासन ने ज़बरदस्त गर्मजोशी दिखलाई और हत्यारों को गिरफ्तार कर ही लिया.
और इस गिरफ्तारी ने जैसे तमाम जुझारू प्रदर्शनकारियों को ठंडा कर दिया. एक अजीब सन्नाटा सा छा गया नगर में. गुनाहगारों के पकडे जाने के बाद अचानक बहुसंख्यक शांत हो गये और नगर में फैला तनाव समाप्त हो गया.
कहाँ तो अल्पसंख्यकों को टार्गेट बनाकर ज़बरदस्त भड़काऊ नारे लगाये जा रहे थे और पुलिस ने जिन लोगों को पकड़ कर जनता के समक्ष प्रस्तुत किया उससे तो जैसे उन लोगों को सांप सूंघ गया.
सल्लू उर्फ़ सलमान, अशोक विश्वकर्मा उर्फ़ पप्पू, अंसार और कालूराम.
इन चारों ने जो बयान पुलिस को दिया वही बयान पत्रकारों को भी दिया.
पत्रकार-वार्ता में पत्रकारों के अलावा नगर के ऐसे युवा भी शामिल थे जिन्होनें स्वस्थ और स्वच्छ समाज निर्माण का संकल्प लिया था. इससे पहले ये युवा नगर की धार्मिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़-चढ़ के हिस्सा लेते थे. इधर उनके मन ये विश्वास गहराता जा रहा है कि देश के लिए इससे सुन्दर अवसर फिर आये न आये इसलिए बरसों से मन में दबी इच्छाओं को, अधूरे स्वप्नों को पूरा किया जाए. गर्व से जाने कब से कहते तो आ रहे थे कि वे इस देश की बहुसंख्यक आबादी को अपने गौरवशाली अतीत की अनुभूति करा देंगे. तब उनके नारे में बहुसंख्यक-वाद की बू थी. इसलिए जब उन्हें भ्रष्टाचार-मुक्त भारत और सर्वांगीण विकास का नारा मिला तो जैसे उनके दिन फिर गए...
अपराधियों के पकड़े जाने से अल्पसंख्यक समाज ने भी चैन की सांस ली.
ऐसी ही चैन की सांस ली थी मुस्लिम समाज ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद...बड़े दहशत में थे लोग कि कहीं हत्यारा कोई मियां न हो... जब क्लियर हुआ कि इंदिरा गांधी के सेक्युरिटी सिपाहियों ने ही उनकी हत्या की है जो कि सिख हैं और आपरेशन ब्लू स्टार का बदला ले रहे हैं.
अरे, बादशाहों ने भी अपने जमाने में गौकशी को मान्यता नहीं दी थी...फिर थोड़े से धन के लालच में ये टुच्चे चिकवे-कसाई काहे अमन-चैन में खलल डालने की कोशिश करते हैं.
हाजी अशरफ साहब ने गांधी चौक पर भारी भीड़ को संबोधित करते हुए कहा---“अब घटना की हकीकत चाहे जो हो लेकिन कितनी शर्मनाक बात है कि एक मछली सारे तालाब को अगर गंदा करना चाहेगी तो हम उस मछली को ही मार देने के पक्ष में हैं...हमें साफ़ सुथरा तालाब चाहिए...हमारी नगर की अंजुमन कमेटी की तरफ से प्रशासन से अपील है कि इस गौकशी की तत्परता से जांच करें और दोषियों को तीन दिन के अन्दर पकड़ें..वर्ना हम अनिश्चित काल तक के लिए नगर बंद रखेंगे...!”

उन चारों के पकड़े जाने से पहले तक जो विस्फोटक माहौल बना हुआ था अचानक शांत हो गया क्योंकि इस प्रकरण में दो मियाँ और दो हिन्दू युवक पकड़े गये थे और उन लोगों ने इकबाले-जुर्म भी कर लिया था. जो शक किया जा रहा था कि गौ-हत्या के इस जघन्य अपराध को मुसलामानों ने किया उस धारणा को विराम मिला. अब आन्दोलनकारी लोग ये कहते पाए गए के भईया, घोर कलजुग है...घोर कलजुग...
सल्लू ने मीडिया को जो बताया उसका लब्बो-लुआब ये था कि स्मार्ट फोन के लिए उन्हें पैसे चाहिए थे. एक बड़ी रकम.  बिना गलत काम किये एक साथ इतनी बड़ी रकम कैसे आये सो बेनी नाला पर बने रपटा में जो योजना बनी कि मौके की ताक में रहा जाए और तमाम परिस्थितियाँ अनुकूल हों जिस दम ये काम अंजाम दिया जाए.
सल्लू ने कई दिनों एक बात गौर से देखी थी कि आखिरी पेट्रोल पम्प के बगल में बसे पंडित जी की गाय अक्सर देर तक चरती रहती है. उसने कालूराम को तैयार रहने को कहा था कि जिस दिन मौका लगा वह फोन करके उसे बुलाएगा. कालूराम औजार लेकर पंद्रह मिनट के अन्दर आ जायेगा.
हुआ वही...एक शाम जब सब तरफ सन्नाटा पसर चुका था.
चिड़िया अपने बसेरों में आ सिमटीं और सर्वत्र शान्ति छा गई थी तब सल्लू ने पप्पू और अंसार को कहा कि तुम दोनों गाय को वापस लौटने न दो. उसे किसी न किसी बहाने नाले के उल्टी तरफ हंकालते रहो.
फिर उसने कालूराम को फोन किया.
पंद्रह मिनट में कालूराम अपनी साइकिल पर औज़ार लिए हाज़िर हो गया.
फिर उन लोगों ने वो घृणित काम अंजाम दिया जिसके कारण नगर अशांत हुआ और दो समुदायों के बीच खाई और गहरा गई.
बड़े शातिर थे वे लेकिन पुलिस की तत्परता से वे धरा गये.
पांच हज़ार रुपये और पांच किलो गौ-मांस भी उनके पास से बरामद हुआ था, जिसे वे ठिकाने नहीं लगा पाए थे...

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संपर्क : अनवर सुहैल, टाईप IV-3 आफिसर कालोनी पो बिजुरी जिला अनुपपुर मप्र ४८४४४०

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सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

पहचान उपन्यास लिखने से पूर्व

वैसे तो मैं कविता कहानियाँ लगातार लिख रहा था. हंस में तीन कहानियां आ चुकी थीं. अब मैं अपने लेखन से संतुष्ट था. क्योंकि कानपुर से निकलने वाली लघुपत्रिका के संपादक स्व. सुनील कोशिश ने जब मेरी पहली कहानी स्वीकृत की थी तब कहा था की हंस में छापना कथा-कार की कसौटी है. आपको हंस पढ़ना और कहानी के नए ट्रेंड को पकड़ना होगा. उनकी सीख ने असर किया था. अब ऐसे संपादक कहाँ जो बनते हुए लेखक को खाद-पानी दें.
तो मैं बता रहा था की कहानियां छापने लगीं. अकार, अन्यथा, कथाबिम्ब, कथादेश में कहानियां आ चुकीं.
मैं खुद को बचपन से एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित होते देखना चाहता था. मेरे पास सिंगरौली की सर-ज़मीन पर उपन्यास का खाका तैयार हो चूका था. ज़रूरत थी सिर्फ एक बार तबीयत से पत्थर उछलने की…. मैंने अपने मन में उपन्यासकार बनने की तड़प को महसूस किया…..
मेरा इरादा लंबे उपन्यास लिखने का नहीं था.
लघु-उपन्यास या उपन्यासिका ही मेरा टारगेट था.
ऐसा काम्पेक्ट कथानक की पाठक एक बार घुसे तो फिर पूरा पढ़ कर ही रीते….
जैसा की दोस्तोयेव्स्की के उपन्यासों में होता है…
जैसा की निर्मल वर्मा के उपन्यासों में होता है…
जैसा की अमृता प्रीतम के उपन्यासों में होता है…
जैसा की कृष्ण सोबती के उपन्यासों में होता है…
ऐसा तो था मेरा स्वप्न…और उसके लिए मुझे बड़ी कड़ाई से अपने लिखे को काटना भी था….
पहचान
पहचान

जब मैं सिंगरौली की कोयला खदानों में काम करता था, तभी ‘पहचान’ का आइडिया मन में आया था. ये बात सन १९९० की है.
तब तक मैं कवी से कथाकार बन चूका था. कथानक, हंस, कथाबिम्ब, अक्षरपर्व में कहानियां पब्लिश हो चुकी थीं. इरादा था की अब उपन्यास में हाथ साफ़ किया जाए.
मैंने एक रजिस्टर लिया और उसके पहले पन्ने पर उपन्यास का खाका खींचा.
मुझे मंटो याद हो आये और मैंने रजिस्टर में कलम चलाने से पहले ‘७८६’ लिखा.
जैसा की मंटो करते थे.
उपन्यास का मैंने शीर्षक सोचा और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा
—–छलांग—-
इसमें युनुस की कहानी शुरू हुई.
फिर काम रुक गया.
विभागीय परीक्षाएं आती रहीं और कविता कहानियां समय खाती रही.
फिर १९९३ में मेरी शादी हो गई.
१९९४ में फिर मैं रजिस्टर के पन्ने उलटने पलटने लगा.
युनुस के साथ अब सलीम का चरित्र खुला.
युनुस के खाला खालू आये और उपन्यास ४० पन्ने का हो गया.
फिर मैं भूमिगत कोयला खदान में प्रशिक्षण के लिए आ गया. डेढ़ साल उसमे लगे.
रजिस्टर के पन्नों में कैद युनुस भी गुप-चुप ढंग से आकार लेता रहा.

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

चुनाव की फसल

चुनाव की फसल 


जख्म टीसता है, 
दर्द तो होगा ही 
लाजिम है ज़ख़्मी का रोना-तड़पना, 
मरहम की दरख्वास्त करना
इधर-उधर ताकना-गिडगिडाना 
लेकिन वे जानते हैं 
समय सबसे बड़ा डाक्टर होता है 
बड़े-बड़े ज़ख्म भर देता है 
उन्हें तो बस ये देखना था 
कि इस ज़ख्म से 
किस-किसको लगी ठेस...
किस-किसने पहुंचाया सांत्वना-सन्देश 
कौन-कौन गया मिलने 
किस मीडिया संस्थान ने कैसी लगाई बाईट 
किस अखबार ने कैसे रखी बात 
फिर वे जुट गये विवेचना में 
प्रयोग के प्रायोजन और प्रभाव पर 
हुई बैठकें और निकाला गया निष्कर्ष 
कि ऐसे ही प्रयोग के दुहराव से 
आजीविका से जूझते समाज को 
किया जा सकता है दिग्भ्रमित 
और चुनाव की अच्छी फसल के लिए 
ऐसे प्रयोग ही तो ज़रूरी हैं.....


 भूलना ही है इलाज 

मत करो चीख-पुकार 
भूल जाओ इसे कि भूलना ही इलाज है इसका 
सदियों सी किये जा रहे अपमान को 
यूँ ही भूलते ही तो आ रहे हो 
फिर अब क्यों न्याय की लगा रहे गुहार 
जबकि सदियों से किसी ने सुनी नही पुकार
मत करो चीख-पुकार
ज़ख्म हैं भर जायेंगे एक दिन
आंसूओं के सैलाब सूख जायेंगे एक दिन
कितनी चरेर देह है तुम्हारी
इतना मारने के बाद भी तो मरते नहीं तुम
मत करो चीख-पुकार
जान की होती है एक तयशुदा कीमत
लेकिन अपमान की कीमत कहाँ दे पाता है कोई
इस अपमान को भी भूलना होगा
जब तक कोई राह नहीं दीखती
भूलना ही इलाज है इसका....

बुधवार, 2 सितंबर 2015

पुरवाई: लव-जिहाद जैसा कुछ नहीं... अनवर सुहैल

पुरवाई: लव-जिहाद जैसा कुछ नहीं... अनवर सुहैल:        अनवर सुहैल का समकालीन रचनाकारों में महत्वपूर्ण स्थान है। इनकी लेखनी को कविता , कहानी , उपन्यास आदि विधाओं में एकाधि...

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

गहरी-जड़ें को वागीश्वरी पुरुस्कार

वर्ष 2014 के लिये वागीश्वरी पुरस्कारों पर निर्णायकों ने अपना निर्णय दे दिया है।कहानी-उपन्यास विधा में यह पुरस्कार शहडोल ज़िले के अनवर सुहेल को उनके कहानी संग्रह ' गहरी जड़ें ' के लिए,कविता विधा में उज्जैन के नीलोत्पल को उनके कविता संग्रह "पृथ्वी को हमने जड़ें दीं" के लिए,गीत-गज़ल विधा में छिंदवाड़ा के रोहित रूसिया को उनके नवगीत संग्रह ' नदी की धार सी संवेदनायें ' के लिये और अन्य गद्य विधाओं के अंतर्गत भोपाल के आनन्द सिंह को अज्ञेय पर केन्द्रित उनकी पुस्तक ' सन्नाटे का छंद ' के लिये दिया जाना निश्चित हुआ है।वर्ष 2014 एवं 2015 के भवभूति अलंकरण तथा वर्ष 2013 के वागीश्वरी पुरस्कारों के साथ ये पुरस्कार भी आगामी 3 मई को भोपाल में आयोजित समारोह में प्रदान किये जायेंगे।विजेता रचनाकारों को ' सम्मेलन ' की ओर से बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

जीवन पर थोपी त्रासदी और विषमताबोध के खिलाफ कहानियां

अनवर सुहैल समकालीन हिंदी कथा जगत में एक जाने पहचाने कहानीकार हैं.
मनोज पाण्डेय 
गहरी जड़ेंउनका कहानी संग्रह है जिसमें भारतीय मुस्लिम परिवेश पर आधारित कहानियां संग्रहित है.इस बात को आधिकारिक बनाने के लिए इस संग्रह के मुखपृष्ठ पर स्पष्ट रूप से इत्तला भी दिया गया है.हिंदी पाठकों के लिए इस कहानी संग्रह का परिचय देते हुए अपरिचित संसार का अनावरणका शीर्षक भी दिया गया है.यह मान कर चला गया है कि मुस्लिम परिवेशएक अपरिचित दुनिया ही साबित होता रहा है.जबकि ऐसा नही है कि अनवर सुहैल पहली बार मुस्लिम परिवेश की कहानियां लिख रहे है.हिंदी कथा-साहित्य में शानी, राही मासूम रजा,बदी उज्जमाँ,असगर वजाहत,अब्दुल बिस्मिल्लाह,हसन जमाल,हबीब कैफ़ी अलग-अलग कद के रचनाकार रह चुके हैं और आज भी लिख रहे है.इतने लोगों के लिखने और उनको पढ़े जाने के बाद भी परिवेश का अपरिचित बने रहना हिंदी कहानियों के संवेदनशील पाठक के लिए किसी धक्के से कम नही हो सकता.इन मुस्लिमकहानीकारों से पहले प्रेमचंद की कहानियों में वह भारतीय जीवन उभरता है जिसमे मुस्लिम परिवेशके रंग भी साफ़ पहचाने जा सकते है.प्रेमचंद के कथा-साहित्य में यह परिवेश किसी विशेष हिस्से के रूप में आने की जगह भारतीय जीवन के पहलू के तौर पर ही सामने आता है.
     प्रेमचंद ने जिस समय में अपनी कहानियां लिखी उस समय तक न धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा हुआ था और न ही उस समय तक पाकिस्तानका विचार ही अपनी जड़े जमा पाया था. 1947 के बाद बंटवारे के बाद से भारत में ही रह गये भारतीय मुस्लिमों के साथ एक खास किस्म की मानसिकता ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी.  मुसलमानों को किसी एक दुसरे देश के साथ जोड़ कर पहचाने जाने की पीड़ा से नही गुजरना पड़ता था. उस समय तक उसके खाने-गाने पर दो देशों के नाम नही चिपके हुए थे.जितनी मात्रा में हिन्दू अंग्रेजपरस्त थे उतनी ही मात्रा में मुस्लिमों के मामले में भी संभावना थी.शहर-गाँव की बसावट में धर्म की  रेखाएं दीवार में नही बदली थी. शायद यही कारण रहा होगा कि अलगू और जुम्मन एक दूसरे की पंचायत करते थे और उन के निर्णय भी दोनों सहजता से स्वीकार भी करते थे. संग्रह के शीर्षक गहरी जड़ेंनामक कहानी का मुस्लिम पिता का मनोसंसार बाबरी’,‘गोधराऔर ग्यारह सितम्बरहोने से पहले ही पुख्ता तौर पर निर्मित हो चुका था.अपने मनोसंसार में पंच-परमेश्वरवाले खाद-पानी के कारण ही उनके भीतर अपने पुराने मुहल्ले में बसेरहने जिद ने गहरी जड़ें जमा ली हैं.उनकी यह जिद अपने समय के अधेरों के खिलाफ रौशनी की जिद बन पाठक को भारतीय समाज के प्रति आश्वस्त करती है.अपनी इस आश्वासन की बिना पर यह कहानी इस संग्रह की विशिष्ट कहानी का दर्जा पाती है.
  एक अच्छी कहानी अपनी पूरी बुनावट में अपने लिखे जाने के कारण की ओर साफ़ इशारा करती है.अनवर की अधिकांश कहानियों में ये इशारे इतने साफ़ तौर पर आते है कि उन इशारों को हम ब्यौरे की तरह देखने लगते है.नीला हाथी’,’ग्यारह सितंबर के बादऔर दहशतगर्दनामक कहानियों में हमे इसकी तफ्शील मिलती है.दहशतगर्द कहानी के मूसा के आतंकवादी में तब्दील होने की प्रक्रिया को इन्ही ब्योरों के साथ देखा-समझा जा सकता है.पहले-पहल इस नगर में एक ही मन्दिर था,देवी माँ का मन्दिर,फिर जब यहाँ मारवाड़ी आकर बसे तब नगर के मध्य में भव्य राम-मन्दिरबना,जिसके प्रांगण में सुबह-शाम शाखाएं लगने लगीं.
  पहले यहाँ एक छोटे कमरे में मस्जिद बनी, फिर देखते-देखते इस नगर में तीन मस्जिदें, दो ईदगाह,एक कब्रस्तान, एक मजार बन गई.
  ...........................................आर्थिक उन्नति के साथ धर्म,आस्था,विचार,आदर्श,संवेदना और शिक्षा का व्यवसायीकरण किस तेजी से होता है,इसकी प्रत्यक्ष मिसाल यहाँ देखी जा सकती है.इन ब्योरों की बानगी हमे हर शहर और कस्बों के साथ इतनी ही शिद्दत के साथ घटती दिखाई देती है.यह कहानी हर शहर-कस्बें की कहानी बन जाती है.मूसा के आतंकवादी बन जाने या बना दिए जाने  के बाद भी गनीमत है कि  हमारे आसपास ईसा मियां  और पहले वाले मूसा कम नही हुए हैं.यह कहानी मूसा को बदलने में भागीदार लोगों की साजिशों को बेपर्दा करने वाली कहानी है.यह बेपर्दा करने वाली कहानियां  हमे किसी अगले मूसा को आतंकवादी बनने और बनाने की प्रक्रिया से जूझने की ताकत से भरने का काम भी करती जाता है.जबकि ग्यारह सितंबर के बादका अहमद इससे पहले छह दिसंबरभी झेल चुकने की निरन्तरता को सह नही पाता और घनघोर-नमाजीबन जाता है.उसके इस बदलाव के पीछे इन दोनों घटनाओं के असर से कहीं ज्यादा बड़ी भूमिका इन दोनों घटनाओं के बीच उसके साथ रोजमर्रा के जीवन में होने वाली घटनाएँ और व्यवहारों ने निभाई हैं.अयोध्या और अमेरिका दोनों अहमद से दूर है पर उसके आसपास के लोग हमेशा उसके आसपास हैं. मुझे एक मुसलमान क्यों समझा जाता है,जबकि मैंने कभी भी तुमको हिन्दू वगैरा नही माना. मुझे एक सामान्य भारतीय शहरी कब समझा जायेगा?” अहमद का यही दर्दउसको भीतर तक डरा देता है.एक मुसलमानमें बदलते अहमद के रूप में भारतीय समाज-संस्कृति का डरा-सहमा और कमजोरहोता चेहरा हमारे सामने आ खड़ा होता है.    
   अनवर परिवार और उसके संबंधों की भी कहानियां लिखते है और अच्छी लिखते हैं.नसीबन’,’चहल्लुमशीर्षक कहानी तो पूरी तरह परिवार के भीतर की कहानी हैं.पुरानी रस्सीको भी इस दायरे में शामिल माना जा सकता है.इन कहानियों के माध्यम से पारिवारिक रिश्तों के तनावों से रूबरू होता है. इन कहानियों के पात्रों का नाम आप जिस परिवेश की छाह देने वाले रखगें  यह कहानियां भी उसी परिवेश की हो जाएँगी.इस तरह की कहानियां हमारे पारिवारिक ढांचे को ढकने वाले धार्मिक आवरण को उघाड़ कर पूरे भारतीय  सामाजिक तानेबाने की विसंगतियों को सामने लाती है. हमारे यहाँ ऐसा नही होता या होता हैके दावों की भुरभुरी नीवं को खोद कर नेस्तनाबूद कर देती हैं.रिश्तों के भीतर मार्मिक स्थितियों को पहचानने और उन्हें प्रभावी कलेवर में प्रस्तुत करने में भी अनवर सुहैल  सफल रहे है.इस लिहाज से नसीबनएक बेहद सफल कहानी है.नसीबन एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो स्त्री-जीवन की विपरीत और त्रासद स्थितियों के खिलाफ मजबूती से खड़ी होती है,लडती है,अपने दायरे में जीतती भी है. वह पाती है कि  एक उस जैसी एक दूसरी स्त्री उन्ही विपरीत और त्रासद स्थितियों के चंगुल में फंसी हुयी है और उस दूसरी स्त्री के व्यवहार में उसका एहसास दूर दूर तक दिखाई नही देता. इस सच से नसीबन को गहरा धक्का लगता है.कहानी का अंतिम अंश है नसीबन की आँखें बंद थीं./एक बम सा फटा उसके कानों के पास! जुम्मन’/काश!उसने अपने कान भी बंद कर लिए होते.इस तरह नसीबन दूसरी स्त्री के जीवन-स्थितियों के त्रासद सच से अपने आप को एकाकार महसूस करती है.नसीबन के साथ कहानी का पाठक भी भीतर तक हिल जाता है.
    ‘नीला हाथीऔर पीरू हज्जाम उर्फ़ हजरतजीकहानी धर्म के आडम्बर और विसंगतियों का कथात्मक रूप प्रस्तुत करती है.अपनी विषयवस्तु में प्रभावी होने के बाद भी इन कहानी का पूरा ढांचा बहुत हद तक तय फार्मूले और टूल के  इस्तेमाल से खड़ा किया हुआ लगता है.इन दोनों कहानियों में धर्म का आडम्बर रचने और उसे अपने लिए फायदेमंद बना लेने का काम करने वाले पात्र मुस्लिम समुदाय के अशराफ या पसमांदा तबके से ताल्लुक रखने वाले हैं.कहानीकार ने इस तथ्य को दोनों कहानियों में दर्ज भी करता है.एक कहानी के शीर्षक से ही इस बात की पुष्टि हो जाती है. अब मामला ये बनता है कि धर्म के पूरे जालताल पर किस तबके का वर्चस्व बना रहता है,उस ओर न तो इशारा करती है और न ही इन पात्रों के व्यक्तित्व को इस तरह से विकसित होने में उस तबके की मानसिकता का असर ही पकड़ा गया है.इसके बावजूद दोनों कहानियों को पढने में  पाठक कहानी का पूरा रस ले सकते है.
    ‘फिरकापरस्त’,’कुंजड-कसाई’,’और फत्ते भाईइन तीन कहानियों में मुस्लिम परिवेश के परत दर परत खांचों के दबावों और विषमता-बोध को केंद्र में रखा गया है.इन कहानियों में दर्ज हुआ मुस्लिम परिवेशअपने ही धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ साबित होता है फिर भी मजबूती से अपना वजूद कायम रखे है. यह भारतीय परिवेश का कारुणिक प्रभाव है जिससे कोई भी धर्म नही बचा हुआ है.कहानी संग्रह की भूमिका में जिस अपरिचित संसार का अनावरणकरने की बात की गई है वह इन्ही तीन काहनियों से मुख्यतः जुडती हैं.इन तीनों कहानियों का सबसे मजबूत पक्ष यह है कि इन तीनों कहानियों के पात्र अपने जीवन पर धोपी त्रासदी और विषमताबोध के खिलाफ सार्थक संघर्ष के रास्ते पर चलते है.एक कहानीकार के तौर पर अनवर सुहैल अपनी सभी कहानियों में संवेदनशील और सचेत रूप में सार्थक संघर्ष के प्रति अपनी गहरी आस्था और विवेक की पक्षधरता का निबाह किया है और यही निबाह किसी भी रचनाकार अंतिम देय साबित होती है. 

गुरुवार, 22 जनवरी 2015

अंधकार में धँसीं जड़ें ‘गहरी जड़ें’ / मोहसिन खान



















भारतीय मुस्लिम परिवेश की पृष्ठभूमि पर ग्यारह कहानियों का संग्रह ‘गहरी जड़ें’ अनवर सुहैल का सद्य प्रकाशित कहानी-संग्रह है, जो कि भारतीय मुस्लिम समाज की परम्पराओं में समायोजित अवस्थाओं, आस्थाओं, अंधविश्वासों और विडंबनाओं का बेलौस खुला चित्रण प्रस्तुत करता है । कहानियाँ मुस्लिम समाज के ऐसे लोक को संप्रेषित करती हैं, जो हमारे सम्मुख तो है,परंतु हम उसकी वास्तविकता को या तो नज़रअंदाज़ करते हैं या फिर अनभिज्ञ ही बने रहना चाहते हैं । ‘गहरी जड़ें’ आस्था-अनास्था,अवसरवाद,सांप्रदायिकता,सांस्कृतिक समन्वय,धर्म की ठेकेदारी,धार्मिक व्यावसायीकरण,ऊँच-नीच, भेद-भाव, खंडवाद,बाज़ारवाद, जातिवाद, पाखंड, विभेदीकरण और मानसिक यंत्रणा केयथार्थ का वह रूप है, जिसे समाज की धरती पर सतही तौर पर नहीं, बल्कि गहरे में उतरकर देखा जा सकता है । अनवर सुहैल की दृष्टि समाज के गहरे अंधरे की ओर गई है, जहाँ केवल शोषण, उत्पीड़न और जकड़न है ।
कहानी संग्रह मुस्लिम समाज के अंतर्गत फैली विकृतियों, विडंबनाओं,असंगतियों और अतिरंजनाओं के शिकंजे में क़ैद ऐसे पात्रों को घटनाओं में बांधकर लाता है, जिसमें जीवन शैली की घोषित-अघोषित नियम पद्धति का सूक्ष्म अन्वेषण और सांस्कृतिक कमजोरियों का ब्योरा है । ‘नीला हाथी’कहानी वास्तव में मज़ारों की स्थापना,उनकी स्थिति, वहाँ उपजी व्यावसायिकता को रेखांकित करती है । लेखक की आस्था वैसे मज़ारों पर है, लेकिन वह सबके समक्ष वहाँ की वास्तविकता को उघाड़कर रखा देता है । कहानी में एक ओर सुन्नी मुस्लिमों का अंधविश्वास व्यक्त हुआ है, तो दूसरी तरफ़ मुस्लिमों की गुमराइयों की ओर इशारा व्यक्त हुआ है । यह कहानी बेहतर संवेदना के साथ कथात्मकता में रोचकता लिए हुए है ।
हिन्दू-मुस्लिम मानसिकता का अध्ययन और सांप्रदायिक मानसिकता के परिवर्तनों को यदि मापा जाए, तो  ‘ग्यारह सितंबर के बाद’ कहानी एक सामाजिक-सांप्रदायिक कटुता का यथार्थ रूप समक्ष उपस्थित करेगी ।  गुटनिर्माण और गुटनिरपेक्षता के बीच उपेक्षित व्यक्तित्त्व और उनका मानसिक हनन दो चरित्रों हनीफ़ और अहमद बख़ूबी दर्शा रहे हैं । विश्व में अमेरिकी घटना का प्रभाव, उसका टूटा हुआ वर्ल्ड ट्रेड टावर चरित्रों के मलबे में परिवर्तित होता हुआ नज़र आता है । यह कहानी यथार्थवादी सांप्रदायिक परिवर्तन की परछाईं है । अहमद तटस्थ होकर किसी भी ख़ैमे से दूर था, लेकिन तंज़ और गंदी मानसिकता के लोगों से तंग आकार अंततरू वह मुस्लिम ख़ैमे में शामिल होना स्वीकारता है । सान्वय की दूरस्थता कहानी की त्रासदी व्यक्त कर रही है ।
‘गहरी जड़ें’ इस कहानी-संग्रह की प्रतिनिधि काहनी है,जो एक ओर लोकविश्वास की जड़ें तलाशती है, तो दूसरी ओर सांप्रदायिक दंगों के माहौल में लोकविश्वास के खो जाने को एक घबराहट के साथ व्यक्त करती है। असगर नामक पात्र सांप्रदायिक दंगों से पीड़ित, आहात औरशंकाकुल होकर मुस्लिम मोहल्ले की शरण में जा पहुंचता है, परंतु उसी का पिता अपनी जड़ें इतनी गहरी लिए हुए है कि हिंदुओं के मोहल्ले में अपने पुश्तेनी मकान में तनकर खड़ा हुआ है और लोकविश्वास के बल पर लहरा रहा है । यह कहानी मानसिकता के विभेद को दर्शाती है और शंकाओं के आवृत्त में सांप्रदायिकता में उपजी बोखलाहट वैयक्तिक रूप में संप्रेषित करती है ।
अम्मा का निर्णायक किरदार ‘चहल्लुम’ कहानी का प्राण है । घर के मुखिया के अंत के पश्चात उपजी बेटों की लालची निगाहों और स्वार्थ की प्रवृत्ति कहानी का केंद्र है । कहानी जहाँ बेटों की स्वार्थवृत्ति को दर्शाती है, वहीं बेटियों कि फिक्रोमंदी को दर्शाते हुए उनके वास्तविक रूप को और भी निखारती है । कहानी में बहू बेटों की सांठगांठ और चालबाज़ियों का नक्शा खींचा गया है, जो हर घर की कहानी का बयान पेश करती नज़र आ रही है । कहानी की नायिका अम्मा है, जो अंत में ठोंस निर्णय लेते हुए, आत्मनिर्भरता को अपना हथियार बनाती है और बेवा होने के बाद मुस्लिम धर्म की इद्दत की अवस्था के सारे नियमों को नज़रअंदाज़ कर देती है । कहानी का अंत विद्रोह और आत्मनिर्भरता को प्रदर्शित करता है ।
‘दहशतगर्द’कहानी का आधे से अधिक भाग जितनी रोचकता लिए हुए है,जितना दिलचस्प है, उतना दिलचस्प उसका अंत नहीं है । देश के सांप्रदायिक हालात किस प्रकार लोगों के भीतर उत्पात मचाते हैं और लोग किस प्रकार विकृत होकर अंधी खाई में कूद पड़ते हैं, मुसुआ पात्र इसका एक सशक्त उदाहरण कहा जा सकता है । कहानीकार अनवर सुहैल ने बड़े करीने से मुस्लिम मानसिकता के तनाव, बदलाव और अंतहीन असुरक्षा को मापने की कोशिश की है । मुस्लिमों पर लगाए लांछनों , आरोपों को समाज के सामने प्रश्नात्मक रूप में कहानी में उभारा गया है ।
‘फिरकापरस्त’कहानी घटना विहीन सी नज़र आती है । कहानी में केवल मुस्लिम समाज में फिरकापरस्त लोगों की कट्टरता का यथार्थ वर्णन है । इस कहानी का झुकाव इस ओर ही नज़र आता है कि मुस्लिम समाज किस प्रकार धर्म की मूल भावना को दरकिनार करके केवल फिरकों में बंट रहा है । फिरकों में बंटे मुस्लिम दल आपस में एक-दूसरे को हराम और दुश्मन समझकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने पर तुले हुए हैं । कहानी मानस पर कोई खास प्रभाव नहीं जमा पाती है, यह केवल एक वर्णन सी अथवा चिंताशील विषय को सामने लाती है । कोई घटना या पत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह इसमें नहीं हो पाया है । यह कहानी का बोध जगाने में असफल मानी जा सकती है, कोई विशेष आकर्षण इसमें दिखाई नहीं देता ।
प्रेम के एक छोर पर श्यामा और दूसरे छोर पर सुलेमान खड़े हैं,‘पुरानी रस्सी’इन्हीं दोनों के प्रेम की प्रतीकात्मक  खामोश कहानी है । एक अदृश्य रस्सी है, जिसने अब तक सुलेमान को अपने जादूई प्रेम में बाँधे रखा है । वक़्त-बेवक्त सुलेमान-श्यामा के अप्रतिम और निरूस्वार्थ प्रेम को याद करता रहा है । करीब पंद्रह वर्षों बाद सुलेमान-श्यामा से मिलता है । श्यामा आदिवासी महिला है, जो अब पहले की तरह रूपवान ओर लावण्ययुक्त नहीं रही, बल्कि जीवन की निर्धनता से टकरा-टकराकर वह कुरूप और बदरंग हो गई । सुलेमान उसकी ऐसी दुर्दशा देखकर हतोत्त्साहित हो जाता है और जाने कैसी बेचैनी उसके भीतर उमड़ आती है । श्यामा के खो गए रूप सौन्दर्य से वह आहत होता है और पश्चाताप भी करता है । सुलेमान कुर्बानी के बकरे की ख़रीदारी के बहाने श्यामा को देखने इतनी दूर आदिवासी इलाके में आता है और एक गहरा अफसोस पाता है । श्यामा अपने प्रिय बकरे शेरु को किसी को भी नहीं बेचती है, परंतु सुलेमान को वह माना नहीं कर पाती है । सुलेमान शेरु को अगले दिन कुर्बानी के लिए ले आता है, लेकिन श्यामा की रस्सी जो शेरु के गले में आदिवासियों से मंत्रबिद्द करके डाली थी, वह श्यामा वापस निकालना भूल जाती है । यह पुरानी रस्सी ही कहानी में प्रेम का सफल प्रतीक बनकर उभरी है और गहरी संवेदनशीलता व्यक्त कर रही है । यह एक खामोश प्रेम कहानी है, जो रोचकता के साथ पाठक को एक अलग ही लोक में ले जाती है ।
तलाक़शुदा मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधितत्व करती ‘नसीबन’महिलाओं की सामाजिक दुर्दशा,आश्रितता,संघर्ष और आरोपों की कहानी है । नसीबन की तलाक़ अपने पहले पति से इस बिनाह पर हो जाती है,कि उसके कोई औलाद नहीं होती है । नसीबन पर बांझ होने का आरोप लगाया जाता है और उसे तलाक़ की पीड़ा झेलनी पड़ती है । कुछ वर्षों बाद एक अच्छे परिवार में उसका फिर निकाह हो जाता है और उसका एक बेटा भी होता है । शहडोल (मध्य प्रदेश) की यात्रा के दौरान बस में उसकी मुलाक़ात एक महिला से होती है, उसके साथ उसके तीन बच्चे है। कहानी के अंत में वह महिला उसके पहले पति की दूसरी पत्नी निकलती है । एक घटना के माध्यम से तलाक़शुदा औरत की संघर्षात्मक अवस्था का वर्णन किया गया है, जो अत्यंत साधारण और नाटकीय प्रतीत होता है ।
मज़ारों की स्थापना से लेकर वहाँ पर चल रहे ढोंग ढकोसलों, अंधविश्वासों, व्यावसायिकता,अय्याशी और पाखंड के बोलबाले को अपने यथार्थ रूप में यदि देखना हो, तो ‘पीरू हज्जाम उर्फ़ हजरतजी’के माध्यम से देखा जा सकता है। कहानी ऐसी वास्तविकता लिए हुए है,जिससे आँख ही नहीं, बल्कि अक्ल भी खुल जाएगी । कहानी में मुस्लिमों-हिंदुओं की आध्यात्मिमकता की झूठी छवि को एक चालबाजी के तहत दर्शाकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि धर्म के ठेकेदार केवल ढोंग की चादर ओढ़े हुए हैंतथा उस चादर के भीतर वे कितनेस्वार्थी ,पतित और कमीने हैं । लोभ, लालच और अवसरवाद का पर्दाफाश करते हुए झूठे रिश्तों को बड़ी व्यापकता के साथ घटनात्मक रूप में कहानी में अंजाम दिया गया है । कहानी मन पर प्रभाव स्थापित करने में अत्यंत सफल सिद्ध हुई है ।   
‘कुंजड़ क़साई’मुस्लिमों के बीच पनप रही जाति व्यवस्था पर केन्द्रित कहानी है,जिसमें प्रमुख पात्र एम.एल.कुरैशी निम्न जाति के दंश को सहता हुआ, पीड़ादायक परिस्थितियों से गुज़रता है । उच्च जाति- निम्न जाति के व्यक्ति को ताउम्र किस प्रकार ग्लानिआपुरित रखते हुए, अपने लिए आनंद और फ़ख्र की बात समझती है, कहानी बेहतर रूप में खुलासा करती है । एम.एल. कुरैशी को अपना सरनेम तब और भी चुभता है, जब उसका निकाह सय्यदों में होता है । वह सय्यदों की जाति व्यवस्था की ऐंठन और उच्चदंभता से आहात होता है और अंततरू विचार करता है कि व्यक्ति पढ़-लिखकर चाहे कितने बड़े ओहदे पर क्यूँ न पहुँच जाए, लेकिन जाति व्यवस्था उसे पिछड़ा ही बनाए रखेगी । एम.एल. कुरैशी जातिवाद की त्रासदी को सहता है और मानता है कि अपनी  जाति को कभी दफनाया नहीं जा सकता है, व्यक्ति को अवश्य दफ़न किया जा सकता है ।
कहानी संग्रह की अंतिम कहानी ‘फत्ते भाई’धर्म के शिकंजे में व्यक्ति की छटपटाहट और आस्था-अनास्था के बीच जीवन की बाध्यता की कहानी है । यह एक ऐसे चरित्र की कहानी है, जो मुस्लिम तो है, परंतु अपनी धार्मिक आस्था से डिगने पर समाज के समक्ष अपराधी सिद्ध हो जाता है । जब उसे  लकवा मार जाता है, तब बावजूद सारे इलाजों के ठीक न होने की दशा में अपने मित्र बलदेव के कहने पर वह अपनी पत्नी हमीदा के साथ मध्य प्रदेश के शहर कटनी में चमत्कारी हनुमान जी का प्रसाद ग्रहण करने छुपते-छुपाते जाता है, लेकिन इस बात की खबर मुस्लिम समाज में फैल जाती है । फत्ते भाई की पेशी मादरेसे में होती है और वह अपना जुर्म कुबूल कर लेते हैं कि उनसे एक अज़ीम गुनाह हुआ है । कमेटी निर्णय करती है कि फत्ते भाई हराम हो गए हैं, काफ़िर हो गए हैं । इनको फिर से कलमा पढ़ाया जाए और फिर से निकाह पढ़ाया जाए । यह कहानी एक खामोश मुस्लिम चरित्र का असमय आई शारीरिक विपत्ति के साथ मुस्लिम समाज के कड़े शिकंजे की कहानी है ।
इस संग्रह की समस्त कहानियाँ मध्यप्रदेश के पूर्वी-दक्षिणी क्षेत्र से संबन्धित हैं, जो कि बघेलखंड और छत्तीसगढ़ का सीमावर्ती क्षेत्र है। इस क्षेत्र में मुस्लिम संस्कृति में काफ़ी बदलाव आया है और वे एक साथ कई दृष्टिकोणों से परिवर्तित हुए हैं, फिर भी मुस्लिमों की मूल संस्कृति कीतमाम जड़ों की रक्षा उनमें नज़र आती है। लेखक ने मुस्लिमों की सामाजिक, धार्मिक और मानसिक दशा-दुर्दशा का गहरे तौर पर आकलन किया है । जहाँ कहानियों में कथ्य की दीर्घता, संवेदनशीलता, घटनाओं का ब्योरा है, वहीं शिल्प की दृष्टि से सपाट और सहज नज़र आती हैं और यही समस्त कहानियों की विशेषता बन गई है । लेखक ने कहानी के परिवेश में कई कटाक्ष भी किए हैं, चाहे मुस्लिमों का पिछड़ापन हो, चाहे मुस्लिमों की मानसिकता या फिर मीडिया की चालबाज़ियाँ हों । मूल रूप से कहानियों में दृश्य-विधान को सफलता के साथ उकेरा गया है, जो आँखों के समक्ष एक चित्र खींच देता है । लेखक ने नए बिम्बों को बड़ी ही खूसूरती के साथ उठाया है,जैसे- “लकड़ी से जलाने वाला मिट्टी का दोमुंहा चूल्हा जलता और उसकी लाल आँच में खाना पकाती अम्मी की आकृति कल्लू को किसी परी सी लगती थी ।”बहरहाल संग्रह की समस्त कहानियों में खास तौर पर प्रगतिशीलता की जड़ें नज़र आती हैं और यह जड़ें इस संग्रह के माध्यम से समाज के गहरे अंधकार में मूसलाजड़ की तरह धँसीं हुई हैं ।   


समीक्षक-
डॉ मोहसिन ख़ान
स्नातकोत्तर हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं शोध निर्देशक
जे एस एम महाविद्यालय अलीबाग ज़िला रायगढ़ (महाराष्ट्र)
पिन- 402 201  मोबाइल- 09860657970 


कहानी-संग्रह --- गहरी जड़ें
लेखक-अनवर सुहैल
प्रकाशन-यथार्थ प्रकाशन
2604@213 द्वितीय तल श्री बालाजी मार्किट,
नई सड़क दिल्ली-110 006
मूल्य-275 रुपये मात्र