सोमवार, 5 मार्च 2018

कैसे कह दें कि हम भी खुश हैं

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कैसे कह दें कि हम भी खुश हैं
रोज़ इक इम्तिहान देते हैं
और हर शाम फैल हो-होकर
ग़म के झुरमुट में गुम हो जाते हैं
मायूसियां पीछा छोड़ती नहीं
खामोशियां चीखना चाहे हैं
बड़बोलों ने समय को हाय साध लिया
कुछ दबंगों ने रस्ता रोक लिया
झिलमिल सी उम्मीदें भी साथ न दें तो
आप कहिये कि हम कहां जाएं।।।

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

छोटे-छोटे गोयबल्स

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कोई तो बतलाये
कैसे बचा जाए
आये दिन पैदा हो रहे हैं
छोटे-छोटे लाखों गोयबल्स
झूठ को सच में बदलने में माहिर हैं ये
यही तो करते आये हैं कि एक दिन
भीमकाय झूठ के आगे बौना हो गया सच 

धड़ाधड़ हो रहा उत्पादन
उनकी फैक्ट्रियों से रेडीमेड झूठ का
सदियों से स्थापित सच को विस्थापित करते झूठ
हम इने-गिने लोग ही तो बचे हैं
जो समझते हैं कि अंत में सच की होती है विजय
लेकिन यह विश्वास भी अब डगमगाने लगा है
वैकल्पिक तौर पर झूठ का मुकाबला
और बड़े झूठ से करने की कवायद ठीक नहीं है भाई
सच के साथ डटे रहना है हमें

आओ कि कोशिश करें
कि थोडा सा सब्र और थोड़ा सा आत्मबल
इस कठिन समय में बचा कर रखा जाए.....


शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

अपने हक़ की बात

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हम कब कह पायेंगे
अपने हक़ की बात
उसके सामने और सबके सामने
कब जुटा पायेंगे हिम्मत
कब कह पायेंगे
बिना नशा किये अपने मन की बात
कब कह पायेंगे
बिना गिड़गिड़ाये
बिना हकलाये
बिना सकुचाये
अपने मन की बात
कि आज तक सीखा है हमने
सलीके से बात करने का हुनर
कि आज तक सिखाया गया है
आवाज़ नीची रखना
कि आज तक नजरें झुकाए
थोड़ा थरथराये से
कहते हैं इस तरह बात
कि मिल जाए डांट
दुत्कार
तिरस्कार
तुम्हें मालूम है न
कोई बात कहने के लिए
हम कितनी बार करते हैं रिहर्सल
भाषा बदल-बदल कर
भंगिमा बदल-बदल कर
खुद ही खुद से करते हैं इल्तिजा
खुद ही एक नये पैंतरे के साथ
गढ़ते हैं इस तरह वाक्य
कि बात भी बन जाए
और तिरस्कार भी न हो

जाने कब होगा ऐसा
कि बिना सम्पादन किये
कह सकेंगे हम अपने हक़ की बात
एक दम डायरेक्ट...

सोमवार, 29 जनवरी 2018

कमबख्त दिल को चैन नहीं किसी तरह



टीवी से दूर भागा मैं
यह आसान तो नहीं था 
क्योंकि सिर्फ
एक मैं ही तो नहीं था दर्शक पूरे परिवार में
फिर भी मेरे लिए सभी ने किया त्याग
छोड़ दिया टीवी देखना
कि सिवाय सिरदर्द के कोई न्यूज़ नहीं रहती
सीरियल्स भी अब वाहियात आते हैं
टीवी के चक्कर में अखबार भी
बिन खुले ही स्टोर पहुँच जाता है कभी-कभी
मेरे लिए घर में अन्य सदस्यों ने
बना ली एक सी राय
कि मुखिया टीवी देखकर गुमसुम से
बैठे रह जाते हैं जैसे कोई झटका लगा हो
शायद यही कारण हो कि
रक्तदाब और शुगर नियंत्रण में नहीं हो पा रहा हो
टीवी से दूर भागा मैं
लेकिन चिंताएं अपनी जगह रहीं यथावत
टीवी जैसा मर्ज़ सोशल साइट्स में भी बरकरार है
हर जगह आधी-अधूरी सूचनाएं
हर जगह अपने-अपने अलहदा चूल्हे
हर जगह अनबन, तनातनी
हर जगह अपनी श्रेष्ठता के भाव
हर जगह प्रेम का दिखावा और खूब-खूब नफरतें
अख़बार, पत्रिकाएं ही नहीं अड़ोसी-पड़ोसी भी
किसी साज़िश में मुब्तिला हों जैसे
माथे पर सलवटें ऐसी कि हटाए न हटें
दिमाग की नसें ऐसी कि अब फटीं कि तब
अन्फ्रेंड और ब्लाक करने का हुनर न हो तो
तनाव बढ़ता है, और बढ़ता जाता है...
ऐसे वाहियात समय में दोस्तों
हम जी रहे हैं ये क्या कम है
चंद हमखयाल हैं तभी तो दम है..................

बुधवार, 17 जनवरी 2018

मत तलाशो सौन्दर्य-शास्त्र मेरी कविताओं में

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आलोचकों काहे तलाशते हो
किसी भी तरह का सौन्दर्य-शास्त्र मेरी कविताओं में
मेरी कवितायेँ बाहर हैं उन सीमाओं से
यह समय सौन्दर्य-शास्त्र के मापदंड साधने का नहीं है दोस्तों
भोथरे होते जा रहे हैं पूर्व और प्राच्य के चिंतन 
रस-छंद-अलंकार की बंदिशों में
मत बांधों कुछ दिन और इन कविताओं को
ये कवितायेँ जूनून में तारी हो रही हैं
देखते नहीं कि तमाम तार्किकताओं को
किस तरह किया जा रहा है ध्वस्त
अतार्किकता इस समय का मूल भाव है
झूठ की बुनियाद में खड़ी की जा रही हैं अट्टालिकाएं
सच कवि के साथ सहमा-सिकुड़ा खामोश है
बरसों से बनी-बनाई संस्थाएं बिचौलियों का काम कर रही हैं
और जाने कितने संशोधनों के थीगड़े चिपकाए
भारी-भरकम किताब उपेक्षित सी हाशिये पर सिसक रही है
आलोचकों, यह समय एक नया सौन्दर्य-शास्त्र गढ़ने का है
तुम बने-बनाये फार्मूलों की ज़द से बाहर आओ
आने वाला समय तभी तुम्हें गंभीरता से लेगा
एक बात तो तय कर लिए जाए
कि किसी भी तरह के आनंद की अनुभूति के लिए अब
कोई कवि नहीं लिख रहा कविताएँ
और जो लिख रहे हैं
उन्हें समय कभी माफ़ नहीं करेगा...

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

खुद्दार इतने हैं कि बस खामोश हैं

कब तलक चलता रहेगा
मनमानी का कारोबार
कब तलक खामोशियों को
अनसुना करती रहेंगी
कत्लगाहों की चीत्कारें
कब तलक छाई रहेंगी बदलियाँ
कब तलक सिमटी रहेंगी परछाइयां
कब तलक लगती रहेंगी बंदिशें
आइये और देखिये तो गौर से
उस भीड़ में लाचारी है, गुस्सा भी है
तमतमाए हैं कई चेहरे, भिंची हैं मुट्ठियाँ
ये कोई आयातित बंदे नहीं हैं
ये कोई प्रायोजित धंधे नहीं हैं
खुद-ब-खुद आये हैं भूखे हैं मगर
खुद्दार इतने हैं कि बस खामोश हैं
मेरी आँखों से देखो दिख जायेंगी
अनगिनत ज़ुल्मो-सितम की दास्तान
कोई टीवी कोई अखबार नहीं इनके लिए
कोई खुदाई मददगार नहीं इनके लिए
मुद्दतों से हैं ये मजलूम ठगी के शिकार
फिर कोई डाका न डाले होशियार
हर किसी के मन में इक उम्मीद है
इस उम्मीद से हमें भी बड़ी उम्मीद है......

सोमवार, 15 जनवरी 2018

लाशों में तब्दील होते लोग

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खुद से ही
क़त्ल हो जाओ
कि बाद तुम्हारे
थरथराते बचे लोग
कह सकें कि स्वेच्छा से
लाशों में तब्दील हुआ था वो।
यह नया निज़ाम है दोस्तों
जब लाशें क़ातिलों की शिनाख्त नहीं करतीं
और जीवित बचे लोग
बहुत दिनों तक
साबुत बचे रहने के लिये
हो जाते खामोश
जीवित लोगों को मालूम है
कि लाशों में बदलने की प्रक्रिया
बहुत तकलीफदेह होती है।।।

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

जेलों का समाज-शास्त्र

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जेलों में बहुत कम मिलेंगे अगड़े
मिलेंगे भरपूर दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़े
ये क़ैदी चुपचाप सज़ा काटते
और मुक्ति की चाह से बेपरवाह दीखते
वे जापनते हैं कि बाहर निकलकर
कौन पैर पुजवाना है किसी से
जेल के बाहर भी तो एक है दुनिया
जहां भी तादाद में कम ही हैं अगड़े
लेकिन हर संस्था के
मुख्य द्वार की चाबियां
रहतीं इनके पास
यहां भी दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक
वंचित हैं सुविधाओं से
फिर कहां जाएं ये लोग
जिन्हें कहते हैं कि संविधान की किताब में
सबसे ज्यादा ताकत दी गई है
इस दी गई ताकत से
खुद ब खुद प्राप्त ताकत जीत जाती है
कि ज़िंदगी के इस खेल का निर्णायक
अगड़ा ही होता है
हर तरह की लूट में मुब्तिला है यही अगड़ा।।।

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

हम शर्मिंदा हैं निर्भया

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हम शर्मिंदा हैं निर्भया
कि हम पुरुष हैं
कि हम तलाशते रहते हैं 
किसी भी समय बलात्कार की सम्भावनाएँ
ज़रूरी नहीं कि जिस्म से ही
देखकर, सुनकर, सूंघकर भी
कोशिशें करते रहते हैं बलात्कार की
जरुरी नहीं कि हम जिस्मानी तौर पर
पूर्ण पुरुष हों लेकिन
कहीं भी, यूँ ही, स्खलित होने के
चूकना नहीं चाहते अवसर
हम शर्मिंदा हैं निर्भया
कि हम बड़े शातिर हैं
कभी भाई, कभी बाप, कभी चाचा-मामा
कभी डॉक्टर, तो कभी अध्यापक की आड़ लेकर
खोजते रहते हैं बेबस शिकार
हमने मछली कहा तुम्हें
और चारा डाल कर पकड़ लिया, यूं
कभी चिड़िया कहा
और दाना डाल कर पकड़ लिया, यूं
हिरनी कहा और दौड़ा कर शिकार कर लिया
हम शर्मिंदा हैं निर्भया
कि अपनी बच्चियों की हिफाज़त के लिए
हम रहते हैं बड़े चौकन्ने
कि उन्हें गड़ने न पाए काँटा भी
लेकिन निर्भया,
केवल अपनी बच्चियों के लिए ही
रहते हैं सतर्क और लेना नहीं चाहते
तनिक भी रिस्क...
क्योंकि हमें मालूम हैं
हम नहीं तो कोई और पुरुष
घूमता रहता है हर समय
एक कोमल शिकार के लिए.....

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

लेकिन दिल नहीं बहला

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पहले बहल जाता था दिल
मरहम के इक फाहे से भी
आज जाने क्या हुआ
लोग आए, सभी ने की दुवाएं भी
लेकिन दिल नहीं बहला 
हरारत भी रही आई
कि घबराहट अब भी वैसी है
मुझे मालूम है ओ चारागर तुम भी
इधर कुछ खोए रहते हो
तुम्हारे इल्मो-हुनर पर भी
किसी ने कर दिया है कुछ
दवाएं बेअसर हैं अब।
ज़रा सोचो, ज़रा समझो
कोई तो राह निकलेगी
चलो फिर कोई नुस्खा
करें ईजाद कुछ ऐसा
कि जिससे इस जहां में फिर
भरोसा हो जाए खुद पर।।।।।

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

खोखली सांत्वना...

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आ रहे ढाढ़स बंधाने लोग
ऐसा नहीं कि निभा रहे हों रस्म
वे दिल से दुखी हैं
उतने ही डरे हुए भी
जितना कि हम हैं खौफ़जदा
आए हैं वे सभी लोग सांत्वना देने
जो धार्मिक हैं लेकिन धर्मांध नहीं
उनमें कई नास्तिक भी हैं
ये सभी दुखी हैं और डरे हुए भी
लेकिन हम समझें अगर
तो ये सभी शर्मिन्दा भी हैं
शर्मिन्दा इसलिए भी कि अब लगता है
बेशर्मी ही जीता करेगी हमेशा
हां, यह अलग बात है
कि अपनी ही आवाज़ उन्हें
बेजान सी लगती है
सांत्वना देने वाले भी
जैसे जानते हैं कितने
खोखले होते हैं शब्द

रविवार, 10 दिसंबर 2017

मैं इसे उम्मीद कहता हूँ..

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कोई चीज़ है ऎसी
जो बार-बार तोड़े जाने की 
ज़बरदस्त कोशिशों के बाद भी
टूटने नहीं दे रही
खंडित होने के लिए विवश वजूद को
दानिश्वर इसे जो कहें
मैं इसे उम्मीद कहता हूँ
बस, इसी उम्मीद के सहारे
कट जायेंगी काँटों भरी राहें
चाँदनी-बिना पथरीली पगडंडियाँ
तुम देखते रहना
चुपचाप...
मन की हारे हार है
मन है कि हारना नहीं चाहता
बेयारो-मददगार बचाए रखना अपना वजूद
मौत के कुंए में चक्कर लगाने वाले
मोटर-साइकिल चालक जैसा अभ्यस्त हो चुके हैं हम
बिना किसी निर्धारित पाठ्यक्रम के
बहुत लम्बे समय से ली जा रही है धैर्य की परीक्षा
और परीक्षा परिणाम घोषणा के पहले
एक नया प्रश्न-पत्र रख दिया जाता है सामने
अकबकाओ या भुनभुनाओ
उन नित नए अनगिनत सवालों के जवाब लिखते-लिखते
कई पीढियां गुज़र गई हैं भाई
न परीक्षा ख़त्म होती है
न सवालों की फेहरिस्त
समझदार लोग जानते हैं
सुहानुभूति भी रखते हैं
कुछ सहृदय दोस्त, परीक्षा-भवन तो छोड़ भी आते हैं
लेकिन इन परीक्षाओं से
इन अनगिनत सवालों से
कोई तो निजात दिलाओ
आओ भाई, आगे आओ
हमें बचाओ.....
कि ना-उम्मीदी अभी भी हमसे
एक बिलांग दूरी बनाये हुए है
बस, एक बिलांग...
🌸

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

अपमान की बरसी



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हम इंतज़ार नहीं करते
फिर भी, हर बरस आती है
हमारे लिए अवसाद, हताशा, अपमान की बरसी
उद्दंडता, निर्लज्जता, बेहयाई की बरसी
हम याद नहीं करते
फिर भी, हर बरस आकर
अहसास करा जाती है
कि कैसे टूटते हैं दिल
कैसे होती है विश्वास का कत्ल
जिसे बड़ी मुद्दत से संजोकर
बारीकी से एक धागे में पिरोकर
हजारों साल के लिए संरक्षित किया गया था
हम भूलना चाहते हैं
एक नये कल की आस में
मिटाना चाहते हैं अतीत के निशाँ
फिर भी हर बरस सुनाई जाती है
उन अनकिये गुनाहों की फेहरिस्त
जिनसे हमारा कोई लेना-देना नहीं
हमारा वजूद बना दिया गया कितना गैर-ज़रूरी
हम बार-बार
बताना चाहते हैं कि हमारी मौजूदगी
कोई ऐतिहासिक मजाक नहीं है भाई
हम सच में इस बगिया का हिस्सा हैं
मिटटी, हवा, पानी और धूप पर
उतना ही हक़ है हमारा
जितना कि तुम्हारा है......