शनिवार, 11 सितंबर 2021

तिलचट्टे



     

अम्मा के कमरे में मनहूसियत तारी थी।

ये मनहूसियत तो पूरे घर में डेरा डाले है।

जब कुछ नहीं था, तब ये घर कितना गुलज़ार हुआ करता था और जब सब कुछ है तो फिर जाने क्येां मनहूसियत के सिवा इस घर में कुछ नज़र नहीं आता।

तब घर में इतने कमरे कहां थे?

इतनी सुविधाएं कहां थीं?

नगरपालिका के सार्वजनिक नल से तब पानी बाल्टियों में भर-भरकर घर की टंकी मे ंजमा किया जाता था।

घर में बिजली नहीं थी।

लालटेन और चिमनी के ज़रिए रात गुज़ारी जाती थी।

आज एक छत के नीचे सब सुविधाएं मौजूद हैं। क़दम-क़दम पर नल की टोटियां हैं। बस, नल खोलो और पानी हाज़िर।

दोनों तल्लों में बाथरूम और पैखाना हैं

दो कमरे बाथरूम अटैच हैं।

बस कमी ये है कि अब घर में रहने वाले कम हो गए हैं।

पंछियों के पर उगे नहीं कि सब अपने नए घरौंदे बना कर फुर्र हो गए।

बचा रहा सिर्फ यादों का मकबरा...

वाक़ई ये घर अब यादों का मकबरा ही तो है।

इसी घर से सब भाई-बहनों ने तालीम हासिल की।

अच्छी-अच्छी जगहों पर काम पा कर टा-टा, बाय-बाय कर विदा हो गए।

उसका मन बेहद उदास हो रहा था।

वह अम्मा के पास बिस्तर पर बैठ गया।

बाबूजी पान का पिटारा लेकर बैठे पान का बीड़ा बना रहे थे।

अम्मा के चेहरे पर झुर्रियां बढ़ गई हैं।

उसने अम्मा की हथेली को अपने हाथ पर रखकर सहलाया।

‘‘लगता है अब इस घर में तिलचट्टे और मकड़ियां ही रहेंगी...!’’ कहकर अम्मा रोने लगीं।

वह बहुत दिनों के बाद घर आया था।

बेटे की समझ में न आया कि अम्मा को कैसे सांत्वना दे।

वाकई घर की छत और दीवारों पर मकड़ियों के बेषुमार जाले हैं और किचन की सिंक के नीचे तो तिलचट्टों ने अड्डा बना लिया है।

सम्भवतः रात-बिरात ये तिलचट्टे पूरी आज़ादी से घर में आवारागर्दी करते होंगे।

अम्मा को मोतियाबिंद के कारण धुंधला दिखाई देता है। कहते हैं कि रात के वक़्त तिलचट्टे उड़ते भी हैं। उसने तिलचट्टों को उड़ते तो देखा नहीं था, लेकिन अम्मा की व्यथा उसे समझ में आ रही थी।

अम्मा रोएं क्यों न?

इतना बड़ा घर और रहने के लिए सिर्फ दो प्राणी।

दो टाईम नौकरानी आकर खाना पका जाती है।

अम्मा परसों पैखाना जाते समय गिर गई थीं, जिससे उनके कंधे की हड्डी उखड़ गई थी। डाॅक्टर ने हाथ मोड़ कर गरदन के सहारे से उसे झुला दिया था। हिदायत थी कि कम से कम एक माह इसी तरह आराम किया जाए।

उस हाथ से कोई काम न लिया जाए।

एक माह बाद एक्सरेलिया जाएगा, फिर जैसी स्थिति होगी, वैसा निर्णय लिया जाएगा।

बाबूजी ने उसे फोन किया और वह दौड़ा चला आया।

म्ंांझला और छोटा भाई भी आते, लेकिन काम की अधिकता के कारण वे तत्काल नहीं आ सके थे।

मोबाईल के ज़रिए ऐसी ही मजबूरी तो बतलाई थी दोनों भाईयों ने।

उसकी पत्नी ने भी आदतन उसे कितना रोका था। वह नहीं चाहती कि अम्मा-बाबूजी के फोन पर वह दौड़ा चला जाए। अरे, और भी तो औलाद हैं, क्या वही भर ज़िम्मेदार है उनका?

उसने कहा था कि उसे अपनी सेहत का ख्याल रखना चाहिए।

चेहरा कैसा खड्डूस सा हुआ जा रहा है। खाया-पिया तन पर लगता नहीं। गैस के मरीज़ हो। बदन-दर्द और बीपी अलग।

पत्नी ने कहा था-‘‘क्या आपने ठेका ले रखा है?’’

पत्नी की बात सुन कर उसका गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा और हमेषा की तरह वह बिना कुछ खाए-पिए घर छोड़ दिया था...

 

 

     

दवा दुकान पर बहुत भीड़ थी।

कुछ धंधे ऐसे हैं जहां आजकल बिन बुलाए भीड़ के दर्षन हो जाते हैं।

दवा-दुकान, पेट्रोल टंकी, मंदिर-मकबरे, मौज-मस्ती के अड्डे...

धर्म और आस्था से सम्बंधित व्यवसाय आजकल सबसे ज़बरदस्त व्यवसाय है, जहां आयकर, सम्पत्ति कर आदि किसी कर-कानून की त्यौरियां टेढ़ी नहीं होतीं।

दवा-दुकान के काउण्टर पर कई सेल्समेन कार्यरत थे।

उसने एक पतले-दुबले सेल्समेन से पूछा, जिसके दांत जबड़े सहित बाहर नज़र आ रहे थे-‘‘काकरोच मारने की दवा चाहिए?’’

सेल्समेन ने बड़ी मासूमियत से उसे घूर कर देखा और अपने हाथ की पर्ची के मुताबिक दवा लगाने में मषगूल हो गया।

उसे समझ में न आया कि सेल्समेन ने ऐसा बर्ताव क्यों किया?

षायद उसने काकरोचषब्द न समझा हो, सो उसने हाथ की अंगुलियों से तिलचट्टे का बिम्ब बनाते हुए स्पष्ट करना चाहा-‘‘काकरोच यानी वो घर की अंधेरी जगहों में जो नहीं लग जाते हैं कीड़े, तिलचट्टे...’’

सेल्समेन, दूसरे ग्राहक की दवा-पर्ची पढ़ते हुए बोला-‘‘यहां नहीं मिलेगा!’’

ऐसा लगा कि सेल्समेन दांत मसूढ़ों सहित बाहर निकल आएंगे

उसने षांत स्वर में पूछा-‘‘तो फिर कहां मिलेगा?’’

तब तक दवा खरीदते, बगल में खड़े मोटे से ग्राहक ने मुस्कुराते हुए हस्तक्षेप किया -‘‘खेती-किसानी वाली जो बस-स्टेंड मंे दुकान है न, वही लोग चूहा, तिलचट्टा, खटमल आदि मारने वाली दवा रखते हैं।’’

वह समझ गया।

पैदल ही था।

उसने घड़ी पर निगाह डाली।

दिन के बारह बज रहे थे।

कई दिनों से बारिष नहीं हुई थी, सो गुस्सैल आसमान से सूरज की किरणें कोड़े बरसा रही थीं।

बदन पसीने से चिपचिपा रहा था।

सितम्बर का षुरूआती हफ़्ता था।

आसमान पर कभी बादल आते और कभी धूप इस क़दर क़हर बरसाती कि जान निकल जाए।

कहते हैं कि ऐसा मौसम डाॅक्टरों का सीज़नकहलाता है।

इस मौसम में मच्छरों और मरीज़ों की बेतहाषा बढ़त होती है।

उसने जेब से चष्मा निकाला।

धूप-छांह वाला चष्मा।

चष्मा पहनने से उसे कुछ सुकून मिला।

यदि वह टकला न होता और सिर पर प्रचुर मात्रा में बाल होते तो धूप उसका कुछ न बिगाड़ पाती।

जिस बात पर उसका बस नहीं, उसके लिए वह क्या कर सकता है?

मन में ख़्याल आया कि जेब से रूमाल निकाल कर सिर पर डाल ले, लेकिन इससे नमूना बनने का ख़तरा था।

इसलिए रूमाल से माथे पर चुचुआए पसीने की बूंदों को पांेछते हुए वह तेज़ क़दमों से बस-स्टेंड की तरफ चल पड़ा।

फौव्वारा-चैक से स्कूल चैराहा तक भीड़ बहुत थी, उसके बाद भगतसिंह तिराहा का रास्ता सूना मिला।

उसने दांए-बांए की दुकानें देखीं। वे ग्राहकों के बिना पहले जैसी ही वीरान नज़र आईं। जाने क्यों ये दुकाने मुद्दत से अभिषप्त हैं। इनमें ग्राहक आकर्षित क्यों नहीं होते?

तिराहे पर विक्की की पान दुकान दिखी।

विक्की दुकान पर था।

गोल-मटोल, वैसे का वैसा विक्की।

उसके बाल न उड़े थे, न सफेद हुए थे।

उसका चेहरा भी वही मासूम सा था।

उसे लगा कि कभी फुर्सत में पत्नी से विक्की की मुलाक़ात कराएगा और बताएगा कि विक्की उसका सहपाठी है। वह दोनों समवयस्क हैं। जाने क्येां वह असमय बूढ़ा दिखने लगा था। उसके बाल सफेद हुए और जल्दी ही झड़ गए। बत्तीस में से पांच दांत अब तक षहीद हो चुके हैं।

परसों जब वह घर से चलने लगा था तो पत्नी ने टोका था कि रूकिए जी, आपने ग़ौर किया है, आपकी भौंह का एक बाल सफेद है।

अब भौंह के बाल भी सफेद होने लगे।

वह घबरा गया था।

उसकी निगाह के सामने मध्यप्रदेष के भूतपूर्व स्पीकर श्रीनिवास तिवारी का चेहरा आ गया। क्या वह कुछ सालों बाद उन्हीं जैसा दिखने लगेगा?

नहीं, वह तत्काल आईना लेकर आंगन में चला गया। वहां तेज़ धूप की रोषनी में उसने जब ध्यान से अपनी बांईं भौंह का निरीक्षण किया तो पाया कि वाकई एक बाल सफेद है।

उसके हाथ में तेज़ धार वाली छोटी कैंची थी।

उसने कैंची की नोक का सावधानी से इस्तेमाल किया और उस बाल को जड़ से उड़ा दिया।

उस पर बुढ़ापे का हमला बहुत तेज़ी से हुआ था।

जबकि आज वह एक बैंक का सफल प्रबंधक है। रायपुर षहर में अपना एक डुप्लेक्स बंगला है। नई चमचमाती कार है। अच्छा बैंक-बैलेंस है। पत्नी, बच्चे, स्वयं और अन्य ज़रूरी सामानों का उसने बीमा करवाया हुआ है। कहीं किसी रिस्कका सवाल नहीं। बच्चों को बोर्डिंग में डाला हुआ है। पत्नी घर के पास एक स्वयं-सेवी संस्था में म्यूज़िक-टीचर है।

तकरीबन पचास-साठ हज़ार रूपए हर साल वह भारत-सरकार को आयकर के रूप में अदा करता है। सभी कुछ वेल-सेटल्डहै।

कोई कमी नहीं, सिवाए सिर के इस उजड़े चमन के। जो बाल नहीं उड़े वे अब सफेद होते जा रहे हैं। वह तो भला हो हेयर-डाईकरने वालों का। वरना अब तक तो वह मुहल्ले के बच्चों का नानाजी, दादाजी कहलाता।

उसका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता।

काम की अधिकता, षहरी जीवन की आपाधापी के कारण दिन में दो बार उसे गैस्ट्रिक की दवा लेनी पड़ती है। सुबह नाष्ते के बाद ब्लड-प्रेषर की एक गोली खाना ज़रूरी है। सप्ताह में दो-तीन बार सिर-दर्द की गोली का इस्तेमाल न करे तो सिर से भेजा निकल कर हाथ में आ जाए। ऐसा ख़तरनाक सिर-दर्द होता है उसे।

उसने अपनी कई आदतें बिगाड़ ली हैं।

मसलन देसी स्टाईल वाले पैखाने में वह खुलासा नहीं कर पाता।

कुर्सी वाले कमोड पर अखबार पढ़ते हुए षौच करना उसकी आदत है।

इसीलिए नाते-रिष्ते में यदि जाना पड़े तो वह क़ब्ज़ का मरीज़ हो जाता है।

पैतृक मकान में भी उसने कुर्सी वाला कमोड लगवा रखा है। अम्मा को जब घुटने के दर्द की षिकायत थी, तब उसने पांच हज़ार का चेक बाबूजी के नाम भेज दिया था कि वह घर में एक पैखाने को मोडिफाईडकरा लें।

वाकई कमोड लग जाने के बाद अम्मा को काफी आराम मिला। पहले पैखाना या पेषाब जाने के नाम से वह घबराया करती थीं कि एक बार उकड़ू बैठ जाने के बाद उठ भी पाएंगी या नहीं।

वैसे पत्नी उसकी इस फिजूलखर्ची पर बहुत चिड़चिड़ाई थी।

पति अपने परिवार वालों पर एक भी धेला खर्च करे तो पत्नी के लिए वह फिजूलखर्ची का सबब था। जब उसने समझाया कि फिर अम्मा को यहीं रायपुर ले आना होगा। तभी उनकी सही देखभाल हो पाएगी।

पत्नी का गुस्सा भड़क उठा थी-‘‘काहे, क्या हमारी ही ज़िम्मेदारी है उनके देखभाल की। मंझले और छोटे भईया काहे उनका ख्याल नहीं रखते। उनकी क्या कोई ज़िम्मेदारी नहीं। और जो चटर-चटर मुंह चलाती हैं आपकी बहनें, जब भी मैके आती हैं, घर से कुछ न कुछ ले ही जाती हैं। उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती। एक आपई श्रवन-कुमार हैं का?’’

वह जानता है कि इस लड़ाई का कोई अंत नहीं होता।

हां, गुस्से और तनाव को नियंत्रण न कर पाने के कारण वह भी पत्नी से काफ़ी लड़ लेता और फिर विरोध-स्वरूप एक-दो टाईम का खाना घर में नहीं खाता। फिर जब स्थिति सामान्य हो जाती, जब कहीं जाकर वह खाना खाता। उसे मालूम है कि सब कुछ पास होने के बावजूद उसके पास बहुत कुछ नहीं है। इसी बहुत-कुछको पाने के लिए वह परेषान रहता।

अममा-बाबूजी की सेवा करके उसे बहुत सुकून मिलता है।

उसे लगता है कि वह खोया हुआ बहुत-कुछयही तो है!

ल्ेकिन क्या इस जीवन में यह सम्भव हो पाएगा?

फिर भी वह पत्नी से छिपाकर अममा-बाबूजी के नाम हर माह दो हज़ार रूपए भेज दिया करता है। एक हज़ार तो नौकरानी ले जाती है। बाकी से अम्मा का सब्ज़ी वगैरा का खर्च निकल जाता। बाबूजी की पेंषन से घर के अन्य खर्च चलते। मंझला भाई भी छठे-छमाहे चार-पांच हज़ार रूपए अम्मा के हाथ रख जाता है। हां, छोटू निकम्मा है। वह पूरी तरह अपनी ससुराल पर आश्रित है। वह अपने जन्म-स्थान से नाता तोड़ बैठा है।

दो बहनें हैं तो दोनों अपनी-अपनी ससुराल में हैं।

साल-डेढ़ साल में एक्कोबार मैके का दौरा लगा जाती हैं।

पत्नी उन्हें क्यों कोसती है, वह आज तक समझ नहीं पाया।

हां, एक बार मूड ठीक देख उसने पत्नी से पूछ लिया था कि तुम अपनी ननदों से क्यों इतना खार खाए रहती हो।

तब उसने बताया था-‘‘अम्मा के षरीर पर आपने कभी ध्यान दिया है?’’

पत्नी का चेहरा उससे देखा नहीं गया। जब भी उसके दिल में नफ़रत के षोले भड़कते हैं तो उसका सुंदर सा चेहरा चु़ड़ैलों जैसा हो जाता है।

उसने अनभिज्ञता प्रकट की।

‘‘उनके हाथ में सोने की चार चूड़ियां हुआ करती थीं। अब सिर्फ दो बची हैं। उनके गले में मंगल-सूत्र के अलावा सोने की एक मोटी सी चैन हुआ करती थी, वह कहां ग़ायब हो गई? करधन और पायल की कोई गिनती न थी, लेकिन अब उनके सारे ज़ेवरात कहां गए? गहना ले जाएं बेटियां और उनका गू-मूत साफ़ करे बहू! ऐसा होगा नहीं। बेटियां काहे उनकी सेवा नहीं करतीं। जब मिलेंगी, बहुओं के खि़लाफ़ अम्मा के कान भरती रहेंगी। सिर्फ बटोरना ही जानती हैं वे?’’

वह क्या जवाब देता।

बेटियां तो पराया धन होती हैं।

दुनिया के तमाम दामाद उसकी तरह बेवकूफ नहीं होते जो पत्नी के दबाव में आकर ससुराल में महींनों पड़े रहते हैं और सास-ससुर की खि़दमत किया करते हैं।

इसी से चिढ़कर उसने एक बार पत्नी से कह दिया था कि जितना दिन मैंने अपनी ससुराल में गुज़ारा है, उसका पचास प्रतिषत भी तुमने अपनी ससुराल में नहीं बिताया।

लेकिन वही बात कि अंधे के आगे रोईए अपना दीदा खोईए।

वह अपने जीवन से क़तई संतुष्ट नहीं था।

वह अक्सर मदर-इंडियाका वह गीत गुनगुनाया करता-

‘‘दुनिया में जो आए हैं तो जीना ही पड़ेगा

 जीवन है अगर ज़हर तो  पीना ही पड़ेगा।’’

 

 

 

     

और विक्की, उसके बचपन का दोस्त, जिसका धंधा उतना जमा नहीं है लेकिन फिर भी कितना बिंदास, कितना स्वस्थ, कितना टनाटन् दिखता है।

विक्की उसे देख कर मुस्कुराया-‘‘और मुकेष भाई, दूज का चांद हो गए हो भईया?’’

वह जवाबन मुस्कुराया।

वह जानता है कि उसकी मुस्कान काफ़ी हद तक पेषेवराना मुस्कुराहट है।

इस मुस्कान में आत्मीयता का पुट डालने की कला क्या उससे छिन चुकी है?

उसने विक्की से एक सिगरेट मांगी।

उसने सोचा कि गर्मी का मुक़ाबला गर्मी से किया जाए।

जिस तरह लोहा लोहे को काटता है, उसी तरह गर्मी, गरम को काटेगी।

‘‘इस बार बहुत दिनों बाद...!’’ विक्की की षिकायत।

‘‘हां यार! नौकरी और बाल-बच्चों के कारण इधर आना नहीं हो पाता।’’

‘‘तो इसी तरफ ट्रांसफर क्यों नहीं करवा लेते?’’

प्रष्न तो अतिसाधारण था।

लेकिन क्या ये सम्भव है?

पत्नी इस छोटे से क़स्बे में रहना नहीं मांगती। बच्चों के लिए यहां वैसा स्कूल कहां, जैसा कि रायपुर में है। उसने मन ही मन सोचा कि यहां कोई लाईफ़ है।

सब कुछ वैसा ही ठहरा-ठहरा सा।

कहीं कोई परिवर्तन नहीं।

कोई मनोरंजन का साधन नहीं।

पैसा कमाए भी तो कहां खर्च करे आदमी।

ऊपर से बूढ़े माता-पिता की मान्यताएं...

बहू नौकरी न करे।

सिर्फ घर सम्भाले और अस्तित्वहीन बन कर जीवन गुज़ारे।

वो तो जब ख़बर मिली कि अम्मा का पैर फिसला है और वह गिर पड़ी हैं तो उसे आना पड़ गया।

अम्मा के कंधे की हड्डी उखड़ गई थी।

बाबूजी ने नीचे वाले मुहल्ले के एक पुराने पहलवान को बुलाकर उसे बिठवा दिया था।

अम्मा को अब आराम है।

लेकिन मोतियाबिंद और मधुमेह के कारण उन्हें अब दिखलाई कम देता है।

जब मुकेष घर पहंुचा तो अम्मा उसे देखते ही रो पड़ीं।

बाबूजी ने बतलाया कि अब इसे तेज़ रोषनी ही में ठीक दिखलाई देता है। थोड़ा भी अंधेरा हो तो कुछ नहीं दिखता।

उसने कहा कि अम्मा को रायपुर ले जाता हूं। वहां आंख के अच्छे-अच्छे डाॅक्टर हैं।

नई-नई मषीनें आ गई हैं आजकल जिनसे बिना किसी चीर-फाड़ के आंख का आपरेषन हो जाता है।

लेकिन बाबूजी तैयार नहीं हुए।

बोले अब इसे और कितना देखना है।

दोनों आंख में मोतियाबिंद का आपरेषन हो चुका है।

जब नगर में कांटेक्ट-लैंस नहीं आया था, तब आपरेषन हुआ था।

परिणामतः आंखों पर मोटे-मोटे कांच का भारी चष्मा लगाना पड़ता है।

चष्मा आंख पर न रहे तो फिर सब कुछ अंधेरा ही अंधेरा रहता है।

बाबूजी ने बतलाया है कि मधुमेह पर नियंत्रण हो नहीं पाता, इसीलिए निगाह की रोषनी घटती जा रही है।

डाॅक्टर ने बताया है कि मधुमेह पर नियंत्रण रखा जाए और चावल-आलू-चीनी से परहेज़ किया जाए।

लेकिन तुम्हारी अम्मा मानती कहां है।

नौकरानी आई नहीं कि चुपके से एक मुट्ठी चावल दुपहर मे बनवा ही लेती है।

मैं क्या करूं।

अब इसी तरह बुढ़ापा कटेगा।

अम्मा बिस्तर पर बड़ी देर तक पड़ी रहीं और बाबूजी की षिकायत सुनती रहीं।

फिर उन्होंने बाबूजी के खि़लाफ़ ज़हर उगलना षुरू कर दिया।

‘‘इनकी बातों मे मत आना बाबू। तेरे बाबूजी तो चाहते हैं कि मैं मर जाऊं और इन्हें आराम मिले।’’

अम्मा रोने लगीं।

‘‘देखता नहीं, पूरे घर में ये अंधेरा करके बैठे रहते हैं। कहते हैं कि बिजली का बिल ज्यादा आता है। मेरी आंख लगी नहीं कि ये झट कमरे की लाईट बुझा देते हैं। ऐसा लगता है कि ये घर नहीं भूत-बंगला हो।’’

बाबूजी की ये पुरानी आदत है।

उनके बारे में तो मज़ाक में ये भी कहा जाता है कि घर में मेहमान आएं तो, बात-चीत षुरू होने के बाद एक बार लोग एक-दूजे का चेहरा देख लें, फिर लाईट जलते रहने का क्या लाभ! लाईट बुझा देनी चाहिए।

बात भी सही है।

बचपन से ही बिजली की बचत का जो पाठ बाबूजी ने पढ़ाया था कि वह आज भी अपने आफिस से निकलते समय पंखा और लाईट बंद कर देता है।

अम्मा की हिचकियां बंध गई थीं।

मुकेष ने ग़ौर किया कि कितना दुबला गई हैं अम्मा!

जैसे हड्डियों का ढांचा बन गई हों।

एक ज़माना था कि वह मोटी-ताज़ी हुआ करती थीं।

सिलाई, बुनाई, कढ़ाई और अचार-पापड़-बड़ी आदि कला में पारंगत हुआ करती थीं।

अम्मा उस ज़माने में सरिता, मनोरमा जैसी पत्रिकाओं के बुनाई-कढ़ाई विषेषांक खरीदा करती थीं।

अब मधुमेह जैसी नामुराद बीमारी के कारण उनका जिस्म खोखला हो गया है।

अम्मा के आरोप सुनकर बाबूजी हंसने लगे।

बोले-‘‘बस, ऐसे ही बिना बात ये मुझसे झगड़ते रहती है। जब जीत नहीं पाती तब खामखां रोने लगती है।’’

फिर अम्मा से बोले-‘‘अपने बेटवा से और षिकायत बतिया ले ताकि तेरा कलेजा ठंडा हो जाए।’’

बाबूजी ने टेबिल पर रखा पान का पिटारा उठाया और पान बनाने की तैयारी करने लगे।

उन्होंने अम्मा से पूछा-‘‘तेरे लिए भी पान बना दूं?’’

अम्मा ने चिढ़कर सुबकते हुए कहा-काहे, ज़हर नहीं खिला देते।’’

बाबूजी दो पान बनाने लगे।

पान खाकर अम्मा कुछ सामान्य हुईं।

मुकेष ने महसूस किया कि घर में कितनी वीरानी है।

दो तल्ले का मकान।

आठ कमरे और एक बड़ा हाॅल।

रहने वाले बस दो लोग।

कितनी बड़ी विडम्बना है।

जब घर भरा-पूरा था, तब इस घर में इतने कमरे न थे।

कितनी मुष्किल से गुज़ारा होता था।

अब सभी भाई-बहिन अपने-अपने घरौंदों में व्यस्त हैं और ये घर भूत-बंगला बन गया है।

पान खाकर अम्मा ने पूछा-‘‘आज सुरसत्ती नहीं आएगी क्या? उसके बारे में पता क्यों नहीं लगाते?’’

बाबूजी ने कहा कि अभी उसके आने में एक घण्टा बचा है।

दस बजे आती है सुरसत्ती, फिर मषीन की तरह घर को साफ-सुथरा करके, रसोई में जाकर दो जन का खाना पका, बर्तन धो-मांज कर कब चली जाती है, पता ही नहीं चलता।

दूसरे टाईम वह षाम पांच बजे आती है और रात का खाना पका कर रसोई साफ कर चली जाती है।

मुकेष ने सोचा कि सुरसत्ती न होती तो इन बुजुर्गों का क्या होता?

सुबह जब वह आॅटो से उतरा तो पड़ोसी गजार्दन भैया अपने कुत्ते को टहला कर वापस लौटे थे।

मुकेष ने उनका अभिवादन किया था।

जब गजार्दन भैया ने कहा था कि चाचा-चाची को आप लोग एकदम भूल गए हैं।

उनकी उम्र अब अकेले रहने की नहीं।

उन्हें अपने साथ ले क्यों नहीं जाते?

मुकेष उन्हें कैसे समझाता कि समस्या क्या है।

साझे के काम में ऐसा ही होता है।

अम्मा-बाबूजी के तीन बेटे हैं।

सभी सोचते हैं कि वे ही इस संसार में सबसे ज्यादा दुखी और व्यस्त हैं।

किसी के पास इन बुजुर्गों के लिए समय नहीं।

 

 

 

     

मुकेष के कानों में अम्मा की आवाज़ गूंज रही थी।

‘‘अब इस घर में तिलचट्टे ही तिलचट्टे रहेंगे?’’

अम्मा की आवाज़ में एक अजीब तरह का डर समाया हुआ था।

चष्मे के अंदर से झांकती अम्मा की आंखें भयानक रूप से बड़ी दिखती हैं कि छोटा बच्चा डर जाए। चष्मा न पहनें तो उन्हें कुछ नज़र नहीं आता।

हां, बाबूजी ने रंगीन टीवी के स्क्रीन का कंट्रास्ट और ब्राईटनेस बढ़ाकर इतनी चमक पैदा कर दी है कि अम्मा बड़े मज़े से टीवी के कार्यक्रमों का आनंद लिया करती हैं।

चूंकि बाबूजी पेंषन की रकम से घर का खर्च चला रहे हैं, इसलिए खर्च मे कटौती के लिए काफी परेषान रहते हैं।

जब से सरकार ने मुई बिजली महंगी कर दी और घर-घर मे इलेक्ट्रानिक मीटर लगा दिए, तब से बाबूजी बिजली के बिल को कम से कम कराने के लिए प्रयासरत रहते हैं।

वह जहां बैठकर अख़बार पढ़ते हैं, वहां बाहर से अच्छी रोषनी आती है और ठीक उनकी नज़र के सामने बिजली का मीटर लगा हुआ है।

वह बार-बार मीटर देखते रहते हैं कि अब लाल बत्ती जली और टूं की आवाज़ आई।

उन्होंने पूरे घर में बिजली बचत वाले कम वोल्ट के महंगे बल्ब लगवा लिए हैं।

उसके बाद भी ये बल्ब बिना ज़रूरत दिन में क़तई नहीं जलाए जा सकते।

हां, अम्मा के लिए रियायत रहती है कि यदि वह सो न रही हों तो पावर-सेवरबल्ब जलाए रख सकती हैं।

बाबूजी देखते रहते हैं।

जैसे ही अम्मा की आंखें बंद हुई नहीं कि टीवी और बल्ब का स्विच आॅफ कर देते हैं।

अम्मा की जब आंख खुलती है तो अंधेरे की भयावह परछाईयां बड़े-बड़े तिलचट्टों में बदल जाती हैं।

और अम्मा डर कर रोने लगती हैं।

 

     

किसानों के लिए खाद-बीज और दवा वाली एक दुकान बस-स्टेंड पर मिल गई।

वहां एक भी ग्राहक न था।

मुकेष ने देखा कि उसका मालिक तो वही पत्रकार है, जो कभी काॅलेज का छात्र-नेता हुआ करता था।

उसने पत्रकार को नमस्कार किया।

लगा पत्रकार ने उसे पहचान लिया-‘‘और कैसे?’’

उसने कहा-‘‘घर में तिलचट्टे बहुत बढ़ गए हैं। मकड़ियों ने जाले डाल लिए हैं। कुछ मकड़ियां तो भयानक रूप से बड़ी हो गई हैं। ऐसी दवा दीजिए कि इनसे मुक्ति मिल जाए।’’

पत्रकार हंस पड़ा-‘‘सब भगवान के बनाए जीव हैं भईया। खैर, मेरे पास कई अच्छी दवाएं हैं, जिनके छिड़काव से तिलचट्टे और अन्य कीड़े-मकोड़े मर जाएंगे। उन्हें नया अड्डा बनाने में सालों लग जाएंगे।’’

फिर उसने कई दवाएं निकालीं और उससे पूछा-‘‘स्प्रे करने के लिए घर में कुछ है?’’

उसने कहा-‘‘है तो वह भी, लेकिन उसे ढूंढना टेढ़ी खीर होगा। आप एक स्प्रे-गनभी दे ही दें।’’

दवाएं और उनके इस्तेमाल का तरीका ध्यानपूर्वक सुना।

फिर पोलीथीन में तमाम सामान डालकर वह घर की तरफ चल पड़ा।

उसके दिमाग में एक प्रष्न रह-रह कर कौंध रहा था कि तिलचट्टे तो मर जाएंगे, लेकिन क्या उसके बाद भी अम्मा का मन उस घर लगेगा ही?

क्या अम्मा को तिलचट्टों के प्रेत नहीं डराया करेंगे?

उसके पास इन प्रष्नों कर कोई जवाब न था।

बुधवार, 21 अप्रैल 2021

अशोक भौमिक की पेंटिंग पर कविता

 बच निकलने की राह 

आसान भी, दुरूह भी

समय प्रतिकूल है तो क्या

हम खत्म होने से पहले 

बचा ले जाएंगे बहुत कुछ

इतना कि पड़ जाए 

बिना ऊंच-नीच, भेदभाव वाली

एक नई सभ्यता की नींव 


कि यह इमारत हो चुकी खंडहर

इसे टूटना ज़रूरी है।।।।







शनिवार, 6 मार्च 2021

समीक्षा शाकिर उर्फ़ : रामनाथ शिवेंद्र

 अनवर सुहेल का कहानी संग्रह शाकिर उर्फ ......




मेरे सामने है जो अभी-अभी प्रकाशित हुआ है सभी जानते हैं कि अनवर सुहेल का नाम कहानी जगत में बहुत ही जाना पहचाना नाम है। प्रस्तुत कहानी संग्रह सुहेल भाई ने बहुत पहले ही मेरे पास भेज दिया था लेकिन अपनी परेशानियों के कारण उक्त संग्रह मैं पढ़ नहीं पाया था। इधर चार-पांच दिनों से मैं उक्त संग्रह को पढ़ रहा हूं। संग्रह की सारी कहानियां जिन तथ्यों को उजागर करती है वे तथ्य मानवीय
समीपता के विभिन्न पहलुओं को छूती हुई उन भेदों तथा रहस्यों को उजागर करती हैं जो एक आदमी को दूसरे आदमी से धर्म के नाम पर जाति के नाम पर संप्रदाय के नाम पर तथा अन्य सरोकारों के
आधार पर अलग करते हैं। उक्त संग्रह में कुल दस कहानियां है पहली कहानी है शाकिर उर्फ.... इसी कहानी के नाम पर कहानी संग्रह का नाम रखा गया है। आइए कहानी के नायक शाकिर से मिलते हैं। शाकिर ट्रेन की एक बोगी में सवार है और एक स्टेशन पर एक दूसरा व्यक्ति जो मैं नामक पात्र है वह भी उसमें सवार होता है शाकिर उसे बैठने की जगह देता है जाहिर है कुछ देर के बाद दोनों में बातचीत होती है फिर पता चलता है यह जो ट्रेन में सवार राजू नामक व्यक्ति है जिसने अपना नाम राजू बताया था वह व्यक्ति राजू नहीं शाकिर है, यही कहानी का पूरा कथ्य है और यही कथ्य राजू का अपना असली नाम बताना जो जाति बोधक तथा धर्म बोधक है वही कहानी को विस्तार देता है और सोचने के लिए मजबूर करता है कि यह जो मानव समाज में जाति के संबोधन वाले नाम है ये भी बहुत ही खतरनाक ढंग से समाज को बांटने का काम करते हैं देखिए शाकिर खुद बताता है कि उसने अपना नाम राजू क्यों रखा? "इस राजू नाम के कारण देश प्रदेश में कहीं कोई परेशानी नहीं उठानी पड़ती काम की हुनर ही हमारी पहचान बन गया है । लोग मेरे काम के कारण पहचानते हैं और अल्लाह का करम है कि मेरे जैसे बेल्डर बहुत ही कम है । बहुत रिस्क लेता हूं साहब बचपन से ही तभी तो आज इज्जत दार ढंग से रोजी रोटी चल रही है"
कहानी का कथ्य यह है कि जब तक वह शाकिर था तब तक उसे काम मिलने में बहुत ही दिक्कत होती थी लोग संकोच करते थे या नफरत दोनों संभव है उसे काम नहीं मिलता था अचानक उसने अपना नाम शाकिर से राजू बदल दिया फिर उसे किसी काम की कमी नहीं और समाज के मुख्यधारा में मैं शामिल होकर काम करने लगा।'
सोहेल भाई कहानी के माध्यम से उस भेद उपभेद को खोलते हैं जो आज के समय में बहुत ही खतरनाक ढंग से हिंदू और मुसलमान के नाम से अलग करता है। यह जो धर्म भेद है इतना विस्तारित हो गया है कि लगता ही नहीं कि आदमी और आदमी के बीच में कुदरती बोध विनम्रता कहीं से बची हुई है।
संग्रह की दूसरी एक अनिवार्य कहानी है होलोकास्ट...
होलोकास्ट का नायक सलीम टीवी देखता है टीवी पर समाचार जो आते हैं उसे सुनता है और वह घबरा जाता है कि यह दौर कहीं हिटलर वाला तो नहीं,.
हिटलर के समय में जाति और धर्म की शुचिता के नाम पर बहुत कुछ किया गया था जिसे दुनिया ने, जिसे मानव सभ्यता ने नापसंद किया था और वही दौर लगता है फिर आ गया है। उसकी पत्नी उसे बार-बार रोकती है टीवी वगैरह मत देखा कीजिए काहे के लिए अपना दिमाग खराब करते हैं टीवी देखने से क्या मिलेगा आपको बेमतलब झंझट में फसे रहते हैं जो होगा होगा उसके बारे में पहले से ही चिंतित हो जाना या ठीक नहीं। क्या होने वाला है या हो जाएगा इसके बारे में सोचनाखुद को मानसिक रोगी बनाना यह ठीक नहीं है । लेकिन सलीम परेशान हैं और एक दिन उनकी यह परेशानी इस रूप में उभरती है की किसी कॉलेज में बाहर पढ़ रही बिटिया को वे निर्देश देते हैं कि....
"इसलिए याद किया बिटिया इतनी सुबह को कि देखो तुम जो हिजाब लगाती हो ना अब यह हिजाब पहनना बंद कर दो, दिल्ली में रहती हो समय ठीक नहीं है हिजाब के कारण तुम पहचान में आ सकती हो कि तुम एक मुसलमान लड़की हो, समझी बिना हिजाब के तुम एक साधारण हिंदुस्तानी लड़की दिखोगी"
सलीम की बिटियां आधुनिक है समझदार है वह अपनी मां से बोलती है....
"पापा को बोल दीजिए की टीवी पर न्यूज़ देखना कम करें और फेसबुक तथा व्हाट्सएप कम चलाएं तभी उनका टेंशन कम होगा। ऐसा होता है क्या? मैं इंजीनियरिंग कर रही हूं हिजाब मेरी पहचान है मुझे हिसाब से कंफर्ट लगता है जाने कब से हिजाब पहन रही हूं कॉलेज में भी कोई एतराज नहीं करता बल्कि टीचर्स मुझे रिस्पेक्ट देते हैं । यह देश हम सबका है मम्मी पापा को बोल दीजिए पापा को फोन दीजिए, मुझे उनसे बात करनी है और सलीम की पत्नी ने उन्हें फोन दे दिया।
और सलीम का जवाब देखिए .....
ठीक है बेटा तुम्हारी जैसी मर्जी तुम समझदार हो मौजूदा समय के हालात और आसपास के लोगों को देखकर कांसस रहा करो, अब बस इतनी बात तो मान लो।
संग्रह की एक कहानी है ट्यूबलाइट । यह संग्रह की पूर्ण रूप से अनिवार्य कहानी जान पड़ती है इस कहानी के माध्यम से अनवर सुहैल ने यह बताने की कोशिश की है की जीवन जीना है अगर र तो कुछ ना कुछ खुद में बदलाव करना होगा और वह बदलाव होता है ....वसीम नामक पात्र अपना नाम बदलकर शौर्य प्रताप सिंह रख लेता है फिर तो उसके पास सोशल मीडिया के माध्यम से तमाम तरह की संदेश आने लगते हैं और वह कभी वंदे मातरम बोलता है तो कभी भारत माता की जय बोलता है तो कभी जय श्री राम बोलता है। ऐसा उसने इसलिए किया है क्या है ताकि वह भारत मे रह सके और अपना जीवन निर्वाह कर सकें । स्थितियां काफी बदल चुकी हैं ऐसी हो चुकी हैं की मुसलमान बन के रहना उसे समझ में आता है कि यह भारत में संभव नहीं है । कहानी कई तरह के तथ्यों को प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ती है और संदेश देती है कि यह जो धर्म का छद्म युद्ध लड़ा जा रहा है वह किसी भी धर्म के साथ नहीं है बल्कि वह केवल आदमी और आदमी के बीच गहरी खाई खोदने का काम कर रहे हैं।
संग्रह की और कहानियां भी जैसे "गोकशी " "डाली" "जीव हत्या " नरगिस रुखसाना " "मोहन" "एसी"ये सब ऐसी कहानियां हैं जो भारत के अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज के मानसिक दुख दर्द एवं सोचो का बयान करती है कि बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के वजह से आज का जो मुस्लिम समाज है वह न केवल भयभीत है बल्कि सोच में भी है कि उसे जिंदा रहने के लिए क्या करना चाहिए । वह यह भी सोचने लगा है क्या धर्म जीवन जीने का तरीका बताता है अगर ऐसा है फिर तो जो कई तरह के धर्म है इनमें आपस में भेद क्यों है भेद क्यों है ? सोहेल भाई बहुत बारीकी से मुस्लिम पहचान के संकट को उजागर करते हैं तथा यह बताने का प्रयास करते हैं कि यहां का मुस्लिम समाज भारतीय समाज में अपनी भूमिका के लिए कैसा प्रयास करें तथा उसके प्रयास को मान्यता भी मिले । उसकी पहचान ही विलुप्त होती जा रही है उसे कभी आतंकवादी बताया जाता है कभी देशद्रोही बताया जाता है तो कभी कुछ बताया जाता है । नफरत की दीवार लगातार खींची जा रही है जो किसी भी धर्म के अनुकूल नहीं है । धर्म तो सहकार सहिष्णुता ,विनम्रता आपसी मेलजोल का नाम है ।धर्म किसी में भेद नहीं करता । धर्म में जाति भेद ,लिंग भेद, अर्थ भेद है ही नहीं , धर्म तो जोड़ने का काम करता है तोड़ने का नहीं । धर्म मे तो कुदरती बोध होता है है समत्वम बोध वाला, वहां भेद,उपभेद है ही नहीं।
साकिर उर्फ कहानी संग्रह एक ऐसा कहानी संग्रह है जिसे हर आदमी को पढ़ना चाहिए तथा समझना चाहिए यह जो आदमी और आदमी के बीच भेद पैदा किया जा रहा है जाति और धर्म के नाम पर वह पूर्ण रूप से गलत तथा कुदरत विरोधी है । तथा समझना यह भी चाहिए कि की दुनिया में एक ही धर्म क्यों नहीं है? कहीं इस्लाम है कही हिंदू धर्म है ,कहीं ईसाई धर्म है कहीं और धर्म है । कई तरह के धर्म आखिरकार दुनिया में क्यों आ गए ,? और उनके प्रणेताओं में किसी भी तरह का द्वन्द नहीं ,मोहम्मद साहब से राम का झगड़ा नहीं ,राम का ईशा से झगड़ा नहीं फिर आज का जो समाज है जो हमारा मानव समाज जाहिर है राम एक तरह के अलग व्यक्तित्व है तो कृष्ण जी भी एक अलग तरह के व्यक्तित्व है ।सभी एक अलग तरह के व्यक्तित्व हैं ये सारे धार्मिक व्यक्तित्व कहीं भी आपस में भेद नहीं रखते और नहीं एक दूसरे की नकल करते हैं । दिक्कत यह है कि हम नकल करने के चक्कर में झगड़ रहे हैं मारपीट कर रहे हैं नफरत फैला रहे हैं जिसे कभी भी सक्रिय मानव सभ्यता स्वीकार नहीं सकती और वह भी जब हमारा समाज लोकतांत्रिक समाज हो...तो इसे क्या कहा जाए केवल दुख ही प्रकट किया जा सकता है।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

ज़ुबैर सैफ़ी की कविताएं


ज़ुबैर सैफ़ी  की कवितायेँ :











बेशक, नज़्म कहीं भी हो सकती है। इन पंक्तियों के रचयिता को सलाम। अपनी खुशहाल ज़िंदगी मे पेवस्त दिलो-दिमाग को बड़ी वर्जिश करनी पड़ती है नज़्म को आत्मसात करने मेंऔर हम वाकई इन अहसासात को महसूस कर पाने के काबिल नहीं हैं भाई। ------------अनवर सुहैल )

~ईंट भट्टे का कवि (1)
कवि ईंट भट्टे पर दूर से लाया गया था,
वो सालाना झुंडों में लाये जाते,
कच्चे फूस और चटका ईंटों पर रखी काली पिन्नियों से बने घर में,
कविताएं उगतीं,
कवि माटी घोटता,
ईंट पाथता,
हाथ ठेले पर कच्ची ईंटें ढोकर चिमनियों पर ले जाता,
हाथ रेहड़ी और चिमनी के बीच में कविताएं ईंटों से होकर गुज़रती,
चिमनी में ईंट पकती तो,
कवि बैठकर भूसे की राख से कविता चुनता,
क्रमश: अव्वल, सोयम, दोयम, चटका,
जिसको जितनी आंच, वैसी कविता,
और कविता पक कर निकलती,
...
कवि रात में चांद देखता तो,
चांद ईंट के आकार का दिखाई पड़ता,
फलां ब्रिक फिल्ड का मुहर रूपी बिल्ला प्रेमिका के चेहरे पर चिपका होता,
कवि कच्चे चावल खाता, दाल पीता,
खैनी की थैलियां ख़त्म करता,
और सुबह ईंटों से फिर कविता उपजती,
...
कवि की कलम चिमनी है,
कवि पथेरवा है,
ईंट भट्टे पर कवि भी काम करते हैं,
बंधुआ मज़दूरी में जीवन कविता कहता है,
हर रोज़ एक नई कविता,
एकाकी जीवन में कविता नहीं होती,
ईंट भट्टों की चिमनियां बहुवचन हैं
कविता और चिमनी में क्या समानता है?
दोनों ईंट भट्टे के मज़दूर के सीने में,
सीधी खड़ी हैं!
..
कितने कवि ईंटों के चट्टों में दब कर मारे गये
हर बंधुआ के पेट से कितनी कविताएं बंधी है,
ये किस कविता में लिखा जायेगा,
कवि मज़दूर ही मर जायेगा,

चटका हज़ार ,
सोयम दोयम चौदह सौ,
अव्वल दस हज़ार ,
स्वयं में पूर्ण कविता है!



 ~तरतीब

मुकद्दर की झील में सदियों से बर्फ़ जमी हैं,
ओस के क़तरे शमशीरों की नोंक पे रखे हाथ आये हैं,
प्यास की कोयल गूंगी हो गई,
शाम की आमद ख़ूंरेज़ी है,
अब्र के टुकड़े छाती के गोश्त से टकराकर
पानी लेते हैं,
वक़्त की बरछी सीने में पैवस्त है लेकिन घूम रही है,
शाइर की नज़्मों की दस्तक गूंज रही है,
मीर ओ ग़ालिब, सौदा-मोमिन भूखे हैं,
रोटी की ज़द में ग़ज़लें तवे पर खौल रही है,
नज़्म उदासी की शलवार का नाड़ा ढीला करके,
मुंह काला करने पर आमादा है,
हातिमताई के जिन्नात की आंखो में मौत का डर है,
....
ऊपर की बकवास को पढ़कर
क्या समझे?
इक नज़्म कभी भी हो सकती है,
सूअर की चर्बी के मिसरों पर,
गाय की खाल लपेटे लफ़्ज़ भेड़ियों के दांतों पर,
नज़्म कहीं भी फंस सकती है,
रक़्कासा के घुंघरू पर वारे नोट का गांधी बिल्कुल असली है,
उस पर भी नज़्म कही जा सकती है,
गौतम-साईं के उपदेशों पर,
मेरी कोरी बकवासों पर,
नज़्म कहीं भी घट सकती है!


~अनकही
आंख आवाज़ की आवाज़ से खुलीं,
"आज फ़ुलां मर गया है,
मरना तो रोज़ की ही घटना है,
घटना से पहले असाधारण तब जुड़ता है,
जब कोई अपना मृत्यु को प्राप्त हो जाये,
..
देश की राजधानी में,
जो मरने वाले के घर से सैकड़ों मील की दूरी पर थी,
उसी रात,
भूकंप के झटके महसूस किये गये,
इस प्रश्न का उत्तर किसके पास है
कि आत्मा किसी का शरीर छोड़ती है तो
झटके और लोगों को महसूस नहीं हो सकते।
...
भूकंप आकर चला गया,
और अर्थी बनाने वाले बुलवाने से आये,
बांस फाड़े और जोड़े जाने जन्म और मृत्यु के मध्य किसी सेतु का संकेत थे,
अर्थी के विमान की आकृति पुष्पक विमान के माॅडल से मेल खाती थी,
ठीक उसी समय कहीं किसी चाय की थड़ी पर कोई नवयुवक प्रेमिका का हाथ पकड़े हुए,
विमान यात्रा का वादा कर रहा था,
"वहां से तुम्हें पूरा शहर दिखाई देगा"
एक नया शहर मृतक के घर में बस गया,
शोक मनाते लोगों का शहर,
...
राजधानी दिल्ली से स्थानांतरित नहीं की जा सकती,
मगर अर्थी स्थानांतरित की जा रही थी,
एक जनपद से दूसरे जनपद,
मृतक का घर एक जनपद की सीमा के अंत पर था,
श्मशान दूसरे जनपद के प्रारंभ में थे,
अर्थी अन्तरजनपदीय थी,
और सीमा को लेकर भी दोनों जिलों की पुलिस में कोई झगड़ा नहीं था,
अर्थी चल दी थी,
उधर प्रेमिका भी,
चाय ठंडी हो रही थी,
अग्नि जलाई जा रही थी,
एक समय में दो अप्रतिम घटनाओं का साक्षी समय था,
...
कहीं भूकंप आये,
लोग मर जायें,
मगर राजधानी से दूर,
किसी घर में फटे कलेजे में उठने वाला भूकंप किसकी दृष्टि में है,
एक समय पर, एक समय में
यद्यपि और हालांकि एक जैसे हो सकते हैं,
अर्थी और भूकंप समानार्थी भी हो सकते हैं,
परंतु अलग समय में,
कहीं किसी के शरीर से जब आत्मा खींची जा रही थी,
ठीक उसी समय दिल्ली में भूकंप के झटके लग रहे थे,
समय हमें एक सूत्र में बांधता है,
हम सब एक हैं!
प्रकाश वर्ष के मध्य के निर्वात में,
भूकंप सदाचारियों के लिये प्रणय निवेदन है,
मृत्यु दूर किसी गांव के साहूकार के लिये मूल और ब्याज दोनों का मर जाना है।




~मृत्यु की लोरी
मृत्यु घात लगाये बैठी होती है,
सर्द रातों में,
गली के नुक्कड़ पर,
उसे सर्दी भी नहीं लगती,
बिना शाॅल ओढ़े,
किसी की खोज में भटकती हुई बिरहन की तरह,
मृत्यु वो अभागी है,
जिसे विवाह की पहली रात त्यागा गया,
...
अपनी काली आंखों में सूरज की रंगत झोंके,
देखती रहती है,
कौन आने वाला है इस रस्ते!
..
मृत्यु पुरातन कथाओं की वही प्रेतनी है,
जो ना जाने कितने लोगों को रतिक्रिया के पश्चात मार देती है,
फिर भी उसको चाहिए होता है,
नया आदमी!
मृत्यु संभोग की प्यासी प्रेतनी,
...
मृत्यु के तीन स्तन हैं,
त्रिस्तनधारिणी!
तीसरे स्तन पर समय का गोल लदा है,
समय स्तन की गोलाई से घूमकर आता है,
....
स्तन तो जीवन स्त्रोत के द्योतक है,
मां के स्तन,
मृत्यु के तीन स्तन,
जैसे बच्चा जग घूमकर मां के पास लौटता है,
वैसे ही हम सब भी मृत्यु के पास ही लौटेंगे,
इस सत्य को ईश्वर ने अज्ञात ही रखा है
कि
मृत्यु हमारी 'मां' भी हो सकती है!

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

बच गए तो



यदि हम बच गए
तो भी क्या वाकई बचे रह पाएंगे
मंच पर मृत्यु का दृश्य सजा है
एक-एक कर कम होते जा रहे 
कांधा लगाने वाले और रोने वाले भी
गिनती के पात्र हैं और नेपथ्य में सूत्रधार
नाट्यशाला के दर्शक भी तो
एक-एक कर लुढ़क रहे देखो
मौत का डर हर तरफ है
भूख से या बीमारी से
दोनों हालात एक जैसे हैं
जीवित लोग जिनके घरों में
दो महीने का राशन मौजूद है
वे सिर्फ अपनों को
बचा ले जाने की जुगत में हैं
ऐसे निर्मम समय में
पूर्णतः सुरक्षित कुछ लोग
जो चाह रहे इस आपदा में
भूख, बीमारी के अलावा
नफ़रत भी बन जाए एक कारण
मौत तो हो ही रही है
एक कम, एक ज़्यादा
कोई फ़र्क नहीं पड़ता।।।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

साथ


मैं ग़मज़दा हूँ
और खामोश हूँ
एक खुन्नस सी तारी है
अपने दुखों का बयान
सिर्फ मैं ही क्यों करूँ

मेरी अपील है हमख़यालों से
मुझसे दुखों के बोझ उठाया नहीं जाता
अपने काँधे दे दो यारों
जैसे हम मिलजुलकर पहले भी
बांट लिया करते थे सुख-दुख

मैं यक़ीन है मेरी खामोशी से
तुम भी हो जाते हो गूंगे
मेरी तहरीरों को सदा तुमने
अपनी आवाज़ समझ दुलारा है
मेरी खामोशी को
दे दो अपनी आवाज़
कि इस खामोशी से
घुटता है दम।।।

(बीती रात बिटिया जामिया होस्टल में थी और हम सब ख़ौफ़ज़दा थे)

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

भूखे आदमी को कविता नहीं रोटी चाहिए....


भूखा आदमी क्या कविता लिखता है
भूखा आदमी खामोश मुझे घूरता रहा
मैने उसकी आंखों में देखी महाकाव्य की सम्भावनाएं
मैने उसकी मजबूरियों में देखीं
सम्पादकों से स्वीकृत होती कविताएं
आलोचकों की प्रशंसात्मक टिप्पणियां

कवि का टारगेट पाठक भूखा आदमी होता है
भूखा आदमी कविता नहीं पढ़ता है
भूखा आदमी पर बनी पेंटिंग कीमती होती है
उसकी बेचारगी से सिनेमा ग्लोबल हो जाता है

भूखे लोग संगठित नहीं हो पाते
खाये-पिये-अघाये लोगों से
हज़ार गुना ज्यादा होने पर भी
भूखे लोग अल्पमत में रहते हैं
भूखे लोग एक रोटी पाने की लिए
लड़ सकते हैं, मर सकते हैं
मार सकते हैं किसी को भी लेकिन
इंकलाबी नहीं हो सकते क्योंकि
भूख इंसान को हैवान बना सकती है
इन्क़िलाबी कतई नहीं।

भूखा आदमी एक अदद रोटी के लिए
हर पन्थ, हर वाद को अपना लेता है
इसलिए जुलूस में झंडा थामे, नारा लगाते
उस आदमी को गौर से देखो जिसके
स्वप्न का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ
एक अदद रोटी का जुगाड़ है
आज और अभी के लिए तत्काल
उसे नहीं चाहिए योजनाओं वाले पांच साल।।

(पेंटिंग : अवधेश बाजपेई)

गुरुवार, 24 अक्टूबर 2019

किताब की दुकान





हमारे मासूम ख्वाबों में
इन किताब की गुमटियों की
कितनी बड़ी जगह हुआ करती थी
जेबें खाली हों तब भी
किताबों के मुखपृष्ठ को
और अंदर छुपी कहानियों को
कितनी ललचाई निगाहों से सोखते थे हम
दुकानदार को मानते थे
कितना भाग्यशाली हम
जो जब चाहे जिस किताब को
घूँट-घूँट पी सकता था
और एक हम जो एक अरसे बाद ही
देख पाते थे झलक किताब के दुकान की

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करती कहानियां : गहरी जड़ें


  • बिभूति कुमार झा 

Anwar Suhail अनवर सुहैल साहेब की लिखी कहानी संग्रह "गहरी जड़ें" पढ़कर अभी समाप्त किया है। बहुत ही सार्थक शीर्षक है। समाज में जिन कुरीतियों और विचारधाराओं ने अपनी गहरी जड़ें जमा लीं हैं उन्हें उखाड़ना आसान नहीं है।
पुस्तक को एपीएन पब्लिकेशंस ने सुन्दर आवरण में मूल्य ₹160/- रखकर प्रकाशित किया है।
मैं अनवर सुहैल साहब को इस बेहतरीन और खतरा मोल लेने वाली पुस्तक के लिए बधाई, शुभकामनाएँ देता हूँ और इतना हिम्मती कार्य करने के लिये उनकी सराहना करता हूँ।
इस पुस्तक में दस कहानियाँ हैं और सभी कहानियाँ मुस्लिम परिवार, उनकी जीवन शैली, आशंका, निजी जीवन में धर्म के नाम पर हस्तक्षेप और ज्यादातर कर्मकांड के बारे में लिखी गयीं हैं। लेखक ने लगभग प्रत्येक कहानी में कट्टर धर्मान्धता, मुस्लिम समाज का जातिवाद और निजी जीवन में धर्म के नाम पर कुछ भी थोप देने का बहुत सलीके से, खुलकर, सीधा विरोध किया है। यह एक मुस्लिम लेखक के लिए दसरथ माँझी की तरह पहाड़ काट रास्ता बनाने जैसा कार्य है। लेखक ने बहुत ही हिम्मत से मुँहतोड़ साहित्यिक कुदाल चलाया है।
किसी भी समाज की कुरीतियों को साहित्य सबसे पहले उजागर करता है। कुरीतियों पर बार- बार, लगातार प्रहार कर समाज को जगाता है तभी अंत में समाज उसे अपने से हटाता है। लेखक ने मुस्लिम समाज के अनेक कुरीतियों पर तेज़ प्रहार किया है। मुझे मुस्लिम समाज की बहुत चीजों की जानकारी नहीं थी जो इस पुस्तक से मिली है।
अब कहानियों पर आता हूँ।
पहली कहानी 'नीला हाथी' में लेखक ने एक ऐसे कलाकार के बारे में लिखा है जो बहुत अच्छा मूर्तिकार था। मुस्लिम होकर हिन्दू देवी देवताओं की मूर्ति बनाता था। धर्म के ठेकेदार ने रोककर माफी मंगवायी। अब वह जुगाड़ कर एक मजार बनवाता है और मुजाबिर (दरगाह/मजार पर रहने वाला जो चढ़ावा लेता है) बन जाता है। हरा चोगा पहन, गले में रंगीन पत्थर डालकर अपने लाभ के लिये बाजार खड़ा कर देता है। बेहतरीन अंदाज में व्यंग्य है। लेखक यह स्थापित करने में सफल हो जाता है कि इस्लाम में मूर्ति पूजा मना है लेकिन एक कलाकार का मूर्ति बनाना तो जायज़ होना चाहिए।
मुझे मजाहिया शायर नश्तर अमरोही का एक सच्चा शेर याद आता है कि
'बरहम जिस्म पर चादर कोई ओढ़ाये क्यों,
सड़क की लाश है कोई मजार थोड़े है।'
इनकी रचनाओं में एक आम शहरी जो सोचता है वही हू ब हू कलम ने उतार दिया है। 1984 का सिक्ख दंगा हो, 1992 का बाबरी मस्जिद के बाद का विवाद, 1993 का मुम्बई बम ब्लास्ट या 2002 का गुजरात दंगा, सबको लेखक ने कटघरे में खड़ा किया है। लेखक मुस्लिम हैं अतः उन्होंने अपने समाज की बारीकियों और कमियों को बहुत ही अच्छे तरीक़े से रखा है।
दूसरी कहानी '11 सितंबर के बाद' में एक आम मुस्लिम जो किसी गुट में नहीं था लेकिन व्यंग्य और गंदी मानसिकता के लोगों की बातों से तंग आकर मुस्लिम खेमे में शामिल होता है, की कहानी है। आपसी वैचारिक दूरी की त्रासदी की कहानी है।

'गहरी जड़ें' जो इस पुस्तक का नाम भी है, वाकई इतनी समृद्ध है कि अकेला मुस्लिम परिवार अपने पुश्तैनी मकान में, हिन्दुओं के मोहल्ले में, इस विश्वास से रह रहा है कि साम्प्रदायिकता की हवा कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी। मुख्य पात्र अपने बच्चों और परिवार के कहने पर भी मुस्लिम बहुल इलाके में नहीं आता। यह आत्मविश्वास है। ये कहानी उन लोगों के लिए है जो अपने धर्म मानने वाले लोगों के बीच जाकर रहना चाहते हैं। भीड़ के बीच। अच्छी रचना है।

'चेहल्लुम' कहानी एक आम घर की कहानी है। दो बेटे पिता की मृत्यु के बाद माँ से सब ले लेने की राजनीति करते हैं। बेटी आकर माँ का पक्ष लेती है। मुस्लिम बेवा औरतों का पति की मृत्यु के बाद इद्दत की अवधि तीन माह तक घर से बाहर निकलना मना होता है जिसे मुख्य पात्र अम्मी ने विद्रोह कर तोड़ दिया है। अपना काम वो खुद नहीं करेंगी तो बेटे बहू इसका लाभ ले उनका सब हड़प लेने की नीयत में लगे हैं। कहानी आज के समय में जीने को कह रही है। कहानी पिछले समय के जंज़ीरों को तोड़ आगे बढ़ने को प्रेरित करती है।
'दहशतगर्द' कहानी में एक मुस्लिम युवक साम्प्रदायिक माहौल में कैसे दहशतगर्द बन जाता है, की कहानी है। मुस्लिम समाज पर लगने वाले आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच उलझे इस पात्र ने अनेक ज्वलंत प्रश्नों को उठाया है। कहानी अपनी रोचकता बनाये रखती है।

'नसीबन' एक तलाकशुदा महिला की कहानी है। इसमें सास अपने नपुंसक बेटे की पत्नी से किसी भी तरह बच्चे की आस लगा झगड़ते रहती है। विवश निरपराध औरत मायके आती है। तलाक़ मिलने पर दूसरा खुशहाल जीवन पुनः शुरू करती है। अब बस में उसे अपने पति की दूसरी पत्नी से उसके तीन बच्चों के साथ भेंट हो जाती है। तीन बच्चे कैसे आये। यह कहानी कुछ भी, कैसे भी, नैतिक या अनैतिक तरीके के बीच से निकलती है। एक औरत कैसे अपने अहं के लिये कुछ भी करवा सकती है का चित्रण है। तलाक़ मिली हुई महिला के संघर्ष की कहानी है। यहाँ "अवली" पुस्तक की एक कहानी लेखक Dr-Sarveshvar Pratap Chandravanshi सर्वेश्वर प्रतापजी की "धाधा" की याद आती है जिसमें औरत अपने बाँझ होने की गाली भी नहीं सुनती, नफरत करने वाली सास से भी अलग होना नहीं चाहती और ना ही अपने नशेड़ी पति को छोड़ना चाहती। ये दोनों कहानियाँ एक दूसरे के आमने सामने लगतीं हैं।
'पीरू हज्जाम उर्फ हजरतजी' कहानी में लोगों की आँखों में धूल झोंककर मजार के बनवाने और अध्यात्म के नाम पर ढ़कोसला, ठगी , पाखंड और व्यवसाय करवाने की कहानी है। पैसे और अय्यासी के कारण कोई रिश्ता स्थायी नहीं रह पाता। कहानी अपनी दिशा दिखाने में बिल्कुल स्पष्ट और कामयाब है।
'कुंजड़-कसाई' कहानी मुस्लिमों के अन्दर जाति प्रथा के कसक को बयां करती है। कुरैशी का विवाह सैय्यद की लड़की से होती है लेकिन उसे अपना सरनेम छुपाने को कहा जाता है। कहानी ऊँची और निम्न जाति के मिथक को तोड़ती है लेकिन मुख्य पात्र अंत तक इसे झुठला नहीं पाता।
'फत्ते भाई' कहानी एक ऐसे साधारण पति पत्नी की है जो छोटा सा काम करके अपना जीवन बसर करता है। निःसंतान है लेकिन दोनों के बीच बहुत प्यार है। दोनों खुश भी हैं। फत्ते भाई जोर का बीमार पड़ते हैं। चिकित्सा से, झाड़- फूँक, ताबीज़ के बाद भी जब ठीक नहीं होते तो किसी दूर के हिन्दू बजरंगबली के मंदिर का प्रसाद समाज से छुपाकर इस विश्वास से खाते हैं कि बीमारी ठीक हो जायेगी। ये बात मुस्लिम धर्मगुरु और समाज के ठेकेदार को पता चल जाती है। वे इसे धर्म विरुद्ध मानकर पुनः इस्लाम में दाखिल होने को कहते हैं। कुफ्र करने वाले का निकाह टूट जाता है इसलिए उसे अपनी पत्नी के साथ फिर से निकाह पढ़वाना होगा। सुनते ही फत्ते भाई का जिस्म बेसुध हो जाता है।
लेखक ये बताने में सफल हो जाता है कि किसी भी व्यक्ति को स्वयं कोई भी धर्म मानने का अधिकार है और वो अपनी मर्जी से किसी भी धर्म के किसी कार्य में भाग ले सकता है, इससे उसका अपना धर्म खतरे में नहीं आ जाता।

'पुरानी रस्सी' कहानी एक अदृश्य रस्सी की तरह एक मुस्लिम युवक का एक आदिवासी महिला के प्रति प्रेम की कहानी है। अब विवाहित महिला अपना प्रिय बकरा बेचना नहीं चाहती थी लेकिन पहले प्यार को कैसे मना कर दे। अंत तक पाठक आगे क्या होगा सोचकर बंधा रहता है।

कुल मिलाकर एक मुस्लिम लेखक द्वारा अपने समाज के अंदर का भय, आशंका, स्थिति, जातिवाद, अंधविश्वास, ठगी, गरीबी, अशिक्षा और धार्मिक कट्टरवादिता के साथ बहु संख्यक से अनेक सवाल पूछती कहानियाँ लिखी गयीं हैं। यह लेखक का भागीरथी प्रयास है। इन रीतियों की जंजीरों को तोड़ना बहुत आसान नहीं है लेकिन छोटा ही सही लेखक ने एक हथौड़ा तो मार ही दिया है। मैं लेखक को इतनी साफगोई से अपनी बात रखने की पुनः बधाई देता हूँ।
पुस्तक पढ़ने योग्य है एकबार अवश्य पढ़ें।

गुरुवार, 15 अगस्त 2019

जाने-पहचाने कातिल

kanha dubey 


एक 
जाने पहचाने क़ातिल / Anwar Suhail_____\\_____\\_____\\_____\\_____\\_____\\_____
ग़ौर से देखें इन्हें
किसी अकेले को घेरकर मारते हुए
ध्यान दें कि ये भीड़ नहीं है
भीड़ कहके हल्के से न लें इन्हें
दीखने में ये क़बीलाई लोग नहीं हैं
मानसिकता की बात अभी न करें हम
आधुनिक परिधानों में सजे
प्रतिदिन एक जीबी डाटा खुराक वाले
कितने सुघड़-सजीले जवान हैं ये
इनके कपड़े ब्राँडेड हैं वैसे ही
इनके जूते, बेल्ट और घड़ियाँ भी
अनपढ़-गँवार भी नहीं हैं ये
हिंगलिश और इमोजी के ज्ञाता हैं
फ़ोर-जी मोबाइल फ़ोन इनके हाथों में
जिनमें फ़्रंट-रियर कैमरे हैं दस-बीस मेगा-पिक्सल के
हम नहीं जान सकते हैं कि ये लोग
नौकरीपेशा हैं या छिटपुट रोज़गार वाले हैं
या कि एकदम बेरोज़गार हैं
ये अच्छी तरह से जानते हैं
कि कुछ भी ऐसा नहीं कर रहे हैं जो आकस्मिक हो
और थोड़ी भी हड़बड़ाहट नहीं है
कोई जल्दबाज़ी भी नहीं है
कितना इत्मिनान है इनमें
जान की सलामती माँगती आहों को
इनकी उन्मादी चीख़ें उभरने नहीं देतीं
कई मोबाइल कैमरे व्यस्त रहते हैं
आखेट के इन क़ीमती पलों को क़ैद करने में
कुछ साथी लाइव भी हो जाते हैं
जैसे उनमें पहचान लिए जाने का कोई डर नहीं है
ग़ौर करें कि सभी लोग नहीं पीट रहे हैं
बहुत से लोग हैं जो तमाशबीन भी हैं
इनमें हिंसा की हर हालत में निंदा करने वाले भी लोग हैं
जिन्हें झटका की जगह हलाल करना क्रूर लगता है
किसी पवित्र उद्देश्य के तहत
एक आदमी को बेदम होते तक पीटा जाता है
इतना पीटा जाता है कि वह मर ही जाता है
और ठीक इसी के साथ मर जाते हैं बहुत से
अमनो-पसंद लोगों के जिस्मों-रूह भी...

kanha dubey

दो 
जाने पहचाने क़ातिल / Anwar Suhail_____\\_____\\_____\\_____\\_____\\_____\\_____
ग़ौर से देखें इन्हें
किसी अकेले को घेरकर मारते हुए
ध्यान दें कि ये भीड़ नहीं है
भीड़ कहके हल्के से न लें इन्हें
दीखने में ये क़बीलाई लोग नहीं हैं
मानसिकता की बात अभी न करें हम
आधुनिक परिधानों में सजे
प्रतिदिन एक जीबी डाटा खुराक वाले
कितने सुघड़-सजीले जवान हैं ये
इनके कपड़े ब्राँडेड हैं वैसे ही
इनके जूते, बेल्ट और घड़ियाँ भी
अनपढ़-गँवार भी नहीं हैं ये
हिंगलिश और इमोजी के ज्ञाता हैं
फ़ोर-जी मोबाइल फ़ोन इनके हाथों में
जिनमें फ़्रंट-रियर कैमरे हैं दस-बीस मेगा-पिक्सल के
हम नहीं जान सकते हैं कि ये लोग
नौकरीपेशा हैं या छिटपुट रोज़गार वाले हैं
या कि एकदम बेरोज़गार हैं
ये अच्छी तरह से जानते हैं
कि कुछ भी ऐसा नहीं कर रहे हैं जो आकस्मिक हो
और थोड़ी भी हड़बड़ाहट नहीं है
कोई जल्दबाज़ी भी नहीं है
कितना इत्मिनान है इनमें
जान की सलामती माँगती आहों को
इनकी उन्मादी चीख़ें उभरने नहीं देतीं
कई मोबाइल कैमरे व्यस्त रहते हैं
आखेट के इन क़ीमती पलों को क़ैद करने में
कुछ साथी लाइव भी हो जाते हैं
जैसे उनमें पहचान लिए जाने का कोई डर नहीं है
ग़ौर करें कि सभी लोग नहीं पीट रहे हैं
बहुत से लोग हैं जो तमाशबीन भी हैं
इनमें हिंसा की हर हालत में निंदा करने वाले भी लोग हैं
जिन्हें झटका की जगह हलाल करना क्रूर लगता है
किसी पवित्र उद्देश्य के तहत
एक आदमी को बेदम होते तक पीटा जाता है
इतना पीटा जाता है कि वह मर ही जाता है
और ठीक इसी के साथ मर जाते हैं बहुत से
अमनो-पसंद लोगों के जिस्मों-रूह भी...