शनिवार, 29 जून 2019

बित्ता भर का पौधा झूमता है

संदर्भ : अनवर सुहैल की किताब #उम्मीद_बाक़ी_है_अभी
■ शहंशाह आलम
Image may contain: Shahanshah Alam, standing, shoes and beard

आज जब हमारी साझा संस्कृति दम तोड़ रही है। भाषा की जो मर्यादा होती है, वह ख़त्म होने-होने को है। व्यवस्था का जो अपना वचन होता है, वह ध्वस्त है। विचारों का जो आशय हुआ करता था, वह अपना आशय खो चुका है। राजनीतिक संगठनों की अपनी जो विशेषता हुआ करती थी, वह अब किसी पार्टी में दिखाई नहीं देती। खबरिया चैनल भी अब सत्ता के ग़ुलाम प्रवक्ता बने दिखाई देते हैं। थोड़ा-बहुत ठीक-ठाक कुछ बचा हुआ दिखाई देता है, तो वह साहित्य में ही दिखाई देता है। यहाँ भी सत्ता की ग़ुलामी ने अपना ख़ूनी पंजा मारना शुरू कर दिया है, मगर ख़ूनी पंजा यहाँ से हारकर वापस अपने आका के यहाँ लौट जाता रहा है। उसके लौटने की असल वजह यही है कि कवियों की, लेखकों की, कलाकारों की चेतावनी से यह ख़ूनी पंजा हमेशा डरता आया है। इतना-सा सच साहित्य में इसलिए हो रहा है कि यहाँ ईमानदारी पूरी तरह बची हुई है। साहित्य हर ज़माने में देशकाल के प्रति अपनी सक्रिय भूमिका और अपने शत्रुओं को पहचानने दृष्टि खुली जो रखता आया है। जहाँ तक सत्ता की बात है, सत्ता का वर्तमान अर्थ, जो कमज़ोर हैं, उनको डराना, धमकाना और मार डालना मात्र रह गया है। मेरी समझ से अनवर सुहैल हमारे समय के ऐसे कवि हैं, जो सत्ता के इस अनैतिक कार्य को कविता की नैतिकता से ख़त्म करने का सफल प्रयास करते आए हैं, ‘टायर पंक्चर बनाते हो न / बनाओ, लेकिन याद रहे / हम चाह रहे हैं तभी बना पा रहे हो पंक्चर / जिस दिन हम न चाहें / तुम्हारी ज़िंदगी का चक्का फूट जाएगा / भड़ाम … / समझे / कपड़े सीते हो न मास्टर / ख़ूब सिलो, लेकिन याद रहे / हम चाह रहे हैं तभी सी पा रहे हो कपड़े / जिस दिन हम न चाहें / तुम्हारी ज़िंदगी का कपड़ा फट जाएगा / चर्र … / समझे (व्यथित मन की पीड़ा)।’
यह सच देखा-भाला हुआ है, आपका भी, मेरा भी और अनवर सुहैल का भी कि वे यानी जो हत्यारे हैं, वे चाहते हैं, तभी हम ज़िंदा हैं। वे जिस दिन हमें मुर्दा देखना चाहते हैं, हमसे हमारी ज़िंदगी छीन लेते हैं। उम्मीद बाक़ी है अभी पुस्तक की कविता हमारा साक्षात्कार ऐसे ही कड़वे सच से कराती है। यह एक कड़वा सच ही तो है कि हत्यारे ने जब चाहा किसी पहलू ख़ाँ को मार डाला। हत्यारे ने जब चाहा किसी तबरेज़ अंसारी को मार डाला। सवाल यह भी है कि पहलू ख़ाँ जैसों का दोष क्या था और तबरेज़ अंसारी जैसों का दोष क्या है? जवाब कोई नहीं देता – न कोई खबरिया चैनल, न कोई आला अफ़सर, न कोई मुंसिफ़ और न कोई सत्ताधीश। अब उम्मीद इतनी ही बाक़ी है कि बाक़ी बचे हुए पहलू ख़ाँ और तबरेज़ अंसारी अपने मार दिए जाने की बारी का इंतज़ार करते हुए दिखाई देते हैं, ‘मुट्ठी भर हैं वे / फिर भी चीख़-चीख़कर / हाँकते फिरते हैं हमें / हम भले से हज़ारों-लाखों में हों / जाने क्यों टाल नहीं पाते उनके हुक्म (इशारों का शब्दकोश)।’ आदमी अपनी साधुता में ही तो मारा जाता है। हत्यारी भीड़ ने आपको मारने की पूरी कोशिश करी और तब भी आप में ज़रा-सी जान बाक़ी अगर रह गई तो आपकी लाश जेल से बाहर आती है। इस तथाकथित क़ानून ने तो हद पार कर रखी है। जिसकी हत्या की साज़िश रची जाती रही है, वही जेल जाता रहा है। और जिस भीड़ ने आपको मारा, वह ईनाम पाती है। यह सच नहीं है तो फिर तबरेज़ अंसारी की लाश जेल से बाहर क्यों आती है और वह जेल किस जुर्म में भेजा गया था, यह सवाल अभी अनवर सुहैल की कविता में ज़िंदा है और वह हत्यारी भीड़ भी ज़िंदा है अभी, ‘ग़ौर से देखें इन्हें / किसी अकेले को घेरकर मारते हुए / ध्यान दें कि ये भीड़ नहीं हैं / भीड़ कहके हल्के से न लें इन्हें / दिखने में क़बीलाई लोग नहीं हैं / मानसिकता की बात अभी न करें हम / आधुनिक परिधानों में सजे / प्रतिदिन एक जीबी डाटा ख़ुराक वाले / कितने सुघड़-सजीले जवान हैं ये / इनके कपड़े ब्रांडेड है वैसे ही / इनके जूते, बेल्ट और घड़ियाँ भी (आखेट)।’
अब हर हत्यारा मॉडर्न है और एजुकेटेड है। वास्तव में, भीड़ के रूप में हाज़िर हत्यारे उच्चकोटि के होते हैं। इनको मालूम होता है कि जिस तरह आखेटक आखेट किया करते थे, वैसे ही अब इनको किसी आदमी को अपना शिकार मानते हुए शिकारी करना है। इस शिकार के एवज़ इनको कोई सज़ा नहीं मिलनी, सत्ता के वज़ीफ़े मिलने हैं, पूरी गारंटी के साथ, ‘जो ताने-उलाहने और गालियाँ दे रहे / प्रतिष्ठित हो रहे वे / जो भीड़ की शक्ल में धमका रहे / और कर रहे आगज़नी, लूटपाट / पुरस्कृत हो रहे वे / जो बलजबरी आरोप लगाकर / कर रहे मारपीट और हत्याएँ (सम्मानित हो रहे वे)।’ अब भारतीय होने का तानाबाना बिगड़ रहा है। भारतीयता का अर्थ जितना सुंदर हुआ करता था, अब इसका अर्थ उतना ही विद्रूप बना दिया गया है। यह भद्दापन हमारे भीतर असुरक्षा की भावना लाता रहा है। विगत कुछ वर्षों में सत्ता पाने की राजनीति ने जो नंगानाच अपने देश में शुरू किया है, चिंतनीय भी है और निंदनीय भी। उम्मीद बाक़ी है अभी की कविता में अनवर सुहैल की यही चिंता और यही निंदा पुष्ट होती दिखाई देती है, ‘हुक्मराँ के साथ प्यादे भी फ़िक्रमंद हैं / खोल के बैठे हैं मुल्क का नक़्शा ऐसे / जैसे पुश्तैनी ज़मीन पर बना रहे हों मकान / जबकि मुल्क होता नहीं किसी की निजी मिल्कियत (आह्वान)।’
अनवर सुहैल की चेष्टा यही है कि अपने देश में एका बचा रहे। यह देश सबका है। यानी जितना यह देश आपका है, उतना ही मेरा भी है और उतना ही अनवर सुहैल का भी है। न जाने एकाएक यह स्वर कहाँ से और कैसे उठने लगा है कि आप तो यहाँ के हैं लेकिन अनवर सुहैल किसी और दुनिया से हैं और उनको उसी दुनिया में लौट जाना चाहिए। यहाँ रहने की ज़िद पर अड़े रहेंगे तो किसी न किसी दिन पहलू ख़ाँ या तबरेज़ अंसारी वाली हालत अनवर सुहैल की भी होगी और अनवर सुहैल के बच्चों की भी। इतने के बावजूद अनवर सुहैल नाउम्मीद नहीं होते हैं। चूँकि अनवर सुहैल विवेकशील मानव हैं। इनको अपने मुल्क के संविधान पर पूरा भरोसा है। भरोसा है, तभी इनकी कविता में उम्मीद ज़िंदा है, ‘एक कवि के नाते / मुझे विश्वास है / कि जड़ें हर हाल में सलामत हैं / मुझे इस बात पर भी / यक़ीन है हमारी जड़ें / बहुत गहरी हैं जो कहीं से भी / खोज लाती रहेंगी जीवन-सुधा (जड़ें सलामत हैं)।’
भरोसा है, तभी तो बित्ता भर का पौधा झूम सकता है, अपनी ज़िंदगी की उम्मीद को बचाए रख सकता है तो अनवर सुहैल की कविता, जो किसी फलदार वृक्ष की तरह है, यह कविता उम्मीद का दामन कैसे छोड़ सकती है। फिर कविता जब विद्रोह है तो अनवर सुहैल जैसा सच्चा भारतीय कवि अपने मारे जाने का इंतज़ार थोड़े ही न कर सकता है। अनवर सुहैल हर उस हत्यारे के विरुद्ध खड़े दिखाई देते हैं, जो हत्याकांड भी करता है और इसके एवज़ पुरस्कार और सम्मान भी पाता है। हम तय करते हैं, और रचे जाते रहें शब्द, तुम्हारी बातें मरहम हैं, मिल-जुल लैब खोलें, मरने के विकल्प, चोरी-छिपे प्रतिरोध, अबके ऐसी हवा चली है, हमें तलाशना है ईश्वर, मुसलमान, दलित या स्त्री, डरे हुए शब्द, बुर्क़े और टोपियाँ, दलितों द्वारा भारत बन्द, सहारे छीन लेते हैं आज़ादी, डिजिटल समय में किताबें, नव-इतिहासकार, जेलों का समाज-शास्त्र, हम शर्मिंदा हैं निर्भया, मई इसे उम्मीद कहता हूँ शीर्षक आदि कविता एक सच्चे कवि के दायित्व का नतीजा बेधक कहा जा सकता है। वास्तव में, जब हमारे आसपास जीने की चाहत तंग करने की पुरज़ोर कोशिश चल रही है तो ऐसे में किसी कवि से साधुभाषा की उम्मीद हम नहीं कर सकते हैं। अनवर सुहैल से भी हम इसीलिए साधुभाषा की उम्मीद नहीं कर सकते।
—-
उम्मीद बाक़ी है अभी (कविता-संग्रह) / कवि : अनवर सुहैल / प्रकाशक : एक्सप्रेस पब्लिशिंग, नोशन प्रेस मीडिया प्रा.लि., चेन्नई / मूल्य : ₹140
https://notionpress.com/read/1323139


बुधवार, 5 जून 2019

मुस्लिम समाज के जीवन के अनछुए पहलू




-गंगा शरण सिंह की कलम से उपन्यास पहचान की समीक्षा :



अनवर सुहैल साहब का उपन्यास 'पहचान' पिछले साल डाक से आया था। उसी दौरान घर की शिफ्टिंग में किताबें इस कदर इधर उधर हुईं कि आज तक उनका मामला दरबदर ही है। जो अमूमन बहुत ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलतीं, वही किताबें कभी कभार साफ सफाई करते अचानक हाथ लग जाती हैं, जैसे दो दिन पहले 'पहचान' हाथ लग गया।

कविता और कहानी दोनों विधाओं में निरन्तर लिखते रहने वाले अनवर सुहैल इस पीढ़ी के सबसे सक्रिय लेखकों में हैं। 'पहचान' संभवतः उनका पहला उपन्यास है जो 2009 में राजकमल प्रकाशन से आया था। उन्होंने इसे समर्पित किया है "उन नवयुवकों को जो ज़िन्दगी में अपने दम पर कुछ बनना चाहते हैं और किसी संस्था का नहीं बनना चाहते 'भोंपू' या कोई 'टूल्स'।"

इस रोचक उपन्यास की कथावस्तु के केन्द्र में भारतीय समाज के वे पिछड़े क्षेत्र हैं, जहाँ विकास और शिक्षा की जगह घोर अशिक्षा और पिछड़ापन है। जहाँ बच्चों का बचपन से जवानी तक का सफर फुटपाथ, सिनेमाहाल और गैरेज की संगति में बीतता है। इसी भूखण्ड पर अपने अस्तित्व को बचाये रखने की जद्दोजहद से जूझ रहा है यूनुस। जीवन के इस कठिनतम संघर्ष में यूनुस के साथ एक ही चीज है और वह है उसकी जाग्रत चेतना जो उसे निरन्तर अशुभ से दूर शुभत्व की तरफ़ जाने की प्रेरणा देती है और वह कड़ा परिश्रम करके अपने लिए एक स्वतंत्र पहचान बनाने का सुख हासिल करता है।

इस किताब में मुस्लिम जीवन और समाज के बहुत से यथार्थ दृश्य मौजूद हैं।
अनवर सुहैल ने बरेलवी और देवबंदी मुसलमानों के पहनावों, मान्यताओं, धार्मिक निशानियों और उनकी एक दूसरे के प्रति नापसंदगी का तटस्थ वर्णन किया है।

यूनुस का धर्मनिरपेक्ष चरित्र बहुत प्रभावित करता है। वह जितनी सहजता से अलग अलग संप्रदायों की मस्जिदों में चला जाता है उसी तरह मन्दिर से लौटे दोस्तों द्वारा दिया गया प्रसाद भी खा लेता है। न उसे वन्दे मातरम बोलने से कोई गुरेज़ है न ही कोई ऐसा धार्मिक दुराग्रह जो उसकी जीवन यात्रा में बाधा बन सके।
उसका रहन सहन और पहनावा इस तरह है कि उसके धर्म का अनुमान लगाना सहज नहीं।

" यूनुस ने फुटपाथी विश्वविद्यालय की पढ़ाई के बाद इतना अनुमान लगाना जान लिया था कि इस दुनिया में जीना है तो फिर खाली हाथ न बैठे कोई। कुछ न कुछ काम करता रहे। तन्हा बैठ आँसू बहाने वालों के लिए इस नश्वर संसार में कोई जगह नहीं।
अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए इंसान को परिवर्तन-कामी होना चाहिए।"

प्रसंगवश रिहन्द बाँध क्षेत्र का ज़िक़्र आने पर उस दौर की स्मृतियों का भी मार्मिक पुनरावलोकन हुआ है जब आजादी के बाद उस क्षेत्र के नागरिकों के लिए यह कल्पना असम्भव थी कि उन्हें अपनी जन्मभूमि से विस्थापित होना पड़ेगा...
" कल्लू के बूढ़े दादा आज भी डूब के आतंक से भयभीत हो उठते। उनकी जन्मभूमि, उनके गाँव को इस बाँध ने निगल लिया था। ये विस्थापन ऐसा था जैसे किसी जड़ जमाये पेड़ को एक जगह से उखाड़कर कहीं और रोपा जाए! क्या अब वे लोग कहीं और जम पाएंगे?"

विसंगतियों का वर्णन करते समय अनवर सुहैल की शैली स्वाभाविक रूप से व्यंगात्मक हो जाती है। कोतमा क्षेत्र का यह शब्द-चित्र देखिए....

" कोतमा-वासी अपने अधिकारों के लिए लड़ मरने वाले और कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हैं। हल्ला गुल्ला, अनावश्यक लड़ाई- झगड़े की आवाज़ से यात्री अंदाज़ लगा लेते हैं कि कोतमा आ गया।"

इसी तरह शहरों में धन और सुविधा की अंध दौड़ में खो गयी युवा पीढ़ी 
के लिए उनकी चिन्ता इस प्रकार व्यक्त हुई है--

" शहर में रहते रहते युवकों की संवेदनाएँ शहर की आग में जलकर स्वाहा हो जाती हैं। वे जेब में एक डायरी रखते हैं जिसमें मतलब भर के कुछ पते और टेलीफोन नम्बर्स दर्ज़ रहते हैं, सिर्फ़ उस एक पते को छोड़कर जहाँ उनका जन्म हुआ था। जिस जगह की मिट्टी और पानी से उनके जिस्म को आकार मिला था। जहाँ की यादें उनके जीवन का सरमाया बन सकती थीं। "

★पहचान
Anwar Suhail
★राजकमल प्रकाशन
Rajkamal Prakashan Samuh
मूल्य: ₹200

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

दो कवितायेँ


एक


हम आपके बताए
इतिहास को नहीं मानते
हम आपकी किताबों का
करते हैं बहिष्कार!
जान लो कि अब हमने 
लिख ली इतिहास की नई किताबें
पूरा सच तुम भी कहां जानते हो
पूरा सच हम भी नहीं जानते
फिर तुम्हारी मान्यताएं क्यों हो मान्य
हम भी दावा करते हैं कि सच के
ज्यादा करीब हैं हमारी मान्यताएं
दो अधूरे सच मिलकर भी
नहीं बन सकते पूरा सच
कि जीवन कोई गणितीय फार्मूला नहीं।।।


दो 

अपनी विद्वता, पद-प्रतिष्ठा को
आड़े नहीं आने देता कि तुम कहीं
अपनी मासूम, बेबाक छवि को छुपाने लगो
मैं नहीं चाहता कि मेरे आभा-मंडल में
गुम जाए तुम्हारा फितरतन चुलबुलापन
तुम्हें जानकार हौरानी होगी
कि हम लोग बड़े आभाषी लोग हैं
और हम खुद नहीं जानते अपनी वास्तविक छवि
परत-दर-परत उधेड़ते जाओ
फिर भी भेद न पाओगे असल रूप
तुम जिस तरह जी रहे हो दोस्त
बेशक, उस तरह से जीना एक साधना है
बेदर्द मौसमों की मार से बेपरवाह, बिंदास
भोले-भाले सवाल और वैसे ही जवाब
बस इतने से ही तुम सुलझा लेते हो
अखंड विश्व की गूढ़-गुत्थियाँ
बिना विद्वता का दावा किये
यही तुम्हारी ऊर्जा है
यही तुम्हारी ताकत
और यही सरलता मुझे तुम्हारे करीब लाती है......

सोमवार, 17 दिसंबर 2018

पहचान : पहचान का द्वंद्व और संकट





आदमी की पहचान क्या है? उसकी जाति? मज़हब? पद, प्रतिष्ठा, या काबिलियत? आदमी इन द्वंद
्वों में जीता रहा है। सामंती समाजों में जाति भी पहचान का महत्वपूर्ण कारक होता है,और वह आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है;बावजूद इसके व्यक्ति का आर्थिक वर्ग ही उसकी मुख्य पहचान बनता रहा है; मगर पिछले कुछ दशकों से साम्प्रदायिक राजनीति के उभार ने मज़हब को अस्मिता से जोड़कर उसे आदमी की 'मुख्य पहचान' बनाने की कोशिश की है; और बहुत हद तक सफल भी रहा है।इसके दुष्परिणाम कितने भयावह रहे हैं, यह किसी से छुपा नही है। मगर 'अपने मज़हब' के भीतर भी ऊंच-नीच के संस्तरण रहते हैं, और यहां भी आदमी की पूछ-परख उसके आर्थिक हैसियत के आधार पर होती है।
अनवर सुहैल जी का उपन्यास 'पहचान' में पहचान का यह द्वंद्व उभरकर आया है। उपन्यास का मुख्य पात्र 'यूनुस' निम्न वर्गीय मुस्लिम युवक है। पारिवारिक विडम्बना से 'खाला' के यहां रहता है।उनकी स्थिति भी लगभग वही है; जैसे-तैसे घर चल रहा है।किशोरवय यूनुस खाला की बेटी सनूबर को चाहता है;वह भी उसे पसंद करती है। खाला के घर यूनुस 'पराश्रित' ही है। शिक्षा-दीक्षा से वंचित; जिसमे उसकी लापरवाही भी शामिल है। दरअसल वह जिस 'माहौल' में रहता है, वहां यह स्वाभाविक है।गरीबी, अशिक्षा और लापरवाही भी लाती है,जिसे समाज के सम्पन्न वर्ग 'उनके संस्कार' कह कर मजाक उड़ाते हैं।ऐसे में जीवन के अनुभव ही सब-कुछ सिखाते हैं। इनके लिए फुटपाथ ही कॉलेज और विश्वविद्यालय है। यूनुस भी इसी 'विश्वविद्यालय' से अपना ज्ञान अर्जित करता है।यह ज्ञान यौन-संबंधों से लेकर सामाजिक-आर्थिक हर प्रकार के होते हैं,जिसमे व्यक्ति जिंदा रहने का हुनर सीखता है।उपन्यासकर ने बेबाकी से इसका चित्र खींचा है। चूँकि कथानक मुख्यतः मुस्लिम समाज से सम्बंधित है, इसलिए चित्रण अधिकतर उसी परिप्रेक्ष्य में हुआ है। दूसरे 'मजहबों' को मानने वालों की जीवन शैली पर रहस्य का आरोपण करने वाले देख सकते हैं कि जीवन के जद्दोजहद हर जगह हैं।
यूनुस खाला के घर 'बोझ' न सही उन पर निर्भर तो है ही इसलिए अधिकार का दावा तो कर ही नही सकता। जल्द ही उसे इस बात का अहसास हो भी जाता है जब घर मे 'जमाल साहब' का प्रवेश होता है। जमाल साहब सम्पन्न हैं; अधिकारी हैं; अविवाहित हैं,उनका घर आना खुशनसीबी है। खाला उनमें अपना भावी दामाद देखती है। सनूबर भी उनके तरफ आकर्षित होने लगती है। उनके सामने यूनुस की क्या औकात?टूटता है दिल तो टूटा करे!जमाल साहब भी मंजे खिलाड़ी हैं; सनूबर से सम्बंध बनाने की कोशिश है तो खाला से भी याराना है। खाला का चरित्र भी ऐसा है कि यह तय कर पाना कठिन है कि इस सम्बंध की पहल जमाल साहब ने की होगी या खाला ने।लेखक ने खाला के चरित्र को जिस ढंग से उभारा है उसमें खाला काफी 'बिंदास' है। कमजोर आर्थिक स्थिति उसकी इच्छाओं से मेल नही खाती।नैतिकता-अनैतिकता के उनके अपने मापदण्ड हैं।
इन घटनाक्रमों से यूनुस का भ्रम टूटता है; मानो वह स्वप्नलोक से बाहर आता है।उसके आत्म सम्मान को चोट पहुँचती है ।उसे अहसास होता है कि बिना अपने पैरों पर खड़े हुए दुनिया मे उसकी कोई पहचान नही है। सनूबर भी हकीकत से वाकिफ़ होती है यूनुस के प्रति उसका प्रेम बढ़ता है। यूनुस दर्जिगिरी से मोटर साइकिल मैकेनिक तक काम सीखने का अनुभव लेते हुए अंततः कोयला खदान में पेलोडर और पोकलेन ऑपरेटर बन जाता है।इस तरह वह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ जाता और अपनी पहचान बनाने लगता है।यह जरूर कोई 'बड़ी' पहचान नही है, मगर छोटे-छोटे कदमो से भी सफर तय होता है और मंज़िल मिलती है।
यूनुस एक मुस्लिम युवक है; इसलिए उसे कई बार पहचान के संकट से गुजरना पड़ता है।उसे उसके मुस्लिम होने के कारण कई बार बहुसंख्यक वर्ग के अधीन 'सेवायें' नही मिल पाती; कई बार लोगो की दृष्टि बदल जाती है।अंततः इस 'संकट' से बचने के लिए वह अपनी पहचान छुपाने लगता है। अपना हुलिया इस तरह रखने लगता है कि जसकी धार्मिक पहचान न हो सके। उसका बड़ा भाई सलीम अपने 'धार्मिक पहचान' के कारण ही गुजरात दंगे में मारा जाता है। सलीम के माध्यम से लेखक ने मुसलमानों के एक वर्ग में भी बढ़ते धार्मिक पहचान के प्रति अतिरिक्त आग्रह को रेखांकित किया है। इस तरह उपन्यास में संकेतो में कई जगह पहचान के इस द्वंद्व और संकट जो पिछले कुछ दशकों से वैश्विक और स्थानीय दोनो स्तरों पर उभर कर आया है;प्रकट हुआ है।
उपन्यास विधा की यह खासियत है कि इसमें कथानक के परिवेश को प्रकट करने के लिए लेखक के पास पर्याप्त स्पेस होता है।इस उपन्यास में भी लेखक ने सिंगरौली कोयला क्षेत्र के भूगोल,औद्योगिकरण, उसके उपजे संकट, क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने, रहन-सहन; खासकर कामकाजी वर्ग के जीवन को बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है।परिवेश अनुरूप भाषा भी प्रवाहपूर्ण और 'ठेठ' है, जिससे पात्र जीवंत लगते हैं।कुल मिलाकर उपन्यास सार्थक है; जिसे पढ़ा जाना चाहिए।
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कृति- पहचान(उपन्यास)
लेखक- अनवर सुहैल
प्रकाशक- राजकमल,नयी दिल्ली
मूल्य- 200 रू(हार्ड बाइंडिंग)
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अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा(छ. ग.)
मो. 9893728320

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

पुख्ता होती दीवारें



एक ------------
कितने भोले हो तुम
जो बड़ी मासूमियत से
चाह रहे समझाना
कि हम नहीं हैं टारगेट
तो कौन है जो हममें से
हर दिन एक कम होता जा रहा है गुपचुप नहीं बल्कि आगाह करके मारने की संस्कृति कैसे ढीठ बनकर आ बैठी संग जितना सोचो उतनी बढती चिंताएं एक नामालूम सा डर साथ चलता हैहमारे दिलो-दिमाग की हार्ड-डिस्क में आजकल
एक खतरनाक वायरस जगह बना चूका है
हमारी नींद पर भी जिसने कर लिया कब्जा
डरावने सपनों की श्रृंखलाएं
झझक कर जगा देती हैं हमें
और तुम कहते हो
कि हम खामखा डरते हैं
भाई मेरे
हम जो तुम्हारे साथ
उठते-बैठते, नाचते-गाते
दुःख-दर्द बांटते और भूले रहते हैं
कि हम पराये नहीं हैं
और बेशक तुम भी तो कभी
यह अहसास नहीं होने देते हो
लेकिन
यह नामुराद लेकिन क्यों बार-बार
आ खड़ा होता हमारे रिश्तों के बीच
आओ ऐसा करें कुछ कि इस
आभाषी दीवार को पुख्ता होने से बचा लें हम
मुझे उम्मीद है कि अब भी शेष है उम्मीदें ........

दो
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यह जानते हुए भी कि
हमारे लिए लड़ नहीं रहा कोई
हम फिर भी एक स्वप्न जीते हैं
और उन लोगों के जीतने की ख्वाहिश रखते हैं
जो दुश्मनों के खिलाफ खड़े होने का
खूबसूरत अभिनय करते दिखलाई देते हैंयह तो तय है कि कोई नहीं हमनवा
हम अपने दुश्मनों को पहचानते हैं
इतने बरसों के साथ का असर है
कि दोस्तों की मजबूरियों से भी वाकिफ हैं हम
हम हर बार ऐसे दुश्मनों को तरजीह देते हैं
जिसके नाखून कम बड़े हों
दांत कम नुकीले हों
और जो प्रहार करे लेकिन बिना मजाक उडाये
हम इज्ज्तों के लिए मरते हैं
तुम अपनी फ़िक्र करो दोस्तों
कि तुम्हें भी पहचानने लगे हैं वे
और ये जानने लगे हैं कि तुम
हर मौसम में हमारे साथ खड़े हो
ऐसा बर्दाश्त करने वाले लोग
लगातार घटते जा रहे हैं
मालूम है न !

शनिवार, 22 सितंबर 2018

कामरेड चंद्रशेखर की याद में


हक़ की लड़ाई जारी रखने के लिए,
सच की हिफ़ाज़त के लिए
बार-बार मरना जानते हैं कामरेड
रिरियाकर समझौता करना फ़ितरत नहीं
और सुन लो कि कामरेडों को 
शहादत की ब्रांडिंग नहीं आती
बड़े ढीठ होते हैं कामरेड
मरकर नष्ट नहीं होते
बल्कि वे फिर उग आते हैं
हर युग में
नए जिस्मों में,
नई रौशनी के साथ
कि बिकाऊ होने से पहले
हर व्यक्ति के अवचेतन में
एक कामरेड आकार लेना चाहता है
उसे दु:स्वप्न की तरह फेंक देते हैं जो लोग
बन नहीं पाते कामरेड
बन नही पाते आदि-विद्रोही।
कामरेड की शहादत की बरसी मत मनाओ लोगों
कामरेड मरा नहीं करते
देखो, हर उठे हाथों में
हर बंधी मुट्ठियों में
गगनभेदी नारों में
जीवित है कामरेड
लांग-लिव कामरेड।।।
--------+++++++++++---------
(कामरेड चंद्रशेखर की याद में)

सोमवार, 6 अगस्त 2018

देख बुझने न पाए भीतर की आग




चुप रहकर भी बोल दी जाती हैं बातें 
हम जिस दौर में हैं 
हमें आदत डालनी होगी 
चुप की भाषा डिकोड करने की
मुट्ठियाँ अब नहीं लहराती हवा में 
इशारों पर भी लगे हैं पहरे 
हुंकारी भरने वाली अवाम की ब्रीड 
कर ली गई है ईजाद 
सुबहो-शाम, दिन-रात 
गालियों की नई खेप उतरती है
प्रतिरोध का गला घोंटने वालों को 
मिल रहा इनामो-इकराम 
आलोचकों को दी गई है ड्यूटी 
कविता में तलाशें कला-तत्व 
आह-कराह में कहाँ होता है सौन्दर्य 
कहाँ होती है कला?
सुर की तलाश जहाँ खत्म होती है 
परिवर्तन के नव-राग वहाँ फूटेंगे 
बस ज़रूरत है एक बार और 
मिजाज़ से फेंका जाए जाल
जाग, ओ मेरे मीत जाग 
देख बुझने न पाए भीतर की आग 
जाग ओ मेरे मीत 
समय रहते जाग!

शुक्रवार, 3 अगस्त 2018

कितनी वहशी सोच तुम्हारी



कितना ज़हर भरा है तुममें
बार-बार डसने पर भी
खत्म नहीं होता है विष
दांतों के खोहों में तुमने
कितना ज़हर छुपा रक्खा है?
अब तक तुम करते रहते थे
ढेरों प्यार-मनुहार की बातें
गंगा-जमुनी तहजीब की बातें
सतरंगी दुनिया की बातें
हम सब कितना खुश थे भाई
गलबहियों और बतकहियों के
कितने अच्छे दिन बीते हैं
इधर हुआ क्या बोलो भाई
तुमने ज़हर उगलना सीखा
हमनें डरना-बचना सीखा
देखो-देखो, इस जहान में
नफरत की ज्वाला भड़की है
कत्लो-गारत, आगज़नी से
घर भी जले हैं दिल भी जले
कितनी वहशी सोच तुम्हारी
कितने बर्बर स्वप्न देखते
ऐसा हरगिज कभी न होगा
नफरत के इस मकड़जाल में
जब तक तुम यूं फंसे रहोगे
केवल तुम भर बचे रहोगे
बेशक तुम ही बचे रहोगे।

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

कवि बेशक एक सृष्टा ही होता है.....


दिल्ली की सेल्फी साप्ताहिक में प्रकाशित इंटरव्यू : अनवर सुहैल से कवि नित्यानंद गायेन की बातचीत
nityanand gayen

कवि / उपन्यासकार एवं संपादक के तौर पर अबतक का सफ़र
अभिव्यक्ति की बेचैनी विधागत स्वतंत्रता देती है. विधाएं बदलतीं हैं लेकिन बातें/ चिंताएं वही बनी रहती हैं जिनसे चेतन/अचेतन परेशान रहे आता है. ये बेचैनियाँ ही रूप बदल-बदल कर, टूल्स बदल-बदलकर अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करती रहती हैं. अब चाहे कविताएँ आकार ले लें या कहानियां, उपन्यास आकार ले ले या कि लघुपत्रिका के रूप में संकेत के अंक छप कर मंजरे-आम हो जाएँ. मेरे अन्दर अभिव्यक्ति की बेचैनी चाहे जिस फॉर्म में आये, मुझे आगे ले जाती है. मैं जानता हूँ कि मेरी ट्रेन निर्धारित समय से लेट चल रही है, लेकिन ये भी जानता हूँ कि अपने गंतव्य तक ये अवश्य पहुंचाएगी, या किसी गलत स्टेशन पर नहीं ले जायेगी. सफर अधूरा भले हो सकता है लेकिन जितना भी रास्ता तय होगा वह परफेक्ट होगा….
मेरी इन बेचैनियों से उत्पन्न उत्पाद बेशक मुझे लोगों से जोड़ते हैं. ये लोग मुझे हमेशा नया रचने की ताकत देते हैं.  मैं वाल्ट व्हित्मन की बात याद रखता हूँ और हमेशा नयों से जुड़ना पसंद करता हूँ. इसी क्रम में संकेत पत्रिका की तयारी भी हो जाती है. ऐसी कविताएँ जो पाठक से सीधे संवादरत हों मुझे बेहद पसंद हैं. हिंदी कविता का ये रूप भले से नकचढ़े आलोचकों को पसंद न आता हो लेकिन ये कविताएँ जो संवाद बनाती हैं, हिंदी कविता को व्यापक जनमानस तक पहुंचा रही हैं.
संकेत के अंक पेजमेकर पर स्वयं तैयार करता हूँ. कवि/चित्रकार कुंवर रवीन्द्र जी के रेखांकन से सज्जित कविताएँ पाठकों को बेहद पसंद हैं. मुझे लगता है कि अपनी रचनाओं में अब मैं खुद को दुहरा रहा हूँ तब लेखनी को विराम देता हूँ और संकेत के अंक तैयार करने लगता हूँ. यह एक अनियतकालीन पत्रिका है. मैं बिजुरी जिला अनुपपुर में रहता हूँ और यह एक पिछड़ा इलाका है. यहाँ डाकघर है रेलवे स्टेशन है और दो छोटे प्रिंटर्स हैं. जब मैं खुद कुछ नहीं लिख रहा होता हूँ तब या तो पढ़ रहा होता हूँ या फिर संकेत के अंक के लिए बेचैन रहता हूँ. संकेत की कविताएँ पाठक पसंद करते हैं. इसके अंकों में अब तक कई कवि छप चुके हैं जिन्हें आज भी गर्व होता है कि वे संकेत के कवि हैं.
इसका कारण है कि मैंने संकेत के माध्यम से कविता के नए पाठक तैयार किये हैं. दूसरी बात ये है कि संकेत की कविताएँ पढ़ी जाती हैं, ये कविताएँ पाठकों से संवाद करती हैं.
तो मैं कोयला खदान की नौकरी के बाद घर-परिवार की जिम्मेदारियों को निपटाकर अपनी नींद में से कुछ समय चुराता हूँ और खुद को अभिव्यक्त करने में मगन रहता हूँ.

साइबर युग में क्या कवि भी डीजीधन की तरह अपनी भावनाओं में   डिजिटल हो रहे हैं ?
डिजिटल होना युग की ज़रूरत है. यूनिकोड आ जाने से हिंदी लिखना-पढना आसान हो गया है. साइबर स्पेस का इस्तेमाल भ्रष्टाचारी, आतंकवादी करते हैं तो क्यों न हिंदी का लेखक भी इस माध्यम का उपयोग कर एक बृहत् नव-पाठक वर्ग से जुड़े. आज हिंदी में बहुत सी ऎसी साइट्स हैं जो हिंदी लेखन को प्रकाशित कर रही हैं और एक बड़े पाठक वर्ग से जोड़ रही हैं. लेखक अब नामी पत्रिकाओं और प्रकाशकों का मोहताज नहीं है.
अब वो जमाना नहीं रहा कि हिंदी सीखने के लिए चंद्रकांता संतति पढ़ी जाए.  पुस्तकालयों की जगह अब अधिकाँश नागरिकों के हाथ में ई-लाइब्रेरी है. इस ई-लाइब्रेरी की सुविधा ई-पाठक उठा रहे हैं तो लेखक क्यों इस माध्यम से दूर रहे?
हाँ, हिंदी लेखन के क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा का नितांत अभाव था, सो डिजिटल माध्यम में भी ऐसी दिक्कतें हैं. गुरुओं ने शायद शिष्यों के अंगूठे माँगा बंद नहीं किया होगा सो हिंदी में शिष्य देश-विदेश का उपलब्ध साहित्य पढ़कर हिंदी में लेखन करता है. और लेखक के पास अपना लोक, अपना परिवेश, अपनी विरासत भी की पूँजी भी होती है. इस लोक को गुनकर या फिर बेचकर लेखक नाम कमाते रहते हैं.
एक जमाना था जब महानगरों में काफी-हाउस हुआ करते थे जहाँ स्टार लेखक आते थे और नये लेखक उनसे मिलते-जुड़ते थे. कितने लोगों को ये अवसर मिल पाता होगा तब? आज सोशल साइट्स में बड़े लेखक मौजूद हैं जिनसे गाँव-गिरांव का लेखक/पाठक सीधे संवाद कर ले रहा है. यह एक बड़ी सहूलत मिली है, और इस माध्यम से बेशक लोक-शिक्षण भी हो रहा है. मैं मप्र की सीमा पर एक कोयला खदान में काम करता हूँ. यह साइबर स्पेस है जो मुझे देश दुनिया से प्रतिदिन जोड़े रखता है. इस डिजिटल युग में मेरी भावनाओं पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ा है तो बेशक इस माध्यम का स्वागत होना ही चाहिए.

संवेदना विहीन समाज का दायरा लगातर फ़ैल रहा है , इसका क्या कारण है ?
बढती आबादी, बेरोज़गारी, भूख-गरीबी से उत्पन्न अवसाद से पूरे विश्व का एक बहुत बड़ा वर्ग प्रभावित है. सिर्फ मुट्ठी-भर लोगों को सुविधाएँ और अनुकूलताएँ नसीब हो रही हैं. गरीब-अमीर के बीच खाई बढती जा रही है. इसका सीधा असर इंसान की सम्वेदनाओं पर हो रहा है. दुखी लोगों की बढती जमात किंकर्तव्यविमूढ़ सी जूझ रही है. बाज़ार में इंसान एक खरीदार बन कर रह गया है और सब कुछ बिकते हुए समय में कुछ भी न खरीद पाने वालों का दुःख बढ़ता जा रहा है. ये दुःख समाज में गरबीली गरीबी की जगह संवेदन-हीनता को बढ़ा रहा है.
इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित है युवा वर्ग. इस वर्ग को रोज़गार चाहिए. काम चाहिए. स्वावलम्बन चाहिए. संविधान सम्मत तमाम उपाय इन युवाओं को देश का नागरिक बनाये रख पाने में असमर्थ हैं. पढ़े-अनपढ़ इन युवाओं की प्राथमिकता अब फ्री डाटा-पैक हो गई है. राजनितिक संस्थाएं इन युवाओं को गुंडा / लूम्पेन की तरह इस्तेमाल कर रही हैं और आतंकवादी/ फासीवादी ताकतें इन युवाओं को धर्म की अफीम चटा कर उन्माद और दंगों का हथियार बना रही हैं….
वाकई ये ऐसा समय जहाँ सम्वेदनायें दम तोड़ रही हैं और बर्बरता फल-फूल रही है….

हिंदी साहित्य में ठेलो -धकेलो की परम्परा ने जो नई रफ़्तार पकड़ी है , उसे आप किस तरह से देखते हैं ?
हर युग में ऐसे लोग होते हैं जो जेनुइन की जगह नकली लेखन को बलजबरी प्रोत्साहित/ स्थापित करते रहते हैं लेकिन इससे जेनुइन लेखन का कोई नुक्सान नहीं होता. जेनुइन लेखन ही कालजयी होता है. बकौल मुक्तिबोध--अभिव्यक्ति के खतरे उठाने वाले लेखकों के लिए पाठक/प्रशंसक आदि पाना आसान होता है. नकली चिंताएं और नकली क्रांतियों के भेद ज्यादा दिन नहीं छुपे रह सकते हैं. असली लेखन ही स्थापित होता है. लेखक को अपनी लेखनी पर भरोसा होना चाहिए न कि ठेल-धकेल कर स्थापित होने का उपक्रम करना चाहिए.
तालियाँ / वाह-वाहियाँ जेनुइन लेखन की राह में रोड़े अटकाती हैं. गुपचुप साधना का कोई विकल्प नहीं है और यह भी सत्य है कि जो रचेगा वही बचेगा. बाकी सब कुछ समय भुला देगा.
कई गिरोह बनते-बिगड़ते रहते हैं जो शॉर्टकट रास्ते के राही लेखकों पर अटैक करते हैं और उन्हें अपनी गिरफ्त में लेकर धंधेबाजी करते हैं लेकिन इन गिरोहों के निशाने पर कुछ जेनुइन लेखक भी होते हैं जो गाइडेंस के अभाव में गुमराह होते हैं. अब लेखक को स्वयं सचेत रहना है और ‘अहो रूपम, अहो ध्वनि!’ के वाग्जाल से मुक्त होना है.
हाँ, नव-लेखन को मिसगाइड नहीं बल्कि प्रोमोट करना ज़रूरी है. ये नए लोग आखिर हिंदी लेखन के क्षेत्र में क्यों आ रहे हैं? इनकी क्या कोई मजबूरी है या फिर इन्हें यही एकमात्र ऐसा माध्यम मिला है जिससे ये खुद को स्वतन्त्र रूप से अभिव्यक्त कर लेते हैं. तो इन नये लिखने वालों पर विकट आलोचकीय कुल्हाड़ी न चला कर इनके लेखन को दशा-दिशा देने वाले सुझाव आने चाहिए. उनके लिखे का सम्मान होना चाहिए क्योंकि प्रख्यात लेखक या आलोचक बनने से पूर्व आप भी तो एक पाठक ही थे और फिर धीरे से एक नवलेखक भी थे. तब किस तरह से आपके पूर्ववर्ती लेखकों ने आपको प्रोत्साहित किया था उसे भूलें नहीं. इस तरह ठेलो-धकेलो परंपरा के लोग खुद-बखुद मुंह के बल गिर जायेंगे.


कविता का सौन्दर्यशास्त्र क्या है ?
सौन्दर्य-शास्त्र जैसे प्रश्नों से मैं बचना चाहता हूँ. कविता का सौन्दर्य शास्त्र जैसा प्रश्न सुनकर ऐसा लगता है कि कोई कहीं बिरयानी का सौन्दर्य-शास्त्र या फिर जुताई-बोआई का सौदर्य शास्त्र जैसे सवाल क्यों नहीं बनाता है? अरे भाई, कविता अभिवयक्ति का एक फॉर्म है और इसमें अनुशासन है भी और नहीं भी है. ये कवि और पाठक के बीच का रिश्ता है. इसमें किसी मध्यस्थ की कोई ज़रूरत नहीं होनी चाहिए. इन मध्यस्थों ने कविता का बड़ा नुक्सान किया है. लय,छंद, रस, अलंकार, शाब्दिक चमत्कार जैसे प्रयोगों के लिए कविता सवतंत्र है. हिंदी कविता संस्कृत, अवधि, ब्रज, भोजपुरी, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी जैसी भाषाओँ की कविताओं की समृद्ध परंपरा को साभिमान साथ लेकर चल रही है और सबसे ज्यादा हिंदी में आज कवि हैं और प्रति वर्ष कविता की अनगिनत किताबें छपती हैं. ऐसे में कविता के सौन्दर्य-शास्त्र के बौद्धिक आतंक से कवियों को मुक्त रहना चाहिए.
भूमिगत कोयला खदान की अँधेरी सुरंगों के असामान्य वातावरण में, कैप-लैम्प की धुंधली रौशनी से राह तलाशता जब मैं  मीलों  घूमता हूँ तब जीवन का कोई सौन्दर्य शास्त्र मुझे नहीं सूझता. धरती के गर्भ की गर्मी से उग आती है देह में पसीने की बूँदें और खुद के कदमों की आहट से लरजता रहता तन-मन. यही जीवन की सच्चाई है. गृहणी बच्चे को दूध पिलाकर सुलाती है और फिर बच्चे के जागने से पहले किसी सर्कस के कलाकार की तरह एक साथ कई काम पूरी तन्मयता और सम्पूर्णता से करती है. ऐसा ही बड़ा तेज़ रफ़्तार युग है यह, जब कविताएँ लिखी भी जानी हैं, छपी भी जानी हैं और पढ़ी भी जानी हैं.
आभाषी संसार में आकार लेती हिंदी कविता ने जो कविताएँ दी हैं और जिस तरह से ये कविताएँ पढ़ी-सराही जा रही हैं ऐसे में मुझे तमाम यही लगता है कि हमने अपना एक नया सौंदर्यशास्त्र खुद ही गढ़ लिया है. इसे किसी प्राध्यापकीय या अकादमिक आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.

आज हिंदी आलोचना किस दशा में है ?  
किसी भाषा में जब तक आलोचक अपने समय के लेखन को स्वयं खोजकर नहीं पढ़ेंगे, तब तक जो भी आलोचकीय बातें प्रकाशित होंगी वो संदेह के घेरे में रहेंगी. आज आलोचक के टेबिल में कुछ किताबें पहुँचती हैं या कि पहुंचाई जाती हैं. कुछ लेखक पहुँचते हैं या फिर अनुशंसित होकर पहुंचाए जाते हैं. फिर ये ही किताबें चर्चित होती हैं और यही लेखक. सीधे समझ में आती है बात कि अपने समय में हो रहे जेनुइन लेखन की नब्ज़ को देखना, पढना आलोचना को विश्वसनीय बनाये रखने में मददगार साबित होगा वर्ना आलोचकों की परवाह करता कौन है?
विदेशी विचारों की रौशनी में देशी लोक का छौंक देकर बौद्धिक आतंकी भाषा के आवरण में जो आलोचना परोसी जा रही है, उसी कारण  लेखक कवि आजकल आलोचक की परवाह नहीं करते हैं. किसी भाषा के साहित्य के लिए यह एक अच्छी प्रवित्ति नहीं है, इससे आलोचक और लेखक अलग-अलग राह पकड़ लेते हैं और इस झगड़े में आने वाली पीढ़ी को कोई दशा-दिशा नहीं मिल पाती है. 
क्या कवि बनाये जा सकते हैं ? क्या कविता लिखी जा सकती है या लिख जाती है ?
 मैंने चाहा कि हारमोनियम बजाने लगूं, क्या मेरे चाहने से ऐसा संभव हो पायेगा? 
 हारमोनियम खरीद कर घर में रख लेने से भी मैं उसे बजा नहीं सकता हूँ. सामान्य पेन 
 से खराब कविताएँ और पारकर की पेन से क्या खूब अच्छी कविताएँ लिखी जा सकती हैं?
 ऐसा दावा कोई नहीं कर सकता कि उसके पास ऐसा विश्वसनीय, उच्च-स्तरीय कारखाना 
 है जहां से साल में इतने कवि बना कर निकाले जाते हैं. आप दरजी बना सकते हैं, बढ़ई,
 वेल्डर, संगीतकार आदि बना सकते हैं लेकिन कवि बनाने का दावा कतई न करें. ऎसी
 खुश-फहमी न पालें कि कोई रसखान बना सकता है, कोई संस्था तुलसीदास या कबीर 
 बना सकती है. कविता तो मेरे लिए किसी आयत से कम नहीं है और कवि बेशक एक 
 सृष्टा ही होता है.....

शनिवार, 14 जुलाई 2018

आओ, बोलें, मिलजुल लब खोलें.



उनकी हर इक बात के
अर्थ हैं कुछ और
बड़े साधारण से शब्द हैं
कोई गोला-बारूद या खंज़र नहीं छिपा है इनमें
लेकिन एक चीज़ पेवस्त है साथी 
जिसे हम नफरत कहते हैं
और जिस नफरत के बलबूते
खड़ा होता जा रहा है एक साम्राज्य
देखते-देखते....
बाल की खाल निकालना
हर किसी को नहीं आता
अमूमन लोग समझना नहीं चाहते
और वही अर्थ ग्रहण करते हैं
जो कि होना चाहिए था
लेकिन ऐसा नहीं है दोस्त
ये कोड हैं, कोई साधारण बात नहीं
हर बात के कई निहितार्थ हैं
अब वक्त आ गया है
इन बड़ी-बड़ी बातों को डिकोड करने का
क्योंकि उनमें-हममें जो फर्क है
वह सिर्फ इतना है कि
वे खोजते रहते हैं सिर्फ बुराइयां
और हम नज़र-अंदाज़ करते जाते हैं बुराइयां
कि सच और अच्छाई को साबित क्या करना
लेकिन हम गलत साबित हुए जा रहे हैं
देखो, लांछनों के कचरे फेंके जा रहे हम पर
ढेरों तले दब जायेंगे इक दिन यूं ही खामोश रहे तो
आओ, बोलें, मिलजुल लब खोलें.

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

आईने चटक कर टूट रहे हैं



सम्मानित हो रहे वे
जो ताने-उलाहने और गालियाँ दे रहे
प्रतिष्ठित हो रहे वे
जो भीड़ की शक्ल में धमका रहे
और कर रहे आगज़नी, लूटपाट
पुरुस्कृत हो रहे वे
जो बलजबरी आरोप लगाकर
कर रहे मारपीट और हत्याएं
ऐसे लोगों की बढती जा रही तादाद
छिटपुट चिंताएं और भर्त्सना के शब्द
किसी भी तरह से नहीं पायेंगे भरपाई
देखो तो सही कितनी बेरहमी से
आईने चटक कर टूट रहे हैं
और इन कांच के टुकड़ों में
पेवस्त चेहरों से टपक रहा खून
इस दुर्दांत समय में कुछ लोग गुपचुप
अपने-अपने खुदाओं का शुकराना अदा कर रहे
कि उन्हें नहीं पड़ रही गालियाँ
कि बचे हैं अब तक उनके घर आगजनी से
कि उन्हें नहीं खोज रहे हत्यारे
सांत्वना देते हैं कुछ लोग
ऐसा हमेशा नहीं होता रहेगा
ठंडा जायेंगे लोग तो सब कुछ हो जाएगा
एकदम पहले जैसा ही
भले से ऐसी बाते करने हैं इने-गिने ही
लेकिन ढाढ़स बंधाते इन शब्दों के मरहम से
तुम्हें क्या पता हमारे कमजोर दिलों को
कितना सुकून मिलता है
तुम ऐसे ही बतियाते रहना दोस्त
कि तुम्हारी बातें मरहम है हमारे लिए....

रविवार, 1 जुलाई 2018

ओ नादान बच्चियों!


लडकी जबसे होश संभालती है
तभी से एक डर उसके साथ चलता है
हो सकता है अचानक कोई यौन हमला
कहीं भी
कभी भी 
घूरती निगाहों के एक्सरे से बचती-बचाती
गुजारती रहती है उम्र के रास्ते
लेकिन उन बच्चियों का क्या हो
जिनके नन्हे से तन-मन को
होश सम्भालने से पहले ही
कोई दरिंदा
कोई भेड़िया
नोच-खसोट के
कर देता है लहुलुहान
ऐसे पशुओं से कैसे हो हिफाजत
ओ मेरी नन्ही बच्ची
हम समाज के तमाम
तथाकथित सुलझे हुए लोग
बहुत शर्मशार हैं
कि अभी भी नहीं हुए सभ्य
क्षमा करना हमें
ओ नादान बच्चियों!