रविवार, 10 मार्च 2013

ज़रूरी नहीं...

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ज़रूरी नहीं
कि हम पीटें ढिंढोरा
कि हम अच्छे दोस्त हैं
कि हमें आपस में प्यार है
कि हम पडोसी भी हैं
कि हमारे साझा रस्मो-रिवाज़ हैं
कि हमारी मिली-जुली विरासतें हैं

कतई ज़रूरी नहीं है ये
कि हम दुनिया के सामने
अपने प्यार का इज़हार करें
क्योंकि जब दोस्ती टूटती है
जब प्यार नफरत में बदलता है
तब रिश्तों में खटास आती है
तब दिल टूट जाते हैं
तब अकबका जाते हैं वे लोग
जिनके दिल मोम हैं
जो सरल हैं
जो सहज हैं
सीधे-सादे हैं
जिन्हें नहीं आती
पोलिटिक्स की क-ख-ग....
थोड़ी सी भी
इत्ती सी भी....

कुछ तो सोचो
ऐसे नादानों के लिए.....

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

आतंकी











जाने क्यों आजकल


जब भी

देखता / सुनता हूँ ख़बरें

तो धड़कते दिल से

यही सुनना चाहता हूँ

न हो किसी आतंकी घटना में

किसी मुसलमान का हाथ...



अभी जांच कार्यवाही हो रही होती है

कि आनन्-फानन

टी वी करने लगता घोषणाएं

कि फलां ब्लास्ट के पीछे है

मुस्लिम आतंकवादी संगठन...



बड़ी शर्मिंदगी होती है

बड़ी तकलीफ होती है

कि मैं भी तो एक मुसलमान हूँ

कि मेरे जैसे

अमन-पसंद मुसलमानों के बारे में

काहे नहीं सोचते आतंकवादी...

गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

खो गया सौन्दर्य-शास्त्र

मेरे यह सब कहने का मतलब यह नहीं है कि आज के जो भी जन आंदोलन हैं उनसे जुड़ी कविताएं एकदम नहीं लिखी जा रही हैं। ऐसी कविताएं लिखी जा रही हैं, पर वे कविताएं और कवि, हिन्दी कवि


की मुख्यधरा से अलग हाशिये पर हैं और हाशिये की जिन्दगी की कविता लिखते हैं।

अभी हाल में लीलाध्र मंडलोई के सम्पादन में 25 कवियों की कविताओं का एक संग्रह आया है, जिसका नाम है कविता का समय। उस संग्रह में अनेक कवि ऐसे हैं जो जीवन की वास्तविक समस्याओं और

वास्तविकता की मार्मिक कविताएं लिखते हैं और वे प्रयत्नपूर्वक हिन्दी कविता की मुख्यधरा से अपनी अलग पहचान रखते हैं।

उस संग्रह में शामिल एक कवि हैं अनवर सुहैल। उन्होंने एक कविता खान मजदूरों पर लिखी है। उस कविता में वे एक जगह कहते हैं-

‘‘मेरी कविताओं में नहीं है

कोमलकांत पदावली,

रस-छंद, अलंकार मुक्तभाषा

क्योंकि मैं एक खनिक हूं

खदान में खटते-पड़ते,

खो गया सौन्दर्य-शास्त्र’’

इस संग्रह की कविताएं पढ़ते हुए कोई भी व्यक्ति यह महसूस करेगा कि कविता मनुष्यता की मातृभाषा है। जहां भी मनुष्यता संकट में होती है, वहां कविता अपनी उपस्थिति से उस संकट का सामना करने में मनुष्य की मदद करती है। इन कविताओं के बारे में दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्किांश कविताएं पाठकों से सीधे संवाद करती हैं। उनमें से किसी कविता को किसी दुभाषिए की जरूरत नहीं है। यह कविता का लोकतन्त्र है, जो कविता के अनुभवों और मुद्दों में ही नहीं, भाषा में भी मौजूद है।

युवा सम्वाद जनवरी 2011 अंक में मैनेजर पाण्डेय से लिए गए साक्षात्कार का एक अंश

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

सफल पुरुष


सफल पुरुष


होता है एक अच्छा अभिनेता भी...

सफल पुरुष

होता है जिद्दी, सनकी, आत्म-केंद्रित...

सफल पुरुष

... रखता है जिस सीढ़ी पर कदम

उसके नीचे के पायदान तोड़ देता है

ताकि चढ़े न कोई और

पहुंचे न कोई और

उन बुलंदियों तक

जहां गाडना है झंडे

सफल पुरुष को...

भूल जाता है सफल पुरुष

अपने बीते दिन

पुराने दोस्त

ब-आसानी

इसी लिए तो है वो एक सफल पुरुष..

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

जालिमों होशियार!


पुराने लोग कहते हैं


भरता है पाप का घडा

एक दिन ज़रूर

अन्याय का होता है अंत

और मजलूम जनता के दुःख-दर्द

दूर हो जाते हैं उस दिन...



पुराने लोग कहते हैं

इंसान को दुःख से

नहीं चाहिए घबराना

कि सोना भी निखरता है

आग में तप-कर

रंग लाती है हिना

पत्थर में घिस जाने के बाद....



पुराने लोग कहते हैं

दुनिया की दुःख-तकलीफें

सब्र के साथ सह जाना चाहिए

इससे परलोक संवारता है...



पुराने लोगों की बातें

समझ में नहीं आतीं

नई पीढ़ी को अब

उनमें नहीं है

चुपचाप

अत्याचार सहने का

नपुंसक विवेक

यही कारण है

नई पीढ़ी ने गढ़ लिए

नए मुहावरे

नए हथियार

जालिमों होशियार!

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

कोयला खदान के अँधेरों में

के रविन्द्र की पेंटिंग
मेरी कविताओं में    


नही दीखते उड़ान भरते पंछी

नहीं दीखता शुभ्र-नीला आकाश

नही दीखते चमचमाते नक्षत्र

नही दीखता अथाह विशाल समुद्र

नही दीखता सप्तरंगी इन्द्रधनुष

क्या ऐसा इसलिए है

कि भूमिगत कोयला खदान के अँधेरों में

खो गयी मेरी कल्पना शक्ति

खो गयी मेरी सृजनात्मक दृष्टि

खो गयी मेरी अभिव्यक्ति....!

शनिवार, 19 जनवरी 2013

आशा

हिना फिरदौस मेरी बिटिया

वह बोलती
रेखाओं की भाषा
जीवन की

इक नई परिभाषा
देती पिता को

भरपूर दिलासा
पापा

"मुझमे है आशा ही आशा!"

tum kaisi harkat karte ho....

तुम कैसे बहके-बहके हो


तुम कैसे उलझे-सुलझे हो

तुम कैसी बातें करते हो

तुम कैसी हरकत करते हो

कोई जान नहीं पाता है

कोई बूझ नहीं पाता है

सब तुमसे डरते रहते हैं

सब तुमरी बातें करते हैं

चाहे तुम उनको देखो न

चाहे तुम उनको चाहो न

चाहे तुम उनको दुतकरो

फिर भी वो तुमपे मरते हैं

सब तुमसे उल्फत करते हैं...

सोमवार, 14 जनवरी 2013

मत भेज एसएमएस


मत भेजो मुझे


प्यार भरे एसएमएस

थोक भाव में

समय-कुसमय

रात-बिरात....

मुझे मालूम है

नही बना सकते तुम,

भावनाओं से ओत-प्रोत ऐसे संदेशे...

नही लिख सकते तुम

प्रेम-प्रीत में डूबी ऐसी पंक्तियाँ...

इन्हें ज़रूर किसी और ने

भेजा है तुम्हें

जिसे तुम बिना सोचे-समझे

कर देते हो अग्रसारित...

कि मैं भाव-विभोर हो जाऊँगा

पढकर इन्हें...

ये तुम्हारी भूल है मेरे दोस्त...

इन्हें पढकर मुझे ऐसा लगता है

जैसे सुबह की बनी चाय पी रहा हूँ शाम को...

जैसे खा रहा हूँ टिफिन में क़ैद बासी आलू-पराठे..

इसीलिये मत भेजो मुझे

प्यार-मनुहार भरे बासी एसएमएस!

लिख सकते हो तो लिखो

खुद की बातें..

खुद के किस्से...

अपनी जुबानी

राम-कहानी...

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

chalo achcha hua













चलो अच्छा हुआ


तुमने खुद कर लिया किनारा



तुमने खुद छुडा लिया दामन
तुमने खुद बचा लिया खुद को

..................................मुझसे

मेरी परछाई भी अब

नही पड़ेगी तुम पर

तुम निश्चिन्त रहो

कागज़ के उन पन्नों से क्यों डरते हो

वे तो मैं नष्ट कर दूँगा

उन तस्वीरों से क्यों डरते हो

उन्हें मैं जला दूँगा

हाँ, यादें मेरी अपनी जागीर हैं

यादें मेरे साथ दफ़न होंगी