मंगलवार, 29 मार्च 2016

बेशक, जीतेगा उजाला ही : मनु स्वामी की कविताएँ

विचार और सम्वेदनाएँ घनीभूत होकर कविता के रूप में जितना अभिव्यक्त होती हैं उतना किसी और विधा में नहीं. शायद इसीलिए वर्तमान दौर में आहत भावनाओं की अभिव्यक्ति छोटी-छोटी कविताओं के माध्यम से हो रही है. ये कविता का एक ऐसा फॉर्म विकसित हुआ है जो फेसबुक की वाल के आकार की होती हैं, या ये कहें कि मोबाइल या टेब की स्क्रीन साइज़ में एडजस्ट होने वाली होती हैं. हिंदी जबसे यूनिकोड के ज़रिये बड़ी आसानी से ऑन-स्क्रीन हो गई है तब से कवि और पाठक संख्या में वृद्धि हुई है. उसी रफ्तार में लघु-पत्रिकाएं भी बढ़ीं हैं और इन पत्रिकाओं में कविता के छोटे स्वरूप को स्वीकृति मिलती जा रही है. अब लम्बी कविताएँ कम लिखी जा रही हैं. इसका मतलब ये नहीं कि लम्बी कविताओं की डिमांड नहीं है...होता ये है कि कविता के इस नए स्वरूप को पढ़ते-पढ़ते पाठकों की अभिरुचि और क्षुधा को बेशक लम्बी कविताएँ ही शांत कर सकती हैं, जिनमें विचारों और संवेदनाओं का विस्तार हो, आख्यानिक आस्वाद हो...
आज का समय इसीलिए कविता का समय है, क्योंकि आज कविता प्रतिरोध को स्वर देने का विनम्र प्रयास कर रही है. कवि महसूस कर रहा है कि विचार पर और संवेदनाओं पर पहरे डाले जा रहे हैं और कविता ही है जो एक विरोध या असहमति को सलीके से जन-मानस के समक्ष रख सकती है. सोशल साइट्स में, किताबों-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रमुखता से स्पेस कवर कर रही हैं. ये कविताएँ किसी हारमोनियम-तबले की बाट नहीं जोहतीं...किसी मजबूर के पैर में घुंघरू नहीं बंधवाती हैं. ये कविताएँ झाड-फानूस के नीचे गाव-तकिये में तोंद टिकाये खाए-अघाए लोगों का मनोरंजन करने का दावा भी नहीं करती हैं. हाँ, जब इन कविताओं में पेवस्त शब्द किसी विचार का, भावनाओं का आकार लेते हैं तो पाठक या श्रोता सहज ही इनसे खुद को जोड़ लेता है. यही कनेक्टिविटी आज की कविता की ताकत है जो पाठकों की बौद्धिक या तार्किक समझ का इम्तेहान नहीं लेती बल्कि सीधे-सीधे अपनी बात कहती है. ये सहजपन कविता की कमजोरी नहीं है...कलावादी-रूपवादी मित्र नाक-भौं सिकोडा करें भले से. इसे कविता का लोक से जुड़ाव कहा जा सकता है. कवि का अपना भावलोक होता है, अपना अनुभव-संसार होता है और प्रकृति में व्याप्त लोक-तत्व बिम्ब-प्रतीकों के रूप में अभिव्यक्ति को एक आयाम देते हैं. ये आयाम ही तो प्रथम-दृष्टया कविता को पाठक से जोड़ते हैं.
मनु स्वामी का छठवां कविता संग्रह ‘सफ़र में हूँ’ मेरे समक्ष है और इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि हमारे दौर में कविता के इस फॉर्म को जन-स्वीकृति मिल रही है. मनु स्वामी निरंतर कविता लिख रहे हैं...कविता के अतिरिक्त उन्होंने लघु-कथाएं और संस्मरण लिखे हैं. गद्य-लेखन कवि को असीमित करता है, मेरे विचार से कवि जब विधाओं का अतिक्रमण करने का उपक्रम करता है तब उसकी कविताओं की अर्थवत्ता और रेंज बढती है.
मनु स्वामी लोक-धर्मी कवि हैं. उनकी कविता में लोक बोलता है और जैसे उनका मन किसी यात्रा में रहता है. शायद यही कारण है कि उनका नया कविता-संग्रह ‘सफ़र में हूँ’ कवि की चेतना को एक जगह रुकने नहीं देती और नित नये भावलोक से यात्रा को पडाव से कवि दो-चार होता रहता है.
कवि मनु स्वामी के बिम्ब प्रतीक एक नये रूप में नई आभा के साथ प्रदीप्त होते हैं...ऐसे में मैदान की ‘दूब’ संघर्षरत आम-आदमी का आकार लेकर हमारे समक्ष आती है. ‘दूब’ जिसे गुड़ाई या निराई की ज़रूरत नहीं होती, फिर भी ह्मारे लोक में दूब अजर-अमर होती है..
ये संघर्षरत आमजन की जिजीविषा है, जिसे दूब के रूप में कविता में देखा जा सकता है---
“चाहे जब रौंद / उखाड़ दी जाती हो/ हार नहीं मानती / देखते ही देखते / हो जाती हो / हरी भरी..”
‘सर्दी’ कविता में कवि सर्दी को किसी शोषक के रूप में देखता है जो किसी आतताई की तरह डराना चाहती है आमजन को लेकिन वाह रे कवि की आमजन की प्रतिरोधात्मक सहनशीलता के प्रति आस्था...
‘सर्दी/ कितना ही / पैना कर ले / नश्तर/ कोहरे में डूबे / भोपा पुल के नीचे / जमा हो गये / खेस लपेटे / मिस्त्री और मजदूर...”
पर्यावरण से छेड़छाड़ का दुष्प्रभाव है प्रदूषण जिससे नदी अब एक ऐसे नाले में तब्दील होती जा रही है कि मन खिन्न हो उठता है. ‘काली नदी’ कविता में कवि फिर भी नदी की मृतप्राय देह पर आस्था के दीप जलाए बैठा दीखता है---“वो तो / माँ- सा / मन रखती हूँ / इसीलिए / थमी हूँ..”
छोटे-छोटे वाक्य से अद्भुत चित्रात्मक कम्पोजीशन रचते है मनु स्वामी कविताई में...
मुज़फ्फरनगर के शायर मौजुद्दीन ‘बावरा’ को याद करती कविता जैसे गंगा-जमनी तहजीब की विरासत को बचाए रखने का आव्हान करती है...
“ता-उम्र सींचते रहे / कहीं भीतर जमी/ रवायती जड़ें.
ये रवायतें हैं जो कहीं बहुत गहरे से खींच लाती हैं जीवन-रस और हरा-भरा कर देती हैं सारा परिवेश. चाहे लाख जमाना दुश्मन हो...’बावरा’ जैसी शख्सियतें एक चिराग की मानिंद रौशनी फैलाती रहेंगी.. सच है—‘’रंगे महफ़िल / उदास रहता है/ बावरा जब यहाँ / नहीं होता..’’
खेत, किसान, अन्न, श्रम और निराशा को स्वर देती कविता है ‘’अन्नदाता’’
बड़ी विडम्बना है जब पकने लगती हैं बालियाँ किसान कई सवालों से दो-चार होता है—‘’शहर/ आने लगा है/ आजकल / गाँव में/ आँखों-आँखों में / न जाने क्या/ नाप-तौल/ करता रहता है/ देखकर / धक से / रह जाता है राधे/ महज़ दस बीघा है / खेत / उस पर भी/ बदनज़र...!’
और अंत में जैसे आर्तनाद---
‘’राधे की राह/ ताक रही है/ मण्डी की / गिद्ध-दृष्टि!’’
जाने कब उबर पायेगा किसान इन सदियों पुरानी बदनज़रों और गिद्ध-दृष्टियों से...इन प्रश्नों से लोकतंत्र कभी नहीं जूझता और संसद ढीठता के साथ मौन रहती है...फिर भी हर साल किसान बीज बोता है और एक नई जिंदगी के अपने देखता है...
समाज में बुजुर्गों की दयनीय दशा और युवा संतान की बेरुखी से मनु स्वामी का कवि खिन्न रहता है. वाकई बेहया हो गई है युवा पीढ़ी जिसे बुजुर्गों की तनिक भी परवाह नहीं है. ‘रघु’ कविता में मनु स्वामी खीज कर कहते हैं---
‘’शिखंडी की मुद्रा में / यदा-कदा / अकेला आता / बेटा..!’
और व्यथा-कथा का एक आम रूप देखें---
‘’बेटा / इंजीनियर है/ शोहरत है/ माया में / खेलता है/ माँ-बाप के लिए/ नहीं है / उसकी दुनिया में / कोई कोना..’’
एक और कविता जो बड़ी देर तक मन-दिमाग में खलल डाले रहती है. ‘प्रजापति’
वृद्ध दल्मीरा प्रजापति को कविता के लोक में जैसे स्थापित करते हैं मनु स्वामी...’’बूढ़े हो गये / पर देह-मन से / चुस्त-दुरुस्त हैं/ दलमीरा...’’
और यही दलमीरा प्रजापति रचते रहते हैं पात्र...जिनमें समाता है कवि का आलोक...
मनु स्वामी हमारे गाँव-गिरांव के कवि हैं जो विकट निराशा में भी लोकरंग और लोकराग से अपने अस्तित्व को जोड़े रखता है...
ये आशा है, उम्मीदें हैं जो मनु स्वामी को लोक का कवि बनाती हैं—
‘’उजाला / पौ फटने का हो / या दीये का / अँधेरे से / ताकतवर होता है...
जीतेगा / उजाला ही...’’
मनु स्वामी की पाठकों से सम्वाद करती कविताएँ ‘सफर में हूँ’ उनकी काव्य-यात्रा को एक नई ऊंचाइयां प्रदान करती हैं.

सफर में हूँ : मनु स्वामी : २०१५
सहज प्रकाशन, 113, लाल बाग़, गांधी कालोनी, मुज़फ्फरनगर उप्र २५१००१
पृष्ठ : 80 मूल्य : १२० रुपये
----------------------------------------------------------------------------------------------अनवर सुहैल ----------------------

मंगलवार, 1 मार्च 2016

बुरे दिनों से निजात दिलाती कविताएँ : अनवर सुहैल




कुछ कविताएँ किसी वाद या विचार की गिरफ्त से आज़ाद होती हैं और अपने परिवेश की ऐसी उपज होती हैं जहाँ पहुंचकर सिर्फ असुविधाएं, अभाव, दुःख-दर्द की इबारतें इंसान को पशुतर बनने पर मजबूर किये रहती हैं और इंसान अपने अस्तित्व की सार्थकता प्रमाणित करने के लिए जिस जिजीविषा का परिचय देता है उसे ही कविता मान लेता है. जीने की कला सिखाती कवितायें, संघर्ष के हुनर से पारंगत करती कविताएँ सहज ही पाठकों को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं. इन कविताओं को अभी भी मालूम नहीं रहता कि वे वर्ग-संघर्ष के लिए लड़ रहीं हैं हैं या फिर इंसानी हुकूक की बहाली के लिए... एक बात तो तय है कि ये कविताएँ इंसानी समाज को एक बेहतर समाज का विकल्प देने का विनम्र प्रयास करती हैं.
रमेश प्रजापति की कविताएँ मेरे सामने हैं और उनकी विगत दस-बारह वर्ष की कविताएँ ‘शून्यकाल में बजता झुनझुना’ संग्रह के रूप में इकट्ठी संवादरत हैं. इस संग्रह से पूर्व कवि का एक संग्रह आ चूका है—‘पूरा हंसता चेहरा’. रमेश प्रजापति सिर्फ कविताई ही नहीं करते, उनके पास एक सधी आलोचकीय दृष्टि है, कहानी और लघुकथाएं भी लिखते हैं. इस तरह रमेश ये साबित करना चाहते हैं कि उनके अन्दर अभिव्यक्ति की बेचैनी है जो उन्हें विश्यनुकुल विधा चुनने को प्रेरित करती है. कविता की अपनी सीमा होती है और कई बातें लघुकथा या कहानी की शक्ल में ज्यादा मुखर रूप में पाठकों के सम्मुख आते हैं.
रमेश प्रजापति की कविताएँ मुझे इसलिए अच्छी लगती हैं कि इनमें बडबोलापन नहीं है. ये पाठकों को बरगलाती नहीं और सीधे-सीधे अपनी बात कह जाती हैं---
‘अच्छे दिनों की रोटी में
किरकिराते हैं बुरे दिन...”
या
“तू ईश्वर है...
तो क्यूँ आराम फरमाता है पूजाघरों में ?”
और इन प्रतिकूलताओं में भी गज़ब की उम्मीदें---
“फुटपाथ पर बैठा / टांग हिलाता मजदूर
बुरे दिनों को चबा जाता है
मुट्ठी भर चनों-सा.”
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जिसमें सांत्वना देने के लिए किसी के पास वक्त नहीं है. ‘कौन सा दिल है जिसमें दाग नहीं...? वाकई अधिकाँश आबादी के दुःख-दर्दों की सूची दिनों-दिन बढती ही जाती है. कोई संस्था नहीं, कोई व्यवस्था नहीं जो इस मर्ज़ का उपचार करने का दावा करे...संसार के सारे वाद, विचार और हथकंडे इन लोगों को दुःख-दर्दों से निजात दिलाने में नाकाम रही हैं. असहमति, नफ़रत और युद्ध ही इन व्यवस्थाओं के औज़ार हैं. अपनी बात को तार्किक साबित करने के लिए इनके पास किताबें हैं, क़ानून है, सैनिक हैं, हथियार हैं और निरंकुशता भी है. इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी कवि और कविता अभिशप्त इंसान को उम्मीदों के ख़्वाब दिखलाती रहती है...ये क्या कम है? पाठकों के कुंद हुए दिलो-दिमाग में सहमति की जगह सवाल पैदा करने की हिम्मत कविता ही दे रही है---
“जब बर्फ सा जम गया हो
आदमी के अन्दर डर
दुखों की चट्टान तले
दफ़न हो गई हों जीने की उमंगें
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बडबडाने के अलावा
कुछ न कर पा रहे हों किसान
ऐसे में अंतिम हथियार साबित होती है आग
वक्त-बेवक्त ज़रूरत के वास्ते
जलने दो इसे भीतर के अलाव में..”
यही कविता है जो इंसान को संघर्ष करने की प्रेरणा देती रहती है. यही कवि की ज़िम्मेदारी है कि अपने समय के सच को पाठक के समक्ष रखे और इस लड़ाई में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करे..वर्ना इतिहास उसे भुला देगा...अपनी बात कहने के लिए ये कविताएँ एक नया सौन्दर्य-शास्त्र खुद ही गढ़ रही हैं, क्योंकि ये कविताएँ किसी भी तरह सत्ताश्रयी या सेठाश्रयी नहीं हैं. कविताई के लिए किसी भी तरह की पारिश्रमिक या पारितोष नहीं मिलता बल्कि अभियक्ति के खतरे उठाने में पहचान लिए जाने का खतरा मंडराता ही रहता है. बहुत आसान है सत्ता या पूँजी के समर्थन में भांड बनकर वीरगाथाएं रचना. इसमें पैसा है, सम्मान है, सुख है लेकिन जब जेनुइन कवि खुद को आने वाली पीढ़ी के साथ खड़ा करता है तो उसे लगता है ये बहुत बड़ी बेईमानी होगी! थोडा पैसा, सम्मान या सुख तात्कालिक राहत तो देगा लेकिन ये समझौता उसे समय की अदालत में नकार देगा.
रमेश प्रजापति की तमाम कवितायेँ अच्छी हैं ये नहीं कहता, लेकिन ये ज़रूर है कि तमाम कविताओं में कवि अपने समय के सच को अलग-अलग एंगल से देखने का विनम्र प्रयास करता है और कविता के एक ऐसे फ़ार्म के साथ अपनी बात कहता है जो आजकल के पाठकों के लिए बहुत सहज है.
इन कविताओं को पढ़ते हुए मैं बड़ी ईमानदारी से ये कह सकता हूँ कि कठिन काव्य का प्रेत बनकर पहेलियों से कविताई के दिन लद गये... ऐसी कविताएँ लिखना कि जिन्हें समझने के लिए शब्दकोष की ज़रुरत पड़े, कोई व्याख्याता या फिर टिप्पणीकार उन कविताओं के मंतव्य से पाठक को अवगत कराये..इसे मैं भाषा की ऐयाशी मानता हूँ...ये कविता का रीतिकालीन या छायायुगीन कलेवर पाठकों को कविता से विलग/विरत करता है.
इससे कविता का ही नुक्सान होता है...न मालूम किस टार्गेट पाठक के लिए लिखी जाती हैं ऐसी क्लिष्ट कविताएँ कि जिन्हें कोई विद्यार्थी कोर्स में होने के कारण ही मजबूरीवश पढ़े...कोई नया पाठक खामखाँ क्यों इन कठिन काव्य के प्रेतों से झाड-फूँक करवाएगा.
रमेश प्रजापति की चिंताओं में शामिल हैं गाँव, घर, खेत-खलिहान, किसान, मजदूर, माँ-पिता, पशु-पक्षी, धनकार, स्त्रियाँ, नदी-नाले, चाँद-सूरज-पृथ्वी-गौरैया और गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक-चिन्ह...कवि लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखता है लेकिन इंसान के शोषण की तमाम तकनीकों से घृणा करता है. कवि के सामाजिक सरोकार उसे पाठकों के साथ जोड़े रखते हैं और उसकी कवितायें, पाठकों के लिए किसी मलहम की तरह लेप लगाती हैं और बुरे दिनों से निजात दिलाने का प्रयास करती हैं....
*शून्यकाल में बजता झुनझुना : कविता संग्रह : रमेश प्रजापति
पृष्ठ : १२० मूल्य : 100.00 संस्करण : 2015
बोधि प्रकाशन, एफ 77, सेक्टर-9 रोड नं. 11
करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर ३०२००६
फोन: 0141-2503989, 9829018087
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

यादें : एक

स्व. जाहिदा (अम्मी)

बाल्य-काल
·         कुछ भी विलक्षण नहीं है बाल-जीवन में सिवाय सृजन के स्वप्न के...
ये एक ऐसा स्वप्न है जो अब भी बेचैन किये रहता है..और यही बेचैनी कुछ नया करने को प्रेरित करती है. एकदम बच्चा था जब तब चार आने में कापी आती थी और चार आने की पेन्सिल. नानी आतीं तो वो बच्चों को अपनी आमद पर खुश होकर आठ आने दिया करतीं. भाई-बहन उन पैसों का क्या करते मुझे याद नहीं लेकिन मैं दौड़ा-दौड़ा मुल्लाजी की किताब दूकान जा पहुँचता. उनकी दुकान से एक कापी और पेन्सिल खरीद लाता...
ये मेरे अक्षर-ज्ञान से पहले के दिन थे...जब बेशक मैं छः साल का नहीं हुआ था. क्योंकि तब छः साल होने पर ही स्कूल में दाखिला मिलता था. तो उस कापी पर पेन्सिल से मैं बड़ी रवानी से गोलम-गुल्लम लिखा करता..बीच-बीच में कुछ आकृतियों को काट भी दिया करता और कुछ आकृतियों के ऊपर लाइन खींचा करता...
छोटा भाई बड़ी उत्सुकता से मेरी हरकत देखा करता और पूछता—‘का कर रहे हो भईया?’
तो मैं गर्व से बताता—‘वकीलों की तरह लिख रहा हूँ...!’
मेरा गृह-नगर तहसील था सो वहां तहसील दफ्तर के बाहर मैं कई बाबुओं को कागज़ पर कलम घिसते देखा करता था.
मुझे लगता कि संसार का सारा ज्ञान इन बाबुओं के पास होगा तभी तो सेठ-महाजन, अधिकारी और अन्य लोग इन बाबुओं के पास बैठकर बड़ी तल्लीनता से उन्हें काम करते देखा करते हैं. ये बाबू कोई सूट-बूट वाले नहीं होते थे बल्कि धोती-कुरता, पजामा-कमीज़ वाले हुआ करते थे. इनके चेहरे पर ज़माने भर की गंभीरता आसानी से दिखलाई देती थी.
फिर जब दाहिने हाथ से बांया कान पकड़ में आने लगा तब अब्बा ने कहा कि अब पहली में नाम लिख जाएगा.
मेरा दोस्त था बगल के लाज में काम करने वाले का बेटा..उसके साथ मैंने अब्बा के रेलवे प्रायमरी स्कूल में नाम लिखवा लिया और अचानक से इतना गंभीर हो गया कि जैसे किसी बड़ी क्लास में पढने वाला बच्चा हो गया हूँ. मेरे कक्षा शिक्षक मिश्रा गुरूजी सफ़ेद धोती और लम्बा कुरता पहनते थे. वे मुझे बहुत मानते थे, क्योंकि मैंने तब तक गुपचुप रूप से अपनी दीदी लोगों की संगत में अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर लिया था. एक से सौ तक की गिनती लिखनी मुझे आती थी. हाँ, पहाडा स्कूल में जाकर रटने लगा था. मिश्रा गुरूजी कुर्सी पर बैठकर खैनी खाते फिर ऊंघने लगते और मुझे बच्चों को अक्षर-ज्ञान का काम सौंप देते थे.
उस जमाने में हम सिर्फ हिंदी भाषा ही पढ़ते थे. अंग्रेजी का औपचारिक ज्ञान हमें छठवीं कक्षा से मिला था.
स्कूल में बिना पैसे के खेल हम खेला करते. जैसे आमा-डंडी, छुपा-छुपौवल, पिट्टुल और लडकियों के खेल जैसे खो-खो, लंगड़ी-घोड़ी, धुप-छाँह आदि.
घर में तब अध्यापक अब्बा का प्रशासन बहुत कड़ा था. क्या मजाल कि उनकी मर्ज़ी के बिना परिंदा भी पर मार ले. उनकी नज़र जैसे कि ख़ुदा की नज़र हो, जिससे बचना नामुमकिन होता था. बचने को तो बचा जा सकता था लेकिन पकड़े जाने पर जहन्नुम के बारे में बयान किये जाने वाले अज़ाब (दंड) से भी जियादा का खौफ हमें मारे डालता था. जहन्नुम के अज़ाब तो मरने के बाद मिलेंगे लेकिन जीते-जी अब्बा की डांट-मार का ज़िक्र किसी धर्म-ग्रन्थ में नहीं मिल सकता है, जितना डर हम बच्चों के दिल में रहता था.
पिन-ड्राप साइलेंस का मतलब यदि जानना हो तो मेरे बचपन के दिनों में अब्बा की मौजूदगी में हमारा घर इसकी बड़ी मिसाल होगा.
अब्बा की दबंग उपस्थिति के ठीक उलट अम्मी की अंधी ममता..वे भरसक अब्बा के कोप और क्रोध से हम बच्चों को बचातीं..हमने कभी ये अलफ़ाज़ नहीं सुने उनके मुंह से—‘आने दे तुम्हारे अब्बा को, उन्हें सब कुछ बता दूंगी..!’ अब्बा की गैर-मौजूदगी में हमारी गलतियों, शरारतों और बदमाशियों को अम्मी इंज्वॉय किया करतीं...वे हमारे साथ थोड़ी-बहुत मस्ती भी कर लिया करती थीं और हमारी बड़ी राजदार थीं..ऐसी माएं अब कहाँ होती हैं...
तो बचपन में पढाई-लिखाई, खेल-कूद, शरारतें ही याद आती हैं. हाँ, हम दोनों भाई मोहल्ले के बच्चों के साथ नहीं खेलते थे क्योंकि अब्बा का ये मानना था कि मोहल्ले के लडकों के साथ मिलने-जुलने से गाली बकना और उत्पाती बनना ही हम सीखेंगे. वैसे भी मोहल्ले के लडके आये दिन कंचे खेला करते या सिक्का-जीत जैसे खेल खेलते, बीच-बीच में हल्ला करते और एक-दुसरे को गालियाँ बकते...हमारे घर में ‘अबे’ या  ‘रे’ भी गाली  के  तुल्य हुआ करता था. हम जब बहुत गुस्सा होते तो एक-दूजे को कुत्ता-कुत्ती जैसे शब्द कहके गाली बकने की क्षुधा शांत किया करते थे. दीवाली में बिकने वाले हरामी बम को हम तब घर में ‘गाली बम’ कहा करते थे.
हम दोनों भाई अपनी बहनों की सहेलियों के साथ लडकियों के खेल खेलते...इसी कारण कपड़े की तुरपाई करना, बटन-काज का काम, स्वेटर बुनने का हुनर और खाना बनाने में पारंगत हो गया था मैं..इसका लाभ ये हुआ कि आज भी कपड़े की रिपेयर खुद कर लेता हूँ. कालेज में मैं खुद ही खाना पका कर खाता था.

अम्मी को चाय पीने का शौक था और मैं उनका चायवाला बेटा था..उनकी फरमाईश पर तत्काल चूल्हे में लकड़ी सुलगा कर चाय बना लाता था. तब उस जमाने में घरों में मिटटी तेल के स्टोव भी हुआ करते थे, लेकिन हमारे घर में तीन मुंह वाला मिट्टी का चूल्हा बना हुआ था. अम्मी अलस्सुबह उस चूल्हे की टूट-फूट रिपेयर करतीं, फिर छूही माटी से रसोई की लिपाई करती थीं. 

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

तुम लिखो कवि

( कवि नित्यानंद गायेन के लिए)

तुम लिखो कवि
दोस्त में छिपे दुश्मन को लतियाकर लिखो
बेख़ौफ़ होकर लिखो क़ि तुम हम सबकी जुबां हो
हमारी मरी आत्माओं का मर्सिया हैं तुम्हारी कविताएँ
क़ि बार बार बीच का रास्ता तलाशते हैं हम
और तुम करते रहते हो सचेत मित्र
कि बीच का कोई रास्ता नहीं होता
अभी अभी तो वह पूछकर गया है कवि
कि बताओ पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?
और हम बगलें झाँक रहे हैं तब से
कि हम हर बार लेते रहे हैं विजेता का पक्ष
कि हारे हुए लोग हमेशा से मिटा दिए जाते हैं इतिहास के पन्नों से
तुम लड़ रहे हो हमारे अचेतन में वाबस्ता उस युद्ध को
जिसका हम बनना चाहते रहे इक सिपाही
लेकिन हमने जीतने वालों में खुद को
शुमार कराने का जब से सीखा हुनर
लड़ाइयां तुम हारते रहे कवि
लोकगाथाओं का इतिहास,
चीख चीख कर तैयार करता रहा अपने समय के कवि को
लोकमानस गाता रहा कवि के गीत
और हमारे उच्छ्वास से, सजती रही राजाओं की महफिलें
बजते रहे घुंघरू छन छना छन
मादक सिसकारियों में खोज रहे थे
हमारे समय के आलोचक
एक नया सौंदर्यशास्त्र
कितनी चालबाजियां करते रहें हम
तुम्हारा आर्तनाद, तुम्हारी प्रेम की तड़प
और इंक़िलाब की चाहत से
पैदा होते रहेंगे सदा प्रेमी और इंकलाबी।
ये बगावत का उद्घोष है कवि
जो हमारी समझौता-परस्त आत्मा को
कुरेदती रहेगी पीढ़ियों तक।
इसलिए कवि तुम वही कहो जो तुम्हें कहना है
क्योंकि तुम हमारे कवि हो
क्योंकि तुम हमारी अनकही अभिव्यक्ति हो.....

शनिवार, 30 जनवरी 2016

मेहनतकश के सीने में


कितना कम सो पाते हैं वे
यही कोई पांच-छः घंटे ही तो
यदि हुई नही बरसात
पड़ा नही कडाके का जाड़ा
तो उतने कम समय में वे
सो लेते भरपूर नींद
बरखा और शीत में ही
अधसोए गुजारते रात
उनसे पहले उठती घरवालियाँ
चूल्हे सुलगा पाथती छः रोटियाँ
अचार या नून-मिरिच के साथ
पोटली में गठियातीं तब तक
छोड़कर बिस्तर वे किसी यंत्र-मानुष की तरह
फ़टाफ़ट होते तैयार
और निकल पड़ते मुंह-अँधेरे ही
खदान की तरफ
आखिर बीस कोस साइकिल चलाना है
जुड़े रहते तार उनके इस तरह
कि पहले मोड पर मिल जाते कई संगी
एक राऊण्ड तम्बाखू-चून की चुटकी
होंठ और मसूढ़ों के बीच दबा
पिच-पिच थूकते, जो नागा किया उसके बारे में
अंट-शंट बतियाते, पैडल मारते तय करते दूरियां
उन्हें नही मालूम कि प्रधान-मंत्री सडक योजना क्या है
वर्ना इन पथरीली पगडंडियों पर आदिकाल से
यूँ ही नही चलना पड़ता उन्हें
छोटे नाले-नदी, जंगल-टीले पार करते-करते उग आता सूरज
और उन्हें तब तक दिखलाई देने लगता कोयला-खदान के चिन्ह
रात पल्ली से लौटते श्रमिक मिलते तो राम-राम हो जाती
एक तसल्ली भी मिलती कि खदान चालू है
काम मिल ही जाएगा,
बिना कामनही लौटना पड़ेगा उन्हें…
वे खदान पहुँचते हैं तो
बड़ी आसानी से कोयले के ढेर में घुल-मिल जाते हैं
ऐसे दीखते हैं जैसे हों कोयला की तराशी हुई चट्टानें
जो ये जानते ही नही कि उनमे छुपी हुई है बिकट आग
कि उनमे छुपा है बिजली बनाने का तिलस्म
कि उनमे पेवस्त है स्टील बनने का रसायन
वे नही जानते कुछ भी
सिवाय इसके कि इस जनम यही लिखा उनके भाग में
और भाग के लिखे को कौन मिटा सकता है…
वे नही जानते कुछ भी
सिवाय इसके कि भगवान जिसे चाहे देता दुःख-पीड़ा
और जिसे चाहे देता सुख-सुविधाएं अपार
लेकिन मुंह अँधेरे इन साइकिल चालकों में
एक भोले है, एक भूपत है, एक गंगा है
जिनके पास सवाल ही सवाल हैं
और बुज़ुर्ग मजदूर सुमारु उन्हें समझाता रहता
भर-रास्ता उन्हें डांटता और सबर करने को कहता
लेकिन भोले, भूपत और गंगा के सवाल
पूरब में उगते सूर्य की आभा में दमक उठते
और एक नया रास्ता सूझता उन्हें
उस रास्ते में दीखते अनगिन ठोकर, अंतहीन यातनाएं
और फिर दूर-दूर तक अँधेरा ही अँधेरा…
क्या इसका मतलब ये समझा जाए
कि खदान पहुंचते ही
उनके मन में उठे सवालात दफ़न हो गए
वे नहीं जानते कि सवाल जो उठा है मन में
ये पहली बार नही आया है
इससे पहले जाने कितनी पीढियां
खत्म हो गईं इन सवालों से टकराते-जूझते
इसी प्रयास में कि इस लड़ाई को
जल्द ही जीत लेंगे वे
और सूरज आसमान पर उगता रहा
चाँद निकलता रहा
धरती घूमती रही
पेड़-पौधे-फूल उगते-कटते रहे
और हर बार मेहनतकश के सीनों में
यूँ ही सवाल पनपते और दफ़न होते रहे….
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गुरुवार, 28 जनवरी 2016

पहचान की सृजन यात्रा

से उन बच्चों के अन्दर स्कूली पढाई के प्रति उदासीनता आती जाती है और एक-दो बार फ़ैल हो जाने के बाद वे पढाई छोड़ देते हैं हैं बहुधा ये आरोप लगाकर---'अरे भाई, मीम लोगों को जानबूझकर फ़ैल कर देते हैं ई मस्टरवा लोग..चाहते नहीं हैं न कि मीम के लइका लिखे-पढ़ें-तरक्की करें...!'
तो मदरसा की हिज्जेवाली अरबी-उर्दू की तालीम, प्राथमिक विद्यालय की अक्षर-ज्ञान के बाद उनके पास तीसरा विकल्प बचता है माँ-बाप के पुश्तैनी कारोबार या हुनरमंदी के गुर सीखना और विराट सामजिक ताने-बाने से कटकर एक ऐसे समाज का अपने इर्द-गिर्द बनते देखना जहां असहमति/ विरोध/ बहस की गुंजाइश एकदम नहीं रहती...
यूनुस उस समाज से खुद को अलग करेगा...ऐसा मेरा विश्वास है और यही विश्वास उपन्यास पहचान की मुख्य सोच है...
औपचारिक स्कूली शिक्षा में मुस्लिम विद्यार्थियों की संख्या आज भी उत्साह वर्धक नहीं हैं और सीनियर सेकंडरी तक आते-आते ये संख्या काफी निराशाजनक हो जाती है. इस शिक्षा-प्रणाली की दुरुहता के कारण मुस्लिम ही नहीं आदिवासी, दलित और स्त्रियाँ भी आगे की पढाई नहीं पढ़ पाते हैं...
यूनुस को मैंने विकल्प के रूप में मज़हबी यूनुस की जगह हुनरमंद यूनुस के रूप में तरजीह देने का प्रयास किया है...

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

बचपन के दिन : एक

      
डॉ लाल रत्नाकर की पेंटिंग 
           कुछ भी विलक्षण नहीं है बाल-जीवन में सिवाय सृजन के स्वप्न के...
ये एक ऐसा स्वप्न है जो अब भी बेचैन किये रहता है..और यही बेचैनी कुछ नया करने को प्रेरित करती है. एकदम बच्चा था जब तब चार आने में कापी आती थी और चार आने की पेन्सिल. नानी आतीं तो वो बच्चों को अपनी आमद पर खुश होकर आठ आने दिया करतीं. भाई-बहन उन पैसों का क्या करते मुझे याद नहीं लेकिन मैं दौड़ा-दौड़ा मुल्लाजी की किताब दूकान जा पहुँचता. उनकी दुकान से एक कापी और पेन्सिल खरीद लाता...
ये मेरे अक्षर-ज्ञान से पहले के दिन थे...जब बेशक मैं छः साल का नहीं हुआ था. क्योंकि तब छः साल होने पर ही स्कूल में दाखिला मिलता था. तो उस कापी पर पेन्सिल से मैं बड़ी रवानी से गोलम-गुल्लम लिखा करता..बीच-बीच में कुछ आकृतियों को काट भी दिया करता और कुछ आकृतियों के ऊपर लाइन खींचा करता...
छोटा भाई बड़ी उत्सुकता से मेरी हरकत देखा करता और पूछता—‘का कर रहे हो भईया?’
तो मैं गर्व से बताता—‘वकीलों की तरह लिख रहा हूँ...!’
मेरा गृह-नगर तहसील था सो वहां तहसील दफ्तर के बाहर मैं कई बाबुओं को कागज़ पर कलम घिसते देखा करता था.
मुझे लगता कि संसार का सारा ज्ञान इन बाबुओं के पास होगा तभी तो सेठ-महाजन, अधिकारी और अन्य लोग इन बाबुओं के पास बैठकर बड़ी तल्लीनता से उन्हें काम करते देखा करते हैं. ये बाबू कोई सूट-बूट वाले नहीं होते थे बल्कि धोती-कुरता, पजामा-कमीज़ वाले हुआ करते थे. इनके चेहरे पर ज़माने भर की गंभीरता आसानी से दिखलाई देती थी.
फिर जब दाहिने हाथ से बांया कान पकड़ में आने लगा तब अब्बा ने कहा कि अब पहली में नाम लिख जाएगा.
मेरा दोस्त था बगल के लाज में काम करने वाले का बेटा..उसके साथ मैंने अब्बा के रेलवे प्रायमरी स्कूल में नाम लिखवा लिया और अचानक से इतना गंभीर हो गया कि जैसे किसी बड़ी क्लास में पढने वाला बच्चा हो गया हूँ. मेरे कक्षा शिक्षक मिश्रा गुरूजी सफ़ेद धोती और लम्बा कुरता पहनते थे. वे मुझे बहुत मानते थे, क्योंकि मैंने तब तक गुपचुप रूप से अपनी दीदी लोगों की संगत में अक्षर-ज्ञान प्राप्त कर लिया था. एक से सौ तक की गिनती लिखनी मुझे आती थी. हाँ, पहाडा स्कूल में जाकर रटने लगा था. मिश्रा गुरूजी कुर्सी पर बैठकर खैनी खाते फिर ऊंघने लगते और मुझे बच्चों को अक्षर-ज्ञान का काम सौंप देते थे.
उस जमाने में हम सिर्फ हिंदी भाषा ही पढ़ते थे. अंग्रेजी का औपचारिक ज्ञान हमें छठवीं कक्षा से मिला था.
स्कूल में बिना पैसे के खेल हम खेला करते. जैसे आमा-डंडी, छुपा-छुपौवल, पिट्टुल और लडकियों के खेल जैसे खो-खो, लंगड़ी-घोड़ी, धुप-छाँह आदि.
घर में तब अध्यापक अब्बा का प्रशासन बहुत कड़ा था. क्या मजाल कि उनकी मर्ज़ी के बिना परिंदा भी पर मार ले. उनकी नज़र जैसे कि ख़ुदा की नज़र हो, जिससे बचना नामुमकिन होता था. बचने को तो बचा जा सकता था लेकिन पकड़े जाने पर जहन्नुम के बारे में बयान किये जाने वाले अज़ाब (दंड) से भी जियादा का खौफ हमें मारे डालता था. जहन्नुम के अज़ाब तो मरने के बाद मिलेंगे लेकिन जीते-जी अब्बा की डांट-मार का ज़िक्र किसी धर्म-ग्रन्थ में नहीं मिल सकता है, जितना डर हम बच्चों के दिल में रहता था.
पिन-ड्राप साइलेंस का मतलब यदि जानना हो तो मेरे बचपन के दिनों में अब्बा की मौजूदगी में हमारा घर इसकी बड़ी मिसाल होगा.
अब्बा की दबंग उपस्थिति के ठीक उलट अम्मी की अंधी ममता..वे भरसक अब्बा के कोप और क्रोध से हम बच्चों को बचातीं..हमने कभी ये अलफ़ाज़ नहीं सुने उनके मुंह से—‘आने दे तुम्हारे अब्बा को, उन्हें सब कुछ बता दूंगी..!’ अब्बा की गैर-मौजूदगी में हमारी गलतियों, शरारतों और बदमाशियों को अम्मी इंज्वॉय किया करतीं...वे हमारे साथ थोड़ी-बहुत मस्ती भी कर लिया करती थीं और हमारी बड़ी राजदार थीं..ऐसी माएं अब कहाँ होती हैं...
तो बचपन में पढाई-लिखाई, खेल-कूद, शरारतें ही याद आती हैं. हाँ, हम दोनों भाई मोहल्ले के बच्चों के साथ नहीं खेलते थे क्योंकि अब्बा का ये मानना था कि मोहल्ले के लडकों के साथ मिलने-जुलने से गाली बकना और उत्पाती बनना ही हम सीखेंगे. वैसे भी मोहल्ले के लडके आये दिन कंचे खेला करते या सिक्का-जीत जैसे खेल खेलते, बीच-बीच में हल्ला करते और एक-दुसरे को गालियाँ बकते...हमारे घर में ‘अबे’ या  ‘रे’ भी गाली  के  तुल्य हुआ करता था. हम जब बहुत गुस्सा होते तो एक-दूजे को कुत्ता-कुत्ती जैसे शब्द कहके गाली बकने की क्षुधा शांत किया करते थे. दीवाली में बिकने वाले हरामी बम को हम तब घर में ‘गाली बम’ कहा करते थे.
हम दोनों भाई अपनी बहनों की सहेलियों के साथ लडकियों के खेल खेलते...इसी कारण कपड़े की तुरपाई करना, बटन-काज का काम, स्वेटर बुनने का हुनर और खाना बनाने में पारंगत हो गया था मैं..इसका लाभ ये हुआ कि आज भी कपड़े की रिपेयर खुद कर लेता हूँ. कालेज में मैं खुद ही खाना पका कर खाता था.

अम्मी को चाय पीने का शौक था और मैं उनका चायवाला बेटा था..उनकी फरमाईश पर तत्काल चूल्हे में लकड़ी सुलगा कर चाय बना लाता था. तब उस जमाने में घरों में मिटटी तेल के स्टोव भी हुआ करते थे, लेकिन हमारे घर में तीन मुंह वाला मिट्टी का चूल्हा बना हुआ था. अम्मी अलस्सुबह उस चूल्हे की टूट-फूट रिपेयर करतीं, फिर छूही माटी से रसोई की लिपाई करती थीं. 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

मेले में अकेले


वे लोग जो चाहकर भी नहीं पहुँच सकते मेले में
वे लोग जो खुद को कभी भी, कहीं भी नहीं करा पाते आमंत्रित 
खुद्दार इतने कि बिना निमंत्रण जाएँ न यमराज के पास भी 
ऐसा कहकर हंसते हैं कि हंसते हर हाल में हैं वे
हंसने की नामालूम वजह को जानने का कभी प्रयास भी नहीं करते
वे ये भी जानते हैं कि उनकी ये हंसी कालांतर में
गलती से भी नहीं बनेगी किसी शोध-पत्र का बीज-वाक्य
कि उनकी इस हंसी-ठिठोली को लोग लोक-हास्य कह देते हैं
जैसे किसी मजबूरी के तहत हँसते रहे हैं वे
उड़ा देते हैं अफवाह कि ये अपने ही में मस्त रहने के अभ्यस्त हैं
अपनी राजनीतिक समझ और कूटनीतिक चालों में डूबे
कोई कैसे जाने कि उनकी फक्कडपन और दीवानगी के पीछे
नहीं है किसी विपक्षी का हाथ या ये नहीं हैं वामपंथी या नक्सली
ये नहीं हैं कोई दरवेश या पीरो-मुर्शिद या कोई ऋषि-मुनि या कोई अतीन्द्रिय...

वे लोग जो चाहकर भी नहीं पहुँच सकते मेले में
वे लोग जिनके पहुँचने से बदल सकता था मेले का स्वरूप
क्योंकि वे जहाँ जाते हैं वहां तमाम अभावों-असुविधाओं के बीच
गूंजती है बिरहा की धुनें, कबीर की निरगुन और बुल्ले शाह के काफिये
वे पंच-तारा अस्पतालों की अट्टालिकाओं की परछाइयों के पीछे
जहां बस्तियां उग आती हैं फेंके गये मेडिकल कचरे के साथ
मगन होकर गुनगुनाते रहते हैं गीत
और अस्पतालों की मार्चरी में दिन-ब-दिन बढती जाती हैं लाशें.. खाए-पीये-अघाए लोगों की.....
ऐसे नहीं कि वे अजर-अमर हैं लेकिन एक अच्छी बात है कि
मरने से पहले नहीं चिंता होती उन्हें वसीयत की
और नहीं होता कोई षड्यंत्र उनके जीते जी या मरने के बाद
किसी संपत्ति या बैंक बैलेंस के लिए नहीं होती कोई लड़ाई...

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

खनिकर्मी

कोयला खदान की
काली अँधेरी सुरंगों में
निचुड़े तन-मन वाले खनिकर्मी के
कैप लैम्प की पीली रौशनी के घेरे से
कभी नहीं झांकेगा कोई सूरज 
नहीं दीखेगा नीला आकाश
एक अँधेरे कोने से निकलकर
दूसरे अँधेरे कोने में दुबका रहेगा ता-उम्र वह
पता नहीं किसने, कब बताया ये इलाज
कि फेफड़ों में जमते जाते कोयला धूल की परत को
काट सकती है सिर्फ दारु
और ये दारू ही है जो एक-दिन नागा कराकर
फिर ले आती है उसे
कोयला खदान की अँधेरी सुरंगों में
कभी-कभी औरतों और अफसरों को गरियाने के बाद
बड़ी गंभीर मुद्रा में बात करते हैं वे
तो बताते हैं कि ज़िन्दगी एक सर्कस है
हर दिन तीन शो और हर शो में जान की बाज़ी
यही तो खनिकर्मी का जीवन
'इत्ता रिस्क तो सीमा पर सिपाहियों को भी नहीं होता साब
जंग-लड़ाई तो कभी छिड़ती है
खनिकर्मी तो हर दिन एक जंग लड़ता है
एक जंग जीतता है जीवन की, उम्मीदों की...
(उम्मीदों का दामन थामे सभी कोयला खनिकर्मियों को नव-वर्ष की शुभकामनायें)

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

फिर भी अनंत आस्थावान..

रहता है वो
बिना वेतन के भी जीवित
भले से भाग जाए ठीकेदार
लेकर छः-सात माह की पगार
उसे नहीं क़ानून बनाने का अधिकार
इसीलिए बलजबरी मांग नहीं सकता पगार
लेकिन फिर-फिर काम पाने के लिए
खोज लेता एक नया ठीकेदार
और बिकट आस्था के साथ जुटे रहता
हर दिन एक नई टूटन के लिए
हर दिन अंतहीन थकान की लिए
हर दिन एक नई उम्मीद के साथ.
रहता है वो
बिना वेतन के जीवित
मुंह अँधेरे बाँध कर बासी भात-चटनी
साइकिल पर आंधर-झांवर पैडल मार
पहुँच आता ठीहे पर
कितना खुश-खुश, कितना उर्जावान
जैस-जैसे बढ़ती धूप और ताप
वैसे-वैसे गर्माता जाता उसका मिजाज़
और सूरज के ढलने के साथ
बढती थकान, गूंजता थकान का गान
एक बार फिर गाँव-घर तब
थके-तन, खाली हाथ लौटने का ईनाम
फिर भी अनंत आस्थावान..
रहता है वो
बिना वेतन की जीवित
वह नहीं जानना चाहता
कि इस हाड़तोड़ मेहनत और पगार में
हैं कितनी विसंगतियां
कि इसी काम के लिए सरकारी सेवक
पाते हैं दस गुना ज्यादा वेतन
बिना नागा, हर माह, निश्चित तिथि में
वह दूसरों के सुख से दुखी नहीं होता
इसीलिए तो रात भरपूर नींद है सोता...
अपने लिए कतई नहीं चाहिए उसे
एक नया सूरज
एक नई धरती, एक नया आकाश
बस थोड़ी सी जगह में सिकुड़कर-सिमटकर
संकोच और अपार सब्र के साथ
सबके लिए बचा देता है पर्याप्त स्पेस
ताकि बची रहे आसपास
ढेर सारी आस्था और विश्वास.....

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

विद्रोही जी की स्मृति में :


और क्या ये उस आत्मा को सही श्रद्धांजली नहीं है...जब इतनी रात बीत गई और फिर भी मैं जाग हूँ? इतनी थकावट है फिर भी मैं व्यथित जाग रहा हूँ? सोचता हूँ कि यदि मैं पागल नहीं हूँ तो फिर पागलपन होता क्या है? एक पागल और (अ)पागल में क्या अंतर होता है? क्या संसार (अ)पागलों से संचालित होता है? यानी जो पागल नहीं हैं वे ही व्यवस्था के संचालक हो सकते हैं...
क्या नित्यानंद गायेन की सूचना ने मुझमें पागलपन के लक्षण डाल दिए हैं? नित्यानंद गायेन ने तो सिर्फ इतनी बात कही कि विद्रोही जी नहीं रहे....कैसी खबर थी ये जिसे नित्यानंद ने मुझे सुनाना ज़रूरी समझा और ये विद्रोही जी ऐसी कौन सी शख्सियत थे कि जिनके लिए व्यथित हुआ जाए. फिर हमरंग के संपादक हनीफ मदार का फोन आया कि विद्रोही जी के बारे में पोस्ट डालनी है, फ़िल्मकार इमरान का पता या फोन नम्बर खोजा जाए जिसने विद्रोही पर डाक्यूमेंट्री बनाई है. मैंने देखा कि फेसबुक में स्वतः स्फूर्त लोगों ने विद्रोही के निधन पर पोस्ट लगानी शुरू कर दी हैं...और सबसे आश्चर्य तब हुआ जब बारहवीं की गणित की तैयारी करती बिटिया सबा मेरे साथ विद्रोही को यू-ट्यूब पर सुनने लगी...क्या था उस कवि विद्रोही की वाणी में कि आदेल के अंग्रेजी गाने सुनने वाली बिटिया भी मन्त्र-मुग्ध होकर विद्रोही को सुनने लगी...
“और ईश्वर मर गया 
फिर राजा भी मर गया 
राजा मरा लड़ाई में 
रानी मरी कढ़ाई में 
और बेटा मरा पढाई में...” 
जबकि देश के आइआइटीयन तो कुमार विश्वास को ही हिंदी का कवि समझते हैं, चेतन भगत को उपन्यासकार फिर ये विद्रोही ऐसा कौन सा कवि हुआ जिसके न रहने से लोगों को इतनी व्यथा हो रही है, कि जिसके रहने से कोई विचलित नहीं होता था..वो न सम्मानित कवि थे कि उनके पास सम्मान लौटाने का विकल्प होता...वे न सत्ता से प्रताड़ित कवि थे कि कभी पक्षधर सरकार बनती तो उनका सम्मान होता...फिर क्यों लोग रमाशंकर यादव उर्फ़ कवि विद्रोही जी के निधन पर इतने दुखी हैं....लेकिन एक बात तो है पार्टनर कि भले से हमें कुंवर नारायण, नरेश सक्सेना या केदारनाथ सिंह की कविता-पंक्ति याद हों या न हों लेकिन विद्रोही की पंक्तियाँ अवचेतन में जगह क्यों बना लेती हैं और बार-बार उद्धृत होने को बेचैन करती हैं जैसे ग़ालिब के अशआर हों या कोई चिर-परिचित मुहावरे...
"अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है"
या 
"मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को 
एक ही साथ औरतों की अदालत में तलब कर दूंगा "
या 
" मेरी नानी की देह ,देह नहीं आर्मीनिया की गांठ थी"
वही विद्रोही कहते हैं तो लगता है कि ये पागल व्यक्ति का कथन नहीं हो सकता लेकिन सभ्य समाज ऐसे व्यक्ति को पागल ही कहता है जो ये कहे---“मैं ऐसी कवितायेँ लिखता हूँ कि मुझे पुरूस्कार मिले या फिर सज़ा मिले...लेकिन देखो ये कैसी व्यवस्था है जो मुझे न पुरस्कार देती है न सज़ा...अब मैं क्या करूँ...जबकि मैंने लिखा ये सोचकर कि मुझे सज़ा मिलेगी---
“मैं भी मरूंगा
और भारत के भाग्य विधाता भी मरेंगे
लेकिन मैं चाहता हूं
कि पहले जन-गण-मन अधिनायक मरें
फिर भारत भाग्य विधाता मरें.”
मैं जानता हूँ कि ये किसी नेता की मृत्यु का मामला नहीं है, और नहीं है किसी ओहदेदार या संत की मृत्यु कि जिसे चाह कर भी नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता है. आप भले से इन मृत्युओं को भूल जाएँ, लेकिन राष्ट्रीय शोक की घोषणाएं और शासकीय अवकाश भरसक आपको मृत्यु के उत्सव की तरफ घसीट ले जाएँगी. सत्ता-नियोजित भव्य शोभा-यात्रायें मौत को भी एक इवेंट की तरह सेलेब्रेट करती हैं.. ऐसी मौतों से मैं क्या कोई भी व्यथित नहीं होता...भले से मौत स्वाभाविक न होकर हत्या ही क्यों न हो! उस मौत का हत्यारा सज़ा पाए या न पाए लेकिन उस हत्या के बाद होने वाले नरसंहार के हत्यारे कभी सज़ा नहीं पाते...कई पीढियां मुक़दमे लडती जाती हैं...मौत का मुआवजा मिल जाना ही जैसे अभीष्ट होता है और सदियों तक मरने से बच गये लोग हर रात स्वप्न में डरते हुए कत्ल होते हैं...विद्रोही जी की मृत्यु ऐसी मृत्यु नहीं है कि इवेंट की तरह मैनेज हो...भले से कवि को अपने होने और न होने के बारे में जानकारी थी, तभी तो कितनी बुलंदी से वे कह गये---
"कि ये विद्रोही भी क्या तगड़ा कवि था
कि सारे बड़े-बड़े लोगों को मारकर तब मरा...."
उनके लेखन पर, लेखनी पर, जीवनी पर और भी लोग बेशक लिक्खेंगे लेकिन मैं जो उनसे कभी नहीं मिला, मैं जो जेएनयू में नहीं पढ़ा...मैं जो खुद को एक चेतना संपन्न जागरूक नागरिक होने का दम्भ जीता हूँ आज बहुत व्यथित हूँ कि हम विद्रोही के लिए एक मुहाफ़िज़ क्यों नहीं बन पाए...क्या हम पागल नहीं थे..?
हममे पागलपन है लेकिन हम उसे छुपाते हैं और विद्रोही जी पागलपन को शान से जीते थे...

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

तीन कविता संग्रह : टिप्पणियां

बर्फ और आग : निदा नवाज़ 

निदा नवाज़ कश्मीर घाटी में, बिना किसी सुरक्षा घेरे में रहे, आम लोगों के बीच रहकर अभिव्यक्ति के खतरे उठा रहे हैं। पंद्रह वर्ष पूर्व उनका एक कविता संग्रह ‘अक्षर-अक्षर रक्त भरा’ प्रकाशित हुआ था जब घाटी में दहशतगर्दी चरम पर थी। सीमा पार से अलगाववाद को मिलता समर्थन भारतीय प्रशासन के लिए हमेशा चिंता का कारण रहा है ऐसे में अपने लोगों के मन की बात को कठोरता से वृहद जनमानस तक पहुंचाने का बीड़ा निदा नवाज़ ने उठाया है, जो काफी स्तुत्य है और बेशक इससे उन्हें भी मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से गुज़रना पड़ा है।
जिन परिस्थितियों में निदा नवाज़ सृजनरत हैं वहां अस्मिता, राष्ट्रीयता और साम्प्रदायिकता के मसले बेहद उलझे हुए हैं कि उस पर बात करते हुए अरझ जाने का खतरा बना रहता है। निदा नवाज़ अपनी सीमाएं जानते हैं और बड़ी शालीनता से आम कश्मीरीजन की पीड़ा को स्वर देने का विनम्र प्रयास करते हैं। ‘बर्फ और आग’ में भी निदा नवाज़ ने लाऊड हुए बिना अपने लोगों की पीड़ा का सटीक दस्तावेजीकरण किया है। हिन्दी मेें ये कविताएं इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि इन कविताओं के ज़रिए हम कश्मीरियत और कश्मीरीजन की पीड़ा को व्यापक रूप से जान पाते हैं। कवि इन विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता और यही कवि और कविता की विजय है।
‘किसी सुनामी की तरह/
रास्ता निकालती है
 मेरी रचना
 मेरे सारे कबूतर लौट आते हैं वापस
 छिप जाते हैं
 मेरी बौद्धिक कोशिकाओं में
 और एक ऊंची उड़ान भरने के लिए/
आने वाले करोड़ों वर्षोें पर फैले
 बहुत सारे आसमानों पर...’ (पृ. 11)
संग्रह की तमाम कविताएं जैसे बड़ी शिद्दत से पाठक से कनेक्ट होती हैं और बेधड़क सम्वाद करती हैं। फै़ज़ के पास जिस तरह से ‘सू ए यार से कू ए दार’ की बातें होती हैं उसी तरह से निदा नवाज़ एक साथ बर्फ़ और आग के गीत गाते हैं। वे बहुत चैकन्ने कवि हैं जो जानते हैं कि---
‘आम लोगों को नींद में मारने के लिए
 दो बड़े हथियार थे उनके पास
 धर्म भी
 और राजनीति भी!’
 निदा नवाज़ ऐसे लोगों के बीच सृजनरत हैं जहां---
                   ‘उस शहर के बुद्धिजीवी
                    दर्शन के जंगलों में
                    सपनों को ओढ़कर
                    सो जाते हैं
                   और बस्ती के बीच
                   तर्क का हो जाता है अपहरण!’
मेरा विचार है कि निदा नवाज़ की कविताओं को इसलिए पढ़ा जाना ज़रूरी है कि इसमें एक ऐेसी नागरिक पीड़ा व्यक्त है जिससे देश के अन्य हिस्से के कवि नहीं जूझा करते...रोजी, रोटी, मकान के अलावा जो देशभक्ति का सबूत मांगेे जाने की पीड़ा हैे उसे जानने के लिए इन कविताओं को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।
बर्फ़ औेर आग: निदा नवाज़: 2015
पृ. 112  मूल्य: 235.00
प्रकाशक: अंतिका प्रकाशन, सी-56 / यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन 2 गाजियाबाद उप्र



 इस समय की पटकथा : शहंशाह आलम 

पृथ्वी, प्रकृति, परिवेश और लोक के इर्द-गिर्द बड़ी बारीकी से बुनी गई कविताएं यदि पढ़नेे को मिलें तो बरबस शहंशाह आलम का नाम याद आता है। शहंशाह आलम हिन्दुस्तानी समाज की घरहू बनावट और उसकी तासीर के अद्भुत चित्रकार हैं। वे कविताओं में बोलते हैं तो शब्दों से जैसे रंग झरते हैं, आकृतियों आकार लेती हैं और एक अनहद नाद सा गूंजता है। यही तो कविता के टूल्स हैं जिन पर शहंशाह आलम की सिद्धहस्त पकड़ है। उनकी कविताओं का पैटर्न बरबस पाठकों को अपने जादू से चकित कर देेता हैै।
जैैसे--‘एक चिडि़या उड़ती है
औैर छू आती है इंद्रधनुष
यह रंग अद्भुत था
 इस पूरे समय में
 उस हत्यारे तक के लिए।’
एक अद्भुत राजनीतिक चेतना से लैस है कवि। इसमें बिहार प्रदेश के आमजन की सोच को भी समझने का प्रयास किया है और समसामयिक राजनीति पर बड़ा कटाक्ष भी है---
‘यह बड़ा भारी आयोजन था
 उनके द्वारा  भव्य और अंतर्राष्ट्रीय भी
 इसलिए कि इस महाआयोेजन में
 जनतंत्र को हराया जाना था
 भारी बहुमत से
 मित्रों, निकलो अब इस घर से
 अब यहां न जन है न जनतंत्र!’
तो शहंशाह आलम की कविता में एक तरफ कोमल शब्दावली है तो दूजी तरफ अनायास गूंजता सटायर है जोे कवि को अपने समय का सजग कवि बनाने में सक्षम है।
इस समय की पटकथा: शहंशाह आलम / 2015 
पृ. 130  मूल्य 150 प्रकाशक शब्दा प्रकाशन, 63 एमआईजी हनुमान नगर पटना बिहार


इस रूट की सभी लाइने व्यस्त हैं : सुशांत सुप्रिय 

शब्द-विरोधी समय में हिन्दी जगत में कविताओं का टोटा नहीं है। बिना किसी औपचारिकता के कवि अपनी अभिव्यक्ति के बल पर पाठकों से सम्वाद करने की मुहिम छेड़े हैं। चूंकि लड़ाई एक-आयामी नहीं है, दुश्मन भी बहुरूपिये हैं तो फिर कविता ही ऐसा औज़ार बनती है जिससे कवि अपनी पीड़ा, विडम्बना और उत्पीड़न से लड़ना चाहता है। यही कारण है कि आज छपी कविता भी दीख जाती हैं और आभाषी संसार में भी कविता ही एक-दूसरे को जोड़े रक्खी है। इस कठिन समय में हिन्दी कविता आलोचकों की धता बताकर अपने लिए एक सहज फार्म भी खोज रही है।
इस सदी में यांत्रिकता और कृत्रिमता से जूझते आम आदमी के जीवन में विकल्पहीनता को चैलेंज करती कविताएं इस संग्रह को विशिष्ट बनाती हैं। सुशांत सुप्रिय की कविताएं हाशिए के लोगों के साथ मज़बूती से खड़ी होती हैं। शिल्प और संवेदना के स्तर पर कविताएं प्रभावी हैं।
इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं: सुशांत सुप्रिय: मूल्य 335.00
अंतिका प्रकाशन, सी-56//यूजीएफ 4, शालीमार गार्डन, गाजियाबाद, उप्र

शनिवार, 21 नवंबर 2015

हि्मतरू : गणेश गनी की कविताओं पर केद्रित अंक


जब बिना विरासत जाने हिंदी में कविताई एक संक्रामक रोग की तरह बढ़ रही है, ऐसे गैर-ज़िम्मेदार समय में पूरी ज़िम्मेदारी के साथ हिंदी कविता की लोकोंमुखता को बरक़रार रखते हुए कविताएँ लिखी जा रही हैं. कविताएँ बेशक एक कवि और दूजे कवि के बीच का संवाद भर नहीं हैं. कविताएँ बेशक एक कवि और एक संपादक के बीच समझ का आदान-प्रदान भर नहीं हैं. कविताएँ अपने समय, परिवेश और सामाजिक चेतना को भावनात्मक रूप से महसूस कर लिखी जाती हैं और वृहद् पाठक/ श्रोता के साथ संवाद करने की लालसा रखती हैं तब उन कविताओं का महत्त्व है. 
ऐसी कविता पढना सुखद लगता है, जिसमें कवि पूरी ज़िम्मेदारी के साथ महसूस कर रहा है कि समाज, लोक, परिवेश और सोच-सरोकार के परिस्कार के लिए किन मुद्दों को स्पर्श किया जाए. आज सबसे बड़ी ज़रूरत है आत्मसुख का परित्याग और दूसरों के प्रति सहिष्णुता...ये बड़ी सस्कारी बातें हैं, और कुल्लू हिमाचल प्रदेश से निकलने वाली पत्रिका ‘हिमतरु’ का अक्टूबर २०१५ अंक ने कविता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए गणेश गनी की सशक्त कविताओं पर केन्द्रित अंक निकाला है. 
‘घुट रही है हवा’ कविता में पृथ्वी पर प्रेम बरसाने की लालसा उमड़ रही है: 
एक पौधे ने कहा / आज ज्यादा पानी देना भाई/ मेरी गांठों से कोंपलें फूटने को हैं....
कितनी मासूम मदद की उम्मीद एक बेजुबान पौधे की है, क्योंकि----‘कल और फूल खिलेंगे/ और प्रेम बरसेगा पृथ्वी पर.’ तो ये है कविता जिसमे कवि जानता है कि बिना शुरुआत किये कोई काम अंजाम तक नहीं पहुँचता. और जब हम दुनिया को सवर्ग बनाने की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तब अपना थोडा सा योगदान / अंशदान नहीं करना चाहते.
‘पितर माओट करेंगे’ कविता तो जैसे चेतावनी देती है: ‘प्रश्न उठेंगे/ इंसानों की मुड़ी-तुड़ी संवेद्नाओं पर / पनघट के पानी के सूखने के कारणों पर / प्रश्न उठेंगे/ रिश्ते की शैवालों से उठती/ तेज़ हवाओं पर.’
स्मार्ट-सिटी बनने का दिवा-स्वप्न दिखाने वाली व्यवस्था से कितना बड़ा आदिम सवाल किया गया है---‘पता नहीं क्यों अब उम्र कम हो गई है / बर्फ और अन्न की ढेरियों की....’ और----‘इन दिनों बढ़ी हुई चंद मिटटी वाली छतें / हैरान हैं और उदास भी/ बस खालीपन है / न फसलें, न बच्चे / किसान मजदूरी पर गया है / और बच्चे शहर/ दंतकथाएं धीरे-धीरे पलायन कर रही हैं/ छतों पर उगी घास कह रही है / इस बार खेल उसने जीता है / और बच्चे हार गये हैं (घुरेई कहाँ नाचेगी)
जो बिम्ब प्रतीक गायब हो रहे हैं, गणेश गनी की कविताओं में बरबस अनायास ही आते हैं और पाठक की चेतना को झकझोरते हैं. बाज़ार और वैश्वीकरण की आंधी में किसान और खेत किस तरह से विकासशील देशों के लिए शोषण का केंद्र बने हैं और विश्व-राजनीति किस तरह से इनकी अनदेखी कर रही है उसकी बानगी देखिये---‘अब बैलों के गले लगकर/ खींचना चाहता है हल/ और खेत की हथेली पर/ किसान की किस्मत की लकीरें’ 
शिल्प का कसाव कवि की तैयारी बताता है कि कविताएँ यूँ ही नहीं लिखी गई हैं बल्कि इनके पीछे कवि की विकट चिंताएं दीखती हैं---‘जितना ज़रूरी है / आग का जलते रहना/ उनता ही ज़रूरी है / आग का बुझे रहना..’ (आग) जिसमें एक आग असहमति, संघर्ष, प्रतिरोध, जनांदोलन की आग है और दूजी आग शोषण, दमन, उत्पीड़न, अन्याय की आग है...पाठकों को सजग, सचेत करना कवि का कर्तव्य है और वो उसमे सफल भी है.
कृत्रिमता और यांत्रिकता ने इंसान को रोबोट बना दिया है. बाज़ार ने उसे एक खरीददार में तब्दील कर दिया है और जैसे इस आपा-धापी में भूल चूका है इंसान अपना वजूद---‘जब से उतारे हैं / उसने अपने सारे मुखौटे/ लोग कहते हैं/ तुम्हें कहीं देखा है / शायद पाठशाला जाते/ शायद भेड़ें चराते/ शायद हल चलाते/ शायद रास्ता बनाते/ शायद लोकगीत गाते (चेहरे) 
बेशक आज ज़रूरत है बिना कुछ मांगे अपने समय को संजोने की...अपनी विरासतों के अनमोल धरोहरों के संरक्षण की.---‘खिड़की पर रखा गुल्लक / न ब्याज देता है / और न कमीशन लेता है. (हवा को जाने नहीं देगी)
संवेदनहीनता से भयभीत है कवि गणेश गनी. यह शुभ संकेत नहीं है. सिर्फ जीतने के लिए खेलना ही जब लक्ष्य हो गया हो अब वो चाहे कम्प्यूटर या मोबाइल की स्क्रीन पर खेला जा रहा हो, खेल के मैदान में खेला जा रहा हो, राजनीती में खेला हो रहा हो या फिर बर्बरता के खेला जाने वाला खेल हो...हर खेल में सिर्फ और सिर्फ जीत की आकांक्षा ने इंसानों के अन्दर संवेदनहीनता बढ़ाई है.----‘संवेदनहीन समाजों वाला देश / संवेदनहीन देशों वाली पृथ्वी/ सोचो कैसी होगी दुनिया / सोचते ही ह्रदय / डूबने सा लगता है.’ 
गणेश गनी की कविताओं में लोक से विमुखता के प्रति गहरी चिंताएं मुखर हैं. शहर के स्लम्स में बजबजाने की लालसा पाले लोगों का गाँव से पलायन कवि को बेचैन करता है. गाँव यानी माँ यानी अपनी जड़ों से कटकर इंसान जो शहरों के हाशिये में दीखता है कितना बेचारा लगता है जैसे उसे किसी का अभिशाप लगा हो...और शापग्रस्त ही उसे शहर के कोनों में विलीन हो जाना हो...और यही कारण है कि---‘ अब गाँव में बच्चों की संख्या / धीरे-धीरे कम होने लगी है (हुआ जब सयाना) 
फासीवाद के बढ़ते प्रभाव से कवि सचेत है. शब्द और सृजक इंसानी समाज के लिए कितने जरूरी हैं इसे कवि से ज्यादा कौन समझ सकता है? ----‘शब्द कहीं हथियार न बन जाएँ/ इसीलिए वे चाहते हैं/ शब्दों को मार डालना / जुबान काट डालना / या कम से कम / शब्दों के अर्थ ही बदलना...’ (धारा १४४)
तो फासीवाद हर संभव प्रयास करता है अभिव्यक्ति को कुचलने के लिए. इसके लिए वह भी तैयार करता है अपने साम्राज्य की सलामती के लिए बुद्धिजीवियों की खेप...ऐसी खेप हर युग में, हर समाज में बड़ी प्रमुखता से पाई जाने लगी है और बेशक---‘आज शब्दों पर / प्रहार हो रहे हैं/ शब्द टूट रहे हैं/ मृत हो रहे हैं/ वे संवाद नहीं कर सकते / आज उनपर / धारा १४४ लगी है...’
यही राजनितिक सजगता कविता को एक हथियार बनाती है जिससे कवि तो लड़ता ही है, विराट पाठक समाज भी इस हथियार से अपने आसपास के दुश्मनों को पहचानने लगता है, और यही कविता का उद्देश्य है और यही कवि की सचेत दृष्टि-सम्पन्नता.
‘हिमतरु’ का गणेश गनी पर कविता केन्द्रित अंक इसीलिए पठनीय है, संग्रहणीय है और सराहनीय है. गणेश गनी के रचना कर्म पर, संकलित कविताओं पर सत्यपाल सहगल, जयदेव विद्रोही, हंसराज भारती, उमाशंकर सिंह परमार, अजीत प्रियदर्शी, राहुल देव और अविनाश मिश्र के आलेख भी हैं जो गणेश गनी की कविताई के कई पक्षों को उजागर करते हैं. 
एक उत्कृष्ट अंक के संपादन के लिए किशन श्रीमान बधाई के पात्र हैं. 
हिम्तरू : संपादक : किशन श्रीमान : (यह अंक : १५१ रुपये) 
२०१, कटोच भवन, नज़दीक मुख्य डाकघर, ढालपुर, कुल्लू (हि.प्र) 9736500069, 
9418063231