बुधवार, 28 जून 2017

छत्तीसगढ़ी लोक-वेदना का मरसिया: पंगडंडी छिप गई थी

  • अनवर सुहैल


छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है और इधर छत्तीसगढ़ नक्सली समस्या के कारण भी देश में बहुचर्चित रहता है। इसी छत्तीसगढ़ की धरा से जब लोकरंग में पगी कविताएं लिखी जाती हैं तो उनमें धान की सोंधी खुश्बू के साथ नक्सली हिंसा की बदबू भी आ मिलती है। छत्तीसगढ़ ने हिन्दी को कई महत्वपूर्ण कवि दिए हैं। उनमें श्रीकांत वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल जैसे बड़े नाम भी हैं। छत्तीसगढ़ की अस्मिता और लोकाचार पर इधर जो किताब हाथ लगी है वह कवि संजय अलंग की कविताओं की किताब है पगडंडी छिप गई थी। कवि अलंग लोकरंग से आच्छादित इसी छिपी पगडंडी की खोज में अपनी जड़ों तक पहुंचते हैं और छत्तीसगढ़िया लोक वेदना, अस्मिता, आशाओं को आकार देने का विनम्र प्रयास करते हैं। नास्टेल्जिक स्मृतियां कवि का ख़ज़ाना हैं।
कम पंक्तियों में गहन भावबोध समेटे सहज कविताएं संजय अलंग के रचनात्मक विशेषता है। उपभोक्तावादी समय में सामाजिक, राजनीतिक ताने-बाने पर पड़ते प्रहार से कविताएं लाऊड हो सकती थीं लेकिन संजय अलंग की कविताएं नाटकीय आवेश में नहीं आतीं बल्कि बडे धैर्य से कारणों की पड़ताल करती हैं और सांकेतिक प्रतिरोध दर्ज करने में सफल होती हैं। संजय अलंग की कविताएं प्रकृति और मनुष्य के बीच सेतु का निर्माण करती हैं, जिन्हें आज के परिवेश में देखा जा सकता है। इन कविताओं में कवि बार-बार खुद के जीवन का भी अनुसंधान करता है। समय के साथ बदलते परिवेश में कवि का लोक के प्रति गहरा आग्रह है। कवि बाज़ारवाद से प्रभावित नई सामाजिक संरचना के साथ तालमेल बैठाने में कहां चूक हो रही है इसके लिए चिंतित भी है। लोकरंग को बरकरार रखने की ज़िद से सराबोर कविताएं इस संग्रह की निधि हैं---
बस उसे चाहिए / गहरे हरे रंग की पत्तियांें / की पनाह।
(छत्तीसगढ़ पृ 11)
इन कविताओं में गंेड़ी, अमृतधारा का जल-प्रपात, सरई के जंगल, खदान, करमा, मैना, महुआ, गोदना, झुमका बांध, रेण और गेज नदी, बीरबहूटी, भादों, चूल्हा, बांस और गुलेल जैसे लोक-तत्व हैं जो अपनी समूची विविधता के साथ छत्तीसगढ़ लोक को परिभाषित करते हैं। इन लोक-तत्वों से बनी कविताएं संजय अलंग की लोकचेतना और लोक-प्रेम को प्रदर्शित करने में सक्षम हैं। इन कविताओं के माध्यम से कवि बार-बार स्मृतियों की बीहड़ पगडंडियों में विचरण करता है और हर बार ये साबित करता है कि प्रकृति से मनुष्यों का जुड़ाव कितना सुखद हुआ करता था। अपनी जड़ों से कटती जा रही सांस्कृतिक अधोपतन से कवि दुखी है। कवि पाठकों को सचेत करता चलता है कि विरासतें स्थाई होती हैं और तथाकथित आधुनिकता क्षणभंगुर है। मैं संजय अलंग की इन कविताओं के बारे में ज्यादा बात नहीं करूंगा क्योंकि इन कविताओं का लोक पाठकों को सहज ही अपने साथ बहा ले जाता है और मनुष्य की जिजीविषा का उद्घोष इन कविताओं को सशक्त बनाती हैं।
मेरा ध्यान उन अन्य कविताओं की तरफ जाता है जहां कवि ने बहुत सिद्धहस्त तरीके से लोकरंग के साथ की जा रही छेड़खानी और वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक बदलावों के साथ बदलते मानवीय मूल्यों के प्रति अपनी चिंताएं प्रकट की हैं। प्रशासनिक सेवाएं देते हुए सत्ता की नीतिगत आलोचना करने में तमाम खतरे हैं और मुझे खुशी है कि संजय अलंग ने बड़ी कुशलता से अपनी बात इस तरह से रक्खी हैं कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
जैसे एक कविता में गंवरके बहाने कवि बड़ी बात कह जाता है। गंवर वन-भैंसे के शिकार का सांकेतिक जनजातीय नृत्य है। वनभैंसे के सींग और कौड़ियों का मुखौटा लगाकर यह नृत्य किया जाता है। कभी यह नृत्य गंवरजनजातियां किया करती थीं। आज कुछ और लोग हैं जो गंवर कर रहे हैं। इस आखेट के तीखेपन को सरल-सहज तरीके से संजय अलंग ने इस तरह प्रस्तुत किया है--
वे भी अब जंगल में आ गए हैं / करने को एकत्र अपना भोजन
उस भोजन में सत्ता पाना भी है / नाम कमाना भी है / जो वे
अब कर रहे हैं यहां एकत्र भोजन /  क्या वे भी लौट कर दिखाते हैं गंवर और
बताते हैं कि क्या शिकार कैसे / कैसे मारे आदमी / कमाया नाम कैसे?
खुश होते हैं क्या अब भी / देखने वाले इसे।
(क्या अब भी वैसा ही है गंवर पृ 17)
ये जो प्रतिरोधी स्वर हैं इन्हें मैंने संजय अलंग की कविताओं में ही पाया है। छत्तीसगढ़ की समकालीन कविताएं जाने क्यों अपनी पोलीटिक्स बताने से बचती फिरती हैं। छत्तीसगढ़ के समकालीन कवि भी इन सवालों से बचते नज़र आते हैं और छत्तीसगढ़ी लोक की संरचना में भी डूबते-उतराते रहते हैं। कवि बुद्धिलाल पाल ने ज़रूर राजा की दुनियासंग्रह की कविताओं में सत्ता के घिनौने खेल के बीच पिसते लोक की फ़िक्र की है। बेशक, इस तरह की कोशिशों से पहचान लिए जाने का खतरा तो है लेकिन क्या सिर्फ इसी डर से सही बात कहने से कवि बचता फिरेगा?
सरई के पेड़ों को प्रतीक बनाकर जनजातीय संस्कृति और आदिवासियों के दमन-शोषण की प्रतीकात्मक दास्तान जिस कविता में उभर कर आई है वह कविता है--सरई जंगल मुरझाा रहा था और लोग हंस रहे थे
ये लोग कौन हैं? क्या इनका इस लोक से कोई नाता नहीं है? क्या ये हंसने वाले लोग वही परजीवी हैं जिनके हाथ में सत्ता है, जो नैसर्गिक संसाधनों से लैस आदिवासियों को जल,जंगल और जमीन से बेदखल करने का जतन किया करते है। जो आदिवासियों की भूख से अन्न चुराकर खुश होते हैं? बड़ी वीभत्स स्थिति निर्मित होती है जब कवि संवेदनाओं को इस तरह शब्दों में बयान करता है--
संगीने स्तनों पर ठुकी थीं / बसंत का राग / नहीं गा पा रही थी सरई /
मादर निढाल हो चला था / आवाज़ थी तो पर / गोलियों की
( पृ 19)

आदिवासियांें को मुख्यधारा से जोड़ने की निरर्थक कवायद का एक नमूना इस कविता में दिखलाई देता है जहां आदिवासियों की संस्कृति पर तथाकथित सभ्य-समाज अपनी विकृत संस्कृति आरोपित करने का निर्मम प्रयास करता है। ये कोशिशें आदिवासियों को भयभीत करती हैं और उनकी नैसर्गिक सहजता पर अतिक्रमण करती हैं।
इन नए कपड़ों से जंगल तप रहा था / जंगल के सीने पर बूट और संगीन थे
जंगल की नाक से फुल्ली को खींच देने से / खून बह रहा था / अब लड़की
महुआ बीनने जाने से / कतरा रही है
नए कपड़ों से आ रही / खून और बारूद की गंध से / महुआ की गंध खो गई है।
( महुआ बीनती लड़की -पृ 28)
लेकतांत्रिक देश में आदिवासियों की अस्मिता के साथ यह जो घिनौना खेल खेला जा रहा है इस ओर बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने वाली ताकतें भी आदिवासियों की समस्याओं से मुंह चुराती हैं और लोकगीतों की पैराडी बनाकर दोयम दर्जे का छत्तीसगढ़ी साहित्य का सृजन कर रही हैं। अहो रूपम् अहो ध्वनि का खेल सत्ताश्रय में खेला जा रहा है। आदिवासियों की संस्कृति और नगरीय-ग्रामीण संस्कृति में ज़मीन-आसमान का अंतर है। इसे संजय अलंग की कविताओं के माध्यम से बखूबी समझा जा सकता है। ज्यादा ताकतवर सभ्यताएं आदिवासी संस्कृति को लीलने का प्रयास करती हैं। दृश्य और श्रव्य माध्यम दिन-रात इन ताकतवर सभ्यताओं के रीति-रिवाज़ों को स्थापित करने का प्रयास करती हैं। इस चकाचैंध में शास्वत आदिवासी सभ्यता का लोक खुद को ठगा सा महसूस करता है। आदिवासी संस्कृति का शोक-गीत है एक कविता--ऊंचे दरख्तों के साए में प्यार। इस कविता का विन्यास थोड़ा कठिन है और मांदर के थाप से उपजी थरथराहट को देर तक वातावरण में गूंजने देता है। संजय अलंग की इस कविता पर अलग से विस्तार से लिखने की आवश्यकता है। इस कविता में बस्तर के आदिवासियों की सामाजिक संस्था घोटुल की दुर्दशा का वर्णन इस तरह से किया गया है कि देर तक रूह कांपती रहती है। जाने कैसा ग्रहण लग गया है इन प्राकृतिक संस्थाओं पर? इसी तारतम्य में कवि कश्मीर और बस्तर के लोगों की व्यथा में साम्य देखता नज़र आता है। बेशक तथाकथित राष्ट्रवादियों को इस तरह के साम्य पर आपत्ति हो सकती है लेकिन बड़े पैमाने पर समस्याओं के मूल में एक ही चीज़ नज़र आती है। कश्मीर और बस्तर में साम्य है। कश्मीर सामरिक महत्व के कारण और बस्तर भूगर्भीय खनिज सम्पत्ति के कारण सत्ता और कारपोरेट के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों जगह में वहां की धरा महत्वपूर्ण है वहां सदियों से बसे हुए नागरिक नहीं। ऐसा स्थापित करना भी आज कम खतरनाक नहीं है लेकिन संजय अलंग ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए सोच-समझकर अपनी बात रक्खी है।
कश्मीर से बस्तर तक यही बयार है।
इसी तारतम्य में कविता किस तरह आदिवासी जन-जीवन की दुर्दशा का वर्णन इस तरह करते हैं--
मीठी सुबह की गुनगुनी धूप के वस्त्र / कांटों से उलझते, बदन छिलते / तो मुस्कुराहट ही आती
अब वही वस्त्र / पेशाब में भींग कर बदबू मार रहे हैं / बर्बादी घोटुल से शिकारों तक / शरीर ढकने को तरस रही है।
(पृ 35)
बंदूकों से समाधान तलाशती सरकारों की निर्लज्जता क्या कभी आदिवासियों की सम्वेदनाओं को आत्मसात करेगी? बेशक जंगलों के बीच कोई वैक्यूम नहीं हुआ करता था। जंगलों की अकूत खनिज-सम्पदा की लूट के लिए रोड़े की तरह खड़े आदिवासियों को बेदखल करना या कि उनका उन्मूलन करना ही कारपोरेट लूट का अभीष्ट है।
चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकारें नक्सल समस्या से निपटने के लिए नित नए प्रयोग किया करती हैं। ऐसा ही एक प्रयास सलवा जुडूमभी था। इसे संजय अलंग ने करीब से देखा, सुना और गुना है तभी तो इस कविता में आदिवासियों की व्यथा चीत्कार मारती है---
अनुपस्थित है हर चीज़ चारों ओर / बचा नहीं पा रही कविता भी / विचार का, विश्वास को, आसमान को / हदेें, भूख, लालच, बंदूक से बह रहे हैं / प्रेम और शांति जंजीर से जकड़ी / जुडूम के कैंप में बैठी / भात खा रही है शरणार्थियों के साथ।’                        (सलवा जुडूम के दरवाजे से पृ 39)
ये कैसी लाचारी है जो आदिवासियों को पशुवत जीवन जीने पर मजबूर कर रही है। ये कैसी विडम्बना है कि इन आदिवासियों की खुशहाली के लिए फ्रेमवर्क तैयार करते हुए पुलिस, अर्ध-सैनिक बल की तैनाती होती है और आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन से अंततः बेदखल होना पड़ता है। इन आदिवासियों के पास कोई मीडिया नहीं है, इनके पास कोई गुहार सुनने वाले कान नहीं हैं। देश-प्रदेश की राजधानियों में इन आदिवासियों को संरक्षित करने के लिए नातमाम योजनाएं बनती हैं और आदिवासी या तो पुलिसिया कारवाई से या फिर नक्सली हिंसा से असमय मौत का शिकार होता है। बेशक ये आदिवासी हमारे देश के नागरिक हैं और संविधान प्रदत्त तमाम अधिकारों और कर्तव्यों से इनकी रक्षा होनी चाहिए थी। ये आदिवासी इतने निरीह हो चुके हैं कि बकौल कवि---
‘‘आंखों में विस्फोट की चिनगारी दिखती नहीं / विस्फोट सुनता नहीं / बहरापन अब बम से भी नहीं जाता...।’’
क्या हो रहा है लोकतांत्रिक संस्थाएं कवि के इस आर्तनाद पर मौन क्यों हैं?
संजय अलंग ने मर्यादा के साथ ऐसे कई प्रश्न किए हैं जिन प्रश्नों को पूछने से छत्तीसगढ़ के अधिकांश कवि बचना चाहते हैं। सीधे आंख में आंख डालकर पूछे जाने वाले इन सवालों से कवि की समय और समाज के प्रति ज़िम्मेदारियों का अहसास होता है। कवि सिर्फ स्वांतः सुखाय नहीं लिख रहा है बल्कि उसके अपने परिवेश के प्रति कुछ सरोकार भी हैं जो इन कविताओं को पढ़ने से पता चलता है।
आदिवासियों और किसानों को निपटाने का एक और औजार आजकल प्रचलन में है-सेज। आदिवासियों और किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल करने का संवैधानिक हथियार। इसके लिए तर्क चाहे जो हों लेकिन अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा।कविता के माध्यम से कवि संजय अलंग ने करारा व्यंग्य व्यवस्था पर किया है। लुटियन की दिल्ली वहीं रहेगी, राजघाट अपनी जगह रहेगा लेकिन आदिवासियों और किसानों को अपनी जमीनों से विस्थापित होना होगा। इसके लिए उन्हें दाम मिल जाएंगे। क्या ये निर्धन पैसा रखना या उसका उपयोग करना जानते हैं? सेज के जरिये ग्रामीण संस्कृति की विविधता और विशिष्टता को मारने का यह कैसा षडयंत्र है? संग्रह की बेहतरीन वैचारिक व्यंग्यात्मक कविता है ये। ये भोले-भाले आदिवासी, ग्रामीण अच्छे आदमी होते हैं इन्हें उजाड़कर, उखाड़कर कहीं भी फेंका या रोपा जा सकता है। इनके पक्ष में बोलने वाला कोई नहीं। देश के नीति-निर्धारक तत्वों की चालबाज़ियां और निर्धन को निर्धनतम बनाने का षडयंत्र जैसे किसी से छिपा नहीं है लेकिन संजय अलंग ने कविता के माध्यम से सेज़ से सम्भावित खतरों की तरफ मुखरता से प्रश्न खड़े किए हैं। विकास की पूंजीवादी अवधारणा से फायदा किनका है और नुकसान किन्हें उठाना पड़ रहा है सर्वविदित है फिर भी विकास-विकास के नारों में हाशिए की आवाज़े दम तोड़ रही हैं।
पैसा आएगा तो जाएगा / विकास भी लाएगा / भर-भर मुट्ठी फूल उड़ाएगा / छम-छम करती नचनिया पाएगा / जमीन तो स्थिर है उसे ही ले जाएगा / कर्मशील दस्यु ही चल संपत्ति है / उसे ही हटाएगा।’                                                (अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा पृ 47)

जमीन जाएगी, जाए/ पेड़, पहाड़, नदी, जानवर / नाच-गाने, किताब, बोली / आन-बान, इज्जत-आबरू / शासन, संस्कृति / साथ जाएं तो जाएं।
ऐसी विचारधारा सदियों से स्थापित ग्रामीण संस्कारों की बलि चढ़ाने को बेकरार हैं और कामियाब होती जा रही हैं। गांव को लीलते जा रहे शहर एक ऐसे हिन्दुस्तान का निर्माण कर रहे हैं जहां लोकरंग, लोकधर्मिता की हत्या हो रही है। विविधता की इंद्रधनुषी छटा को खत्म करने की साजिशें जारी हैं। मुख्यधारा में लाने के नारे से गांव-गिरांव की अस्मिता पर खतरा मंडरा रहा है।
अच्छा आदमी तुम्हें भी हटाएगा / अपने में सम्मिलित होने की बात चलाएगा / बड़ा वाला एक गांव बनाएगा / बाकी किस काम के / एक गांव, एक धर्म, एक संस्कृति को जमा पाएगा।
यह एक फासीवादी विचारधारा है जो अनेकता में एकता की नींव पर बने हिन्दुस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा है और संजय अलंग इनसे पाठकों को रूबरू कराते चलते हैं।
लेक कलाकार इन बदलती परिस्थितियों में असमंजस की स्थिति में अवाक खड़े हैं। उनका अपनी पहचान विलुप्त होते जा रही है। आद्योगीकरण और विकास की आंधी ने गांव-गिरांव की लोक कलाओं को लील लिया है। आजीविका का संकट लोक-कला की कब्र बनता जा रहा है। ऐसे में लोक-कलाकार की व्यथा कलाकार रेण तीर से उठ नहीं पा रहाकविता में दर्ज है। बड़ी सघन अनुभूतियों से कवि ने लोककला की दुर्दशा पर सवाल उठाए हैं जहां नदियां, पर्वत, जंगल और खेत सब बड़े पैमाने पर किए जा रहे औद्योगीकरण से विलुप्त हो रहे हैं।
छत्तीसगढ़ सिर्फ धान, ददरिया, मंड़ई, बोली-बानी, तीज-त्योहारों का पर्याय भर नहीं है। छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण इलाका बस्तर है जो जाने कितने दशकों से आग और बारूद के ढेर पर बैठा है। वहां के आदिवासियों की दैनंदिनी पर पुलिस-प्रशासन की दखलंदाजी नाकाबिले-बर्दाश्त है। ये नक्सली कौन हैं? यदि ये आदिवासी ही हैं तो फिर इनकी बेहतरी की योजनाएं बननी चाहिए थीं न कि इनके दमन के लिए संगीनों, सिपाहियों, वज्र वाहनों और हैलीकाॅप्टरों की तैनाती की जानी चाहिए थी। लोकतांत्रिक देश में आदिवासियों के संरक्षण और संवर्धन की योजनाएं बंदूक की नलियों से निकालने की कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं और आदिवासियों की अस्मिता खतरे में है।
संजय अलंग की कविताएं बड़ी मुखरता से इन्हे कविताओं के माध्यम से जनमानस तक पहंुचा रही हैं। संजय अलंग बेहद ज़िम्मेदार कवि हैं जो लोक की रक्षा के लिए कृत-संकल्पित हैं।
तभी तो अपनी एक कविता में संजय अलंग ये सवाल उठाते हैं---
खनिज महत्वपूर्ण है कि आदिवासी / मंहगे से मंहगा खनिज है वो तो / देवता क्यों माने आदमी पहाड़ और वन को / उसे उपकरण की तरह तो शासक ही करता है उपयोग / तुम क्यों?’
एक और करारा प्रहार--
सरकार तो सदा वही, जो सभ्य इच्छा को कानून कह इठलाएगी
और--
लाभ खनिज से, खनन आदिवासियों से / विरोधी जुग्गा, जुम्मा, राजू, दोरा, पामभोई सब तो खो गए / हैं तो उद्योगपति, मंत्री, सरकर और बंदूकें / इनका घालमेल ही सब कुछ कराएगा।
(कुई विद्रोह-बस्तर 1859 पृ 59)
ये है संजय अलंग की अभिव्यक्ति के खतरे उठाकर चलने की ज़िद जो उन्हें छत्तीसगढ़ के अन्य कवियों से एकदम अलग चिन्हित करती है।
मैं संजय अलंग की उन कविताओं पर क्या बात करूं जिनमें उनके छत्तीसगढ़िया संस्कार बोल रहे हैं। कवि का कस्बा, कवि का बचपन, कवि के अंतरंग और कवि का लोकोत्सव सब कुछ कई कविताओं में मुखरता से बोलता है लेकिन मुझे संजय अलंग से जिस तरह की कविताओं की उम्मीदें थीं उनमें वह खरे उतरे हैं। उनकी कविताओं के प्रतिरोधी स्वर उन्हें एक नई ऊंचाई प्रदान करते हैं। बेशक, इन विषयों से इतर संजय अलंग की जो राजनीतिक सोच की कविताएं हैं उनमें छत्तीसगढ़ के विदू्रप और विडम्बनाओं का समागम है। बड़े साहस के साथ कवि ने अपनी बातें पाठकों के समक्ष रखी हैं। आए दिन नक्सली हिंसा के तांडव की भत्र्सना नेता और मीडिया करता रहता है लेकिन ऐसी स्थितियां बनी क्यों इस विषय पर सब मौन रहते हैं। संजय अलंग समझते हैं कि---
हत्याएं करते जाना / आत्महंता होने का है राग / बताओ नहीं कुछ भी / सुनना नहीं कुछ भी / न ही जानना / न ही समझना है कुछ भी / डर कर / लाशों के और खेत बनाते जाना है।
(हत्या  पृ 77)
ये डर आदिवासियों के मन में भी है और आदिवासियों के बीच नियुक्त सैनिकों-सिपाहियों के मन में भी है परिणामतः लाशों की फसल उगती रहती है। ये दोनों एक-दूसरे से डरे हुए हैं। यह स्थिति हर पल दोनों को बीच बनी रहती है। एक-दूसरे पर घात लगाए बैठे इन लोगों को लाशों के ढेर में तब्दील होने का खतरा हमेशा मंडराता रहता है। सरकारी तंत्र आदिवासियोें के लिए मनोहारी योजनाओं का मौखिक पिटारा खोलता है और सिपाहियों को रसद और गोला-बारूद सप्लाई करता रहता है। बारूदी सुरंगेजब-तब फटती रहती हैं। मीडिया लाशों की गिनती करती है और अचानक भत्र्सनाओं की आवाज़ें गूंजने लगती हैं।
‘‘फटी जब बारूदी सुरंग / सिर किसी का कहीं गिरा / कहीं किसी का हाथ / रक्त के साथ आंतें बिखरी हुई थीं / चीख सुनने वाला किनारे खड़ा / चिल्ला रहा था-विजय / अब मरसिया ही पढ़ा जाना था / निंदा के बयान के साथ!’                                            (बारूदी सुरंगें  पृ 79)
कुछ हाइकू भी संकलित हैं इस संग्रह में। इनमें भी कवि की राजनीतिक समझ और सामयिक हस्तक्षेप नज़र आता है।
किसकी बंदूक किसका सैनिक
कौन मरा कौन जीता
नहीं पता तनिक
और एक अन्य हाइकू कवि की वैश्विक दृष्टि सम्पन्नता की परिचायक है।
फिलीस्तीन, सिंध, सीरिया, सोमालिया, कश्मीर
सब एक साथ याद आता है
आते हो लेने जब बस्तर की तस्वीर।
मेरे विचार से बस्तर की तमाम समस्याओं पर बड़े साहस और विवेक के साथ एक साथ इतनी अधिक कविताएं संजय अलंग ही ने लिखी होंगी, जिनमें सीधे-सीधे आदिवासियों के साथ कवि खड़ा भी दीखता है। यह एक दुस्साहस है जब आदिवासियों का पक्षधर होना व्यक्ति को संदिग्ध बनाता हो।
ऐसी ही एक कविता है जो मरसिया की तरह पढ़ी जाती है और गहरी वेदना से दम टूटने लगता है।
-‘क्या मुझे बस्तर पर रोना चाहिए?’
इस की कविता की थरथराहट अभी सम पर आती है कि शवकविता तो जैसे चेतना को झकझोर कर रख देती है।
पुलिस समझ नहीं पा रही कि / सपनों और इच्छाओं को कहां फेंकें / अब तो दंतेवाड़ा, बेरूत, बगदाद, गोधरा / सभी जगह गड्ढे पटे पड़े हैं / स्वच्छता का दारोमदार भी सरकार पर है / नालियां कीचड़ और प्लास्टिक से अटी पड़ी हैं / हां उसमें शव भी हैं, कहीं ।’                       
इच्छाओं को ताबूत में रैप किया जा रहा है / जम्हूरियत, नौकरी, पेेंशन, धंधे, डालर, मुआवज़ा, बदलाव / रैपर पर पता नहीं क्या-क्या प्रिंट है / शवों को तो हटना ही होगा।’                     (शव  पृ 77)
और अंत में छत्तीसगढ़ बोली-भाषा के अधःपतन पर कवि की चिंताएं इस तरह परिलक्षित होती हैं--
अब उनकी भाषा कोने में घुटी सी पड़ी है / नई भाषा के गाने ऊंची आवाज़ मे बज रहे हैं / वे अपनी भाषा को बचाने का आवेदन कर रहे हैं / उसके संरक्षण की फाईल नई भाषा में लिखी जाकर दौड़ रही है / एक और भाषा खोने की तैयारी में है।’                                     (गुम होती भाषा  पृ 77)
छत्तीसगढ़ में छाॅलीवुड पनप चुका है और भूमंडलीकरण की आंधी से मदांध उग्र राष्ट्रवाद पनप रहा है। इंसान और इंसान के बीच दूरियां बढ़ रही हैं और ऐसे समय संजय अलंग जैसे सजग-सचेत कवि अपने समय की तर्जुमानी कर रहे हैं।
एक बेहद ज़िम्मेदार कवि संजय अलंग से इसी तरह हस्तक्षेप की आशाएं बलवती होती हैं।


समीक्ष्य संग्रह: पगडंडी छिप गई थी    (संस्करण 2015)
कवि: संजय अलंग  पृष्ठ: 112  मूल्य: दो सौ रूपए
प्रकाशक: किताबघर, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली 110002
011 23266207



समीक्षक
अनवर सुहैल
टाईप 4/3, आफीसर कालोनी पो बिजुरी
जिला अनूपपुर मप्र 484440

9907978108  sanketpatrika@gmail.com

शनिवार, 24 जून 2017

बच-बच कर जीने की कला

वे इसीलिए
बच गए हैं
कि पहचाने नहीं गए हैं
लेकिन वे डरे हुए हैं
एक न एक दिन
उन्हें ज़रूर
पहचान लिया जायेगा
शर्बत में शक्कर की तरह
घुलमिल जाने के बाद भी।
इस तरह बच-बचकर
जीने की कला
वे सिखा रहे
अपने बच्चों को भी
कि शायद इस तकनीकी से
बचे रह जाएँ
कुछ ज्यादा दिन
कुछ ज्यादा बरस
कि तब तक शायद
हमेशा जीवित रहने की
मिल जाए सनद।।।।

मंगलवार, 20 जून 2017

एक नई साइट

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एक नई साइट 

रविवार, 28 मई 2017

छत्तीसगढ़ की परती-परिकथा: बिपत


  • अनवर सुहैल 

















छत्तीसगढ़ जो कभी अखण्ड मध्यप्रदेश का एक उपेक्षित अंग था। राज्यों के पुनर्गठन के बाद अस्तित्व में आया छोटा सा प्रदेश छत्तीसगढ़ तो जैसे इस प्रदेश में विकास के नाम पर एक नई राजनीति गरमा गई। छत्तीसगढ़ की धरा धान का कटोरा कही जाती है लेकिन इसके साथ इसमें प्राकृतिक खनिजों, कोयला भण्डारों, ताप-विद्युत घरों की अकूत सम्पदा है। इन तमाम बातों के साथ छत्तीसगढ़ की एक और पहचान इसके जंगलों, आदिवासियों और नक्सलियों से भी बनती है। जल, जंगल और जमीन से जुड़ी आदिवासियों की अस्मिता और उनकी स्वतंत्रता को किस तरह कारपोरेट जगत अपना शिकार बनाता है यह किसी से छिपा नहीं है। इन आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के नाम पर अरबों-खरबों का बजट स्वाहा हो जाता है। इन आदिवासियों के विकास के नाम पर सरकारें वज्र वाहन, हेलीकाॅप्टर और सैनिक/अर्धसैनिक बलों को डिप्लाॅय करके करती हैं। आदिवासी आज भी उस तथाकथित विकास की बयार से अनभिज्ञ है। आदिवासियों को देश की मुख्यधारा से जोड़ने की कवायद हर तरह की सरकारें करती आ रही हैं। ये मुख्यधारा कौन सी बला है इसे नक्सल प्रभावित क्षेत्र के आदिवासी आज तक नहीं जान पाए हैं। आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के प्रयास में सरकारें आए दिन गोला-बारूद की खरीददारी करती हैं और नक्सलियों से मुठभेड़ की खबरें मीडिया के माध्यम से देश के अन्य हिस्सों में प्रसारित होती रहती हैं। नक्सलियों और सैनिकों के बीच मार-काट का अंतहीन खेल विकास के नारों की चकाचैंध में डूबता-उतराता रहता है। 

आदिवासियों के अलावा छत्तीसगढ़ में एक बड़ी आबादी ब्राम्हणों, राजपूतों, पिछड़ा वर्ग और सतनामी समाज की भी है। बस्तर का इलाका छोड़ दें तो बाकी छत्तीसगढ़ में एक सुगढ़ सामाजिक ताना-बाना इन जातियों के बीच विद्यमान है। संत रविदास, गुरू घासीदास के अलावा बाबा साहेब अम्बेडकर भी इन गांवों में गहराई से पैठे हुए हैं। इन जाति समूहों में अपने कुलगुरू के प्रति अगाध श्रद्धा है और तदनुसार ये अपने मतों का पालन करते हैं। बड़ी और छोटी जातियों के बीच सामाजिक द्वन्द्व यहां बहुत कम देखा गया है। सभी अपने मतानुसार बात-व्यवहार के लिए स्वतंत्र हैं। अभी भी बड़ी जातियों के संरक्षण में छत्तीसगढ़ की सामाजिक और राजनीतिक दशा-दिशा तय होती है। अजीत जोगी का आदिवासी मुख्यमंत्री वाला कार्ड छत्तीसगढ़ में बेअसर साबित हुआ है। आदिवासी और गैर-आदिवासी के बीच खाई खोदने का काम जो अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आते के साथ खेलना चाहा था उसकी भू्रण हत्या इस बने-बनाए सामाजिक ताने-बाने ने उसी समय जनादेश के माध्यम से कर दी थी। छत्तीसगढ़ में विगत पंद्रह वर्षों से दक्षिणपंथी सरकार है और एक राजपूत मुख्यमंत्री है। 
ग्राम-जीवन की त्रासदी और वहां की प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच जीवन जीने की अदम्य लालसा से उत्पन्न जिजीविषा का अद्भुत आख्यान है ‘बिपत’। इस उपन्यास को छत्तीसगढ़ की परती-परिकथा भी कहा जा सकता है। छत्तीसगढ़ जिसे धान का कटोरा कहा जाता है। छत्तीसगढ़ एक आदिवासी बहुल राज्य है। राष्ट्रीय फलक पर छत्तीसगढ़ याद किया जाता है अपनी विपुल खनिज सम्पदा, घने जंगल और नक्सलाईट समस्या के लिए।  उपन्यास ‘बिपत’ छत्तीसगढ़िया मजदूरों के पलायन की त्रासदी को रेखांकित करता है साथ ही सेज के माध्यम से ग्राम-वासियों को जल, जंगल और जमीन से जुदा करने के सरकारी षडयंत्र को बेनकाब करता है। 
‘बिपत’ एक महाआख्यान है छत्तीसगढ़ का। इस उपन्यास के माध्यम से कामेश्वर पाण्डेय ने जो काल-खण्ड और परिवेश चुना है वह इन तमाम समस्याओं को आमजन तक लाने का एक विनम्र प्रयास है। गांव की संरचना में अभी भी पंडितों और ठाकुरों का वर्चस्व है और साहूकारों के जाल में फंसी ग्रामीण जनता के दःुख-दर्द कैसे किसी प्रतिरोध या प्रतिकार में बदलता है इसे बखूबी प्रदर्शित किया गया है। छत्तीसगढ़ से श्रमपुत्रों का अन्य प्रान्तों में पलायन एक ऐसी ज़बर्दस्त त्रासदी है जिसके लिए नए राज्य के बनने से भी कोई समाधान के आसार नहीं दीखते हैं। सरकारी तंत्र ने विकास के नारों के साथ ग्रामीण परिवेश के सदियों से बने-बनाए ताने-बाने को ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है। ऐसा लगता है कि गांव की सभ्यता-संस्कृति को बचाए रखने में सरकारों की कोई रूचि नहीं है। बस छत्तीसगढ़ की धरा में मौजूद खनिज पदार्थों के दोहन के लिए कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम बना हुआ है और उस कार्य को करने के लिए आम ग्रामीण जन की रजामंदी की कोई आवश्यकता नहीं है। ग्रामीणों को किसी भी तरह भूविस्थापित कर उनकी जमीनों पर कल-कारखाने या खदानें खोलना जैसे कार्य बड़ी अदूरदर्शिता के साथ किए जा रहे हैं। इन्हें हम अमानवीय भी कह समते हैं। पर्यावरण की रक्षा के लिए जनसुनवाई जैसे सरकारी आयोजनों की कलई इस उपन्यास में खोली गई है। साथ भी पूंजीपतियों और सरकारों के  इस संगठित लूट के लिए ग्रामीणों के बीच से भी दलालों की खेप तैयार हो जाती है और इन दलालों के माध्यम से सारा काम अंजाम दे दिया जाता है। प्राकृतिक आपदाओं की मार से हलाकान छत्तीसगढ़ का किसान जहां पलायन और फिर अंतहीन शोषण का शिकार होता है और जब लुटपिटकर अपने गांव आता है तब वहां भी अपनी जमीनों से हाथ धोने के अलावा उसके पास बचता कुछ नहीं है। ‘बिपत’ का आख्यान, सरकारों और पूंजीपतियों के इस लूट-तंत्र का कच्चा चिट्ठा भी है। 
‘बिपत’ प्रथम दृष्टया छत्तीसगढ़ की परती परि-कथा शायद इसीलिए कहा जा सकता है कि मैंने अभी तक छत्तीसगढ़ के इस स्वरूप को इतनी तटस्थता और बेबाकी से किसी उपन्यास में नहीं देखा है। कामेश्वर पाण्डेय ने बेशक छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या को ज़रूर नहीं तवज्जो दी है क्योंकि उनके उपन्यास का परिवेश दण्डकारण्य बस्तर से अछूता है और जो परिवेश उन्होंने चुना है वहां एक नए बस्तर को बनते हम ब-आसानी देख सकते हैं। ये बात तो तय है कि विकास के नारों से लैस होकर चुनी हुई सरकारें ग्रामीणों के संस्कार और आस्था से खिलवाड़ करती हैं और उन्हें उनकी सदियों से सहेजी संस्कृति से बेदखल करने का षडयंत्र करती हैं। इन ग्र्रामीणों का जो जातीय बांडिंग है और जिसके तहत वे सदियों से अपनी संस्कार को बचाए आजीविका से लिए संघर्षरत हैं उसे तोड़ने का कार्य सरकारें कर रही हैं। 
‘बिपत’ उपन्यास में कई कहानियां एक साथ जिस अंजाम तक पहुंचना चाहती हैं, वहां आप को आसानी से इन गांव में अपने अधिकार के प्रति जागरूकता और कर्तव्य के प्रति । 
इनमें गांव के बड़े कका जैसे पात्र हैं जो ब्राम्हण हैं और जिनकी सदाशयता के तमाम ग्रामवासी कायल हैं। तो उसी गांव में पांड़े भी है जो अराजक, शोषक और आतताई पैसहा ठाकुरों का दलाल है। बड़े कका मनसा-वाचा-कर्मणा गांव की भलाई के लिए कृत-संकल्पित हैं। एक बहुत उदार पात्र हैं बड़े कका। जो अपनी कथनी और करनी के सामंजस्य से गांव-वासियों के बीच श्रद्धा के पात्र हैं और जिनकी एक आवाज़ पर सब जन एकजुट हो जाते हैं। बड़े कका जमीनी व्यक्ति हैं। कृषक हैं। पुरोहित का कार्य भी करते हैं। लोगों के बीच न्याय की बात करते हैं भले से इसमें उनका नुकसान ही क्यों न होता हो। लेकिन पैसहा और उसकी संतानों की निरंकुशता और अत्याचार पर बड़े कका अंकुश लगाने में विफल हो जाते हैं। इसका एक बड़ा कारण गांव में निचली और पिछड़ी जातियों का दमन के प्रति प्रतिकारहीनता ही है। बड़े कका अपने प्रवचनों और सद्प्रयासों से इन दबी-कुचली जातियों के लोगों के मन में प्रतिरोध के बीच रोपते हैं। बड़े कका के साथ सकारात्मक सोच के लोगों की एक पूरी टीम काम करती है। बड़े कका गांधीवादी विचारों के हैं और पुरोहिताई के अलावा देश-दुनिया में हो रहे बदलावों पर भी उनकी पैनी नज़र है। बड़े कका की वैचारिक पृष्ठभूमि की झलक उनके भाषणों और उद्गारों में बहुलता से मिलती है। खासकर जब बड़े कका डायमंड कोल वाशरी और खुली खदानों के खोले जाने के पूर्व बुलाई गई जनसुनवाई में माईक पकड़ते हैं तो ऐसा लगता है कि हाड़-मांस का ये व्यक्ति कितनी बड़ी बौद्धिक पूंजी का भी मालिक है। 
जब बड़े कका कहते हैं--‘‘यही तो आज की राजनीति की विडंबना है सिउ परसाद।’ बड़े कका ने कहा--‘मुद्दे को छोड़कर ऊल-जलूल बातों की ओर जनता के ध्यान को भटकाना...’ जन सुनवाई के इस नाटक को देखकर उन्हें मन ही मन भारी क्षोभ हो रहा है। बडे़ कका ने कहा---‘हम खदान खुलने के विरोध में हैं। कारण कई हैं। जितने खदान खुलते जाएंगे पर्यावरण की छेद उतनी ही बढ़ती जाएगी। जमीन और जंगल नष्ट हो जाएंगे। गांव-समाज बिला जाएंगे। यहां के आदमी फकत मजदूर और अपने ही इलाके में दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रह जाएंगे। जरूर यहां बिजली, पानी, सड़क, स्कूल और अस्पताल सब हो जाएंगे, लेकिन किस कीमत पर और किनके लिए? हम मानते हैं केवल खदान न खुलने से पर्यावरण की रक्षा नहीं हो जाएगी...वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं, दुनिया भर की लालच का पूरा करने के लिए अभी इतना ज्यादा कार्बन जलाना पड़ रहा है कि अगले दस-बीस वर्षों में धरती का पर्यावरण एकदम छलनी हो जाएगा। आधा कार्बन तो हथियारों को बनाए रखने के लिए खर्च हो रहा है।’’
कलेक्टर ने बड़े कका को टोका--‘यहां सिर्फ मुद्दे की बात बोलिए पंडित जी...।’ 
बड़े कका इन भभकियों से कहां डरने वाले हैं। उन्होंने पुनः अपनी बात आगे बढ़ाई--‘हम मानते हैं आज दुनिया प्रगति और विकास के जिस राह पर चल पड़ी है उसमें से लौटना बड़ा कठिन है और यह काम पूंजी के पिछलग्गू सरकारों के वश में है भी नहीं। आप कहते हैं गांव की समस्याओं के बारे में कहा जाए, लेकिन खदान खुलते रहेंगे तो गांव-बस्ती रह कहां जाएंगे और बच भी जाएंगे तो उनका जीवन नरक हो जाएगा। धरती-आकाश, रूख-राई और आदमी तक सब काले पड़ जाएंगे। मुआवजा कितनों भी मिले, गांव के किसान मजदूर उस मुआवजे को करेंगे क्या? हम किसान लोग खेती किसानी जानते हैं, पैसे को चलाना नहीं जानते। मुआवजे के पैसे से दो-चार लोगों की हैसियत बन पाएगी। बाकी सब बर्बाद हो जाएंगे। हाथ पैसे आएंगे तो फोकट का टीम टाम बढ़ेगा। दारू-मुर्गा, जुआ-चित्ती की लत बढ़ जाएगी। गांव के किसान कंपनी के ठेकेदारों के बंधुआ मजदूर बनकर रह जाएंगे। हम जानते हैं कि कंपनी की पक्ष में पूंजी है, सरकार है और कानून भी है और हमारे बीच के दलाल लोग भी हैं। हमें इसमें घोर आपत्ति है।’
जन-सुनवाई का मंजर कामेश्वर ने बड़े धीरज से बयान किया है। ऐसी शानदार रिपोर्टिंग बिरले ही देखे मिलती है। ‘बिपत’ के केंद्र में बड़े कका की चिन्ताएं हैं। बड़े कका समाज के उस तबके का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें सच कहने की बीमारी होती है। जानते हैं कि उनकी विजय होगी नहीं क्योंकि स्वार्थी तत्व अपने स्वार्थ के लिए सामाजिक ताने-बाने को  अहमियत नहीं देते हैं। अपनी आगत् पराजय से भी बड़े कका विचलित नहीं होते हैं। हिन्दी उपन्यासों में और कहें कि सामान्य जीवन में भी बड़े कका जैसा सम्पूर्ण चरित्र अब देखे नहीं मिलते हैं। इस आपाधापी के दौर में लोकतंत्र के चारों खम्भे हिलते दिखलाई देते हैं। एक ग्लोबल आंधी व्यक्ति और संस्थाओं को कबीलाई दौर में ले जाना चाह रही है। 
‘बिपत’ की गाथा में कश्मीर और पंजाब गए छत्तीसगढ़िया मजदूरों की मुक्ति के प्रसंग हैं। ये मजदूर किसलिए पलायन करते हैं इसकी खोजबीन भी है। आजादी के इतने सालों बाद ग्रामीण मजदूरों के लिए एक योजना बनी। सौ दिन की रोजगार गारण्टी योजना। इस योजना में इतने घपले हो रहे हैं कि मजदूरों को मजदूरी पाने के लिए जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। सरकारों की रोजगार गारण्टी योजनाओं के ढोल नगाड़े की पोल खोलता है ग्रामीण मजदूरों का निरंतर पलायन। इस बीच गांव में फैले मजदूरों के दलालों का गिरोह सक्रिय रहता है और मजदूरों को ज्यादा पैसे कमवाने का सपना दिखलाकर बंधुआ मजदूरी के नरक में ठेल देता है। ऐसे पलायन कर गए बंधुआ मजदूरों को छुड़ाकर वापस उनके गांव पहुंचाने का काम करती हैं एनजीओ। बिपत उपन्यास में इन पलायनकर्ता ग्रामीण मजदूरों की व्यथा-कथा इस तरह से समावेशित है कि सहज ही इस समस्या के रहस्यों से पर्दा उठता चला जाता है। कितने मजबूर हैं ये भोले-भाले ग्रामवासी जो अपना श्रम औने-पौने बेचते हैं साथ ही अपना आत्मसम्मान और मान-मर्यादा भी। उनकी बहू-बेटियों का दैहिक शोषण इतना आम है कि वे असमय अन्चाहे गर्भ ढोती फिरती हैं। हर तरह से हताश और निराश ये मजदूर जब अपने घरों को लौटते हैं तो यहां सेज और पूंजीवाद उन्हें अपने गांव-गिरांव से बेदखल कर चुका होता है। 
गांव के गौंटिया यानी जमीन्दार पैसहा की बेटी केकती और छोटी जात के कौसल की प्रणय कथा इस उपन्यास की जान है। केकती पिता और भाइयों के विरोध के बावजूद अपने प्रेमी कौसल की घर वापसी का ख्वाब देखा करती है। एक दिन खबर आती है कि कुछ छत्तीसगढ़िया मजदूर आतंकवादियों की गोली का निशाना बन चुके हैं। उन मजदूरों में केकती का कौसल भी है। ये खबर सुनकर प्रेयसी केकती विक्षिप्त हो जाती है। केकती-कौसल का प्रेम बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है। उनका मिलन न हो पाया। बड़े कका ने विक्षिप्तावस्था जब केकती को देखा तो उनका दिल रो पड़ा। कौसल  जैसा पान खाता था वैसा ही तम्बाकू वाला पान जब केकती ने मुंह में डाला तो बड़े कका ने ठंडी सांस ली। ‘‘घर दुआर, रूप-गुण और चीज-बस के रहते अभागिन हो गई छोकरी। बाप-भाईयों के शासन के मारे अपने प्रेमी को नहीं पाई और उसकी जान अजाहे चली गई। आतंकियों की गोली का शिकार हो गया बेचारा। और इधर टूरी पगला गई।’’
पैसहा और उसके बेटों का आतंक इस तरह छाया हुआ था कि गांव में उनका विरोध करने वाला कोई नहीं। जिस पर उनकी कुदृष्टि पड़ी नहीं कि उसका दैहिक या भौतिक शोषण हुआ नहीं। लेकिन अब ग्रामीण समाज पहले जैसा नहीं रह गया है। सामाजिक बदलाव के साथ साथ राजनीतिक जागरूकता भी गांव में आ गई है। पिता पैसहा रोग-ग्रस्त हो गया तो जैसे उसके बेटों को अब कोई रोकने-टोकने वाला न रहा। ऐसे ही एक प्रसंग में बेदिन से बलात्कार के प्रयास में बेदिन के पति ने पैसहा के बेटे राजा का खून कर दिया।  जब बेदिन का पति खेदू थाना सरेंडर करने जा रहा था तो सारा गांव उसकी जय-जयकार करता उसके पीछे गया। आततायी का बदला लेने वाले उस नायक की जमानत का इंतजाम भी हो जाता है। पैसहा का आतंकी साम्राज्य इस एक घटना से छिन्न-भिन्न हो जाता है।  
‘‘थाने में समर्पण करने के लिए जैत-खाम से खेदू का विजय जुलूस निकला।’’
तो ये थी परिवर्तन की बयार जो छत्तीसगढ़ के गांव में अब बहने लगी थी। 
एक और प्रणय गाथा उपन्यास में आकार लेती है। वहीं आदिवासी कन्या चुनिया भी है जो बाल्यकाल से बड़े कका के घर पली-बढ़ी और फिर एक दिन उसका विवाह बड़े कका होरी से करा देते हैं। चुनिया होरी को मन ही मन पसंद करती है। उनका मिलन जैसे अंधेरे में चिराग का आभास देता है। होरी बंधुआ मजदूर मुक्ति मोर्चा के लिए काम करता है। वह खुद भी एक बंधुआ मजदूर था। किसी तरह वह बंधुआ मजदूरी से भाग कर मुक्त हुआ था और उसने प्रण किया कि अब बाकी जिन्दगी बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के लिए होम कर देगा। किशोर भाई जो बंधुआ मुक्ति का एनजीओ चलाते थे, होरी उनके साथ हो लिया। बड़े कका के आव्हान पर होरी ने गांव के काफी मजदूरों को मुक्त कराया तो गांव में बड़े कका ने उन लोगों के साथ मुक्त मजदूरों का भी सम्मान किया और गांव में सम्मिलित भात-भोज हुआ। इस भात-भोज की एक और खासियत ये हुई कि अमीर-गरीब, ऊंच-नीच सभी एक साथ एक पंगत में बैठ कर दाल-भात का आनंद उठाए थे। इस कृत्य का स्वागत भी हुआ और समर्थों द्वारा आलोचना भी हुई लेकिन गांधीवादी ज्ञानी गुणी बड़े कका को किसी की परवाह नहीं थी। 
हां, खदान और कोल वाशरी के लिए भू-अधिग्रहण मामले में बिचैलियों के खेल से ज़रूर बड़े कका पार नहीं पा सके। हो भी नहीं सकता था ऐसा क्योंकि जहां सत्ता और पूंजी का गठजोड़ हो वहां न्याय की उम्मीद बेकार है और यही तो सबसे बड़ी बिपत है।
पूरा उपन्यास छोटे-छोटे प्रसंगों से भरा-पूरा है। गांव के असंख्य पात्रों की उपस्थिति और छत्तीसगढ़ लोक-भाषा से सज्जित परिवेश बरबस इस आख्यान को क्लासिकी का दर्जा देता है। कामेश्वर पाण्डेय स्वयं कोयला उद्योग में कार्यरत हैं और छत्तीसगढ़ की माटी, बोली-बानी और रूप-गंध-स्वाद से सुपरिचित हैं। इसीलिए बड़े विश्वसनीय रूप से उपन्यास मंद गति से कथा-उपकथा रचते एक अंजाम तक पहुंचता है। छत्तीसगढ़ी भाषा में उनका उपन्यास ‘तुहर जाय ले गीयां’ और ‘जुराव’ और एक हिन्दी कथा-संग्रह ‘अच्छा तो फिर ठीक है’ प्रकाशित है। 
‘बिपत’ यानी विपदा से जूझते पात्रों के आख्यान को पढ़ना एक नई लड़ाई लड़ने की प्रेरणा भी देता है। छत्तीसगढ़ी लोक-रंग और आंचलिक शब्दावली से सज्जित इस उपन्यास का स्वागत है।

बिपत: कामेश्वर पाण्डेय 
किताबघर , 24/4855, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002 
संस्करण: 2016     पृष्ठ: 376   मूल्य: रु 795 

  • अनवर सुहैल, टाईप 4/3, आॅफीसर्स काॅलोनी, पो बिजुरी, जिला अनूपपुर मप्र 484440 मो. 9907978108

शुक्रवार, 26 मई 2017

कविता से उम्मीदभरी आस: शकुन्त

  • अनवर सुहैल



कठिन कविताई का दौर जैसे अब समाप्त हो चला है। संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का आतंक और बीहड़ भाव-बोध से पाठकों के समझ को चैलेंज देती कविताओं के दिन जैसे लद गए हैं। कविताएं आज जो आकार लेकर आ रही हैं वे पाठक या श्रोता से सीधे सम्वादरत् हैं। कविता का यह नया गुण उसे रस-छंद-अलंकार के बंधे-बंधाए फार्मूले से अलगिया रहा है। रूपवादी ठसक और कलात्मकता का दुराग्रह नए कवियों को बेचैन नहीं करता है और जब हम कई दशकों से सृजनरत कवि शकुन्त की कविताएं पढ़ते हैं तो सहज ही उनकी रचनात्मकता से जुड़ाव हो जाता है। सन् 1941 के जन्मे शकुन्त लगातार लिख रहे हैं। देश भर की स्तरीय साहित्यिक लघु-पत्रिकाओं में उनकी जीवन्त उपस्थिति उन्हें लगातार ऊर्जावान बनाए रखे है। 1978 से वह कविताएं लिख रहे हैं। आज के कवि निस्संदेह किताब प्रकाशित करने के लिए उतावले रहते हैं लेकिन शकुन्त का पहला कविता संग्रह 2004 में प्रकाशित हुआ और ताज़ा संग्रह 2017 में आया। छोटी-छोटी कविताएं लोक-संस्कार और मालवा प्रदेश की खुश्बू समेटे इस कठिन समय में उम्मीदें बंधाती हैं कि कविताएं अजर-अमर रहेंगी। 
मौजूदा दौर का संकट आदमी को आदमी से दूर कर रहा है। आज हम एक राष्ट्रवादी दादागिरी के शिकार हुए जा रहे हैं। बाज़ार और पूंजीवाद ने आदमी को एक आत्मकेंद्रित रोबोट में तब्दील कर दिया है। विविधता में समरसता, सामाजिकता और सहजीवन की अवधारणा जैसी सोच की जगह गुटबंदी और दलबंदी ने ले ली है। समाज इतना विभक्त क्या कभी रहा होगा, ऐसे समय में कवि की चुनौतियां भी बढ़ जाती हैं। इन चुनौतियों को शकुन्त स्वीकार करते हैं और कविता से आग्रह करते हैं कि उतर आओ / मेरी कविताओं/ पगडंडियों पर/ लोग तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।
ये कौन लोग हैं जो कवि और कविता को पगडंडियों पर बुला रहे हैं---ये लोग मेहनतकश सर्वहारा हैं जो “‘उन हताश चेहरों को/ खुशियां दे जाओ/ जो गीली माटी संग/ पसीने की खारी/ बूंदों का जश्न मना रहे हैं।क्योंकि इन हताश, निराश, थके हुए लोगों को ऐसी कविताओं की ज़रूरत है जो उन्हें उम्मीदों की सेंक से प्रफुल्लित कर सके। शकुन्त की कविताएं हमें आगाह करती हैं ऐसे समय में कवियों को चौकस रहना बेहद ज़रूरी है। इस समय सृजन का दायित्व निभाना बड़ा कठिन कार्य है। 
बेहद भयभीत कर देने वाला समय है यह। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने में बेहिसाब खतरे हैं। हमेशा ऐसा लगता है कि आज ऐसी संस्थाएं भी सक्रिय हैं जो व्यक्तिगत विचारों को, जीवन को और ख़्वाबों को भी स्कैन कर रही हैं। एक डर दिलो-दिमाग में हावी रहता है। विचार आकार लेने से पहले कई तरह की एडीटिंग प्रोसेस से गुज़रते हैं अब। इस कारण मूल विचार की गहनता और मारक-क्षमता कमज़ोर हो जाती है। कवि शकुन्त इस डर को बहुत ही कम शब्दों में इस तरह बयान करते हैं--
इतनी कुरूपता / कुंठाएं और भी / न जाने क्या-क्या
एक धुंध भरा माहौल/ एकदम कन्नीकाट रिश्ते / और संशय भरे / दिन औ रात
चलूं / नदी-पेड़ या किसी / पगडंडी से पूछूं तो सही कि, आखिर, यह हो / क्या रहा है
बेशक बहुत बड़ा प्रश्न है आज कि सभी हैरान परेशान हैं जो कि जो भी हो रहा है ये सब क्या हो रहा है----क्या हमारी जड़ें इतनी कमज़ोर थीं कि सामाजिक समरसता की बातें इश्तिहारों में सिमट कर रह गई हैं। कवि शकुन्त जान रहे हैं कि आज के दौर में अचानक से वे लोग भी पाला बदल रहे हैं जो घोषित रूप से सेकुलर सोच के साम्यवादी विचारों के वाहक हुआ करते थे। ये लोग अब एकदम से साथ छोड़ कर आक्रामक से हो गए हैं और उन लोगों को गरियाने लगे हैं जो सामाजिक न्याय की बातें करते हैं और मिलजुल रहने का दम रखते हैं। ज़िदश्रृंखला की कविताएं ऐसे ही लोगों को लक्ष्य कर लिखी गई हैं--
तुम मुझे रोक नहीं सकते दोस्त / और तोड़ तो / बिल्कुल भी नहीं सकते/ 
चूंकि तुम्हारी सोच में/ बहुत खतरनाक विषाणुओं का/ घालमेल हो गया है।
इन खतरनाक विषाणुओं से देश अचानक से विषाक्त हो गया है। ऐसे में लोकतन्त्र का चैथा पाया भी अचानक से बदल गया है। रामजादे और हरामजादे जैसी गालियों की कोई भी भर्त्सना नहीं करता। जो ज़हर बोया जाता है उसकी काट तलाश करने में देश में कोई भी तंत्र विकसित नहीं हो पा रहा है। बड़ी उहापोह की स्थिति है। हां यह ज़रूर हुआ है कि प्रतिरोधी आवाज़ें एक सामूहिक डर की गिरफ्त में आ गई हैं--
फिर भी जाने क्यों
मेरे भीतर दहशत भरे
क्षण रह-रह कर खूंखारते हैं।
लेकिन कवि शकुन्त आश्वस्त हैं कि ---अपनी ज़िद पर अड़ो / और दुनिया के / साफ फलक पर / क्रूर बौने इरादे बोने वालों को / जड़ों से नेस्तनाबूद कर दो।
शकुन्त का कवि उन ताकतों से भी समाज को आगाह करना चाहते हैं जो दलित सवालों के नाम पर और छद्म राष्ट्रवाद के नाम सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने लगे हुए हैं--
आ रहे हैं कुछ लोग / धर्म, इंसाफ और / जोर-जुल्म की / दुहाई देते।
ऐसे में—“आदिम सदी का कोई वर्ष/ उसमें / तना हुआ सा कोई दिन / मद्धिम रोशनी के साथ / ढूंढता है मानवता का वजूद।
अर्थात इन बीते सालों में हमने खोई है मानवता और खोया है रिश्तों की गर्माहट का अहसास। कवि इन विपरीत परिस्थितियों में भी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता---एक दिन / जरूर आएगी/ इन आंखों को नींद / 
बारूदी सुरंगों से / बहेगा पानी / और धरती पर / जाने कितने ग्रह / बांटेंगे सहज ही / अपने सुख-दुःख।
कवि और कविताएं किसी बच्ची के मन की तरह सहज, सरल और मासूम होती हैं। प्रतिरोधी कविताएं इस क्रूर समय में भी इतराती चलती हैं उन लोगों से बेखबर होकर जो राह पर हर मोड़ में घात लगाए बैठे हैं। अपनी धुन में रमी कविताएं एक ऐसी धरती की कल्पना करने का दुस्साहस करती हैं जहां अन्याय, शोषण और असमानता का दंश से पीड़ित मानवता कराह रही है।
कवि अपनी कविताओं पर तंज़ कसता है—“अरे भाई / तुम्हें कविता का / ज्यादा ही शौक चर्राया था / तो बोल देते/ किसी कवि-मंच से / फूहड़ हास्य भरे फिरके / रच देते किसी शादी-ब्याह में / बरातियों के लिए / पेटू कसीदे.......XXXXX..........तुम्हें मालूम नहीं / बाजार और कारपोरेट / की जुगलबंदी के / राग ग्लोबल-गांवने / हमारी संस्कृति के / चिन्दे-चिन्दे कर दिए हैं।
छोटी-छोटी छपपन कविताओं से आलोकित कवि शकुन्त की यह दूसरी कविता पुस्तक गुंथी हुई उम्मीदेंहमारे समय के सच की तर्जुमानी करती हैं। कवि का लोक उनकी कविताओं में खूब बोलता है। बच्चे, पहाड़, नदी, स्त्री, चिड़िया, मां और इन सबके साथ उम्मीदों के ख़्वाब से बनी है ये कविता पुस्तक। जिसमें प्रतिरोध के स्वर भी हैं और एक जीने लायक पृथ्वी के बचे रहने की उम्मीदें भी।
कवि की इन उम्मीदों के साथ पाठक भी आश्वस्त होता है---अंधेरा बहुत बड़ा / और डरावना है / फिर भी / जाने क्यों / उजास के फववारे / झरते रहते हैं / मेरे आस-पास।
मुझे ऐसे समय फै़ज़ की पंक्तियां याद आती हैं---अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं।
बेशक, ससम्मान जीवन जीने की प्रेरणा देती कविताएं इंसान को दोगलेपन से बचाने के लिए प्रयत्नशील हैं।

संग्रह: गुंथी हुई उम्मीदें 
कवि: शकुन्त
प्रकाशन: 2017 प्रकाशक: विमर्श प्रकाशन उज्जैन मप्र 
पृष्ठ: 88 मूल्य: 100 
कवि सम्पर्क: शकुन्त पो. बखेड़ जिला राजगढ़ /ब्यावरा मप्र 465687 
मो. 08827701707

बुधवार, 17 मई 2017

भीड़ को हल्के से मत लेना

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भीड़ इकट्ठी की जाती है
भीड़ कभी खुद भी लग जाती है
अब जमाना बदल गया है
भीड़ को हल्के से मत लेना
धोखे में मत रहो कि 
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता
भीड़ का धरम होता है
भीड़ की जात होती है
भीड़ की अपनी पहचान होती है
इस भीड़ को कम कर आंकना
भीड़-तंत्र को स्थापित होने में मददगार होना है
किसी भी दौर में
बहुत मुश्किल है दोस्तों
भीड़ इकट्ठी करना
भीड़ पर हंसना खुद के पैरों पर
कुल्हाड़ी मारने जैसा है
ये भीड़ है न जो टकटकी लगाये
किसी चमत्कार की आस में इकट्ठी है
उसकी इस आस को अपने पक्ष में
देखो तो मदारी कैसे कर ले रहे हैं
तुम अपनी कंदराओं में
कर रहे हो शोध उस भीड़ के मनोविज्ञान पर
भीड़ का लोकशिक्षण होता है
भीड़ का अपना एक अनुशासन होता है
और यही भीड़ एक दिन तुम्हारे काम आ सकती है
इस भीड़ को हल्के मत लो
कोशिशें करो कि तुम भी
इकट्ठी कर सको भीड़
अपने रंग में रंग सको जिन्हें
लेकिन भीड़ की भाषा भी तुम्हें आनी चाहिए.....
तुमने हमेशा भीड़ का उड़ाया है मज़ाक
कह दिया कि भीड़ का नहीं होता कोई
चेहरा, चरित्र और संस्कार
सुनो मैंने बड़े गौर से
देखा है एक एक चेहरा
और ये भी देखा है कि ये भीड़
कभी साथ थी तुम्हारे भी
कि ये तुम्हारे लोग हैं
ये तुम्हारे ही लोग हैं भाई।।।

रविवार, 30 अप्रैल 2017

उर्दू का झुनझुना

झुनझुना बजा
उर्दू... उर्दू ...
मुस्लिम मतदाता झूम उट्ठे
जैसे उर्दू न होती
तो दीन न होता
ईमान न होता
रसूल न होते
कुरआन न होता
जाने कितने मुसलमान
नहीं जानते उर्दू-अरबी में भेद
उर्दू अखबार का टुकड़ा
ज़मीन पर फेंका मिल जाए अगर
तो चूम लेते हैं उठा कर
आँखों से लगा लेते हैं
और रख देते हैं अहतियात से
किसी साफ़-सुथरी जगह पर
भले से उस अख़बार में
छपी हो सनी लियोनी की तस्वीरें

झुनझुना फिर-फिर बजा
उर्दू...उर्दू...
बौखला गये तथाकथित राष्ट्र-भक्त
हिन्दुस्थान को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे
उर्दू उत्थान की बात करने वाली सरकारें
गिरती गईं धडाधड

उर्दू यानी के आसिफ की मुगले-आज़म
उर्दू यानी जगजीत सिंह की ग़ज़लें
उर्दू यानी शराब, साकी, मैखाने की शायरी
उर्दू यानी तवायफें, मुजरा, कोठे
उर्दू यानी लज़ीज़ मटन-बिरयानी
उर्दू यानी ख्वातीनो-हजरात वाले अनाउंसर
इससे ज्यादा उर्दू उन्हें बर्दाश्त नहीं

झुनझुना बजता रहा
उर्दू...उर्दू...
अपने बच्चों को मुसलमान
नहीं पढाते अब उर्दू
कोई हाफ़िज़-मौलाना बनाना है क्या?
मस्जिदों के पम्पलेट छपने लगे हिंदी में
शादी-कार्ड अंग्रेजी-हिंदी में
मस्जिद-मज़ार के मासिक आय-व्यय का हिसाब हिंदी में
और उर्दू जिन्दा रही सिर्फ चुनावी घोषणा-पत्रों में
दंगों में किसी खाद की तरह काम आती रही उर्दू
मुसलमान उर्दू को खुद से चिपकाए रहे
उर्दू मुसलमानों से दूर होती गई.....

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

लेकिन मत खाओ हलाल मांस

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तुम्हें मांसाहारी बनना है तो बनो
लेकिन मत खाओ हलाल मांस
इन म्लेच्छों का हलाल किया मांस वर्जित है अब से
इस मांस को हम अपवित्र घोषित करते हैं
इससे बेशक होगा तुम शाकाहारी ही बने रहो

तुम जो इनकी दुकानों से खरीदते हो मांस
तो पाते हैं मुसल्ले स्थाई रोज़गार
इसी की कमाई से गूंजती है अज़ान की आवाजें
'मुस्तफा जाने रहमत पे लाखों सलाम' की सदायें
हमारे नगरों  के चौक-चौराहों पर
टोपी खपकाए ये मियाँ
ईद-बकरीद और जुम्मा की नमाज़ में
छेंक लेते हैं कैसे पूरी सड़क जैसे इनके बाप की हो

ये जो हमारे चौक-चौराहों पर
आये दिन टाँग दी जाती हैं
चाँद-तारे वाली हरी-हरी झंडियाँ
कि ऐसा आभाष होता है जैसे
ये कोई पाकिस्तानी नगर तो नहीं
धीरे-धीरे पूरे देश में छा जायेंगी हरी झंडियाँ
यदि यूँ ही बिकता रहा हलाल मांस
अगर यूँ ही चलते रहे 786 मार्का टायर पंक्चर की दुकानें
अगर यूँ ही रौनक रहे गरीब-नवाज़ बिरयानी होटल
अगर यूँ ही चलते रहे असलम भाईनुमा गैरेज
तुम्हें मालुम हो कि इन्हीं कमाईयों से फूटते हैं आये दिन
फिदाईन बम हमारे आस-पास


तुम्हें मांसाहारी बनना है तो बनो
क्योंकि मांसाहार लड़ने की ताकत देता है
क्योंकि मांसाहार खून-खराबे से डर मिटाता है
क्योंकि मांसाहार उत्तेजना बढाता है
क्योंकि मांसाहार आबादी बढाता है
शाकाहारी हो तुम
तभी तो हुए जा रहे हो
अपने ही देश में अल्पसंख्यक धीरे-धीरे
ये ओबीसी क्या होता है भाई
अरे सब शुद्र हैं, दलित हैं जो भी सवर्ण नहीं हैं
इन्हें कहो कि इतना हुनरमंद बनें
क्यों मुसल्लों को मुल्क में तरक्की करने देते हो
ये दरजी, धुनिये, टीन-कनस्तर के कारीगर हैं
इसके लिए नहीं चाहिए कोई डिग्री-डिप्लोमा
कोई बड़ी पूँजी या फिर लाईसेंस
अब भी वक्त है संभल जाओ
अपने लोगों को प्रेरित करो
कि खोलें झटका मांस की दुकानें
सही कहते हैं लोग कि शाकाहारी अल्पसंख्यक हैं आज

ये मुसल्ले बड़ी आसानी से
लगा लेते हैं चौक-चौराहों पर
अंडे, मुर्गी या फिर बिरयानी के ठेले
एक बात है कि इनके मसालों से
बिरयानी बनती बड़ी लज़ीज़ है
तो क्यों नहीं सीखते हुनर इन मुसल्लों से
और देते टक्कर इनके जमे-जमाए कारोबार को
ये कमजोर होंगे
तो देश मजबूत होगा.....




मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

मुहब्बतें डर रही हैं

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नफरतें थीं
लेकिन मुहब्बतें भी कम न थीं
बीच-बीच में थोडा-थोडा
सब कुछ रहे आता था
मुहब्बत की भीनी हवाएं
बहा ले जाती थीं अपने साथ
नफरतों के गर्दो-गुबार

अबके जाने कैसी हवा चली
कि मुहब्बतें डर रही हैं
और नफरतों के खौफनाक मंज़र
आँखों से नींद भगा ले जाते हैं

कोई अचानक धमकियाँ दे डालता है
एक ऐसे नर्क में धकेल देने की
कि काँप उठती रूह
ऐसे में कोई अगर मरहम लगा जाए
तो जैसे ज़ख्म का दर्द कम हो जाए
लेकिन नहीं आता कोई चारागर सामने

बढती जा रही है ज़ख्मियों की संख्या
कोई उम्मीदबर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
कोई दमदार आके समझा दे
वरना ये जान मुश्किलों में है......


शनिवार, 22 अप्रैल 2017

उम्मीदें मरती नहीं


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उम्मीदें मरती नहीं
इसीलिए इंसान जिंदा है
इंसान का जिंदा रहना लाजिमी है
इंसान है तो हुकूमतें हैं
इंसान हैं तो संविधान है 
इंसान हैं तो कैदखाने हैं
इंसान हैं तो कत्लगाह हैं
इंसान हैं तो बाज़ार हैं
इंसानी बस्तियों को अँधेरे से सजाकर
बाजारों में रौनक बढ़ाई गई है
आसमानी किताबों में वर्णित स्वर्ग जैसे दृश्य
फुटपाथ पर छितराए जिस्म टकटकी लगाये देखते हैं
खैनी या बीडी से भूख को हज़म करने का हुनर
कोई सीखे इन इंसानों से
जो अट्टालिकाओं की नींव में दफ़न होकर भी
शुकराना अदा करते हैं उस ईश्वर का
जो हुकूमतों को दिव्यता प्रदान करता है
और इंसानों को क्षुद्रता में संतुष्टि का वरदान देता है

हुकूमतें सांचे में ढले इंसान चाहती हैं
एक जैसे हुकुम बजा लाते इंसान
एक जैसे कतारबद्ध इंसान
एक जैसे जयजयकार करते इंसान
इन्हीं इंसानों में से खोज लेती हैं हुकूमतें
इतिहासकार, व्याख्याकार और न्यायशास्त्री भी
इन्हीं इंसानों में होते हैं भांड, गवैये और आलोचक
हुकूमतों को सवाल करते इंसानों से नफरत है
हुकूमतों को प्रतिरोध के स्वर नागवार लगते हैं
हुकूमतें खूंखार कुत्तों की फौज छोड़ देती है ऐसे बददिमागों पर
फिर भी हुकूमतों के निजाम को बरकरार रखने के लिए
इंसान चाहिए ही चाहिए
एकदम एक सरीखे किसी फैक्ट्री से निकले उत्पाद की तरह
रैपर कोई भी लगा हो लेकिन अन्दर माल वही हो
जो हुक्मरानों को पसंद आये......

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

‘आओ आओ, जल्द-जल्द पैर बढाओ’ कविता की वर्तमान समय में प्रासंगिकता

                                                                                                                           ------------अनवर सुहैल
Suryakant Tripathi 'Nirala'
सामाजिक न्याय और आर्थिक शोषण की प्रक्रिया से मानवमुक्ति निराला की काव्य-चेतना का मूल आधार है। इसी आधार पर निराला दलितों, वंचितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और निर्धनों को इंगित कर एक प्रयाण गीत रचते हैं। निराला समाज के दलित-दमित समाज की चेतना को जगाते हैं कि ‘जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ’! सिर्फ पैर बढ़ाना भी एक आव्हान हो सकता था लेकिन निराला नहीं चाहते कि सामाजिक न्याय की प्रक्रिया में विलम्ब हो। इसीलिए वे सामाजिक अन्याय से पीड़ित मानव की मुक्ति के लिए चिंतित हैं और पुरानी सामंती व्यवस्था को ध्वस्त कर एक समतावादी समाज के निर्माण के लिए कृत-संकल्पित हैं।
देश में सामाजिक विसंगतियांे की स्थिति अब भी कमोबेश वही हैं जैसी निराला के समय थीं। परम्परागत सामंती अवशेष जीवित हैं और एक नवधनाढ्य वर्ग पनपा है जो कि सामंतवादी शोषण को बरकरार रखे हुए है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार आदि सवालों से सरकारें बचना चाह रही हैं और वर्तमान परिवेश में साहित्य की चिन्ताओं में आमजन उस तरह नहीं है जैसा कि निराला ने आमजन के दुख-दर्द को महसूस किया था और अभिव्यक्त किया था। जब सारा देश नेहरू के जादुई व्यक्तित्व से चमत्कृत था तब निराला ही थे जिन्होंने ‘अबे सुन बे गुलाब’ लिखने का साहस किया था।
भारत देश में दलितों, वंचितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों के लिए आज भी पर्याप्त संसाधन नहीं हैं कि उन्हें शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। देश में कई तरह के प्रयोग हुए लेकिन कम उम्र में ही आर्थिक तंगी के कारण बड़ी मात्रा में बच्चे शिक्षा जारी नहीं रख पाते। निराला जानते हैं कि शिक्षा ही वह अस्त्र है जो शोषण के विरूद्ध प्रतिरोध की आवाज़ तैयार करेगी। वंचितों को अपने अधिकार-प्राप्ति के लिए जागरूक बनाने लिए संघर्ष की रूपरेखा बनाती ‘आओ आओ, जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ’ का आव्हान करती कविता अपने स्वरूप में कालजयी है। जब-जब अन्याय और शोषण के विरूद्ध लोगों को इकट्ठा किया जाएगा निराला की यह कविता अवश्य याद की जाएगी।
स्वतंत्र भारत में इतने साल बाद भी स्थितियां कमोबेश वैसी ही हैं। सामंतवाद और बंधुआकरण के नित-नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं। शारीरिक और मानसिक गुलामी के औजारों से वृहत वंचित समाज प्रताड़ित किया जा रहा है। शिक्षा एक ऐसा जादुई चिराग है जिससे अज्ञानता का ताला खोला जा सकता है। ज्ञान का प्रकाश आने पर वंचित-दलित-आदिवासी, स्त्रियां और अल्पसंख्यक देश-दुनिया से जुड़ सकते हैं और स्व-विवेक से दासता की जंजीरों को तोड़ सकते हैं। यह बहुसंख्यक शोषित समाज अपनी ताकत को जानता नहीं है और मुट्ठी भर आतताईयों से प्रताड़ित, अपमानित होता रहता है। निराला के युग में भी दलालों का एक बड़ा वर्ग सक्रिय हो चुका था जो श्रमवीरों को शिक्षा से दूर करने के कुचक्र को हवा दे रहा था। निराला इन तत्वों का पहचानते हैं और श्रमवीरों को आगाह करते हैं कि बिचैलिया या दलाल एक ऐसी सत्ता है जो मालिक और मजदूर दोनों को ठगता है और बिना श्रम या पूंजी गंवाए ऐश करता है।
हवेली यानी सामंती वैभव के स्मृति-चिन्हों को पाठशालाओं में बदलने का आव्हान एक तरह की क्रांति का उद्घोष है। ये क्रांति उन लोगों को करनी है जो कि भारतीय समाज में नीची जातियों के शिल्पकार लोग हैं। इनमें किसान हैं, धोबी, पासी, चमार, तेली आदि जातियों से आव्हान किया गया है। ये जातियां सदियों से सामंती व्यवस्था के परिणामस्वरूप आर्थिक रूप से कमज़ोर होती हैं और इनका जीवन-स्तर घटिया होता है। भूख, बेकारी, बीमारी इनकी नियति है। आधुनिक भारत में शिक्षा ही वह माध्यम है जो इन्हें सामाजिक रूप से सबल और आर्थिक रूप सम्पन्न बना सकता है। सामंतवादी ग्रामीण व्यवस्था में शोषण के दलाल-बिचैलियों से आगाह करते हुए निराला इन वंचितों को व्यापक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना चाहते हैं। भविष्यदृष्टा निराला जानते हैं कि बैंकिंग प्रणाली के अभिनव प्रयोगों का लाभ शिक्षित दलित-वंचित समाज उठाने लगेगा तो जल्द ही उनका संर्वांगीण विकास होगा।
कवि निराला इन वंचितों-दलितों को जागरूक करना चाहते हैं कि देश में जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उनपर समस्त देशवासियों का हक़ है न कि सिर्फ मुट्ठीभर सम्पन्न लोगों का। इसलिए वह चाहते हैं कि शिक्षित होकर ये तमाम शोषित समाज देश में एक ऐसे वैचारिक विमर्श का माहौल बनाएं कि सुविधाओं की गंगा इनकी गलियों से होकर बहने लगे। सभी लोग एक ही जाति के हो जाएं से तात्पर्य हैं कि जनता के बीच जातिवाद काविभाजन खत्म हो जाए। समस्त शोषित-पीड़ित जनों की एक ही जाति हो जो मिलजुलकर अन्याय का प्रतिकार करें।
निराला की यह कविता अच्छे समय की प्रतीक्षा करने को नहीं कहती बल्कि उस शोषित-पीड़ित समाज से कहती है कि जल्द-जल्द पैर बढ़ाओ, आओ आओ। ये जल्द-जल्द ही कविता की ताकत है जो सर्वहारा वर्ग को एकजुट होकर कहती है कि एक साथ आओ और परिवर्तनकारी क्रांति का सूत्रपात करो। किसी से आशा न रखो कि कोई आकर तुम्हें निर्धनता और अपमानजनक जीवन से मुक्ति दिलाएगा। इसके लिए स्वयं सर्वहारा वर्ग को सामंती के ताकतों को धरासाई करना होगा।
सामाजिक दमन और आर्थिक शोषण की प्रक्रिया से मानवमुक्ति निराला की काव्य-चेतना का मूलाधार है। इस कविता में जिस तरह से जाति सूचक शब्दावली का प्रयोग हुआ है यथा धोबी, पासी, चमार, तेली तो हम निराला की इस कविता को दलित कविता भी कह सकते हैं। आज भी देश में राजनीतिक रोटियां इसी जातिवाद के तवे पर सेंकी जाती हैं।
यह एक प्रयाणगीत है, जिसमें समाज में व्याप्त शोषण, गरीबी, असमानता कि विरूद्ध आवाज़ उठाई गई है। वास्तव में इस गीत में कवि ने साम्यवादी समाज की स्ािापना करने के लिए पंूजीवाद के खिलाफ़ क्रांति का आहवान किया है। कवि को इस बात का अहसास है कि देश का दलित वर्गों में अज्ञानता का अंधकार फैला हुआ है। जब तक यह वर्ग स्वयं नहीं जाग्रत होगा और अन्याय-अत्याचार का विरोध नहीं करेगा तब तक उनकी स्थिति नहीं सुधर सकती है। इसके लिए इनका शिक्षित होना आवश्यक है। कवि का मानना है कि जल्द जल्द पैर बढ़ाने से समाज में जल्द बदलाव आएगा।
इस तरह निराला का यह गीत वर्तमान समय में भी प्रासंगिक है।